फुले ने साहित्य की पारंपरिक अवधारणा को ही चुनौती दी। उनके लिए साहित्य केवल सौंदर्य या रस का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का माध्यम था। यह दृष्टिकोण उस समय की प्रचलित ‘कलावादी’ धारणाओं से भिन्न था। इसलिए उनके साहित्य का मूल्यांकन भी उन्हीं सीमित मानकों से किया गया, जिनमें उनके योगदान का पूरा...