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द्रौपदी मुर्मू के बहाने बहुजन विमर्श

द्रौपदी मुर्मू की उम्मीदवारी देश की बड़ी घटना है। अगर आप यह सवाल करते हैं कि उन्होंने पेसा को लेकर क्या किया और राष्ट्रपति बनकर वे क्या कर लेंगी, तो इस सवाल का जवाब तलाशना भी आपकी ही जिम्मेवारी है कि आजादी के 74 साल बाद भी देश को कोई आदिवासी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री क्यों नहीं मिला? बता रहे हैं रवि प्रकाश

आप चाहें तो इस पर खुश हो लें कि दिल्ली के रायसीना हिल्स की पहाड़ियों पर बसे खूबसूरत और भव्य राष्ट्रपति भवन में अब एक आदिवासी नेता की एंट्री करीब-करीब तय हो गई है। या फिर आप इसका गम मना लें कि समानता की बात करने वाले गांधी और आंबेडकर के देश भारत में इस पद के लिए किसी आदिवासी को मन से आगे करने में सियासत के सूरमाओं को 74 साल क्यों लग गए। आप अगर सोशल मीडिया पर ज्यादा सक्रिय हैं, तो आप यह सवाल भी खड़ा कर सकते है कि कोई आदिवासी राष्ट्रपति बन ही जाए, तो वो आदिवासियों के हितों की कितनी बात कर पाएगा, क्योंकि भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में राष्ट्रपति के पद की व्याख्या रबर स्टांप के तौर पर की जाती है।

इस तरह के कई सवालों के बीच का सच यह है कि द्रौपदी मुर्मू भारत में राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार हैं। केंद्र की सत्ता संभाल रही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और उसके राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने उन्हें इस पद के लिए अपना प्रत्याशी बनाया है। वोटों का अंकगणित उनके पक्ष में हैं और यह लाखों लोगों के लिए खुश होने की बड़ी वजह बन गई है। वे भारत के पिछड़े राज्यों में शामिल ओड़िशा की रहने वाली हैं। झारखंड की राज्यपाल रह चुकी हैं और उनका नाता संथाल समुदाय से है।

संथाली आदिवासियों की वीरता की कई कहानियां हैं और एक सच यह भी है कि आज भी उन्हें वह हक नहीं मिल सका है, जिसके वे अधिकारी हैं। संथाल आदिवासियों की रिहाइश वाले अधिकतर इलाके आज भी पिछड़े हैं। सरकारें इनके लिए योजनाएं तो बनाती हैं लेकिन उसका लाभ बहुत कम आबादी तक पहुंच पाता है। यह उनका वर्तमान है। अतीत की कहानियों में उनके नायक सिद्धो-कान्हो जैसे वीर हैं, जिन्होंने भारत को ब्रिटिश गुलामी से मुक्ति दिलाने की लड़ाई में अपनी जान गंवा दी। अब वे सिर्फ टेक्सटबुक में हैं और जयंती-पुण्यतिथि के अवसर पर लोग उनकी प्रतिमाओं पर माल्यार्पण की रस्म अदायगी बगैर भूले करते हैं, क्योंकि आदिवासी सिर्फ एक पहचान नहीं, एक बड़ा वोट बैंक भी है। इसे नजरअंदाज करके देश के कई राज्यों में सियासत करनी मुश्किल हो सकती है।

बहरहाल, द्रौपदी मुर्मू राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार हैं। उनकी उम्मीदवारी के बहाने देश में बहस छिड़ गई है कि केंद्र में सत्तासीन एनडीए कहीं इसका राजनीतिक लाभ लेने की कोशिशें तो नहीं कर रहा। क्या यह नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी का सियासी दांव है? हो सकता है यह उनका दांव हो और ऐसे सवालों की नींव मजबूत हो। लेकिन, क्या यह बात काफी नहीं कि सिंबालिज्म की सियासत में भी देश ने पिछले 74 सालों में किसी आदिवासी को राष्ट्रपति के तौर पर नहीं देखा। कोई आदिवासी नेता हमारा प्रधानमंत्री नही बन सका। हम आज भी दलित-आदिवासी-अस्पसंख्यकों की बराबरी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ऐसे में अगर द्रौपदी मुर्मू की राह रायसीना हिल्स तक पहुंचने वाली है, तो इसे बहुजन सम्मान और अस्मिता की बड़ी घटना के रुप में क्यों नहीं देखा जाए? क्यों नहीं उनकी जय की जाए, क्योंकि यह देश के इतिहास की एक बड़ी घटना होने वाली है। आप मंदिर में झाड़ू लगाती उऩकी तस्वीरों के बहाने उनकी आलोचना तो कर सकते हैं, लेकिन एक बात जरुर याद रखिएगा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है। यही हमारे संविधान की खूबसूरती है। यहां हम मंदिरों में जा सकते हैं, नास्तिक बने रहने का फैसला ले सकते हैं। मस्जिदों, चर्च या गुरुद्वारे में जाकर भी मत्था टेक सकते हैं। हमें इसकी आजादी है। द्रौपदी मुर्मू ने अगर रायरंगपुर के मंदिर में झाड़ू लगाया, तो वे जाहेर थान (संथाली आदिवासियों के उपासना स्थल) भी गईं। 

एनडीए द्वारा घोषित राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू

यह पूरी तरह उनका व्यक्तिगत मामला है। यह आपके ट्वीट का विषय हो सकता है, लेकिन संविधान की प्रस्तावना में उन्हें इस बात की आजादी मिली हुई है। वे खुद को सरना मानें, हिन्दू कहें या फिर किसी और धर्म की अनुरागी, यह उनका विषय है।

वे झारखंड की पहली महिला और आदिवासी राज्यपाल थीं। अपनी सेवानिवृति के बाद वे रायरंगपुर में रहने लगीं, अपने दो मंजिले मकान में। कोई तामझाम नहीं। कोई आपाधापी नहीं। छह साल तक राज्यपाल रहने के बाद और इतने दिनों तक राजभवन में रहते हुए भी उनका व्यक्तित्व सादगीपूर्ण रहा है, इससे भी इनकार नहीं कर सकते। द्रौपदी मुर्मू को भाजपा के शासन में झारखंड का राज्यपाल नियुक्त किया गया था। यह वह दौर है, जब राज्यपालों पर राष्ट्रपति का एजेंट होने की जगह पालिटिकल या साफ शब्दों में कहें तो सत्तादल के एजेंट जैसे बर्ताव के आरोप लगते रहे हैं। कई राज्यपाल इस कारण सुर्खियों में भी रहते हैं। ममता बनर्जी और वहां के राज्यपाल के बीच के संबंध जगजाहिर हैं। ऐसे में द्रौपदी मुर्मू ने अगर मर्यादा बचाकर रखी, तो इसका भी इस्तकबाल करना चाहिए।

एनडीए के राष्ट्रपति प्रत्याशी के तौर पर 21 जून को जब उनके नाम की घोषणा हुई, तो वे दिल्ली से दूर ओड़िशा के मयूरभंज जिले में स्थित रायरंगपुर के अपने घर पर थीं। इससे एक दिन पहले उन्होंने अपना 64 वां जन्मदिन मनाया था। तब उन्हें पता नहीं था कि सिर्फ 24 घंटे बाद वे देश के सबसे बड़े पद के लिए सत्ता पक्ष की उम्मीदवार बनायी जाने वाली हैं। उन्होंने मीडिया से कहा भी कि वे इस खबर से आश्चर्यचकित हैं और खुश भी। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति संवैधानिक पद है और विजयी होने की स्थिति में वे संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार काम करना चाहेंगी। वे जनता के हित के लिए काम करेंगी। हालांकि, साल 2017 के राष्ट्रपति चुनाव में भी उनके नाम की चर्चा चली थी। वे उस वक्त झारखंड की राज्यपाल थीं। तब भाजपा ने बिहार के राज्यपाल रहे रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बना दिया था। वे अभी राष्ट्रपति हैं। अगामी 24 जुलाई को उनका कार्यकाल खत्म हो रहा है।

द्रौपदी मुर्मू ने बीए तक की पढ़ाई की है और क्लर्क रही हैं। वार्ड काउंसलर के तौर पर सियासी करियर की शुरुआत करने वाली द्रौपदी मुर्मू बाद के सालों में विधायक और मंत्री भी बनीं। भाजपा की सांगठनिक संरचना में भी वे महत्वपूर्ण हैसियत में रही हैं। 18 मई, 2015 को उन्होंने झारखंड की पहली महिला व आदिवासी राज्यपाल के रुप में शपथ ली। वे छह साल, एक महीना और 18 दिन इस पद पर रहीं। वे ऐसी राज्यपाल रहीं, जिनकी इज्जत सत्ता और विपक्ष दोनों खेमों में की जाती थी। राज्यपाल के बतौर वे बेहद लोकप्रिय थीं।

वे चाहतीं तो रबर स्टांप बनकर राजभवन की विलासिता का भोग करतीं, लेकिन उन्होंने कई ऐसे फैसले लिए, जिससे तब झारखंड मे सत्तासीन रही भाजपा सरकार की किरकिरी हुई। जाहिराना तौर पर ये मुद्दे आदिवासी अधिकारों के थे। उन्होंने अपने कुछ फैसलों से बीजेपी गठबंधन की रघुबर दास सरकार की कोशिशों पर पानी फेर दिया। ऐसे कुछ विधेयक उन्होंने बगैर लाग-लपेट लौटा दिए।

साल 2017 के मई महीने में उन्होंने अदिवासियों की जमीनों की रक्षा के लिए ब्रिटिश हुकूमत के वक्त बने छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (सीएनटी एक्ट) और संताल परगना काश्तकारी अधिनियम (एसपीटी एक्ट) के कुछ प्रावधानों में संशोधन के तत्कालीन भाजपा सरकार के विधेयक को बगैर दस्तखत सरकार को वापस कर दिया और पूछा कि इससे आदिवासियों को क्या लाभ होगा। सरकार इसका जवाब नहीं दे पायी और यह विधेयक कानूनी रुप नहीं ले सका। उन्होंने तब कहा भी इस संशोधन विधेयक के खिलाफ राजभवन को करीब 200 आपत्तियां मिली थीं। ऐसे में इसपर दस्तखत करने का कोई सवाल ही नहीं था।

उसी सरकार के कार्यकाल के दौरान जब पत्थलगड़ी विवाद हुआ और झारखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुबर दास ने पत्थलगड़ी के खिलाफ कई बयान दिए, तब राज्यपाल रहीं द्रौपदी मुर्मू ने आदिवासी स्वशासन व्यवस्था के तहत बने ग्राम प्रधानों और मानकी, मुंडाओं को राजभवन में बुलाकर उनसे बातचीत की और इस मसले के समाधान की कोशिशें की। क्या ये बातें आसानी से खारिज की जा सकती हैं? क्या यह उनका सार्थक हस्तक्षेप नहीं था? कुलाधिपति रहते हुए वे जनजातीय भाषाओं की पढ़ाई को लेकर भी सक्रिय रहीं। इस कारण विश्वविद्यालयों में लंबे वक्त से बंद पड़ी झारखंड की जनजातीय व क्षेत्रीय भाषाओं के शिक्षकों की नियुक्तियों का रास्ता खुला।

हालांकि बतौर राष्ट्रपति भी उनका कार्य और व्यवहार वैसा ही रहेगा, जैसा कि झारखंड के राज्यपाल के रूप में रहा, कहना जल्दबाजी होगी। ऐसे में मेरी समझ कहती है कि द्रौपदी मुर्मू की उम्मीदवारी देश की बड़ी घटना है। अगर आप यह सवाल करते हैं कि उन्होंने पेसा को लेकर क्या किया और राष्ट्रपति बनकर वे क्या कर लेंगी, तो यह इस सवाल का जवाब तलाशना भी आपकी ही जिम्मेवारी है कि आजादी के 74 साल बाद भी देश को कोई आदिवासी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री क्यों नहीं मिला? अगर आपने इस सवाल का जवाब खोज लिया, तो शायद द्रौपदी मुर्मू की उम्मीदवारी में भी आपको आदिवासी कल्याण और सशक्तता की परछायी नजर आने लगे। हां, यह भी सही कि भाजपा के पुराने चाल-चरित्र के मद्देनजर हमें सतर्क भी रहना होगा, ताकि वे इसका सियासी इस्तेमाल नहीं कर सके।

बहरहाल, बात सिम्बालिज्म की है, इसलिए द्रौपदी मुर्मू के लिए शुभकामनाएं।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

रवि प्रकाश

लेखक वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं तथा दैनिक जागरण, प्रभात खबर व आई-नेक्स्ट के संपादक रहे हैं

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