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पढ़ें, शहादत के पहले जगदेव प्रसाद ने अपने पत्रों में जो लिखा

जगदेव प्रसाद की नजर में दलित पैंथर की वैचारिक समझ में आंबेडकर और मार्क्स दोनों थे। यह भी नया प्रयोग था। दलित पैंथर ने जाति से आगे बढ़कर, सामाजिक रूप से उत्पीड़ित और आर्थिक शोषण का शिकार समाज के सभी तबकों को ‘दलित’ के अंतर्गत सम्मिलित करने का प्रयास किया था। बता रहे हैं रिंकु यादव

जगदेव प्रसाद शोषितों के बीच एकता बनाने के सवाल पर सिद्धांतों से पीछे हटने के लिए कतई तैयार नहीं थे। वे उस दल के साथ जिसके नेतृत्व की बागडोर ऊंची जात के हाथ में हो कोई मिलन की बातचीत चलाना शोषित इंकलाब के लिए उचित नहीं मानते थे। एकता की इस प्रक्रिया में सोशलिस्ट पार्टी (लोहियावादी) को मिलाने की भरपूर चेष्टा का जिक्र करते हुए वे साफ कहते हैं कि सोशलिस्ट पार्टी के कुछ नेता अहम और वहम के शिकार हैं, जिसके चलते उनको मिलाकर नया दल नहीं बन सका। उनके शब्दों में– “लोहियावादी सोशलिस्ट पार्टी का नेतृत्व भी कांग्रेस, कम्युनिस्ट और जनसंघ आदि की तरह ऊंची जाति के हाथ में है। सोशलिस्ट पार्टी (लोहियावादी) के कुछ नेता यह मानने को तैयार नहीं कि ऊंची जात के नेतृत्व से मुक्त होकर शोषितों का निछक्का दल बनाना और चलाना मुमकिन है। उनका विश्वास ही जब गलत है, तब उनके साथ एकता कायम करना भी ठीक नहीं।”

एक तरफ हिंदी पट्टी में शोषित समाज दल आगे बढ रहा था तो दूसरी ओर 1970 के दशक में महाराष्ट्र में दलितों के जुझारु प्रतिरोध के मंच के बतौर दलित पैंथर उभर रहा था। उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र में आरपीआई के टूटने-बिखरने के बीच दलित राजनीति के इस नये मॉडल ने हलचल पैदा किया था। जगदेव प्रसाद की नजर में दलित पैंथर की वैचारिक समझ में आंबेडकर और मार्क्स दोनों थे। यह भी नया प्रयोग था। दलित पैंथर ने जाति से आगे बढ़कर, सामाजिक रूप से उत्पीड़ित और आर्थिक शोषण का शिकार समाज के सभी तबकों को ‘दलित’ के अंतर्गत सम्मिलित करने का प्रयास किया था। दलित पैंथर के प्रति जगदेव प्रसाद का खिंचाव होना स्वाभाविक था। दलित पैंथर के बारे में जगदेव प्रसाद को समाचार-पत्रों, खासतौर पर कुछ ज्यादा विश्वसनीय जानकारी मार्च में प्रकाशित ‘दिनमान’ से हुई थी। वे 1 अगस्त,1974 को पूरा पता जाने बगैर राजा ढाले, लतीफ खटिक और नामदेव के नाम पत्र लिखते हैं। पत्र में वे दलित पैंथर के अन्य राज्यों में फैलाने की योजना का हौसला रखने पर प्रसन्नता व्यक्त करते हैं। एक-दूसरे को ठीक से जानने-समझने और एक-दूसरे के साथ सहयोग करके नब्बे फीसदी शोषित जनता को दस फीसदी शोषकों के चंगुल से मुक्त करने की भावना व्यक्त करते हैं। वे अपने दल के सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं कि “आज का हिंदुस्तानी समाज साफतौर से दो तबकों में बंटा है– शोषक और शोषित। हमारे दल की निगाह में शोषक है– ऊंची जात, पूंजीपति, सामंत और ब्राह्मणवादी विचारधारा के पोषक। देश के पैमाने पर शोषक सिर्फ दस फीसदी हैं। शोषित हैं– हरिजन, आदिवासी, मुसलमान और पिछड़ी जातियां। ये नब्बे फीसदी हैं। दस फीसदी शोषक बनाम नब्बे फीसदी शोषित की इज्जत और रोटी की लड़ाई इस मुल्क का असली वर्ग संघर्ष है। देश की यही असली समस्या है। जिंदगी के हर दौर पर दस सैकड़ा शोषकों का एकाधिकार जैसा कायम है।” 

जगदेव प्रसाद (2 फरवरी, 1992 – 5 सितंबर, 1974)

इसी पत्र में वे स्पष्ट करते हैं कि शोषित समाज दल और डीएमके को छोड़कर अन्य सभी राजनीतिक दलों पर भी शोषक वर्ग का ही कब्जा है। हमारा दल नब्बे फीसदी शोषितों (हरिजन, आदिवासी, मुसलमान और पिछड़ी जातियों) का निछक्का दल है। शोषितों का राज, शोषितों द्वारा, शोषितों के लिए हमारे दल का मूल नारा है। पत्र में वे एकता की जरूरत और उसके आधार को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं कि “वर्षों की लंबी आजादी के बाद भी देश के हरिजन, आदिवासी, मुसलमान और पिछड़ी जातियां गुलामी की जंजीर में कराह रही हैं। ऊंची जात के खूनी चंगुल से नब्बे फीसदी शोषितों को मुक्त करने के लिए हम जद्दोजहद कर रहे हैं। वास्तव में हमारा आंदोलन एक महान राष्ट्रीय आंदोलन है, क्योंकि हम जनता की इज्जत और रोटी की लड़ाई लड़ रहे हैं। यह एक ऐसा संयोग है कि जहां शोषित समाज दल अभी नहीं है, वहां दलित पैंथर है या डीएमके है। हम बहुत उत्साह और प्रसन्नता के साथ सहयोग और दोस्ती का हाथ आपकी तरफ बढ़ा रहे हैं क्योंकि समाचार-पत्रों से जो कुछ मालूम हुआ है, उसको मद्देनजर रखते हुए हमें ऐसा लगता है कि दोनों की विचारधारा में कोई अंतर नहीं है।”

जगदेव प्रसाद इतने बड़े देश में सब जगह संगठन खड़ा करने और इस महान राष्ट्रीय आंदोलन को जल्दी सफल बनाये जा सकने के लिए मिलने और बातें करने को जरूरी बताते हैं। अंत में वे जल्दी जवाब देने तथा संपर्क स्थापित करने की मेहरबानी करने की उम्मीद करते हैं।

गौरतलब है कि कांग्रेस के राजनीतिक एकाधिकार के खिलाफ 60-70 के दशक के उथल-पुथल के बीच में एकतरफ क्रांतिकारी जुझारु आंदोलन और राजनीतिक शक्तियां उभर कर आ रही थीं तो दूसरी तरफ कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने के तात्कालिक लक्ष्य को केंद्र में रखकर दलों के जोड़-तोड़ के जरिए विकल्प खड़ा करने की जद्दोजहद भी जारी था। जगदेव प्रसाद भी राजनीतिक विकल्प खड़ा करने की जद्दोजहद कर रहे थे। लेकिन वे तात्कालिक लक्ष्य तक ही नहीं देख रहे थे। उनकी निगाह से दीर्घकालिक क्रांतिकारी लक्ष्य ओझल नहीं था। वे ब्राह्मणवाद और द्विज एकाधिकार के विरोध की धुरी पर एक क्रांतिकारी राजनीतिक विकल्प खड़ा करने के लिए संघर्षरत थे। वर्ष 1974 के अंत में इंदिरा गांधी शासन को हटाने के लिए विकल्प खड़ा करने की दिशा में चौधरी चरण सिंह की अगुआई में स्वतंत्र पार्टी, उत्कल कांग्रेस, भारतीय क्रांति दल और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के विलय के जरिए भारतीय लोकदल का गठन हुआ था। इस नये दल के गठन की जगदेव प्रसाद ने तीखी आलोचना की थी। वे संसोपा के एक कार्यकर्ता व मित्र प्रो. राम प्यारे सिंह को 1 सितंबर, 1974 को एक जवाबी पत्र में भारतीय लोकदल के गठन पर प्रेस के लिए जारी प्रतिक्रिया का उल्लेख करते हुए लिखते हैं– “अब बीजू पटनायक, आर.एन. सिंह देव और पीलू मोदी जैसे सामंत, काले धन के मालिक और संरक्षक भारतीय लोकदल का नेतृत्व कर रहे हैं। ऐसे सामंतों और ब्राह्मणवादियों के साथ बैठकर समाजवाद लाने में कर्पूरी ठाकुर का विश्वास हो सकता है, मगर मेरा नहीं!” पत्र में वे आगे लिखते हैं कि “डॉ. लोहिया जिंदाबाद का नारा भी गठन के बाद लगा है। लेकिन जो सिद्धांत-वक्तव्य स्वीकृत हुआ है, उसको मद्देनजर रखते हुए नया दल लोहिया के सिद्धांतों का कब्रिस्तान है। सिद्धांत और नेतृत्व की दृष्टि से यह दल जनसंघ से भी खराब है। ऐसा दल कभी कांग्रेस का विकल्प नहीं बन सकता है।” वे शोषित समाज के संसोपा कार्यकर्ताओं और लोहियावादियों को इस नए दल में शामिल न होने और संसोपा को फिलहाल कायम रखने की सलाह देते हैं।

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वे अक्टूबर में मेलजोल की बात करने के साथ लिखते हैं कि “जिस रफ्तार से शोषित समाज दल का बढ़ाव देश में हो रहा है, उससे मेरा विश्वास है कि शोषित समाज दल और बची हुई संसोपा की एकता, कांग्रेस का विकल्प बन सकती है। जब हम ऐसी कोशिश करेंगे तो और भी शोषितों के छोटे-मोटे दल हम लोगों के बड़े दल में शामिल हो जाएंगे।” वे डीएमके से नजदीकीपन स्थापित होने का जिक्र करते हुए बताते हैं कि “इसमें कोई शक नहीं है कि डीएमके से हमारी राजनीतिक बिरादरी कायम हो जाएगी।” वे दलित पैंथर से भी बातें होने का जिक्र करते हुए बताते हैं कि वह भी शूद्रों का निछक्का दल है। वे साफ शब्दों में कहते हैं कि “मैं किसी हालत में शोषक और शोषित की खिचड़ी खाने को तैयार नहीं हूं। फिर भी आपकी सलाह से हमेशा लाभान्वित होने को तैयार हूं। सत्याग्रह के बाद जो मुझे प्रथम क्षण प्राप्त होगा, उसका सदुपयोग आपसे बातचीत करने में करूंगा।” राम प्यारे सिंह का पोस्टकार्ड मिलने के अगले दिन ही जगदेव प्रसाद ने जवाबी पत्र लिखा था। उन्होंने सितंबर के सत्याग्रह की तैयारी में लगे होने के कारण तत्काल गया आकर बातें करने में असमर्थता के साथ ही बात करने की प्रबल इच्छा जाहिर करते हुए लिखा था कि “सत्याग्रह में गिरफ्तारी नहीं हुई तो 10 सितंबर तक गया आकर आपसे मिलूंगा।” यह उनका अंतिम पत्र होता है।

जगदेव प्रसाद कुर्था ब्लॉक के सामने संघर्ष के मैदान में 5 सितंबर, 1974 को मारे जाते हैं। क्या आश्चर्य कि शोषित दल के स्थापना के मौके पर अंजुमन इस्लामियां हॉल में उन्होंने मंच से कहा था– “जिस लड़ाई की बुनियाद आज मैं डाल रहा हूं, वह लंबी और कठिन होगी। चूंकि मैं एक क्रांतिकारी पार्टी का निर्माण कर रहा हूं, इसलिए इसमें आने और जाने वालों की कमी नहीं रहेगी। परंतु इसकी धारा रुकेगी नहीं। इसमें पहली पीढ़ी के लोग मारे जाएंगे, दूसरी पीढ़ी के लोग जेल जाएंगे तथा तीसरी पीढ़ी के लोग राज करेंगे। जीत अंततोगत्वा हमारी ही होगी।”

आखिरकार, उनकी ही शहादत उनके कथन को सही साबित करता है। उत्तर भारत में भी ब्राह्मणवाद विरोधी सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन तमिलनाडु की ऊंचाई हासिल करने की ओर नहीं बढ़ पाई, जिसके कारण भारत के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में भी उत्तर और दक्षिण का फर्क स्पष्ट है। उत्तर भाजपा का गढ़ बना हुआ है, दक्षिण में उसको अभी तक जगह नहीं मिल पाई है। बहुसंख्यक उत्पीड़ित समाज जिसकी आबादी 100 में 85 है, की राष्ट्रीय स्तर पर स्वतंत्र राजनीतिक ताकत खड़ा करने की चुनौती आज भी खड़ी है। जगदेव प्रसाद ने अपने समय में शोषितों के सामने खड़ी चुनौती को रेखांकित किया था और चुनौती को कबूल किया था। वैचारिक दृढ़ता और राजनीतिक साहस के साथ तेज, लेकिन मजबूत कदमों से आगे बढ़े थे। जिस धारा की उन्होंने बुनियाद रखी, वह धारा आगे बढ़ रही थी। वह इस धारा को तीव्रता से आगे बढ़ाना चाहते थे, लेकिन सिद्धांतों से रत्ती भर भी समझौता के लिए तैयार नहीं थे। उनकी यात्रा लंबी नहीं रही और यह धारा बहुत आगे नहीं जा पाई। जगदेव प्रसाद विचार व विरासत के साथ ही चुनौती छोड़ गए हैं। उन्होंने हिंदी पट्टी में जो बुनियाद डाली थी, वह बीज है। उगाने और विकसित करने की चुनौती है। जगदेव प्रसाद ने बिहार की जमीन से पहल किया था। क्या फिर बिहार से वह धारा पुनर्जीवित होगी? यूपी से होकर आगे बढ़ेगी? यह चुनौती है। आज इस चुनौती को कबूल करने की जरूरत भी है।

(संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

रिंकु यादव

रिंकु यादव सामाजिक न्याय आंदोलन, बिहार के संयोजक हैं

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