वीरेंद्र यादव का सीना ‘अपनों’ के हाथों होते रहे ऐसे अपमानों से छलनी था। वे अपना ज़ख़्मी दिल लिए सेकुलर-प्रगतिशील विचारों की लड़ाई लड़ते रहे। वे अपने सुविधा-कक्ष में बैठकर ख़ामोशी से साहित्य रचते हुए करियर में डूब सकते थे। लेकिन, वे सोशल मीडिया से लेकर, पत्र-पत्रिकाओं तक और सड़कों तक मुसलसल फ़ासीवाद से...