ब्राह्मणवादियों के मन में क्यों है दक्षिण के खिलाफ जहर?

सवाल है कि दक्षिण दिशा ही क्यों? आखिर क्यों दक्षिण को राक्षस-राक्षसियों की दिशा बताया गया? क्यों यमराज को टिकने के लिए वही दिशा दी गई थी? क्यों शूद्रों और दलितों को दक्षिण दिशा तक सीमित कर दिया जाता है? पढ़ें, ओमप्रकाश कश्यप का आलेख

“बताया गया है कि छूआछूत को बनाने वाला ईश्वर है। यदि यह बात सही है तो हमें सबसे पहले उस ईश्वर को ही नष्ट कर देना चाहिए। यदि ईश्वर इस परंपरा से अनजान है तो उसका और भी जल्दी उच्छेद होना चाहिए। यदि वह इस अन्याय को रोकने या इससे रक्षा करने में असमर्थ है तो इस दुनिया में उसका कोई काम नहीं है।”

– पेरियार, कुदीआरसु, 17 फरवरी, 1929 

चीजें किस प्रकार दिमाग में बैठती हैं या बैठा दी जाती हैं, इस बारे में प्रायः हमें पता नहीं चलता। जैसे कि लोककथाओं का एक सबक जिसे जाने-अनजाने उनके आरंभ में ही जोड़ दिया जाता था। शिकार, नौकरी अथवा किसी और काम से ‘परदेस’ जाने वाले कथानायक को घर-परिवार के बुजुर्ग समझाते– “बेटा पूरब जाना, पश्चिम जाना, उत्तर दिशा तो खुशी-खुशी जाना, मगर दक्षिण में हरगिज न जाना।” कहानियों के अनुसार दक्षिण में या तो कोई राक्षस रहता था अथवा डायन। कोई ऐसी खूबसूरत राजकुमारी भी हो सकती थी, जिसे प्राप्त करना आग के दरिया को पार करने जैसा हो। कहानियों में जो डर जाते या असफल रहते वे सफर से वापस नहीं लौटते थे। या यूं कहिए कि उनकी कहानियां ही नहीं बनती थीं। जो व्यक्ति तमाम हिदायतों और बंदिशों को लांघकर साहस के साथ निषिद्ध लक्ष्य की ओर प्रस्थान कर वहां से सकुशल लौट आता, वह कथानायक कहलाता था। दक्षिण की यात्रा आपदाओं को चुनौती देने की यात्रा थी। नायक बनने या यूं कहो कि नायक गढ़ने की यात्रा थी।

आखिर कौन-से दबाव थे कि ऐसी कहानियों में प्रायः दक्षिण दिशा को ही निषिद्ध बताया जाता था? कुछ लोग कह सकते हैं कि इसके पीछे लेखक-किस्सागो का उद्देश्य कहानी को रहस्यपूर्ण और रोचक बनाना होता था। मना करने के बावजूद नायक का दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान, उसके साहसी होने का प्रमाण था। लेकिन यदि यही उद्देश्य होता तो किस्सागो-कथानायक के नाम, स्थान की तरह, दिशा में भी मनचाहा परिवर्तन कर सकता था। दक्षिण के अलावा वह पूरब, पश्चिम या उत्तर को भी निषिद्ध बता सकता था। हमेशा एक ही दिशा क्यों? कुछ चतुर-सुजान कहेंगे कि वास्तुशास्त्र के अनुसार दक्षिण में यमराज का अधिष्ठान है। अगर ऐसा है तब भी हमारा मूल प्रश्न कायम रहता है कि यमराज ने अपने लिए अथवा वास्तुशास्त्रियों ने यमराज के लिए दक्षिण दिशा को ही क्यों चुना?

इसके लिए हमें मिथकों के निर्माण की प्रक्रिया को समझना पड़ेगा। मिथकों के निर्माण में पूरे समाज की भूमिका होती है। मगर उसे विशिष्ट चरित्र प्रदान करने, खास अवसरों से जोड़ने और मनमाना इस्तेमाल करने का काम समाज का अभिजत्य समुदाय करता है। यह भी सच है कि मिथक में आमजन का भरोसा ही उसे अभिजात्य समुदाय की निगाह में महत्वपूर्ण बनाता है। इसके पीछे उसकी नीयत खुद को दूसरों से अलग और खास दिखाने के लिए होती है। वह चाहता है कि उसके द्वारा छलपूर्वक कब्जाए गए अभिजात्यपन तथा विशेषाधिकारों को, लोग दैवीय अनुकंपा मान लें। मान लें कि समाज में उसकी हैसियत किसी षड्यंत्र अथवा दुरभिसंधि का परिणाम न होकर, विशिष्ट ईश्वरीय अनुकंपा है। दक्षिण को यमराज का अधिष्ठान घोषित करना, इसी सांस्कृतिक कूटनीति का हिस्सा है। इसी से जुड़ा एक सच गांव-बस्तियों में अछूतों और शूद्रों को दक्षिण में बसाया जाना भी है। 

सवाल है कि दक्षिण दिशा ही क्यों? आखिर क्यों दक्षिण को राक्षस-राक्षसियों की दिशा बताया गया? क्यों यमराज को टिकने के लिए वही दिशा दी गई थी? क्यों शूद्रों और दलितों को दक्षिण दिशा तक सीमित कर दिया जाता है?

पेरियार के संघर्ष को समझने; या यूं कहिए कि भारतीय समाज की जिस मानसिकता के विरुद्ध उन्हें संघर्ष करना पड़ा था; और जो इसकी अनेकानेक व्याधियों की वजह है – की पृष्ठभूमि को समझने के लिए – इन सबको जानना आवश्यक है। इसके लिए कुछ हजार वर्ष पहले के इतिहास में लौटना होगा। यह स्थापित तथ्य है कि करीब 12 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक में फैली सिंधु सभ्यता (3300-1750 ईस्वी पूर्व) अपनी समकालीन सभ्यताओं में सर्वाधिक उन्नत और समृद्ध नागरी सभ्यता थी। जलवायु परिवर्तन के कारण उस फली-फूली सभ्यता का अवसान काल आया तो उसके निवासी सुरक्षित ठिकानों की ओर पलायन करने लगे। 1500 ईस्वी पूर्व आर्य हमलावरों ने भारत में प्रवेश किया तो उसमें और भी तेजी आई। पलायन के दो प्रमुख रास्ते थे। पहला पंजाब के रास्ते मैदानी इलाकों में गंगा-यमुना के तराई क्षेत्र की ओर। इस ओर जो दल गए, उन्होंने तराई क्षेत्र में समृद्ध सभ्यता की नींव रखी, जिसे गंगा-यमुनी सभ्यता कहते हैं। दूसरे दल राजस्थान, गुजरात, कोंकण प्रदेश से होते हुए दक्षिण दिशा में गए। और दक्षिण भारत में पहले से रह रहे आदिवासी कबीलों में घुल-मिल गए। दक्षिण भारत के बड़े भूभाग पर तीसरी शताब्दी से लेकर सातवीं शताब्दी तक राज करनेवाले कलाभ्र शासकों के सिक्कों पर प्राप्त लिपि संकेतों और सिंधु घाटी से प्राप्त लिपि संकेतों में गहरी समानता, दोनों को आपस में जोड़ती है। 

कालांतर में गंगा-यमुना के तराई क्षेत्र की ओर गए सिंधुवासी कबीलों और आर्य कबीलों में समन्वय हुआ। वहां के अनार्य कबीलों ने आर्य संस्कृति के आगे करीब-करीब समर्पण कर दिया। जबकि दक्षिण जाकर बसे कबीलों ने अपनी पारंपरिक संस्कृति और उसके मूल्यों को बनाए रखा। उसके बाद लगभग एक सहस्राब्दी तक दक्षिण भारतीय सभ्यता, जो अपनी प्रकृति में अनार्य सभ्यता थी, और उत्तर-पश्चिमी सभ्यता एक-दूसरे से अनजान बनी रहीं। ईसा से छह-सात सौ वर्ष पहले, आर्यों को उस सभ्यता के बारे में पता चला तो उनकी पुरानी स्मृतियां ताजा होने लगीं। आर्यों की दृष्टि में वे वही अनार्य कबीले थे, जिन्होंने सिंधु उपत्यका में उनका मार्ग रोकने की कोशिश की थी। जो आर्य संस्कृति की श्रेष्ठता के मिथ को स्वीकारने के लिए तैयार नहीं थे। इसी कुंठा और ईर्ष्या के चलते उन्होंने अपने गीतों में, अनार्य कबीलों को राक्षस, दैत्य, दानव आदि घोषित करना शुरू कर दिया। बाद में रचे संस्कृत ग्रंथों में भी यही प्रवृत्ति बनी रही।

पेरियार की प्रतिमा

ईसा-पूर्व चौथी-पांचवी शताब्दी में बौद्ध और जैन श्रमणों ने दक्षिण पहुंचना शुरू किया। व्यावहारिक नैतिकता पर आधारित इन दर्शनों का दक्षिण में खूब स्वागत किया गया। प्राचीन तमिल, बौद्ध एवं जैन दर्शन के समन्वय से वहां संगम साहित्य की नींव रखी गई। करीब दो सौ वर्ष बाद, बौद्ध धर्म-दर्शन के पराभव के दौर में ब्राह्मण भी वहां पहुंचे। अपने साथ वे जातीय भेदभाव से लबरेज अपनी संस्कृति को भी ले गए। वहां उन्होंने राजाओं और प्रभावशाली वर्गों को फुसलाना आरंभ कर दिया। नए-नए मिथकीय आख्यान गढ़कर उनका अवतारीकरण किया जाने लगा। अवतारीकरण की प्रक्रिया उन्हें राजसत्ता का नैसर्गिक उत्तराधिकारी बनाती थी। उसकी आड़ में मनमाने फैसले भी थोपे जा सकते थे। इस कारण लोग धीरे-धीरे उनके प्रभाव में आने लगे। ब्राह्मणों को खुश करने के लिए गांव के गांव दान किए जाने लगे। इससे उन लोगों के आगे आजीविका का संकट पैदा होने लगा, जो उन जमीनों पर खेती करते थे।

ब्राह्मणों का बढ़ता वर्चस्व, कभी मंदिर, यज्ञ तो कभी ब्राह्मणों को बसाने के लिए गांव के गांव दान देने से उपजा आक्रोश, महान कलाभ्र विद्रोह के रूप में सामने आया। कलाभ्र शूद्र-किसान और आदिवासी कबीले थे। तीसरी शताब्दी के आरंभ में उन्होंने पांड्य, चेर, पल्लव आदि ब्राह्मणवाद के रंग में रंग चुके शासकों पर हमला किया और उन्हें परास्त कर, कलाभ्र साम्राज्य की नींव डाली। पूरा तमिल प्रदेश, जिसमें आधुनिक केरल, तमिलनाडु के अलावा कर्नाटक और आंध्र प्रदेश का भी बड़ा हिस्सा शामिल था, कलाभ्र साम्राज्य की परिसीमा में आते थे। मंदिर, धर्मस्थान आदि के बहाने ब्राह्मणों को जो जमीनें दान में दी गई थीं, कलाभ्र शासकों ने उन्हें छीन लिया। राज्य के संरक्षण में होने वाले यज्ञ और बलि आदि प्रथाएं समाप्त हो गईं। बौद्ध धर्म को पुनर्स्थापित किया गया। 

कलाभ्र शासकों ने तीसरी शताब्दी से लेकर पांचवी शताब्दी तक दक्षिण पर राज किया। उतनी अवधि के बीच ब्राह्मणवाद वहां निस्तेज बना रहा। देखा जाए तो यही वह दौर था जब ब्राह्मण रामायण, महाभारत, गीता तथा पुराणादि ग्रंथों के लेखन-पुनर्लेखन में लगे थे। वेदों सहित सभी संस्कृत ग्रंथों में जमकर प्रक्षेपण किया जा रहा था। उत्तर भारत में राज्य के संरक्षण में ब्राह्मण धर्म खूब फल-फूल रहा था। मनुस्मृति के विधान लागू होने के बाद शूद्रों-अतिशूद्रों से पढ़ने-लिखने सहित अन्यान्य अधिकार छीन लिए गए थे। इससे ब्राह्मणों के वर्चस्व को चुनौती देने वाला कोई नहीं था। कलाभ्र शासकों के शासनकाल दक्षिण से ब्राह्मण धर्म के उखड़ने की प्रतिक्रिया, रामायण-महाभारत आदि के बहाने दक्षिण पर नकली विजयगीतों के रूप में हुई थी। चूंकि ब्राह्मण धर्म के दक्षिण प्रवेश से बहुत पहले बौद्ध और जैन धर्म वहां अपनी पैठ बना चुके थे, इसलिए रामायण जैसा काव्य जो उत्तर भारतीय संस्कृति की दक्षिण पर विजय दिखाता था, ब्राह्मणवादियों को मानसिक संतुष्टि देता था। रामायण और अन्यान्य पुराणों के माध्यम से, उन परिश्रमी और स्वाभिमानी लोगों को असुर, राक्षस आदि घोषित किया जा रहा था, जो दक्षिण में रहकर खुद को आर्य संस्कृति के प्रभाव से न केवल बचाए हुए थे, अपितु अच्छी-खासी, समृद्ध सभ्यता के निर्माता भी थे। 

अनार्यों के प्रति आर्यों की नफरत के रामायण आदि ग्रंथों में कई आयाम हैं। जरा उस प्रसंग को याद कीजिए जब राम लंका जाने के लिए समुद्र से रास्ता मांगते हैं। समुद्र द्वारा अनसुनी करने पर अपना धनुष-बाण तान लेते हैं। समुद्र हाजिर होकर बाण तरकश में डालने की प्रार्थना करता है। राम के यह कहने पर कि संधान किया हुआ वाण वापस तूणीर में नहीं जा सकता, समुद्र बाण को उत्तर दिशा में द्रुमकुल्य की ओर छोड़ने का आग्रह करता है (वाल्मीकि रामायण, युद्धकांड, 22वां सर्ग)।

गौर करने की बात यह है कि दक्षिण में रावण का ठिकाना है। हरण के बाद रावण सीता को वहीं लेकर गया है। वहां राक्षसों का वास है, समुद्र उनसे लंका की ओर शर-संधान करने का आग्रह नहीं करता, बल्कि उत्तर दिशा की ओर शर-संधान करने को कहता है, जहां आभीर, किरात, यवन आदि लोग रहते थे। बताता है कि ऐसे ‘पापी’ प्राणियों के स्पर्श से उसका जल अपवित्र हो जाता है। राम जैसे ब्राह्मण के कहने पर शंबूक की गर्दन तराश देते हैं, ठीक ऐसे ही बिना कुछ सोचे-समझे, समुद्र के कहने पर तीर को उसी की बताई दिशा में छोड़ देते हैं। ये अभीर, किरात वही लोग थे, जिन्होंने सिंधु घाटी में आर्यों को जोरदार टक्कर दी थी। ऋग्वेद में इस युद्ध को दासराज्ञ युद्ध; अर्थात दस राजाओं का युद्ध के रूप में दिखाया गया है। रामायण आदि ग्रंथों के माध्यम से, आर्यों-अनार्यों की राजनीतिक राजनीतिक प्रतिद्विंद्वता को, धार्मिक-सांस्कृतिक घृणा में बदल दिया जाता है। उपर्युक्त प्रसंग से यह भी पता चलता है कि छुआछूत की भावना, जिसके शूद्रों और अछूतों को सार्वजनिक तालाबों का जल पीने से रोक दिया जाता था, रामायण काल में ही पनप चुकी थी। 

ईसापूर्व पहली-दूसरी शताब्दी में दक्षिण जाने वाले वैदिक संस्कृति के प्रचारक वहां के राजाओं और कुछ शीर्ष वर्गों को तो अपने प्रभाव में लेने में कामयाब रहे थे, लेकिन वहां की आम जनता, विशेष रूप से स्थानीय कबीले ब्राह्मण-संस्कृति के प्रभाव से मुक्त थे। उन्हें अपनी संस्कृति पर गर्व था। दोनों संस्कृतियों के संधि-स्थल, विंध्य के पठारों और जंगलों में, जब वे लोग मिलते तो टकराव की संभावनाएं बन ही जाती थीं। इस कारण दक्षिण को लेकर एक अजाना भय, ईर्ष्या उत्तर भारतीय संस्कृति के संरक्षक ब्राह्मणों के हृदय में समाया हुआ था। उत्तर भारत श्रेष्ठ है, दक्षिण भारत निकृष्ट, यह सोच तथा इससे उपजा डर लोककथाओं में दक्षिण-यात्रा के प्रति निषेधाज्ञा के रूप में सामने आया। चूंकि ब्राह्मणों के लिए असुरों, राक्षसों की तरह शूद्र और पंचम भी बाहरी थे, इसलिए गांव में उनके रहने के लिए दक्षिण दिशा सुनिश्चित की गई। 

एक हजार ईस्वी के आसपास उत्तर भारत बाहरी हमलों का शिकार होने लगा। जबकि शंकराचार्य के नेतृत्व में दक्षिण, आठवीं शताब्दी में ही ब्राह्मण धर्म की केंद्र-स्थली बन चुका था। सो उत्तर भारत में भारी राजनीतिक उथल-पुथल के चलते, आने वाली शताब्दियों में दक्षिण, ब्राह्मण धर्म के लिए सुरक्षित ठिकाना बन गया। उस दौर में ब्राह्मणों को विशेषाधिकार दिए गए। वर्णाश्रम धर्म की पुनर्स्थापना की गई। राज्य की मदद से जाति-व्यवस्था को इतना मजबूत किया गया कि शूद्रातिशूद्र जातियां सांस तक न ले सकें। इसकी प्रतिक्रिया संत साहित्य के रूप में हुई। लेकिन कई कारणों से संत ब्राह्मण धर्म को वैसी चुनौती नहीं दे सके, जैसी उनसे अपेक्षित थी। उनके सारे सुधार कार्यक्रम धर्म के दायरे में थे, जो ब्राह्मणवादियों के सबसे सुरक्षित दायरा है। 

ब्राह्मण धर्म को चुनौती 19वीं शताब्दी में उस समय मिलनी शुरू हुई जब औपनिवेशिक सरकार द्वारा बनाए गए कानूनों के अंतर्गत शूद्रातिशूद्रों को पढ़ने-लिखने का अवसर मिला। तभी उन्हें अपनी सामाजिक परतंत्रता का अहसास हुआ। पता चला कि वे अंग्रेजों के अलावा ब्राह्मणों के भी गुलाम हैं। धर्म और जाति उन्हें परतंत्र रखने वाले ब्राह्मणी औजार हैं। वे छुआछूत के सुरक्षा-कवच भी हैं। आरंभ में सामाजिक मुक्ति की पहल के रूप में धर्मांतरण का सहारा लिया गया। लेकिन कुछ ही दशकों में यह साफ हो गया कि धर्म अपने आप में एक सत्ता है और किसी भी प्रकार की सत्ता के रहते, न तो मानवीय गरिमा की रक्षा हो सकती है, न मानव-मुक्ति के लक्ष्य को पाया जा सकता है। इस सोच के साथ दक्षिण की राजनीति में उभरे पेरियार ने सीधे ईश्वर की सत्ता को चुनौती दी। कहा कि सामाजिक आजादी प्राप्त करने के लिए द्रविड़ों को सबसे पहले ब्राह्मणों द्वारा गढ़े गए, ईश्वर और धर्म से मुक्त होना होगा। द्रविड़ों की समानता, स्वतंत्रता और आत्मसम्मान के लिए ऐसा करना जरूरी है। 

वर्ष 1932 में पेरियार श्रीलंका में बसे तमिलों के आमंत्रण पर वहां गए थे। वहां कोलंबो में दिए गए भाषण में उन्होंने कहा था कि आत्मसम्मान और मनुष्यता की स्थापना के लिए तमिलों को ईश्वर, धर्म और राष्ट्रवाद के मोह से बाहर निकल आना चाहिए (कुदी आरसु, 30 अक्टूबर, 1932)। उनका मानना था कि धर्म और ईश्वर मानव-प्रगति के सबसे बडे़ दुश्मन हैं। 

हिंदू धर्म की आलोचना करते समय पेरियार रामायण, गीता और मनुस्मृति को निशाना बनाते हैं। राम, लक्ष्मण, सीता, दशरथ जैसे चरित्र जिन्हें हिंदू धर्म में ‘आदर्श’ के तौर पर पेश किया जाता रहा है, की चारित्रिक दुर्बलताओं को गिनाते हुए वे रावण को आदर्श चरित्र वाला और द्रविड़ों के महानायक के रूप में पेश करते हैं। वे एक-एक कर उन सभी हिंदू मिथों को निशाना बनाते हैं, जिनके माध्यम से ब्राह्मण हिंदू धर्म और उनकी आड़ में अपनी शताब्दियों से अपनी अधिसत्ता को बनाए हुए हैं। पेरियार की धर्म और जाति-संबंधी स्थापनाओं को पढ़ना, हिंदू धर्मशास्त्रों की विखंडनात्मक व्याख्या करने जैसा है। इसलिए वे धर्म की आड़ में राजनीति करने वालों को सबसे ज्यादा अखरते हैं। 

वर्ष 2002 में उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री सुश्री मायावती आंबेडकर पार्क में पेरियार की मूर्ति की स्थापना कराना चाहती थीं। लेकिन भारतीय जनता पार्टी को यह कतई स्वीकार नहीं था। भाजपा के भारी विरोध के कारण उन्हें अपना इरादा बदलना पड़ा था। यही क्यों, 1980 में पेरियार के अपने राज्य तमिलनाडु के कांचीपुरम में पेरियार की मूर्ति की स्थापना की अनुमति देने से तत्कालीन मुख्यमंत्री एमजी रामाचंद्रन ने मना कर दिया था। उन्हें लगता था कि इससे कांची के शंकराचार्य नाराज हो सकते हैं। यह बात अलग है कि सरकार के फैसले के बाद विपक्षी दल द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने मद्रास उच्च न्यायालय में अपील की और अदालत की अनुमति के बाद, मूर्ति को स्थापित कर दिया गया।

अच्छी बात यह है कि इन दिनों पेरियार के प्रति उत्तर भारतीयों का दृष्टिकोण बदल रहा है। उनकी स्वीकार्यता लगातार बढ़ती जा रही है। जो आने वाले वर्षों में बढ़ती ही जाएगी। विचारों को पकने, फैलने और उन्हें क्रांति में ढलने में इतना समय तो लगता ही है।

(संपादन : नवल/अनिल)


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