रामजी यादव की कहानी ‘लोकविद्याधर’ लोककला के क्षरण, पारंपरिक कारीगर जातियों के रोजगार-संकट, बाजार के अमानवीय दबाव और जाति-वर्ग से निर्मित सामाजिक दूरी को एक ही कथासूत्र में पिरोती है। बता रहे हैं अरुण नारायण
रामजी यादव की कहानी ‘लोकविद्याधर’ लोककला के क्षरण, पारंपरिक कारीगर जातियों के रोजगार-संकट, बाजार के अमानवीय दबाव और जाति-वर्ग से निर्मित सामाजिक दूरी को...
डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह की प्रकाशित कृतियां भाषा-विज्ञान, साहित्यालोचना, इतिहास-बोध, लोकसंस्कृति तथा बहुजन विमर्श के विविध आयामों को अपने आप में समेटी हुईं हैं।...