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हसदेव जंगल : सियासत और आदिवासी

तमाम तरह की सियासत और सरकार की दमनकारी नीतियों के बावजूद हसदेव अरण्य की ग्रामसभाएं बिना निराश और हताश हुए उम्मीद कर रही हैं कि देर से ही, उन्हें न केवल भारत वरन् दुनिया से समर्थन मिलेगा और अंतत: जीत भी संविधान और उसमें लिखी इबारतों की होगी। बता रहे हैं मनीष भट्ट मनु

मध्य भारत का फेफड़ा कहलाए जाने वाले और यहां के सबसे सघन वन हसदेव अरण्य में कोयला खनन को लेकर प्रस्तावित हैरिटेज – दशकों पुराने – वृक्षों की कटाई की मंजूरी दिये जाने के खिलाफ विभिन्न समुदायों व संगठनों के लोग जुटे हैं। यहां राजनीति भी है और नेतागिरी भी। यहां आदिवासी स्वशासन को लेकर कुछ बरस पूर्व की गई पत्थलगढ़ी से फलस्वरुप जन्मा सर्व आदिवासी समाज भी है और राजनीति से उपजा आदिवासी समाज छत्तीसगढ़ भी। यहां पांचवी अनुसूची और पेसा कानून की बाते भी हैं और आदिवासी बहुल इलाकों में ग्राम पंचायतों में गैर आदिवासी उपसरपंच धेल भी। यहां कैब्रिज में हसदेव अरण्य को लेकर राहुल गांधी की बातों की चर्चा भी है और नेता प्रतिपक्ष रहते हुए भूपेश बघेल द्वारा अब अचानक पलटी मारने की बातें भी।

पहले हसदेव अरण्य के बारे में

हसदेव अरण्य छत्तीसगढ़ के सरगुजा, सूरजपुर और कोरबा जिले में फैला बहुमूल्य जैव विविधता वाला वन क्षेत्र है। भारतीय वन्य जीव संस्थान ने अपनी एक अध्ययन रिपोर्ट में उल्लेख किया है कि हसदेव अरण्य क्षेत्र में नई खदानों को अनुमति दी गई तो उसके भयानक परिणाम होंगे। दो सौ सत्तर पेज की रिपोर्ट में कहा गया कि देश के एक प्रतिशत हाथी छत्तीसगढ़ में हैं। वहीं हाथियों और इंसानों के संघर्ष में 15 प्रतिशत जनहानि केवल छत्तीसगढ़ में होती है। किसी एक स्थान पर कोयला खदान चालू की जाती है तो हाथी वहां से हटने को मजबूर हो जाते हैं। वे दूसरे स्थान पर पहुंचने लगते हैं, जिससे नए स्थान पर हाथी-मानव द्वंद बढ़ता है। ऐसे में हाथियों के अखंड आवास, हसदेव अरण्य कोल फील्ड क्षेत्र में नया खदान खोलने से दूसरे क्षेत्रों में मानव-हाथी द्वंद्व इतना बढ़ेगा कि राज्य को संभालना मुश्किल हो जाएगा। भारतीय वन्य जीव संस्थान ने रिपोर्ट मे कहा है कि इस क्षेत्र में दुर्लभ, संकटग्रस्त और विलुप्तप्राय वन्यप्राणी थे और हैं भी। इस क्षेत्र में पूरे वर्ष भर हाथी रहते हैं। यहां तक कि कोरबा वन मंडल में, हसदेव अरण्य कोल फील्ड क्षेत्र के पास बाघ भी देखा गया है। यह क्षेत्र अचानकमार टाइगर रिजर्व, भोरमदेव वन्यजीव अभ्यारण्य और कान्हा टाइगर रिजर्व से जुड़ा हुआ है। रिपोर्ट में बताया गया है कि हसदेव अरण्य कोलफील्ड और उसके आसपास के क्षेत्र में मुख्य रूप से आदिवासी रहते हैं। वे वनों पर बहुत ज्यादा आश्रित हैं। गैर काष्ठ वनोपजों से उनकी मासिक आय का 46 प्रतिशत हिस्सा आता है। इसमें जलाऊ लकड़ी, पशुओं का चारा, औषधीय पौधे और पानी शामिल नहीं है। अगर इनको भी शामिल कर लिया जाए तो कम से कम 60 से 70 प्रतिशत आय वनों से होती है। 

हसदेव जंगल को बचाने के लिए प्रदर्शन करते आदिवासी

एक दशक से आंदोलनरत हैं आदिवासी

गौरतलब है कि यहां के आदिवासियों के लिए हसदेव अरण्य को बचाने की लड़ाई आज की नहीं है। आदिवासी पिछले एक दशक से इस जंगल के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। पिछले साल केंद्र सरकार की मुहर के बाद छत्तीसगढ़ सरकार ने हसदेव अरण्य के परसा कोयला खदान को अप्रैल में मंजूरी दे दी। सरगुजा और सूरजपुर जिले के 1252.447 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले परसा कोयला खदान का 841.538 हेक्टेयर जंगल का इलाका है, जबकि 410.909 हेक्टेयर क्षेत्र जंगल क्षेत्र से बाहर का इलाका है। हसदेव अरण्य क्षेत्र के गांवों के सैकड़ों लोगों ने 2 अक्टूबर, 2021 लेकर 4 अक्टूबर, 2021 तक जनसभा और राजधानी रायपुर तक की पदयात्रा की घोषणा की थी। तब आदिवासी मदनपुर गांव की उसी चौपाल में इकट्ठा हुए थे, जहां 2015 में राहुल गांधी ने खनन परियोजनाओं का विरोध कर रहे आदिवासियों से बात की थी। वहां से सभी लोग पैदल ही रायपुर की पदयात्रा पर चले। जंगलों, पहाड़ों, गांवों, शहरों को पार करते हुए वे सभी 13 अक्टूबर, 2021 को रायपुर पहुंचे। यहां उन्हें मुख्यमंत्री से मिलने की इजाजत नहीं मिली थी। आदिवासी रात को रायपुर में ही रुके। सुबह बूढ़ा तालाब के किनारे धरना दिया और शाम को राज्यपाल और मुख्यमंत्री से मिले। आंदोलनकारियों के मुताबिक मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने मदनपुर को उजड़ने नहीं देने की बात करते हुए इस प्रस्तावित परियोजना से किसी भी गांव का विस्थापन न होने देने की बात कही थी।

सियासतदानों की सियासत

इतना ही नहीं, इसी दौरान आदिवासी राजभवन भी पहुंचे, जहां लॉन में राज्यपाल अनसुईया उईके ने सभी की बात सुनी। इस दौरान ग्रामीणों ने उन्हें बताया कि ग्राम सभाओं ने बकायदा प्रस्ताव पारित कर इन परियोजनाओं का विरोध किया है। इसके बाद भी फर्जी ग्राम सभाओं की सहमति बताकर परियोजनाओं को स्वीकृति दिलाई गई है। अब उनकी जमीनों का अधिग्रहण किया जा रहा है। आदिवासियों की बात सुनने के बाद तब राज्यपाल ने कहा था, “आदिवासियों के साथ जो हुआ, उसे अब मैं नहीं होने दूंगी। आपकी मांग पर मुख्यमंत्री के साथ चर्चा करूंगी। दिल्ली में कोयला मंत्री और प्रधानमंत्री मोदी से बात करूंगी।” 

यह भी पढ़ें – हसदेव अरण्य मामला : जिलाधिकारी के पत्र में ‘पेंच’

इस दौरान हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति के प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल को एक ज्ञापन सौंपकर जंगल बचाने की मांग भी की थी। उनका कहना था कि वहां पेसा कानून लागू कर ग्राम सभाओं को निर्णय का अधिकार मिलना चाहिए। उस जंगल को लेमरु हाथी रिजर्व में शामिल कर संरक्षित किया जाना चाहिए।

तब राज्यपाल अनुसूईया उइके ने कहा था कि जो आवेदन मिला है उसका अध्ययन करुंगी। 

राज्यपाल को सौंपे गए ज्ञापन में आदिवासियों ने मांग की थी कि बिना ग्रामसभा की सहमति के हसदेव अरण्य क्षेत्र में कोल बेयरिंग एरियाज एक्ट के तहत किए गए भूमि अधिग्रहण को तत्काल निरस्त की जाय। पांचवी अनुसूची क्षेत्र में किसी भी कानून से भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया के पूर्व ग्रामसभा से अनिवार्य सहमति के प्रावधान लागू किए जाएं। साथ ही, परसा कोल ब्लाक के लिए फर्जी ग्रामसभा प्रस्ताव बनाकर हासिल की गई वन स्वीकृति को तत्काल निरस्त किया जाय और ऐसा करने वाले अधिकारी और कंपनी के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो। इसके अलावा घाटबर्रा गांव के निरस्त सामुदायिक वन अधिकार को बहाल करते हुए सभी गांवों में सामुदायिक वन अधिकार और व्यक्तिगत वन अधिकारों को मान्यता दी जाय। 

उल्लेखनीय है कि हसदेव अरण्य भौगोलिक रुप से उस क्षेत्र में अवस्थित है जो संविधान की पांचवीं अनुसूची में शामिल है। यह अनुसूची ग्रामसभाओं और वहां सदियों से बसे आदिवासी समुदायों को उनकी परंपरा, रीति-रिवाजों और धार्मिक मान्यताओं को संवैधानिकता प्रदान करती है। बीते एक दशक से सरगुजा और कोरबा जिले की ग्रामसभाएं संगठित होकर इस सघन, समृद्ध, जैव विविधतता से परिपूर्ण जंगल और वन्य जीवों के नैसर्गिक पर्यावास को बचाने के लिए न केवल अपने सांवैधानिक शक्तियों का ही उपयोग कर रहीं हैं, बल्कि अपने जंगल को किसी भी कीमत पर खनन के लिए न देने के लिए सतत संघर्ष कर रही हैं। हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति 24 ग्रामसभाओं का देश में एक ऐसा बिरला उदाहरण है, जो अपनी संवैधानिक शक्तियों का उपयोग करते हुए अपने नैसर्गिक संसाधन बचाने के लिए गुजारिश करता चला आ रहा है।

यह समिति वर्ष 2015 से ही – जब सर्वोच्च न्यायालय ने कोयला खदानों के आवंटन में हुए कथित घोटाले के मद्देनजर देश के 214 कोयला खदानों के आवंटन को रद्द कर नए आवंटन करने के निर्देश दिये थे – केंद्र सरकार को यह लिखित में देती रही हैं कि हसदेव अरण्य के दायरे में आने वाली कोयला खदानों को नीलामी प्रक्रिया से बाहर रखा जाए। इसके पीछे समिति का आधार यह रहा है कि खनन शुरू करने से पहले ग्रामसभाओं की सहमति जरूरी है। और हसदेव की इन ग्रामसभाओं ने यह तय कर लिया है कि वे कोयला खदानों के लिए अपने इस विरासती जंगल को नष्ट करने की सहमति नहीं देंगीं। इस लिहाज से यह एक संवैधानिक टकराव की स्थिति ही है। इसके अतिरिक्त 2006 में लागू हुए वनाधिकार (मान्यता) कानून में भी गैर-वानिकी उपयोग के लिए वनों के इस्तेमाल के लिए ग्रामसभा से इस आशय का प्रस्ताव लेना अनिवार्य हो गया है कि “उसके दायरे में आने वाले वन क्षेत्र में वनाधिकार मान्यता कानून के तहत दिये गए सभी 13 प्रकार के अधिकार प्रदान किए जा चुके हैं”। इन अधिकारों में व्यक्तिगत वन अधिकार (जिस वन भूमि पर लोग 13 दिसंबर, 2005) से पहले खेती करते रहे हैं या निवास बनाया है, सामुदायिक निस्तार अधिकार, सामुदायिक वन संसाधनों के अधिकार, लघु वनोपाज संग्रहण के अधिकार, अगर उस ग्रामसभा में आदिम जनजाति समुदाय का निवास है, तो उनके पर्यावास के अधिकार आदि शामिल हैं।

मगर, कांग्रेस शासित छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार इन ग्रामसभाओं को मिली संवैधानिक शक्तियों को लगातार नजरअंदाज कर रही है। राज्य सरकार द्वारा पेसा कानून के ऊपर कोल एरिया बेयरिंग एरियाज एक्ट, 1957 (कोयला-धारक क्षेत्र कानून-1957) को तरजीह देते हुए यह नजीर पेश करने की गैर-कानूनी कोशिश की है कि यह कानून पेसा कानून, 1996 से प्रभावित नहीं होता और कोयला धारक क्षेत्रों में जमीन अधिग्रहण से पूर्व पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों की ग्राम सभाओं की सहमति या परामर्श की जरूरत नहीं है। इस संबंध में एक मामला छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर में चल रहा है। वन अधिकार कानून, 2006 की बात करें तो यहां भी ग्राम सभाओं के प्रस्तावों को तो जरूरी माना गया है, लेकिन ग्रामसभाओं के एक दशक से चल रहे विरोध को देखते हुए खनन के पक्ष में और वनाधिकार कानून के समग्र क्रियान्वयन के संबंध में फर्जी प्रस्ताव बनवा कर यहां खनन के लिए तमाम स्वीकृतियां दे दी गईं हैं।

आदिवासी लगा रहे हैं फर्जी ग्रामसभा प्रस्ताव के आरोप

उल्लेखनीय है कि जब से प्रभावित गांवों के फर्जी प्रस्तावों की खबर ग्रामसभाओं को मिली है, वे तभी से ये कह रही हैं कि उन्होंने ऐसे कोई प्रस्ताव पारित ही नहीं किए हैं। ये प्रस्ताव जिन तारीखों में दिखलाए गए हैं, उन तारीखों में कोई ग्रामसभा आयोजित ही नहीं हुई है। फर्जी ग्रामसभाओं के आधार पर राज्य सरकार द्वारा खनन परियोजना को दी गईं तमाम स्वीकृतियां खारिज मानी जाना चाहिए। छत्तीसगढ़ की राज्यपाल अनुसुइया उइके ने इन फर्जी ग्रामसभाओं के जांच के आदेश भी दिये थे। लेकिन राज्य सरकार और जिला प्रशासन ने राज्यपाल के आदेश को भी कोई तवज्जो नहीं दी।

मगर हसदेव अरण्य की ग्रामसभाएं बिना निराश और हताश हुए उम्मीद कर रही हैं कि देर से ही, उन्हें न केवल भारत वरन् दुनिया से समर्थन मिलेगा और अंतत: जीत भी संविधान और उसमें लिखी इबारतों की होगी।

(संपादन : नवल/अनिल) 


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लेखक के बारे में

मनीष भट्ट मनु

घुमक्कड़ पत्रकार के रूप में भोपाल निवासी मनीष भट्ट मनु हिंदी दैनिक ‘देशबंधु’ से लंबे समय तक संबद्ध रहे हैं। आदिवासी विषयों पर इनके आलेख व रपटें विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होते रहे हैं।

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