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हसदेव अरण्य मामला : जिलाधिकारी के पत्र में ‘पेंच’

छत्तीसगढ़ के सरगुजा में आदिवासी हसदेवा जंगल को बचाने के लिए आंदोलनरत हैं। उनका कहना है कि सरकार कोयला खदानों के लिए पूरे जंगल को तबाह कर देना चाहती है। इस पूरे मामले में जिला प्रशासन की तरफ से स्पष्टीकरण जारी किया गया है। इस स्पष्टीकरण में विरोधाभास के बारे में बता रहे हैं तामेश्वर सिन्हा

छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य यानी जंगल के करीब 2 लाख पेड़ों को बचाने के लिए स्थानीय आदिवासी जी-जान से जुटे हैं। लेकिन राज्य सरकार की ओर से इस मामले में कोई पहल नहीं की जा रही है। उलटे स्थानीय जिलाधिकारी के द्वारा जारी एक पत्र में नया पेंच सामने आया है, जिसमें स्थानीय प्रशासन अपने ही कथन को गलत ठहरा रहा है। सवाल है कि क्या यह जिलाधिकारी ने नासमझी के कारण किया है या फिर यह स्थानीय आदिवासियों के आंदोलन को खारिज करने की प्रशासनिक धोखाधड़ी है?

मुख्यमंत्री का बयान, विरोधी पहले बिजली का उपयोग बंद करें

हालांकि इस मामले में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने आज 4 जून, 2022 को कांकेर जिले के दौरे के दौरान अपने एक बयान में कहा है कि “हसदेव में कुछ लोग राजनीति कर रहे हैं। जो लोग इसका विरोध कर रहे हैं, वे अपने घरों की बिजली पहले बंद कर दें। कोयला चाहिए तो खदान तो चलाना पड़ेगा। जितना जरुरत है उतना ही कोयला दिया जाएगा। इस साल 8 हजार पेड़ कटेंगे, और वे हल्ला 8 लाख का कर रहे है। पेड़ कटेंगे तो पेड़ लगेंगे भी। नियम यही कहता है। विरोध करने वाले घर के एसी, कूलर ,पंखे, फ्रिज बंद कर दें। फिर मैदान में आकर लड़ें।”

कह रहे आदिवासी, सरकार काटेगी 2 लाख से अधिक पेड़

गौर तलब है कि छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार ने पिछले महीने 6 अप्रैल, 2022 को एक प्रस्ताव को मंजूरी दी। इसके तहत, सरकार द्वारा यह कहा गया कि हसदेव जंगल क्षेत्र में स्थित परसा कोल ब्लॉक परसा ईस्ट और केते बासन कोल ब्लॉक का विस्तार होगा। स्थानीय आदिवासियों के मुताबिक, इस विस्तार का मतलब यह है कि सरकार कम से कम दो लाख पेड़ों की कटाई कराएगी और पूरा जंगल पेड़ विहीन हो जाएगा। हालांकि सरकारी रपट में 95 हजार पेड़ों के काटे जाने की बात कही गई है। 

ध्यातव्य है कि छत्तीसगढ़ के उत्तरी कोरबा, दक्षिणी सरगुजा और सूरजपुर जिले के बीच में लगभग 1,70,000 हेक्टेयर में फैला हसदेव जंगल अपनी जैव विविधता के लिए जाना जाता है। वाइल्डलाइफ इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया की साल 2021 की रपट के मुताबिक, हसदेव जंगल के इलाके में गोंड, लोहार और उरांव जैसी आदिवासी जातियों के 10 हजार लोगों के घर हैं। यह झारखंड की सीमा से भी जुड़ा है। यहां करीब 82 तरह के पक्षी, दुर्लभ प्रजाति की तितलियां और 167 प्रकार की वनस्पतियां पाई जाती हैं। 

हसदेव जंगल को बचाने के लिए विरोध मार्च निकालतीं आदिवासी महिलाएं

स्थानीय आदिवासियों के अनुसार जैव विविधता से परिपूर्ण इस इलाके को तबाह करने की योजना को राज्य सरकार ने मंजूरी दे दी है। मसलन सूरजपुर जिले में परसा कोयला खदान का इलाका 1252.447 हेक्टेयर में विस्तृत है। इसमें से 841.538 हेक्टेयर जंगल है। यह खदान राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड को आवंटित है। राजस्थान की सरकार ने अडानी समूह से करार करते हुए खदान का काम उसके हवाले कर दिया है। 

स्थानीय आदिवासी हसदेव जंगल को बचाने के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं। पिछले साल ही जब कोयला खदान के विस्तार की बात कही जा रही थी तब दिसंबर, 2021 में आदिवासियों ने पदयात्रा निकालकर विरोध प्रदर्शन किया था। 

सरकारी पक्ष में ‘पेंच’

वहीं, आदिवासियों के आरोपों को राज्य सरकार ने खारिज किया है। सरगुजा जिला पंचायत के उपाध्यक्ष आदित्येश्वर शरण सिंह को लिखे गए पत्र में जिलाधिकारी ने विरोधाभासी बातें कही हैं। मसलन बीते 1 जून, 2022 को अपने पत्र के पहले हिस्से में वह लिखते हैं कि “विषयांतर्गत संदर्भित पत्र के परिप्रेक्ष्य में लेख है कि भारत सरकार कोल मंत्रालय के आदेश क्रमांक 103/24/2015/एनए दिनांक 08.09.2015 के द्वारा परसा कोल ब्लॉक रकबा 1252.447 हेक्टेयर मेसर्स राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड, जयपुर को कोल बेयरिंग एरियाज एक्ट 1957 के तहत आवंटित किया गया है। उक्त अधिनियम के तहत भूमि अधिग्रहण के लिए ग्राम सभा की आवश्यकता नहीं है।”

जबकि, पत्र के दूसरे पैरा में यह लिखा गया है कि “वन/राजस्व वन भूमि के व्यपवर्तन के लिए संबंधित ग्राम पंचायत साल्ही, आश्रित ग्राम हरिहरपुर, घाटबरी तथा आश्रित ग्राम फतेहपुर द्वारा ग्रामसभा प्रस्ताव विधिवत पारित किये गये हैं।”

इसके साथ ही लिखा गया है कि “अंत में लिखा है अत: परसा कोल ब्लॉक के संबंध में पुन: विशेष ग्राम सभा कराने की आवश्यकता नहीं है।”

सरगुजा के जिलाधिकारी द्वारा भेजा गया पत्र

अब सवाल यह है कि यदि कोल बेयरिंग एरियाज एक्ट, 1957 [कोयला धारक क्षेत्र (भू-अधिग्रहण और विकास) अधिनियम, 1957] के तहत भूमि अधिग्रहण के लिए संबंधित ग्राम सभा की सहमति की आवश्यकता नहीं है तो फिर जिलाधिकारी ने अपने पत्र के दूसरे हिस्से में यह क्यों लिखा कि वन/राजस्व वन भूमि के व्यपवर्तन के लिए संबंधित ग्राम पंचायत साल्ही, आश्रित ग्राम हरिहरपुर, घाटबरी तथा आश्रित ग्राम फतेहपुर द्वारा ग्रामसभा प्रस्ताव विधिवत पारित किये गये हैं?

उपरोक्त पत्र के अलावा स्थानीय प्रशासन द्वारा स्थानीय मीडिया को बताया गया है कि परियोजना और उससे पैदा होने वाले रोजगार के विरोध में कुछ तत्वों ने स्थानीय लोगो को ग्रामसभा की वैधता के बारे में भ्रम फ़ैलाने का लगातार प्रयास किया गया है। विकास विरोधी तत्व बहार से आकर सरगुजा में अस्थिरता पैदा करने का प्रयास कर रहे है।

सनद रहे कि सरगुजा के जिलाधिकारी ने उपरोक्त स्पष्टीकरण आदित्येश्वर शरण सिंह द्वारा 30 मई, 2022 को लिखे गए एक पत्र के जवाब में दिया है। आदित्येश्वर शरण सिंह ने अपने पत्र में ग्रामीणों में व्यापत असंतोष एवं आक्रोश का हवाला देते हुए कहा था कि “इस संवेदनशील मुद्दे की गंभीरता को देखते हुए उक्त ग्रामों में विशेष ग्राम सभा बुलाकर ग्राम सभा की स्पष्ट और पारदर्शी अनुमति लेना जनहित में आवश्यक है। जब तक ग्राम सभा नहीं होती है तब तक परियोजना के संबंधित कार्यवाही रोक दी जाए।”

एक पेंच और

दरअसल, भारत सरकार की पर्यावरण, वन और जलवायु विभाग की अनुमति के बाद राज्य सरकार द्वारा खनन कार्य शुरू करने की अनुमति कुछ शर्तों के आधार पर प्रदान की गई है। इन नियमों के अंतर्गत प्रति पेड़ के एवज में 30 गुना पेड़ लगाने की शर्त प्रमुख है। इस गणना के अनुसार 841 हेक्टेयर के एवज में दुगुने क्षेत्र में लगभग आठ लाख से अधिक पेड़ लगाए जाएंगे। इतना ही नहीं, आठ लाख रुपए प्रति हेक्टेयर के हिसाब से करोड़ों रुपए की राशि अग्रिम के रूप में वन विभाग को जमा कराये जाने की बात कही गयी। ऐसे में सवाल यह भी है कि वन विभाग को अग्रिम के रूप में रकम दी गयी है या नहीं? और यदि दी गयी है तो उसका व्यय कहां और किस रूप में हुआ है?

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

तामेश्वर सिन्हा

तामेश्वर सिन्हा छत्तीसगढ़ के स्वतंत्र पत्रकार हैं। इन्होंने आदिवासियों के संघर्ष को अपनी पत्रकारिता का केंद्र बनाया है और वे विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रिपोर्टिंग करते हैं

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