पसमांदा विमर्श के समकालीन परिदृश्य में यह पुस्तक महज एक सामान्य अकादमिक अध्ययन या आंकड़ों का पुलिंदा नहीं है, बल्कि पसमांदा आंदोलन के ऐतिहासिक संदर्भ में भारतीय मुस्लिम समाज के भीतर व्याप्त अशराफ़ी आधिपत्य, सामाजिक बहिष्कार, सांस्कृतिक बेदखली और आंतरिक औपनिवेशिकता के खिलाफ एक अत्यंत निर्णायक और क्रांतिकारी वैचारिक हस्तक्षेप है। पढ़ें, अब्दुल्लाह मंसूर...