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एक किताब, जिसमें दर्ज है मीडिया में दलित-बहुजनों के प्रति हिकारत के दास्तान

न्यूज़रूम में दलितों और आदिवासियों को अख़बार के सवर्ण समाज से आने वाले मालिकों, मैनेजरों और संपादकों का भरोसा नहीं मिलता; उन्हें यह महसूस कराया जाता है कि वे ‘अपना आदमी’ नहीं हैं। पढ़ें, अभय कुमार की यह समीक्षा

एक किताब, जिसमें दर्ज है मीडिया में दलित-बहुजनों के प्रति हिकारत के दास्तान
न्यूज़रूम में दलितों और आदिवासियों को अख़बार के सवर्ण समाज से आने वाले मालिकों, मैनेजरों और संपादकों का भरोसा नहीं मिलता; उन्हें यह महसूस...
श्रम की गरिमा : भारत में पवित्रता और प्रदूषण की अवधारणाएं
जब तक हम यह मानते रहेंगे कि शारीरिक श्रम केवल विशिष्ट जातियों और लिंग के व्यक्तियों के हिस्से में है और उसमें कोई गरिमा...
चुप्पी से प्रतिरोध तक का मेरा सफ़र
आंबेडकर और फुले के ज़रिए मैंने जाना कि अंधविश्वास किस तरह दमनकारी व्यवस्था को बनाए रखते हैं। पैकपेट से विदा लेते समय मैं बहुत...
स्मृतियां शेष : मुक्ति तिर्की के कारण झामुमो को मिला था ‘तीर-धनुष’
झामुमो की आज की पीढ़ी को इस बात का पता नहीं होगा कि यह मुक्ति तिर्की का कितना बड़ा योगदान था झामुमो को राजनीतिक...
पटना में अली अनवर की किताब के लोकार्पण के मौके पर जाति के सवाल के साथ जवाब भी
दरभंगा के कुशेश्वरस्थान की घटना का उल्लेख करते हुए हेमंत ने कहा कि खबर को वास्तविकता से काटकर उसे एससी-एसटी एक्ट के विरोध में...
मिस्र बनाम सिंधु : भाषा और ज्ञान का उद्गम, प्रवाह व अवरोध
भारत के संबंध में भाषा की खोज का सिलसिला भीमबेटका की पहाड़ियों तक ले जाता है। मध्य प्रदेश के विंध्यक्षेत्र की पहाड़ियों में स्थित...
सुदर्शन ऋषि और डुमार (डोमार) समाज
पूरे भारत में डोमार जाति की जनसंख्या को लेकर एकमत नहीं है, क्योंकि जनगणना में भी उनकी जानकारी सही नहीं मिल पाती है। इसका...
देखें, जगत के प्रकाश को
इस क्रिसमस पर हम झिलमिलाते बल्बों और साज-सज्जा से आगे देखें – हमारे जगत के उस प्रकाश को देखें, जो अंधेरे से भरी हमारी...
आर्यभट नहीं, आजीवक थे भारतीय गणित के प्रतिपादक
सच तो यह है कि सभ्यता के आरंभिक चरण में प्रकृति के सान्निध्य में रहकर, उसका करीब से अध्ययन करने वाले श्रमण, ज्ञान और...
हाशिए पर जीवन जीते गाड़िया लुहार
गाड़िया लुहारों का रहन-सहन भी कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं पैदा करता है। सार्वजनिक शौचालयों का अभाव या उनसे दूरी, इन्हें खुले में शौच...
‘हेरि महां दरद दिवाणी म्हारा दरद न जाण्या कोय’
पति की मृत्यु और पुनर्विवाह न होने की स्थिति में मीरा का यह पक्ष अधिक मुखरता से अभिव्यक्त हुआ है। उन्हें कुछ भी मानने...
‘पसमांदा जन आंदोलन 1998’ : मुस्लिम समाज में जातिवाद और हक की जद्दोजहद की दास्तान
मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में यह किताब और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है। पसमांदा समाज के प्रतिनिधित्व की स्थिति आज भी लगभग...
वर्चस्ववादी सत्ता की मुखालफत करतीं मोहन मुक्त की कविताएं
मोहन मुक्त सांस्कृतिक वर्चस्व को सत्ता का सबसे चालाक रूप मानते हैं। वे कहते हैं कि मिथक, परंपरा, धर्म और भाषा के ज़रिए शोषण...
निष्ठा का सवाल उठाए अरसा गुज़र गया!
कंवल भारती की कविताओं पर सरसरी नज़र दौड़ाने से यही पता चलता है कि उनके अंदर समता को लेकर बेचैनी है। वे महीन से...
प्रगतिशीलों के बीच वीरेंद्र यादव के होने का निहितार्थ
वीरेंद्र यादव का सीना ‘अपनों’ के हाथों होते रहे ऐसे अपमानों से छलनी था। वे अपना ज़ख़्मी दिल लिए सेकुलर-प्रगतिशील विचारों की लड़ाई लड़ते...
जिम्मेदार व निर्भीक पत्रकारिता के अग्रदूत थे संतराम बी.ए.
संतराम जी की पत्रकारिता की पड़ताल करने पर जो तथ्य सामने आते हैं, उनमें सबसे पहला है– बहुजन समाज के मुद्दों पर उनकी बिना...
केवल त्याग की प्रतिमूर्ति नहीं, और भी बहुत कुछ थीं रमाबाई
क्या वे बाबासाहेब की कर्त्तव्यनिष्ठ पत्नी भर थीं? या वे आंबेडकर के मुक्ति संघर्ष में बराबर की साझीदार थीं? क्या वे भी मानव-निर्मित विभाजनों...
मनहीन, तनहीन और धनहीन के जननायक
कर्पूरी ठाकुर जिन वर्गों को ‘मनहीन, तनहीन और धनहीन’ कहकर संबोधित करते थे, शायद वे जानते थे कि इन वर्गों की पहली और सबसे...
शिवनंदन पासवान : एक जीवट समाजवादी, जिन्हें राजनीतिक कारणों से किया जा रहा विस्मृत
शिवनंदन पासवान ने जिस दौर में राजनीति में प्रवेश किया, वह बिहार और देश की राजनीति के लिए उथल-पुथल का समय था। समाजवादी आंदोलन...
जोतीराव फुले के सहयोगी सत्यशोधक तुकाराम तात्या पडवळ
तुकाराम तात्या पडवळ ने धर्म तथा जाति-आधारित शोषण को करीब से देखा था। धर्म के नाम पर पुजारी अनपढ़ लोगों को किस तरह से...