जहां एक तरफ़ इलाहाबाद के सामाजिक यथार्थ की बात करने से गुरेज़ किया गया है, वहीं लेखिका इस शहर के प्रति गहरे ‘नॉस्टेल्जिया’ में डूबी हुई नज़र आती हैं। इलाहाबाद का संस्मरण लिखने का शायद यह बेहतर तरीक़ा नहीं है कि हम शहर के प्रति इतने भावुक हो जाएं, मानो इलाहाबाद इस दुनिया से...