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एक दलित छात्रा का कैंपस के भीतर और बाहर का जीवंत अनुभव

अगर डांगावास (14 मई, 2015, राजस्थान), खैरलांजी (27 सितंबर, 2006, महाराष्ट्र) और लक्ष्मणपुर बाथे (1 दिसंबर, 1997) जैसे नरसंहार और प्रताड़नाएं दलित साहित्य का हिस्सा नहीं हैं, तो फिर वह साहित्य किस काम का? पढ़ें, नर्मदा भाटी का यह आलेख

दलित साहित्य का बुनियादी सिद्धांत है कि ‘स्वानुभूति’ (खुद का भोगा हुआ सच) हमेशा ‘सहानुभूति’ (दूसरों के दुखों पर दिखाई गई दया) पर भारी पड़ती है। असल में वातानुकूलित कमरों में बैठकर हाशिए के समाज पर विमर्श करना जितना आसान है, जमीन पर उस दर्द को जीना उतना ही कठिन होता है। आज अकादमिक जगत में दलित विमर्श एक बड़ा फैशन बन चुका है। विशेषाधिकार प्राप्त बुद्धिजीवी इस विषय पर किताबें लिखकर पुरस्कार और ख्याति बटोर रहे हैं। लेकिन जब एक दलित छात्र उसी विमर्श को अपनी वास्तविक जिंदगी और जीवंत अनुभवों से जोड़कर तीखे सवाल पूछता है, तो इन तथाकथित प्रगतिशील ‘शिक्षकों’ का मुखौटा उतर जाता है। वे संवाद का रास्ता चुनने के बजाय छात्र को हमेशा के लिए चुप करा देना चाहते हैं।

जब मैं अपनी पढ़ाई के लिए अजमेर आई, तो मुझे रहने के लिए एक कमरा ढूंढना था। वहां के आधुनिक समाज का असली चेहरा तब सामने आया, जब मकान मालिकों ने योग्यता या आर्थिक सक्षमता देखने के बजाय सबसे पहले मेरी जाति पूछ ली। केवल जाति के आधार पर कमरा या स्कूल हॉस्टल देने से मना कर देना किसी भी छात्र को मानसिक रूप से तोड़ देता है। यह अनुभव इस बात का जीता-जागता सबूत है कि अजमेर जैसे महानगर में भी एक दलित छात्र को पढ़ाई के लिए कमरा खोजते समय सबसे पहले उसकी जाति पूछी जाती है।

जब समाज की नस-नस में यह जातिवाद दौड़ रहा हो, तब विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर इस क्रूरता को केवल पन्नों तक सीमित रखना चाहते हैं। जब मैंने एक स्थापित प्रोफेसर (जो खुद दलित साहित्य पर काम करती हैं) के सामने वर्ष 2015 के ‘डांगावास हत्याकांड’ (राजस्थान) का जिक्र किया, जहां जमीन पर अधिकार और जातिगत वर्चस्व के कारण दलितों का बर्बर दमन हुआ था, तो मुझे यह कहकर चुप करा दिया गया कि इसका दलित साहित्य से कोई लेना-देना नहीं है। मेरे लिए उनका यह कहना हैरान करने वाला था। अगर डांगावास (14 मई, 2015, राजस्थान), खैरलांजी (27 सितंबर, 2006, महाराष्ट्र) और लक्ष्मणपुर बाथे (1 दिसंबर, 1997) जैसे नरसंहार और प्रताड़नाएं दलित साहित्य का हिस्सा नहीं हैं, तो फिर वह साहित्य किस काम का? क्या साहित्य सिर्फ काल्पनिक विधा है? क्या साहित्य समाज का आईना नहीं है?

अकादमिक दुनिया की व्यवस्था और सहानुभूति का जाल तब दिखता है, जब दलित समाज का युवा अपने अनुभवों के साथ मुख्यधारा के अकादमिक जगत में प्रवेश करता है, तो उसे उम्मीद होती है कि आधुनिक और प्रगतिशील दिखने वाले शिक्षक उसकी जिज्ञासाओं का सम्मान करेंगे। लेकिन असलियत में, व्यवस्था के शीर्ष पर आज भी वही पारंपरिक सोच के लोग बैठे हैं जो एकलव्यों से उनकी वैचारिक मुखरता का अंगूठा मांग लेते हैं। जब हम इन विशेषाधिकार प्राप्त विचारकों से सवाल करते हैं कि वे अपनी रचनाओं में दलितों की लाचारी दिखाने के बजाय उस शोषक व्यवस्था और ब्राह्मणवाद पर सीधा प्रहार क्यों नहीं करते, तो वे असहज हो जाते हैं। वे हाशिए के समाज के वास्तविक दर्द और आंसुओं को पन्नों पर अंकित करके पुरस्कार तो अर्जित कर लेते हैं, लेकिन पीड़ित वर्ग आज भी बुनियादी आवश्यकताओं के लिए वही पुराना संघर्ष कर रहा है। इसे अकादमिक भाषा में दुखों का बाज़ारीकरण कहा जा सकता है।

जब इन कड़वे सच पर बातचीत होती है, तो ये बुद्धिजीवी ‘मतभेद’ को ‘मनभेद’ बना लेते हैं और लोकतांत्रिक संवाद के सारे रास्ते बंद कर देते हैं। यहां तक कि वे छात्रों को दलित साहित्य पढ़ने से भी मना करने लगते हैं, क्योंकि उन्हें डर होता है कि यदि छात्र ने बाबासाहब डॉ. आंबेडकर, जोतीराव फुले या ओमप्रकाश वाल्मीकि को गहराई से पढ़ लिया, तो वह उनकी अपनी अकादमिक साख और विशेषाधिकारों को सीधे कटघरे में खड़ा कर देगा।

पिछले वर्ष दिल्ली विश्वविद्यालय एक कॉलेज परिसर में आयोजित दलित लिटरेचर फेस्टिवल की प्रतीकात्मक तस्वीर

यही वह बिंदु है जहां ‘यूजीसी (उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना) रेगुलेशन-2026’ जैसी सख्त कानूनी विनियामक व्यवस्था की आवश्यकता अनिवार्य हो जाती है। पुराने 2012 के नियम केवल परामर्शदात्री थे, जिनका पालन न करने पर संस्थानों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती थी। लेकिन नए 2026 के नियमों के तहत सभी विश्वविद्यालयों के लिए इसे मानना अनिवार्य कर दिया गया है। यह नियम परिसर में हाशिये के समाज एससी, एसटी और ओबीसी के छात्रों के खिलाफ होने वाले भेदभाव और शैक्षणिक बाधाओं को सीधे तौर पर कानूनी जवाबदेही के दायरे में लाता है। परिसरों में अनिवार्य इक्वल अपॉर्चुनिटी सेंटर और हेल्पलाइन जैसे प्रावधानों की ज़रूरत इसलिए है ताकि संस्थानों को अपनी स्वायत्तता के नाम पर किसी छात्र की वैचारिक यात्रा को रोकने से रोका जा सके और हर छात्र को एक सुरक्षित माहौल मिल सके।

सवाल है कि क्या यह मुमकिन नहीं है कि प्रश्न पढ़ते या सुनते समय व्यवस्था के शीर्ष पर बैठे लोग अपनी जातिगत श्रेष्ठता के बोध को भुला दें और एक इंसान होने के नाते उस दर्द के साथ खड़े हों? एक सच्चे गुरु और शिष्य के रिश्ते में सवालों का स्वागत होना चाहिए, न कि बहिष्कार। यह अनुभव मुझे यह सिखाता है कि भले ही मेरे पास कोई भारी-भरकम किताबी ज्ञान न हो, लेकिन मेरा वास्तविक अनुभव ही मेरी सबसे बड़ी ताकत है। व्यवस्था द्वारा संवाद का रास्ता बंद कर देने से एकलव्यों की वैचारिक यात्रा नहीं रुकती। यह दमन ही हमारी चेतना को और मजबूत बनाती है।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

नर्मदा भाटी

लेखिका स्वतंत्र लेखिका और समाजशास्त्र की अध्येता हैं। मुख्य रूप से दलित साहित्य, सामाजिक न्याय तथा वर्तमान शिक्षा नीतियों में सुधार आदि विषयों पर शोध और लेखन करती हैं।

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