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फुले का सामाजिक और आध्यात्मिक दर्शन

फुले के विचारों के अनुसार, निर्माता ने सभी मनुष्यों को कुछ समान और अपरिहार्य अधिकार दिए हैं। इसलिए सभी मनुष्य समान हैं और किसी को एक-दूसरे के समान अधिकारों के साथ हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। बता रहे हैं डॉ. अमित राय

जंतर-मंतर पर धरने में शामिल ओबीसी महिलाओं ने कहा– ‘साडा हक, इत्थे रख’
धरने में शामिल महिला प्रतिनिधियों ने एक स्वर में कहा कि जब तक महिला आरक्षण में ओबीसी जो बहुसंख्यक समूह है, की महिलाओं को...
बिहार में मंडलवादी राजनीति के अस्तित्व पर सवाल
मंडल राजनीति का मूल उद्देश्य केवल सत्ता में भागीदारी नहीं था, बल्कि सामाजिक और आर्थिक संरचना में बुनियादी बदलाव लाना था। यह केवल जातीय...
लखनऊ में समता अधिकार सम्मेलन में जुटे बहुजन आंदोलन के प्रतिनिधि
वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि इस सरकार में सबसे बड़ा हमला बहुजन समाज की नई पीढ़ी पर...
राजा राममोहन राय नहीं, फुले थे नवजागरण के अग्रदूत
राजा राममोहन राय, दयानंद सरस्वती, रानाडे, भंडारकर, आगरकर आदि के कार्य उतना सामाजिक परिवर्तन के लिए वांछित नहीं थे, जितना महात्मा फुले के कार्य।...
रूपम मिश्रा की कविता को लेकर विवाद की परतें
इस मामले के दो सिरे हैं। पहला सिरा सीपीआईएमएल से जुड़ा है। सीपीआईएमएल के इलाहाबाद क्षेत्र में रामजी राय और कमल उसरी का अपना-अपना...
सरहुल पर्व : आदिवासी संस्कृति, प्रकृति पूजा और कृषि परंपरा का उत्सव
आज जब पूरी दुनिया ‘पेरिस समझौते’ और ‘कार्बन फुटप्रिंट’ जैसे तकनीकी शब्दों में उलझी है, सरहुल का दर्शन एक सरल लेकिन अचूक समाधान पेश...
ब्राह्मण नहीं, श्रमण थे आयुर्वेद के प्रतिपादक (पहला भाग)
श्रमणों की तरह, चिकित्सक भी ज्ञान के साधक थे। वे घूमते-फिरते, रोग का कारण तथा उसके लिए नई औषधि, उपचार और चिकित्सा ज्ञान प्राप्त...
मिस्र बनाम सिंधु : भाषा और ज्ञान का उद्गम, प्रवाह व अवरोध
भारत के संबंध में भाषा की खोज का सिलसिला भीमबेटका की पहाड़ियों तक ले जाता है। मध्य प्रदेश के विंध्यक्षेत्र की पहाड़ियों में स्थित...
सुदर्शन ऋषि और डुमार (डोमार) समाज
पूरे भारत में डोमार जाति की जनसंख्या को लेकर एकमत नहीं है, क्योंकि जनगणना में भी उनकी जानकारी सही नहीं मिल पाती है। इसका...
देखें, जगत के प्रकाश को
इस क्रिसमस पर हम झिलमिलाते बल्बों और साज-सज्जा से आगे देखें – हमारे जगत के उस प्रकाश को देखें, जो अंधेरे से भरी हमारी...
पमरिया : साझा संस्कृति का बोझ और पसमांदा पहचान का बहुजन विमर्श
डॉ. अयुब राईन द्वारा संपादित यह पुस्तक महज़ एक सांस्कृतिक दस्तावेज नहीं, बल्कि अशराफियत और सामंतवाद के गठजोड़ के खिलाफ एक पसमांदा ‘चार्जशीट’ है।...
आंबेडकर मिशन के नायक बुद्ध शरण हंस का साहित्य कर्म
हंस जी किस्सागो नहीं थे, वह कल्पना भी उनमें नहीं थी, जिससे कथा-शिल्प का निर्माण होता है। उनकी कहानियां उसी तरह की हैं, जिस...
आदिवासी, इकोसिस्टम, पूंजीवाद और नीला कॉर्नफ्लावर
लेखक का उद्देश्य प्रकृति संरक्षण के प्रति सजगता जगाना प्रतीत होता है। आदिवासी जीवन का संघर्ष इस उपन्यास का बायप्रोडक्ट जान पड़ता है। चूंकि...
‘हेरि महां दरद दिवाणी म्हारा दरद न जाण्या कोय’
पति की मृत्यु और पुनर्विवाह न होने की स्थिति में मीरा का यह पक्ष अधिक मुखरता से अभिव्यक्त हुआ है। उन्हें कुछ भी मानने...
‘पसमांदा जन आंदोलन 1998’ : मुस्लिम समाज में जातिवाद और हक की जद्दोजहद की दास्तान
मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में यह किताब और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है। पसमांदा समाज के प्रतिनिधित्व की स्थिति आज भी लगभग...
फुले का सामाजिक और आध्यात्मिक दर्शन
फुले के विचारों के अनुसार, निर्माता ने सभी मनुष्यों को कुछ समान और अपरिहार्य अधिकार दिए हैं। इसलिए सभी मनुष्य समान हैं और किसी...
एक कहानी भारतीय पुनर्जागरण के पितामह जोतीराव फुले की
फुले आधुनिक दर्शनशास्त्र के पिता समझे जाने वाले देकार्ते के समकक्ष माने जाते हैं। देकार्ते ने सभी मान्यताओं को तर्क की कसौटी पर कसा।...
सामाजिक न्याय और डॉ. आंबेडकर
डॉ. आंबेडकर ने ब्रिटिश सरकार से मांग की कि दलित वर्ग को समान नागरिकता दी जाए। समान नागरिक के सभी अधिकार दलितों को दिये...
मानना और अवमानना के दौर में फुले
फुले उन्नीसवीं सदी के महानतम व्यक्तियों में से एक थे, जिन्होंने औपनिवेशिक भारत में तमाम बहसों और विमर्शों की नुमाइंदगी करते हुए ब्राह्मणवादी अवधारणा...
गैर-हिंदुओं से नफरत के दौर में फुले का सार्वजनिक सत्य धर्म
हैरानी की बात यह है कि बराबरी का समाज बनाने का ख़्वाब देखने वालों के संघर्षों को जनता के बीच बेअसर करने में जिस...