हंस जी किस्सागो नहीं थे, वह कल्पना भी उनमें नहीं थी, जिससे कथा-शिल्प का निर्माण होता है। उनकी कहानियां उसी तरह की हैं, जिस तरह कोई खबरनबीस या पत्रकार किसी घटना की स्टोरी बनाता है। अर्थात घटना की फोटोग्राफी करता है। पढ़ें, कंवल भारती का यह आलेख