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छत्तीसगढ़ : जंगल बचाने की लड़ाई आदिवासियों के लिए ‘पंडिताई’ से ज्यादा बड़ी है

रायपुर केंद्रीय जेल में पंडिताई के प्रशिक्षण से कितने आदिवासियों या दलितों को लाभ होगा, यह तो नहीं जान सकते, क्योंकि यह प्रश्न तो जरूर आएगा कि उनकी पंडिताई को स्वीकार कौन करेगा और दूसरी बात यह कि दलितों को जमीन और आदिवासियों की जमीन और जंगल के प्रश्न के समक्ष बाकी अन्य सारे प्रश्न गौण हैं। बता रहे हैं विद्या भूषण रावत

छत्तीसगढ़ में अगले साल चुनाव होने हैं। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कांग्रेस के अंदर पिछड़ी जातियों का चेहरा हैं। हालांकि यह माना जाता था कि छत्तीसगढ़ एक आदिवासी बहुल राज्य है, लेकिन आज वहां की स्थिति बहुत भिन्न है और राज्य की दोनों मुख्य पार्टियों ने आदिवासियों के हितों या उनके लिए किसी नए प्रकार की नीति से अभी भी दूरी रखी है। दोनों पार्टियों ने अभी आदिवासियों के प्रश्न पर कोई बहुत क्रांतिकारी पहल नहीं की है और वे ढर्रे वाली राजनीति ही कर रही हैं, जिसमें पुरोहितवादी सांस्कृतिक परंपराओं को आगे बढ़ाना शामिल है।  

“राजस्थान पत्रिका” में खबर छपी कि रायपुर केंद्रीय जेल के कैदियों को पूजा-पाठ और पंडिताई का प्रशिक्षण दिया जा रहा है ताकि वे घर-घर जाकर पूजा-पाठ करा सकें। पूरा कोर्स राज्य संस्कृत बोर्ड की तरफ से होगा, जिसमें पूजा, मंत्र-विधि विधान आदि का प्रशिक्षण दिया जाएगा। कोर्स पूरा करने पर सभी प्रतिभागियों को एक प्रमाणपत्र दिया जाएगा। नए सत्र की शुरुआत जुलाई में हो रही है। 

बताते चलें कि इस समय रायपुर केंद्रीय जेल में 600 के लगभग कैदी हैं। लेकिन इनमें से केवल 91 ही ऐसे हैं, जो हाई स्कूल या इंटर तक पढे हैं और यही लोग संस्कृत और पूजा-पाठ की शिक्षा ले सकेंगे, क्योंकि सरकार यह मानती है कि यदि इन्हें ‘पंडिताई’ आ गई तो उनके रोजगार के साधन ज्यादा अच्छे होंगे और समाज में उनका सम्मान भी बढ़ेगा। सरकार का यह कहना है कि यह प्रशिक्षण बिना जाति-धर्म के भेद के होगा और कोई भी कैदी जो न्यूनतम अहर्ता रखता है तो इस कोर्स के लिए योग्य माना जाएगा। वैसे जेल में और भी कई कोर्स चल रहे हैं, लेकिन कितने कैदी इनका लाभ उठा रहे हैं और कितनों को रोजगार मिल रहा है, यह आंकड़ा शायद ही किसी के पास हो।

छत्तीसगढ़ में लंबे समय तक भाजपा का शासन रहा है और वह अभी मुख्य विपक्षी पार्टी है। भाजपा की राजनीति तो साफ तौर पर धार्मिक संकेतों में छिपी हुई है और गाय उसमें एक बहुत प्रमुख राजनीतिक हथियार है। कांग्रेस में बदलाव की शक्तियों की कमी है और वह भी उन्हीं संकेतों के ऊपर राजनीति कर रही है, जिन्हें भाजपा ने हथिया लिया है। चाहे मध्य प्रदेश हो या राजस्थान अथवा छत्तीसगढ़, कांग्रेस अभी तक खुद को भाजपा से अधिक हिंदुवादी दिखना चाह रही है, लेकिन उसमें प्रतिनिधित्व का सवाल बहुत महत्व का हो जाता है, जिसमें कांग्रेस अभी भी पिछड़ती नजर आ रही है। 

वैसे मंदिरों में दलित-पिछड़ों को पुजारी बनाने की मुहिम तमिलनाडु से शुरू हुई थी और यह वहां बहुत पहले से चल रहा था। लेकिन अभी मुख्यमंत्री स्टालिन ने इसमें वह तत्व डाले हैं, जिन्हें संघ और हिंदुत्व की ताकतें नापसंद करती हैं। जैसे तमिलनाडु के मंदिरों में अब पुजारियों में दलित-पिछड़े बड़ी संख्या में आएंगे और पूजा विधि-विधान तमिल भाषा में होगा न कि संस्कृत में, जो ब्राह्मणों को एक क्षेत्र में एकाधिकार देती है। स्टालिन सरकार का कदम दरअसल सामाजिक न्याय की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम है। इसके विपरीत छत्तीसगढ़ की सरकार ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया और यह हम सभी जानते हैं कि दलित-पिछड़े यदि संस्कृत सीख भी लेंगे तो क्या उनसे कोई पूजा करवाएगा या वे सब अपने-अपने समाज में पुरोहित बन जाएंगे? क्या किसी दलित या पिछड़े जाति के पुरोहित से ब्राह्मण या अन्य बड़ी जातियों के लोग विवाह या अन्य संस्कार करवाएंगे?

दरअसल, परंपरागत जातिवादी व्यवस्था में ही अपनी समस्याओ का समाधान खोजने के प्रयास बहुत सफल नहीं होने वाले हैं, क्योंकि यह उस व्यवस्था के पोषकों या शोषकों को ही मजबूत करती है। ऐसा नहीं है कि यह छत्तीसगढ़ सरकार का पहला प्रयास है। पहले भी मुख्यमंत्री बघेल होली, दीवाली और अन्य सभी त्योहारों को खूब अच्छे से मनाते आए हैं और छत्तीसगढ़ में सरकार का गोधन न्याय योजना कार्यक्रम बहुत लोकप्रिय भी हुआ है। सरकार कहती है कि छत्तीसगढ़ में किसान गोबर बेचकर 25 हजार से 30 हजार रुपए प्रति माह कमा सकते हैं। जुलाई 2020 से अप्रैल 2022 तक राज्य सरकार ने किसानों से लगभग 138 करोड़ रुपए का गोबर खरीदा, जो निस्संदेह अच्छी बात है। 

हसदेव बचाओ पदयात्रा की तस्वीर

धर्म आधारित राजनीति अच्छी बात हो सकती है, लेकिन अपने को धर्मनिरपेक्ष कहने वाले दल अगर नए विकल्प की राजनीति करेंगे तो ज्यादा अच्छा होगा। कांग्रेस के लिए तो नेहरू की विरासत सबसे महत्वपूर्ण है, जिन्होंने कभी धर्म आधारित प्रतीकों का इस्तेमाल नहीं किया। छत्तीसगढ़ भारत के मानचित्र में इसलिए प्रसिद्ध हो गया क्योंकि आदिवासियों के संघर्ष ने सरकारी तौर तरीकों से उनके अधिकारों को निर्धारित किये जाने के प्रयासों को खारिज कर दिया। माओवादी हिंसा का दौर भी था, जिसमें कांग्रेस के बहुत से नेता मारे गए। यह हिंसा भी भाजपा के शासन मे बंद हो गई लेकिन आदिवासियों द्वारा अपने संसाधनों को बचाने की लड़ाई जारी है। कांग्रेस सरकार ने अभी तक ऐसा कुछ नहीं किया, जिससे आदिवासियों के गुस्से या उनके प्रश्नों पर पार्टी कोई ईमानदार प्रयास करती दिखे। 

अभी हसदेव अरण्य मे अदानी के कोल खदान की परियोजना के लिए छत्तीसगढ़ में 841 हेक्टेयर के जंगल में 2 लाख से अधिक पेड़ों को काटने के आदेश हो गए थे। मार्च से ही आदिवासी इस परियोजना के विरुद्ध खड़े थे। गत 26 अप्रैल को जिला प्रशासन ने पेड़ काटने के आदेश दे दिए थे, जिसके विरुद्ध आदिवासी पेड़ों से चिपकने लगे थे। लेकिन मुख्यमंत्री पहले से इसके लिए तैयार थे। जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी और उनकी ही सरकार में मंत्री त्रिभुवनेशवर शरण सिंह देव इस खनन परियोजना का विरोध कर रहे थे। उधर राहुल गांधी शुरू से ही अडाणी-अंबानी के विषय में देश की जनता में लगातार बातें उठा रहे थे। लेकिन उनकी पार्टी की सरकार उनकी विचारधारा के विरुद्ध जा रही थी। हालांकि सरकार अब कह रही है कि उसने परियोजना के तीन चरणों को स्थगित रखा है। यानि अभी भी लोगों के सिर पर तलवार लटकी है, क्योंकि परियोजना को पूरी तरह से खारिज नहीं किया गया है और सरकारी अधिकारियों और नेताओं की भाषा हमेशा चालकी वाली होती है, जो कुछ समय तक लोगों के गुस्से को थामने के लिए कुछ और होती है और बाद में चुपचाप बदल जाती है। 

उधर हसदेव बचाओ समिति का शांतिपूर्ण धरना प्रदर्शन लगातार चल रहा है और अभी उसके 127 दिन से अधिक हो गए हैं। पिछले अक्टूबर में आदिवासियों ने हसदेव के जिला मुख्यालय सरगूजा से लेकर रायपुर तक की 300 किलोमीटर लंबी पदयात्रा भी की, लेकिन सरकार अपनी चालाकियों पर कायम थी। त्रिभुवनेशवर सिंह देव शुरू से ही इन परियोजनाओं का विरोध कर रहे थे और नतीजा यह निकला कि छत्तीसगढ़ सरकार ने भी अपने यहां आदिवासी इलाकों मे पेसा कानून लगाने का फैसला किया है, जिसका मतलब यह है कि अब गांवों मे किसी भी तरह परियोजना के लिए आदिवासी ग्राम सभा की अनुमति के बिना कुछ भी संभव नहीं होगा। लेकिन लोग फिर भी धरने पर बैठे हैं और यह अविश्वास का संकट है। कोयला खदान से उस क्षेत्र की जैव विविधता को खतरा होगा और लाखों पेड़ काटे जाएंगे और उपजाऊ भूमि खत्म हो जाएगी। ऐसा कहा जाता है के हसदेव अरण्य का क्षेत्र 1878 हेक्टर मे फैला हुआ है, जो सरगुजा जिले का हिस्सा है और यहां कोयले की प्रचूर भंडार है और इस इलाके को छत्तीसगढ़ का ‘फेफड़ा’ भी कहते हैं, क्योंकि प्रदेश की शुद्ध हवा और पर्यावरण के लिए यह क्षेत्र बहुत महत्वपूर्ण है। लेकिन नीति निर्माताओं को कोयले की दुकानदारी के अलावा कुछ नजर नहीं आता। इस क्षेत्र की जैव विविधता इतनी महत्वपूर्ण है कि सरकार को कोयले का इस्तेमाल करने की बात सोचनी भी नहीं चाहिए। उससे अधिक, आदिवासियों ने हमारे जंगल बचाये हैं, हमारी पर्यावरण की सबसे बड़ी सुरक्षा की है और हम उनकी जमीनें छीनकर उनके जंगलों को जमींदोज कर देना चाहते हैं तथा विकास के नाम पर उस क्षेत्र को खत्म कर देना चाहते हैं। वैसे भी हमारा मध्य वर्ग, जिसे अपना विकास चाहिए, जो दो मिनट बिजली न होने पर तूफान खड़ा कर दे, वह ज्ञान देता है कि देश के विकास में यदि कुछ लोग शहीद भी हो जाएं तो क्या होगा। सवाल यह है कि शहीद हमेशा आदिवासी, या उनके जंगल या हमारा पर्यावरण ही क्यों हो? 

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को देखना है कि वह वाकई आदिवासियों का भविष्य चाहते हैं या कांग्रेस के उनके पूर्ववर्तियों की तरह ‘विकास’ की राजनीति करना चाहते हैं, जिससे मूलभूत सवालों से हटकर आदिवासियों को केवल जीवन यापन तक सीमित कर दिया जाए। वर्ष 2004 में यूपीए-एक के कार्यकाल में कांग्रेस ने निजीकरन की प्रक्रिया को तेज कर दिया था और गरीबों को मनरेगा का झुनझुना पकड़ा दिया था। लेकिन देश भर मे आदिवासी प्रतिरोध की आवाजें तेज हो गई थीं, क्योंकि सरकार और कंपनियों की मिलीभगत तथा मनमानी से आदिवासियों का जीवन मुश्किल हो गया था। छत्तीसगढ़ इसका स्पष्ट उदाहरण है। आदिवासियों की नाराजगी पार्टी के लिए बुरे दिन ले आई और जब करीब 15 वर्ष बाद फिर पार्टी सत्ता में आई तो अभी तक आदिवासियों के साथ न्याय नहीं कर पाई है। 

सवालों के उत्तर राज्य सरकार के पास ही है। आदिवासियों के पास अपनी जमीन बचाने की लड़ाई है। उनके जंगल और उसकी संपदा पर उसका अधिकार एक महत्वपूर्ण सवाल है। वहीं से उनका नेतृत्व भी निकलेगा। लेकिन उनके शांतिपूर्ण आंदोलन को आपराधिक बनाने के प्रयास भी खतरनाक होंगे। रायपुर केंद्रीय जेल में पंडिताई के प्रशिक्षण से कितने आदिवासियों या दलितों को लाभ होगा, यह तो नहीं जान सकते, क्योंकि यह प्रश्न तो जरूर आएगा कि उनकी पंडिताई को स्वीकार कौन करेगा और दूसरी बात यह कि दलितों को जमीन और आदिवासियों की जमीन और जंगल के प्रश्न के समक्ष बाकी अन्य सारे प्रश्न गौण हैं। समय आ गया है कि सरकार दिखावटी कार्यों को करने के बजाए कुछ ठोस काम करे तो उसका लाभ होगा। नहीं तो प्रदेश की बघेल सरकार की नीयत पर सवाल खड़े होते रहेंगे। 

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

विद्याभूषण रावत

विद्याभूषण रावत सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता हैं। उनकी कृतियों में 'दलित, लैंड एंड डिग्निटी', 'प्रेस एंड प्रेजुडिस', 'अम्बेडकर, अयोध्या और दलित आंदोलन', 'इम्पैक्ट आॅफ स्पेशल इकोनोमिक जोन्स इन इंडिया' और 'तर्क के यौद्धा' शामिल हैं। उनकी फिल्में, 'द साईलेंस आॅफ सुनामी', 'द पाॅलिटिक्स आॅफ राम टेम्पल', 'अयोध्या : विरासत की जंग', 'बदलाव की ओर : स्ट्रगल आॅफ वाल्मीकीज़ आॅफ उत्तर प्रदेश' व 'लिविंग आॅन द ऐजिज़', समकालीन सामाजिक-राजनैतिक सरोकारों पर केंद्रित हैं और उनकी सूक्ष्म पड़ताल करती हैं।

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