इस पुस्तक का मुख्य संदेश यही है कि इन दिनों आंबेडकर के लेखन और भाषणों के चुनिंदा हिस्सों का इस्तेमाल कर उन्हें ‘राष्ट्रवादी’ बताया जा रहा है और जाति और ब्राह्मणवाद की उनकी आलोचना को दरकिनार किया जा रहा है। पढ़ें, नीरज बुनकर की यह समीक्षा
फुले उन्नीसवीं सदी के महानतम व्यक्तियों में से एक थे, जिन्होंने औपनिवेशिक भारत में तमाम बहसों और विमर्शों की नुमाइंदगी करते हुए ब्राह्मणवादी अवधारणा...