भोर होने से पहले भिखारी ठाकुर की नाच मंडली को गांव छोड़ना पड़ा। लेकिन नाच की आंच बहुत दिनों तक बनी रही। जवार की कई लड़कियां बूढ़े वर को देखकर मंडप से भाग गईं। कइयों...
बुद्ध ने भी वर्णगत भेदभाव देखा और भोगा था, भिखारी ठाकुर ने भी देखा और भोगा था। इसीलिए भिखारी ठाकुर अपने व्यत्तिगत और जातिगत पीड़ा को जब कला की चासनी में डूबोकर व्यक्त करते हैं,...
‘मां-बहन’ – यह शब्दयुग्म उत्तर भारत में रोज़मर्रा की बातचीत का हिस्सा है। एक ओर यह सबसे पवित्र रिश्तों में से एक है तो दूसरी ओर यह सबसे आम और अश्लील गालियों का हिस्सा भी।...
‘गबरघिचोर’ नाटक में भिखारी ठाकुर विस्मित करते हैं। उनकी पृष्ठभूमि ऐसी नहीं थी कि उन्होंने ब्रेख्त का नाटक ‘कॉकेशियन चॉक सर्किल’ पढ़ा या देखा हो। कोख पर स्त्री के अधिकार के बुनियादी प्रश्न को वह...