यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह दौर वास्तव में ‘सुशासन’ का था, जैसा कि स्थापित मीडिया और सत्ता समर्थक वर्ग बार-बार प्रचारित करते रहे हैं, या फिर यह एक ऐसा राजनीतिक अध्याय था जिसमें सामाजिक न्याय की राजनीति को व्यवस्थित तरीके से कमजोर कर दिया गया? पढ़ें, अरुण आनंद की त्वरित टिप्पणी