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बहस-तलब : जातिवाद और पूंजीवाद के दोहरे शिकंजे में फंसते दलित-आदिवासी-ओबीसी

भारत का मेडिकल सिस्टम जातीय पूर्वाग्रहों से भरा पड़ा है। अभी दो सप्ताह पूर्व तमिलनाडु के नागपट्टनम जिले मे एक मेडिकल कॉलेज मे फिजियोथेरेपी की छात्रा सुभासिनी ने आत्महत्या कर ली, क्योंकि समय पर फीस न दिए जाने के कारण कॉलेज प्रशासन के लोगों ने उसे जातिसूचक शब्दों के साथ अपमानित किया। बता रहे हैं विद्या भूषण रावत

राजस्थान के दौसा जिले मे पिछले महीने के अंत मे एक घटना ने लोगों को झकझोर दिया, जिसमें एक डाक्टर ने स्थानीय नेताओ के उत्पीड़न के चलते आत्महत्या कर ली। इसके बाद तो सभी स्थानों पर डाक्टरों व अन्य स्वास्थ्यकर्मियों ने आंदोलन शुरू कर दिया। लेकिन यह आंदोलन एक डाक्टर के उत्पीड़न के विरुद्ध न होकर दलितों के विरुद्ध भावनाए भड़काने वाला हो गया और ये आरोप लगे कि दलित आजकल अपने ‘दलित’ होने का लाभ उठा रहे हैं। यह भी कहा गया कि वे आरक्षण का लाभ लेते हैं और हर जगह पर जाति का सहारा लेकर लोगों का उत्पीड़न कर रहे है।

घटना बीते 28 मार्च, 2022 की है। दौसा के एक निजी चिकित्सालय मे आशा बैरवा नाम की एक महिला को प्रसव हेतु भर्ती करवाया गया था। इस नर्सिंग होम को डाक्टर अर्चना मिश्र और उनके पति डाक्टर सुनीत उपाध्याय चलाते है। आशा बैरवा 22 वर्ष की है और उनके पति दैनिक मजदूरी कर अपना गुजारा करते हैं। इसी नर्सिंग होम में आशा बैरवा ने पहली बेटी को भी जन्म दिया था। लेकिन इस बार डाक्टर उनके बच्चे को तो बचा गए, लेकिन आशा बैरवा की मौत हो गई।

बताया जाता है कि इसके बाद आशा बैरवा के परिवार वालों ने अस्पताल के डाक्टरों के विरुद्ध धरना दिया और बाद मे डाक्टर अर्चना शर्मा के विरुद्ध धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज करने की बात कही गई। इस घटनाक्रम से डाक्टर अर्चना शर्मा बहुत आहत हो गईं और उन्हें लगने लगा था कि राजनीतिक लोग उन्हे परेशान करने का षड्यंत्र कर रहे हैं। अपने परिवार को इस षड्यंत्र से बचाने के लिए उन्होंने आत्महत्या कर ली। अपने सूइसाइड नोट में उन्होंने कहा कि हमने आशा बैरवा को बचाने की पूरी कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हो पाए। उन्होंने कहा कि उन्होंने पूरी ईमानदारी से अपना प्रयास किया।

इस पूरे घटनाक्रम से कुछ बातें सामने आई हैं, जिनपर ध्यान देना जरूरी है। आशा बैरवा के परिवार के लोग उन्हें सरकारी अस्पताल में ले गए थे, लेकिन वहां उन्हें बात नहीं जमी और वे उन्हें डाक्टर अर्चना शर्मा के नर्सींग होम में ले गए, जहां उनका ऑपरेशन किया गया, लेकिन अत्यधिक खून बह जाने से उनकी मौत हो गई। अब इसके बाद नेताओं का प्रवेश होता है और भाजपा के कुछ नेता आशा के परिवारवालों को बताते हैं कि वह उन्हें दस लाख रुपए का मुआवजा दिलवाएंगे। वे धरना प्रदर्शन करते हैं और पुलिस एफआईआर दर्ज करती है। अब पुलिस कह रही है कि उसने 302 के तहत मुकदमा दर्ज नहीं किया था। एफआईआर स्थायी भी नहीं थी। 

राजस्थान के दौसा में डा. अर्चना शर्मा की खुदकुशी के बाद प्रदर्शन करतीं महिला चिकित्सकगण

बताते चलें कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक आदेश में कहा है कि डाक्टरों पर किसी भी मरीज की मृत्यु होने की स्थिति में हत्या का मुकदमा दर्ज नहीं किया जा सकता तो फिर पुलिस ने एफआईआर में इसे कैसे शामिल किया। क्या इसका मतलब यह नहीं निकाला जा सकता है कि पुलिस स्थानीय नेताओं के दवाब में कुछ भी कर सकती है?

डाक्टर अर्चना शर्मा की खुदकुशी के बाद आशा बैरवा के पति ने कहा कि उन्होंने एफआईआर दर्ज नहीं करवायी थी, अपितु उनसे एक खाली कागज पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा गया था। वह कहते हैं कि वह पढ़ना-लिखना नहीं जानते और वे नाराज जरूर थे, लेकिन उन्होंनेने डाक्टर पर हत्या का आरोप नहीं लगाया। 

दरअसल, आजकल माहौल ऐसा हो गया है कि लोग अपनी-अपनी सुविधाओ के अनुसार ‘मुद्दों’ को पकड़ रहे हैं। जैसे बहुत से लोग, जयपुर या दौसा की घटना के लिए दलितों मे पनप रहे अलगाववाद को दोषी ठहराते हैं। उन्हें लगता है कि दलित आरक्षण का लाभ लेते हैं और अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम का भी फायदा उठा रहे हैं तथा फर्जी केस दर्ज करवाते हैं।

अगर राजस्थान के उपरोक्त मामले को देखें तो इसका मुख्य अभियुक्त बाल्या जोशी है और वह फरार है। कुछ लोग गिरफ्तार भी हो चुके हैं। और यह देखना जरूरी है कि जैसे-जैसे राजस्थान मे चुनाव नजदीक आएगा, ऐसी घटनाओं की संख्या बढ़ेगी। ऐसे नेताओं को दलितों और पिछड़ों से कुछ भी लेना-देना नहीं है। अपितु उनके साथ हुए घटनाओं को वे जातीय या सामुदायिक रंग देकर अपना उल्लू सीधा करना होता है।

हालांकि ऐसा भी नहीं है कि भारत मे डाक्टर सांप्रदायिक या जातीय बीमारी से ग्रस्त नहीं हैं। दरअसल मेडिकल शिक्षा मे आरक्षण, विशेषकर उच्च शिक्षा में आरक्षण के प्रश्न पर भी तथाकथित उच्च जातियों का रवैया तनातनी वाला रहा है। मेडिकल की पढ़ाई के समय भी दलित और पिछड़े वर्ग़ के छात्रों को बहुत-सी परेशानियों का सामना करना पड़ता है और कई बार उन्होंने आत्महत्या जैसे कदम उठाने को मजबूर किये गए हैं। बंबई मे आदिवासी डाक्टर पायल तड़वी को आत्महत्या के लिए मजबूर करने वाले सीनियर अब खुले में घूम रहे हैं, क्योंकि न्यायालय ने उनके ‘करिअर’ का ध्यान रखते हुए उन्हे जमानत दे दी है।

भारत का मेडिकल सिस्टम इस प्रकार के जातीय पूर्वाग्रहों से भरा पड़ा है। अभी दो सप्ताह पूर्व तमिलनाडु के नागपट्टनम जिले मे एक मेडिकल कॉलेज मे फिजियोथेरेपी की छात्रा सुभासिनी ने आत्महत्या कर ली, क्योंकि समय पर फीस न दिए जाने के कारण कॉलेज प्रशासन के लोगों ने उसे जातिसूचक शब्दों के साथ अपमानित किया। वह प्रथम वर्ष की छात्रा थी और अपने माता-पिता की शान थी। उसके माता-पिता दोनों दिहाड़ी मजदूर हैं।   

दौसा में हुई घटना के बाद राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा कि डाक्टर भगवान होता है और उनके विरुद्ध आरोप नहीं लगाने चाहिए। उनकी बात से सहमति होते हुए भी असहमति है। एक तो यह कि डाक्टर आज के विज्ञान युग और वैज्ञानिक सोच-शोध का परिणाम है न कि किसी भाग्यवादी सोच का नतीजा। दूसरे, मेडिकल सिस्टम आज व्यापार बन चुका है। आरक्षण का विरोध तो सभी करते हैं, लेकिन मोटी फीस देकर प्राइवेट कॉलेजों मे दाखिला लेकर या विदेशों से डिग्री लेकर जो तथाकथित डाक्टर बनेंगे, वे अपने व्यापार के लिए ही ऐसा करेंगे। डाक्टरों को कोई भगवान कह सकता है यदि प्राइवेट क्लिनिक किसी गरीब मजदूर की मौत पर उसके परिवार वालों से पैसा न ले। ऐसा तो नहीं होता। यह हकीकत है कि प्राइवेट डाक्टर लोगों को खूब जांच करवाने के लिए कहते हैं और उन्हें अपने एजेंटों के पास भेजते है। 

एक बात और। आज इन्श्योरेन्स का जमाना है और प्राइवेट अस्तपतालों में डाक्टर आपसे पहले ही पूछ लेंगे कि क्या आपका इन्श्योरेन्स है? यदि मरीज का इन्श्योरेंस है तो फिर मनमाने तरीके से शुल्क वसूल लेते है। 

कोरोना काल ने हमें दिखाया कि गरीब की क्या ‘औकात’ है। लोग ऑक्सीजन की कमी से मारे गए। सरकारी अस्पताल के डाक्टरों के पास लोगों को हाथ लगाने तक की फुरसत नहीं थी और लोगों से बात करने की तमीज भी नहीं। उत्तर प्रदेश मे योगी सरकार में एक मंत्री चेतन चौहान की मौत कोरोना से हुई, लेकिन लखनऊ के मेडिकल कॉलेज मे डाक्टरों ने उन्हे पहचानने तक से इनकार कर दिया। जबकि चेतन चौहान देश के एक नामी गिरामी क्रिकेट खिलाड़ी भी रहे। उनका इलाज करवाने के लिए उनके नजदीकी तरस गए।

भारत मे शिक्षा और स्वास्थ्य पर सरकारों की कोई नजर नहीं है। अभी सरकार ने कोविड से बचाव के लिए वैक्सीन की तीसरी खुराक के लिए प्राइवेट अस्पतालों को छूट दे दी है, जो अपनी मनमानी करेंगे और पैसे लूटेंगे। गरीब के लिए कौन सी जगह है? सरकारी अस्पतालों मे काम करने वाले सफाईकर्मियों की हालत हम सब जानते है। कोरोना काल मे अपनी जान हथेली मे लेकर उन्होंने काम किया, लेकिन उन्हे कुछ न मिला। बहुत से लोगों की जान भी गई, लेकिन मुआवजा वैसे नहीं मिला, जो कोरोना योद्धा के नाम पर बाकी लोगों को मिल रहा था। हमने ऐसी स्थितिया देखी जब लोगों के पास पैसा नहीं था और अस्पतालों ने शव देने से इनकार कर दिया। पहले पैसे लाओ फिर शव मिलेगा। तो यह पूरा बिजनेस है, जिसमें डाक्टरों ने कोई कमी नहीं की है और जनता इसे जानती है।

कुछ वर्ष पूर्व दिल्ली के प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज मे एक विदेशी अतिथि का व्याख्यान था। विषय था– मेडिकल एथिक्स। आयोजकों ने मुझे भी उसमे बोलने के लिए आमंत्रित किया था। मैंने अपने वक्तव्य मे जब जाति का प्रश्न उठाया और उस दौर की एक घटना का जिक्र किया, जिसमें दिल्ली में एक सरकारी स्थान पर दो सफाईकर्मियों की सीवर में अचेत हो गए और जब उन्हे राम मनोहर लोहिया अस्पताल मे ले जाया गया तो डाक्टर ने उन्हे छूने से भी इनकार कर दिया। बाद में दोनों की मौत हो गई। ऐसा आरोप मृतकों के परिजनों ने बातचीत मे लगाया। वैसे जो सरकारी अस्पतालों की स्थिति जानते हैं, वे बता सकते हैं कि भारत में अधिकांश सरकारी अस्पतालों मे सफाईकर्मचारी भी हेल्थ वर्कर की तरह काम करते हैं। विशेषकर मोर्चरी में, जहां पोस्टमार्टम होता है। मैंने कहा कि जाति भारत की कड़वी हकीकत और डाक्टरी का पेशा इससे अलग नहीं है। मरीज को जाति के आधार पर न छूना मेडिकल एथिक्स नहीं, जातिवाद है। यह कोई दूसरे ग्रह की बात नहीं है कि जब उच्च शिक्षा मे दलित व पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की बात आई तो उसके विरुद्ध सबसे बड़ा आंदोलन एम्स (ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस) मे हुआ। आज भी भारत के छोटे कस्बों और गांवों मे डोम, मुसहर, बांसफोर या अन्य गरीब लोगों को डाक्टर दूर से ही देख कर दवा लिख देते हैं। ऐसे हालात में लोग झोला छाप डाक्टरों और जादू टोना की ओर रूख करते हैं। 

जाति भारत में अंधविश्वास का सबसे बड़ा कारण है और उसके लिए जरूरी है कि भारत मे इसके विरुद्ध हर स्तर पर पढ़ाया जाना चाहिए। यह बताना जरूरी है कि डाक्टर भी इंसान है और वह केवल प्रयास ही कर सकता है। डाक्टर को भगवान बता कर उनके उपर ऐसा बोझ पड़ सकता है कि जब मरीज ठीक नहीं होगा तो वो उनके उपर आसानी से आरोप लगा देगा कि इलाज ठीक से नहीं हुआ। कोई भी यह न सोचे कि वो आलोचना से परे है। मेडिकल सिस्टम का निजीकरण होने के कारण जनता पर जो बोझ पड़ता है, उसके कारण ऐसे आरोप लगते हैं। आज पूंजीवाद और जातिवाद दोनों का मिश्रण हो चुका है। 

होना तो यह चाहिए कि हर स्तर पर देश के सभी समुदायों की उसमें भागीदारी हो। ‘मेरिट’ के नाम पर देश भर मे जातिविशेष के लोगों का एकाधिकार पैदा किया जा रहा है, जो मानसिक तौर पर जाति के गुलाम हैं और दलितों और पिछड़ों को बहुत ही हेय दृष्टि से देखते हैं। ऐसी स्थिति अच्छी नहीं है क्योंकि ऐसी स्थितियों मे ईमानदार लोग पिसते हैं और चालाक अपना काम करते हैं। राजस्थान की घटना से देखा जा सकता है कि इस घटना का राजनैतिक लाभ कौन लोग लेना चाहते हैं। वही, जो दलितों और पिछड़ों को मेडिकल या इंजीनियरिंग मे आरक्षण का विरोध करते हैं तथा ऐसी दादागिरी करके उनके मुद्दों पर भटकाव पैदा करते हैं। याद रखिए ये प्रश्न भाजपा-कांग्रेस का नहीं है, अपितु जातिवाद और पूंजीवाद के गठबंधन से बनी व्यवस्था का है, जिसके वैल्यू सिस्टम में नोटों का खेल और जाति अंतर्निहित है।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

विद्याभूषण रावत

विद्याभूषण रावत सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता हैं। उनकी कृतियों में 'दलित, लैंड एंड डिग्निटी', 'प्रेस एंड प्रेजुडिस', 'अम्बेडकर, अयोध्या और दलित आंदोलन', 'इम्पैक्ट आॅफ स्पेशल इकोनोमिक जोन्स इन इंडिया' और 'तर्क के यौद्धा' शामिल हैं। उनकी फिल्में, 'द साईलेंस आॅफ सुनामी', 'द पाॅलिटिक्स आॅफ राम टेम्पल', 'अयोध्या : विरासत की जंग', 'बदलाव की ओर : स्ट्रगल आॅफ वाल्मीकीज़ आॅफ उत्तर प्रदेश' व 'लिविंग आॅन द ऐजिज़', समकालीन सामाजिक-राजनैतिक सरोकारों पर केंद्रित हैं और उनकी सूक्ष्म पड़ताल करती हैं।

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