ओबीसी साहित्य की समस्याएं

लेखक अपनी सामाजिक चेतना के आधार पर साहित्य में सामाजिक अस्मिता की पहचान कराता है। अब सवाल यह उठता है कि अगर ओबीसी साहित्य नाम की कोई चीज मौजूद है तो उसकी सामाजिक अस्मिता और सामाजिक चेतना का आधार क्या होगा

लगभग पिछले एक डेढ़ साल से फारवर्ड प्रेस ओबीसी साहित्य की अवधारणा को लेकर सुनियोजित ढंग से बहस चला रहा  है। इस बहस को देखकर कोई भी लेखक ऐसा अनुमान लगा सकता है। इस पत्रिका के मुख्य संपादक आयवन कोस्का द्वारा बताया गया है कि पहला अखिल भारतीय ओबीसी साहित्य सम्मेलन 2006 में पुणे में हुआ था और दूसरा  2007 में नासिक में संपन्न हुआ। मजेदार बात यह है कि मराठी भाषा के ओबीसी लेखकों द्वारा दो अखिल भारतीयओबीसी साहित्य सम्मेलन संपन्न हो चुके हैं, मगर हिंदी में, उत्तर भारत में उसकी कोई अनुगूंज सुनाई नहीं दी। यह सुन-पढ़ कर ताज्जुब ही होता है। ऐसा ही ताज्जुब प्रसिद्ध पत्रिका हंस के संपादक राजेंद्र यादवजी को भी हुआ जब उनसे पूछा गया कि क्या ओबीसी साहित्य जैसी कोई चीज भी है तो उन्होंने बिना झिझक के कहा कि मुझे नहीं लगता कि ओबीसी साहित्य नाम की कोई चीज है।

दस साल से मैं आम्बेडकरवादी साहित्य की एकमात्र पत्रिका अपेक्षा का संपादन कर रहा हूं। मुझे नहीं पता कि ओबीसी साहित्य नाम की कोई चीज मौजूद है। इसकी सबसे बड़ी वजह तो यह हो सकती है कि हिंदी क्षेत्र शुरू से ही पिछड़ा हुआ क्षेत्र रहा है, अपढ़ों का क्षेत्र रहा है, इसके बनिस्बत बंगाल और महाराष्ट्र काफी आगे रहे हैं। दलित साहित्य का नामकरण सबसे पहले महाराष्ट्र में हुआ और अब ओबीसी साहित्य का नामकरण भी महाराष्ट्र में हुआ है, लेकिन आम्बेडकरवादी साहित्य के नामकरण का श्रेय उत्तर भारत से निकलने वाली पत्रिका अपेक्षा को ही जाता है, जब ओबीसी साहित्य पर बहस चलेगी तो निश्चित तौर पर दलित साहित्य पर भी बहस चलेगी ही, उससे आप बच नहीं सकते।

सत्तर के दशक में जब मराठी भाषा में दलित पैंथर के संघर्ष के बाद दलित साहित्य की अवधारणा सामने आई थी तब से उसके पीछे एक वैचारिक प्रेरणा काम कर रही थी, जिसे बुद्ध-फुले-आम्बेडकर का नाम दिया गया। भले ही दलित साहित्य का नामकरण एक सामाजिक समुदाय या जाति, दलित वर्ग के आधार पर किया था लेकिन हिंदी में आते-आते दलित साहित्य अनुसूचित जाति तक ही सीमित होकर रह गया और इस तरह आज उसमें जाति चेतना इतनी प्रबल हो गई है कि वह जातिवादी चेतना का साहित्य बनकर रह गया है और इसके लेखक अपनी-अपनी जाति को मजबूत करने का नारा लगाकर उसे जातिवाद की संकीर्ण दीवारों में कैद करने लगे हैं। यही वजह है कि दलित लेखकों के बीच चमार-भंगी का विवाद इस समय चरम पर दिखाई दे रहा है। वे एक दूसरे के खिलाफ खड़े हैं। इसलिए हमारी मान्यता है कि साहित्य का नामकरण एक सामाजिक समुदाय-विशेष या जाति विशेष के आधार पर नहीं होना चाहिए बल्कि उसका नामकरण भाषा या साहित्य की किसी प्रवृत्ति या विचारधारा के आधार पर होना चाहिए, अन्यथा वही होगा जो आज दलित साहित्य आंदोलन में हो रहा है। जातिवादी चेतना उसकी मुख्य प्रवृत्ति बनती जा रही है।

यह सही है कि साहित्य और समाज में गहरा रिश्ता होता है और साहित्य में सामाजिक संबंध की अभिव्यक्ति की खोज होती है। व्यक्ति के सामाजिक अस्तित्व के साथ उसकी सामाजिक अस्मिता और सामाजिक चेतना भी जुड़ी होती है। लेखक अपनी सामाजिक चेतना के आधार पर साहित्य में सामाजिक अस्मिता की पहचान कराता है। अब सवाल यह उठता है कि अगर ओबीसी साहित्य नाम की कोई चीज मौजूद है तो उसकी सामाजिक अस्मिता और सामाजिक चेतना का आधार क्या होगा। यानी उसके पीछे कौन-सी विचारधारा होगी, कौन-सा दर्शन होगा, क्योंकि हरेक कला-साहित्य के पीछे एक निश्चित जीवन दृष्टि होती है। जीवन दर्शन होता है अपने समय की राजनीति होती है। ओबीसी साहित्य का सामाजिक आधार क्या है, क्या वह पुरानी समाज वर्ण व्यवस्था के शूद्र वर्ण से संबंधित है, क्या वह पिछड़ा वर्ग या अन्य पिछड़ा वर्ग या अति पिछड़ा वर्ग से संबंधित है। आजादी से पहले पिछड़ा वर्ग संघ बिहार में बनाए गए फिर उसके बाद अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग संघ बना तो उसका राजनीतिक आधार मजबूत हुआ। मंडल आयोग की घोषणा के पीछे पिछड़े वर्ग की राजनीति रही है। परिणामस्वरूप आज पिछड़ा वर्ग राजसत्ता प्राप्त करने में सफल रहा है और दूसरा बड़ा कारण दलित राजनीति या आम्बेडकरवादी आंदोलन भी रहा है, जिसका उसे सहयोग मिलता रहा है। पिछड़ा वर्ग के राजनीतिक-सामाजिक आंदोलन में ब्राह्मण-बनिये की राजनीति से ऊबकर पिछड़ा वर्ग आंदोलन से जुडऩे वाले लोहिया की समाजवादी विचारधारा रही है लेकिन लोहिया पूरी तरह से हिन्दूवादी विचारधारा से मुक्त नहीं हो पाए थे। उनकी समाजवादी विचारधारा में गांधीजी की आत्मा बराबर बोलती रही है। इसलिए मैं भारत के समाजवादियों को मूलत: गांधीवादी ही मानता रहा हूं, क्योंकि उनका गांधीवाद से आज भी मोहभंग नहीं हुआ है। अगर ओबीसी साहित्य की विचारधारा लोहिया की समता, अधिकतम समानता पर आधारित है तो उन्हें इसे स्पष्ट करना चाहिए। लोहिया के समाजवादी सिपाही आज हिन्दुत्ववादी ताकतों, भाजपा के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं, इसलिए मुझे नहीं लगता कि ओबीसी साहित्य को लोहिया की समाजवादीनुमा विचारधारा से जोड़ पाएंगे। क्या ओबीसी साहित्य की अवधारणा के समर्थक अपने साहित्य को सामाजिक क्रांति के दूत महात्मा जोतिबा फुले की सामाजिक परिवर्तन की विचारधारा से जोड़ पाएंगे। उन्होंने शूद-अतिशूद्र की ब्राह्मणवादी शोषण, उत्पीडऩ से मुक्ति के लिए बहुजन समाज की अवधारणा दी थी जिन्हें उन्होंने भारत का मूल निवासी बताया था। मूल निवासी की अवधारणा के आधार पर ही जोतिबा पुले ने शूद-अतिशूद्र बिछड़े हुए भाई बताकर बहुजन समाज की नींव रखी थी जो पीछे मध्ययुगीन संत कवियों, बहुजन समाज से होते हुए बौद्ध धम्म तक जाती है। दक्षिण में रामास्वामी पेरियार ने पिछड़ा वर्ग में आत्मसम्मान, स्वाभिमान का आंदोलन चलाकर उन्हें राजसत्ता तक पहुंचाया था। उत्तर भारत में कांशीराम ने इन सबको दलित आंदोलन का वैचारिक आधार बनाकर बहुजन समाज की अवधारणा को नया राजनीतिक आयाम दिया था। बहुजन समाज में दलित, पिछड़ा वर्ग, आदिवासी,  अल्पसंख्यक वर्ग आदि को शामिल करके मजबूत राजनीतिक आधार खड़ा किया था। इससे दलित-पिछड़ा वर्ग की एकता कायम हुई और 1993 में उत्तर प्रदेश में राजसत्ता से कांग्रेस और भाजपा को बाहर का रास्ता दिखाया लेकिन वह वैचारिक एकता नहीं थी। सामाजिक एकता नहीं थी। राजनीतिक एकता, गठबंधन थी लेकिन जाति चेतना और व्यक्तिगत अहम् की वजह से जल्दी टूट गई। इससे दलित-पिछड़े वर्ग को एक सबक यह मिला कि राजनीतिक एकता की मजबूती के लिए सामाजिक एकता बेहद जरूरी है, दूसरा बड़ा कारण मुलायम सिंह यादव और कांशीराम की विचारधारा में गहरे मतभेद थे। मुलायम सिंह यादव लोहिया की समाजवादी विचारधारा से बंधे थे तो कांशीराम फुले, पेरियार और आम्बेडकर को एक साथ जोड़कर अपना वैचारिक आधार लिए हुए थे। ऐसी वैचारिक समस्या ओबीसी साहित्य के लेखकों के सामने भी आएगी। फिर ओबीसी साहित्य का सामाजिक आधार अन्य पिछड़ा वर्ग ही रहेगा, जैसा कि इस अवधारणा से साफ-साफ निकलकर आ रहा है। सवाल यह उठता है कि क्या ओबीसी साहित्य में सिर्फ  पिछड़ा वर्ग ही शामिल रहेगा। मुझे नहीं लगता कि पिछड़ा वर्ग के नामचीन साहित्यकार ओबीसी साहित्य से जुड़ पाएंगे, क्योंकि वे तो पहले से ही मुख्यधारा के साहित्य में स्थापित और प्रतिष्ठित हैं, फिर वे क्यों ओबीसी साहित्य में आकर अपनी प्रतिष्ठा को कम करेंगे।

सवर्ण समाज में ओबीसी लोगों की वही स्थिति है, जैसी दलित समाज के लोगों की है। जाति की समस्या वहां भी है। जातिगत अपमान और शोषण उन्हें भी उतना ही झेलना पड़ता है, जितना दलितों को, कम ज्यादा का अंतर जरूर रहता है, क्योंकि असली सवाल सामाजिक अस्मिता की पहचान का है। सारी लड़ाई इसी के लिए ही तो है, सामाजिक सम्मान और अस्मिता के लिए। सबसे बड़ा सवाल यह भी उठने वाला है कि ओबीसी समाज और बहुजन समाज की अवधारणा अलग-अलग है। ओबीसी में अन्य पिछड़ा वर्ग, जातियों और बहुजन में दलित, पिछड़ा वर्ग, आदिवासी और अल्पसंख्यक वर्ग भी शामिल हैं। इस तरह से भी ओबीसी साहित्य की अवधारणा से बहुजन साहित्य की अवधारणा एकदम अलग हो जाती है। इस पर चली बहस का भी यही निष्कर्ष निकलकर आता है। सबसे बड़ी समस्या इन सभी जातियों की वैचारिक अवधारणा को लेकर है, क्योंकि इन सभी जातियों की एक निश्चित विचारधारा नहीं है। यह स्थिति साहित्य में भी रहेगी। हम सब जानते हैं कि बिना विचारधारा के साहित्य हो ही नहीं सकता। साहित्य किसी विचारधारा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जाहिर करता है। दूसरे वैचारिक प्रतिबद्धता को राजनीति से अलग करके नहीं देखा जा सकता, क्योंकि वैचारिक प्रतिबद्धता राजनीतिक ही होती है।

भारत के समाजों और समुदायों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे राजनीतिक विचारधारा में आजादी, बराबरी और भाईचारा जैसे लोकतांत्रिक और जनवादी मूल्यों को स्वीकार करते हैं, क्योंकि वह संविधान-सम्मत है लेकिन सामाजिक विचारधारा में इन लोकतांत्रिक जनवादी मूल्यों को अस्वीकार करके जातिवादी समाज-व्यवस्था का अनिवार्य अंग बने रहते हैं, जाति चेतना मात्र रहते हैं। ओबीसी साहित्य की अवधारणा का आधार विचार या विचारधारा न होकर जाति या जातियां हैं। लंबेे समय तक आप इस जाति चेतना या जातिवादी चेतना से बच नहीं सकते हैं, जिस तरह दलित साहित्य आज जातिवादी चेतना का साहित्य बनता जा रहा है। ठीक एक दिन ओबीसी साहित्य भी इस जातिवादी चेतना से बच नहीं पाएगा। इस समस्या का एकमात्र विकल्प यही है कि साहित्य को भाषा या विचारधारा या फिर किसी साहित्यिक प्रवृत्ति विशेष के आधार पर नामकरण किया जाए। इस दृष्टि से हमने आज से आठ साल पहले अपेक्षा पत्रिका के माध्यम से विचारधारा के आधार पर आम्बेडकवादी साहित्य की अवधारणा प्रस्तुत करके दलित साहित्य का विकल्प दिया था जो ओबीसी साहित्य का भी विकल्प बन सकता है। आम्बेडकरवादी साहित्य की अवधारणा बहुजन समाज, बहुसंख्यक समाज की अवधारणा पर आधारित है। आम्बेडकरवादी विचारधारा उसकी विचारधारा है जिसे हम बुद्ध-फुले-आम्बेडकर के नाम से जानते हैं। आम्बेडकरवादी साहित्य में दलित-पिछड़े वर्ग के सभी चिंतकों-विचारकों के विचार शामिल हैं, जिसे मानवतावादी विचारधारा भी कह सकते हैं। आम्बेडकरवाद सिर्फ  जातिविहीन समाज के निर्माण की ही बात नहीं करता, बल्कि जातिविहीन, वर्गविहीन समाज के पुनर्निर्माण व स्थापना के लिए वैचारिक-सामाजिक धरातल पर संघर्ष भी करता है। इस तरह आम्बेडकरवादी विचारधारा एक अंतरराष्ट्रीय विचारधारा बन जाती है। आम्बेडकवादी साहित्य का वैचारिक आधार आम्बेडकरवाद ही है, इसलिए दलित साहित्य और ओबीसी साहित्य का एकमात्र विकल्प आम्बेडकरवादी साहित्य ही हो सकता है।

 (फारवर्ड प्रेस, बहुजन साहित्य वार्षिक,अप्रैल, 2013 अंक में प्रकाशित )

(बहुजन साहित्य से संबंधित विस्तृत जानकारी के लिए पढ़ें “फॉरवर्ड प्रेस बुक्स’ की किताब ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावना’ (हिंदी संस्करण). अमेजन से  घर बैठे मंगवाएं . http://www.amazon.in/dp/8193258428 किताब का अंग्रेजी संस्करण भी शीघ्र ही उपलब्ध होगा)

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