1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान विस्थापित हुए सिंधी शरणार्थियों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की स्थिति सामाजिक, आर्थिक और कानूनी रूप से अत्यधिक जटिल और संवेदनशील थी। आज भी इनके गांव-मोहल्लों को ‘शरणार्थी’ शब्द मजबूरन झेलना पड़ता है। बता रहे हैं जितेंद्र मेघवाल