मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में यह किताब और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है। पसमांदा समाज के प्रतिनिधित्व की स्थिति आज भी लगभग वैसी ही बनी हुई है। आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी का सवाल अब भी अनुत्तरित है। लेखक यह साफ करता है कि ‘अल्पसंख्यक’ और ‘अक़लियत’ जैसे शब्दों ने पसमांदा समाज...