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भिखारी ठाकुर के नाटकों में नारी विमर्श

‘गबरघिचोर’ नाटक में भिखारी ठाकुर विस्मित करते हैं। उनकी पृष्ठभूमि ऐसी नहीं थी कि उन्होंने ब्रेख्त का नाटक ‘कॉकेशियन चॉक सर्किल’ पढ़ा या देखा हो। कोख पर स्त्री के अधिकार के बुनियादी प्रश्न को वह जिस कौशल के साथ रचते हैं वह लोकजीवन के गहरे यथार्थ में धंसे बिना संभव नहीं। बता रहे हैं डॉ. संतोष पटेल

भिखारी ठाकुर (18 दिसंबर, 1887 – 10 जुलाई, 1971) भोजपुरी रंगमंच के सुविख्यात हस्ताक्षर हैं। उनकी रचनाओं में सामाजिक चेतना से लेकर नारी विमर्श, पलायन की त्रासदी से लेकर सब कुछ दर्ज है। बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर जब हिंदू कोड बिल तैयार कर रहे थे, तब भिखारी ठाकुर ‘बेटी वियोग’, ‘विधवा विलाप’, ‘गबरघिचोर’ और ‘कलयुग प्रेम’ जैसे नाटकों के जरिए हिंदू कोड बिल के विभिन्न बिंदुओं का समर्थन कर रहे थे।

‘अनुभूति का जनतंत्र भिखारी ठाकुर एवं गोरख पाण्डेय : एक अध्ययन’[1] में संदीप राय लिखते हैं कि “भिखारी ठाकुर अपने नाटकों के माध्यम से महिलाओं के जीवन को, विद्यमान ग्रामीण व्यवस्था में उनकी सामाजिक स्थिति और मनोदशा को विश्लेषित करते हैं। वे महिलाओं के जीवन के विभिन्न पक्षों को स्पष्ट करने का प्रयास करते हैं। उदाहरण के लिए, उनके नाटक ‘बेटी वियोग’ और ‘ननद भौजाई’ में एक जवान लड़की के जीवन की विडंबना को देख सकते हैं। विवाहित औरत के जीवन की विडंबना को उनके नाटक ‘भाई विरोध’, ‘गंगा स्नान’, ‘पुत्र वध’ में भी देख सकते हैं। और ‘बिदेसिया’, ‘विधवा विलाप’, ‘गबर-घिचोर’ और ‘कलयुग प्रेम’ जैसे नाटकों में प्रवासी पुरुषों और महिलाओं की स्थिति को देख सकते हैं।”

इस विमर्श को समझने के लिए ब्रिटेन से शुरू हुए स्त्री मुक्ति आंदोलनों से, अफ्रीकी-अमेरिकन मुक्ति संग्राम से उत्पन्न परिणामों, साथ ही फ्रांसीसी अस्तित्ववादी चिंतक सिमोन द बोउवार लिखित ‘द सेकंड सेक्स’ को जरूर पढ़ा जाना चाहिए। मधुरेश लिखते हैं– “अपनी पुस्तक ‘द सेकंड सेक्स’ में सिमोन प्रायः दुनिया में सब जगह कहीं भी स्त्री के प्रति अपनाए गए दोहरे मानदंडों की भर्त्सना करती हैं। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया है कि स्त्री की मुक्ति का मार्ग स्त्री के अपने संघर्ष से ही निकलेगा। यह अकारण नहीं है कि सिमोन स्त्री की स्थिति की तुलना नीग्रो की स्थिति से करती हैं। वे नीग्रो और एक स्त्री की स्थिति में गहरी समानता देखती हैं। वे लिखती हैं, ‘दोनों ही समूह आज पितृसत्ता से मुक्त हो रहे हैं और इनके पूर्व स्वामी इन्हें पुरानी जगह रखना चाहते हैं, उन्हीं जगहों में जिनका निर्धारण मालिक वर्ग ने किया था। दोनों ही क्षेत्रों में मालिक यथास्थिति के प्रशंसक हैं।’”[2]

महिला मुक्ति के संदर्भ में बुद्धकालीन थेरीगाथा बहुत प्रासंगिक है। थेरीगाथा में 73 भिक्खुणियों की रचनाएं हैं जिन्हें अर्हत प्राप्त है। हवलदार त्रिपाठी सहृदय ने अपनी पुस्तक ‘बौद्ध धर्म और बिहार’ (बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना, 1997) में ‘बिहार की नारियां और बौद्ध धर्म’ शीर्षक अध्याय में तकरीबन 22 थेरियों का उल्लेख किया है जो बिहार की धरती से थीं। उदाहरण के तौर पर वत्सा, धर्मदिशा, विशाखा, जयंती, चित्रा, मैत्रिका, अभयमाता, दन्तिका, शुक्ला, सोमा, भद्रा कापिलायनी, विमला, सिंहा, भद्रा कुंडलकेशा, वासिष्ठि, क्षेमा, विजया, चाला, उपचाला, शिशुपचाला, रोहिणी, चापा, कंजगला, शुभा, शुभा (द्वितीय), सच्चा लोला, अववादका, पाटाचारा और अंबपाली का नाम उल्लेखित है। इस मिट्टी के कण-कण में विद्रोह के स्वर घुले मिले हैं, जिसका प्रभाव रचनाकारों की कलम में, क्रांतिकारियों के आक्रोश में और दर्शनिकों के ज्ञान में दिख जाते हैं। आखिर भिखारी ठाकुर इससे कैसे वंचित हो सकते थे।”

भिखारी ठाकुर ने ‘कलयुग प्रेम’ (पिया नसइल) में दुखहारिन के चरित्र को जैसे गढ़ा है और नाटक के आखिरी हिस्से में वह जैसे अपने पियक्कड़ पति को छोड़ती है तो मुझे थेरीगाथा में उद्धृत मुत्ताथेरी का कन्फेशन जो काव्यात्मक रूप में याद आता है।

मैं मुक्त हो गई हूं
अच्छी तरह से विमुक्त हो गई हूं
तीन टेढ़ी चीजों से
ओखली से, मूसल से
और अपने कुबड़े स्वामी से
अहा! मैं मुक्त हो गई हूं
जरा और मरण से भी।
[3]

भिखारी ठाकुर ने ‘गबरघिचोर’ नाटक की नायिका गलीज बो (बहु) से जो कहलवाया है, उसे देखने-समझने की जरूरत है। गलीज बो पंच के सामने कहती है–

घर में रहे दूध पांच सेर,
केहू जोरन दिहल एक धार।
का पंचाइत होखत बा,
घीउ साफे भइल हमार।
[4]

भाव यह कि मान लीजिए घर में पांच किलो दूध है। दही बनाने के लिए कोई थोड़ा-सा जोरन दे दिया तो घी जोरन वाले का होगा या दूध वाले का? फिर पंचायत क्यों बैठी है? यानी गर्भ पर अधिकार मां का है। बच्चे पर पहला अधिकार मां का है। तभी गलीज की पत्नी का कहना है कि उसके पुत्र घिचोर पर न तो उसके पति गलीज का अधिकार है न ही उसके दोस्त गड़बड़ी का, जो घिचोर को अपना पुत्र बताने में लगा है।

विख्यात कवि अरुण कमल भिखारी ठाकुर के नाटक ‘गबरघिचोर’ के बारे में लिखते हैं– “भिखारी ठाकुर के नाटकों की मूल परिकल्पना, उनका विकास, उनका चरित्र काव्यात्मक है। इस संदर्भ में मैं उनके एक नाटक ‘गबरघिचोर’ का उदाहरण दे रहा हूं। यह नाटक ‘गबरघिचोर’ अपनी व्यंजना में ब्रेख़्त के महान नाटक ‘द कॉकेशियन चॉक सर्किल’ से तुलनीय है। ब्रेख्त ने निश्चय ही यह कथा लोक से ली है, जैसे लोर्का ने और शेक्सपीयर ने भी कई बार ली है।”[5]

छपरा के कुतुबपुर गांव में भिखारी ठाकुर का स्मारक (तस्वीर : नागमणि)

बहरहाल, नारी विमर्श की बात की जाए तो डॉ. आंबेडकर द्वारा 1946 से 1950 के बीच तैयार किया गया हिंदू कोड बिल याद आता है। हिंदू कोड बिल, जिसे 1951 में संसद में पेश किया गया, वास्तव में वह भारत में नारी विमर्श का मुकम्मल दस्तावेज है। इसके मुख्यतया चार अंग थे–

  1. हिंदुओं में बहुविवाह की प्रथा को समाप्त करके केवल एक विवाह का प्रावधान
  2. महिलाओं को संपत्ति में अधिकार देना और गोद लेने का अधिकार देना
  3. पुरुषों के समान महिलाओं को भी तलाक का अधिकार देना
  4. आधुनिक और प्रगतिशील विचारधारा के अनुरूप हिंदू समाज को एकीकृत करके उसे मजबूत करना

डॉ. आंबेडकर ने 24 फरवरी, 1949 को हिंदू कोड बिल को बहस के लिए पेश करते हुए उसका स्पष्टीकरण करने के बाद अंत में कहा था– “यदि आप हिंदू-प्रणाली, हिंदू संस्कृति और हिंदू-समाज की रक्षा करना चाहते हैं, तो उसमें जो खराबियां पैदा हो गई हैं, उनको सुधारने में तनिक भी हिचकिचाहट न करें। हिंदू कोड बिल हिंदू-प्रणाली के केवल उन्हीं अंशों का सुधार चाहता है, जो विकृत हो गए हैं। इससे अधिक कुछ नहीं।”[6]

हिंदू कोड बिल का तब बहुत विरोध किया गया था। विरोध करने वालों में डॉ. राजेंद्र प्रसाद भी थे। इस बारे में सरला महेश्वरी ने लिखा है कि “हिंदू कोड बिल के विरोध में डॉ. राजेंद्र प्रसाद इस प्रकार अपना संतुलन गंवा बैठे थे कि उन्हें बहु-विवाह की समाप्ति और शराब बंदी एक चीज दिखाई देने लगी। इसे यदि और भी नग्न रूप में कहा जाय तो ऐसा लगता है कि डॉ. राजेंद्र प्रसाद की नजरों में शराब और औरत के बीच कोई फर्क नहीं रह गया था। जो भी हो, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, परिवार की संपत्ति में औरतों की हिस्सेदारी के बारे में हिंदू कोड बिल के बारे में जो प्रस्ताव किए गए थे, उनके पूरी तरह से विरोधी थे।”[7]

वहीं, डॉ. आंबेडकर महिलाओं की उन्नति के प्रबल पक्षधर थे। उनका मानना था कि किसी भी समाज का मूल्यांकन इस बात से किया जाता है कि उसमें महिलाओं की क्या स्थिति है? दुनिया की लगभग आधी आबादी महिलाओं की है, इसलिए जब तक उनका समुचित विकास नहीं होता कोई भी देश चहुंमुखी विकास नहीं कर सकता।

हम देखते हैं कि डॉ. आंबेडकर ने पहली बार महिलाओं के लिए प्रसूति अवकाश (मैटरनिटी लिव) की व्यवस्था की। संविधान प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में संविधान निर्माताओं में उनकी अहम भूमिका थी। संविधान में सभी नागरिकों को बराबर का हक दिया गया है। संविधान के अनुच्छेद 14 में यह प्रावधान है कि किसी भी नागरिक के साथ लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता। आजादी मिलने के साथ ही महिलाओं की स्थिति में सुधार शुरू हुआ। आजाद भारत के पहले कानून मंत्री के रूप में उन्होंने महिला सशक्तीकरण के लिए कई कदम उठाए। उनका मानना था कि सही मायने में लोकतंत्र तब आएगा जब महिलाओं को पैतृक संपत्ति में बराबरी का हिस्सा मिलेगा और उन्हें पुरुषों के समान अधिकार दिए जाएंगे।

सिमोन द्वारा लिखे ‘द सेकंड सेक्स’ का समय देखें तो उसका साल 1949 मिलता है। जर्मन आधुनिकतावादी नाटककार ब्रतोल्त ब्रेख्त के नाटक ‘कॉकेशियन चॉक सर्किल’ (खड़िया का घेरा) का समय भी 1948 है। लेकिन जब हम भिखारी ठाकुर के नाटकों का कालखंड देखते हैं तो हम पाते हैं कि ‘गबरघिचोर’ या ‘घिचोरबहार’ और ‘विधवा विलाप’ या ‘बेटी बेचवा’ सहित समस्त बारहों नाटकों का रचनाकाल सन् 1921 से 1945 तक मिलता है। दूसरी बात यह कि भिखारी ठाकुर स्वयं सन् 1966 तक रंगमंच पर एक्टिव रहे।

‘गबरघिचोर’ नाटक में भिखारी ठाकुर विस्मित करते हैं। उनकी पृष्ठभूमि ऐसी नहीं थी कि उन्होंने ब्रेख्त का नाटक ‘कॉकेशियन चॉक सर्किल’ पढ़ा या देखा हो। कोख पर स्त्री के अधिकार के बुनियादी प्रश्न को वह जिस कौशल के साथ रचते हैं वह लोकजीवन के गहरे यथार्थ में धंसे बिना संभव नहीं। वे एक सतत चौकन्नेपन के साथ वह अपनी रंगभाषा के लिए कौतूहल, लय, गति आदि का नवसंधान करते हैं। चुहल और व्यंग्य के साथ पुरुषवीर्य के दंभ का उपहास उड़ाते भिखारी ठाकुर एक ऐसा संसार रचते हैं, जिसमें भविष्य की स्त्री के क़दमों की आहट साफ़-साफ़ सुनी जा सकती है।[8]

भिखारी ठाकुर की स्कूली शिक्षा न के बराबर थी, लेकिन उनकी नजर समाज पर थी। वैसे भी चेतनशील रचनाकार अपने आसपास घटित हो रहे सामाजिक भेदभाव से उपजे अंधेरे में दीया जलाने का काम करता है। भिखारी ठाकुर भी अपनी नाटकों के माध्यम से बेमेल विवाह का पुरजोर विरोध करते हैं। मसलन, ‘बेटी वियोग’ या ‘बेटी बेचवा’ नामक नाटक का केंद्रीय किरदार उपातो है जो चटक (बाबूजी) और लोभा (माई) की बेटी है। वह बेमेल विवाह का पुरजोर विरोध कर रही है। वह इस विवाह से होने वाली समस्या के बारे में कहती हुई अपनी मां से शिकायत करती है–

जमते मइया माहुर दे के, काहें ना दिहलू मारी?
हमरा के नाहक पालन करे में सांसत सहलू भारी।
[9]

इस नाटक के विषय वस्तु का मूल्यांकन करते हुए ‘जाग चेत कुछ करौ उपाई’ नामक आत्मकथात्मक उपन्यास में प्रसिद्ध साहित्यकार मिथिलेश्वर लिखते हैं कि “लड़कियों की इस नारकीय स्थिति से हमारे समय के लोक गायक, लोक नाटककार, लोक रंगकर्मी तथा लोक नर्तक भिखारी ठाकुर ने द्रवित होकर ‘बेटी बेचवा’ नामक नाटक लिखा तथा जगह-जगह उसे मंचित किया। उस नाटक का मुख्य गीत हमारे गांवों में खूब लोकप्रिय हुआ। भिखारी ठाकुर द्वारा रचित वह गीत हमारी भोजपुरी भाषी लोग आज तक भूल नहीं सके हैं–

रोपेया गिनाइ लिहल
पगहा धराइ दिहल
चेरिया से छेरिया बनवलऽ ए बाबूजी !
अइसन खोजऽल वर
देखत लागेला डरऽ
जमते महुरवा चटइत हो बाबूजी !
मुहंवा में दांत नइखे
हलुआ घोंटात नइखे
पाकुर-पाकुर मुहंवा चलावेला हो बाबूजी…!
[10]

यह भी अकाट्य सत्य है कि भिखारी ठाकुर को उपरोक्त किसी भी बात की जानकारी शायद ही होगी। लेकिन भारतीय परिप्रेक्ष्य में उनके कुछ नाटकों के मूल्यांकन के लिए थेरीगाथा और हिंदू कोड बिल में जाना पड़ेगा। बलभद्र ‘भोजपुरी साहित्य : देश से देस तक’ में लिखते हैं– “भिखारी ठाकुर ने बातों और जज्बातों से भरी, लेकिन किन्हीं दबावों के कारण चुप रहने वाली आम स्त्री को बोलती हुई दिखलाया है। केवल विलाप करती हुई नहीं, न्याय की फरियाद करती हुई भी। साथ ही जो तथाकथित मर्दवादी समझ है उसका मजाक उड़ाती हुई भी दिखाई देती है।”[11]

भिखारी ठाकुर के नाटकों में स्त्रियां ग्रामीण परिवेश की हैं। साथ ही सामाजिक लोकेशन में वे दलित-पिछड़े समाज से आती हैं, जहां भिखारी ठाकुर लड़कियों और औरतों की दुर्दशा को नजदीक से देख समझ रहे हैं और इसलिए भी उन्होंने अपने नाटकों में उसको विषय भी बनाया है। जिस समाज में पुरुष की स्थिति दास के समान होती है वहां स्त्री दोहरे मार के लिए अभिशप्त होगी। फिर इस समाज में भिखारी ठाकुर जैसा कोई आता है और एक सूत्रधार के रूप में नारी की व्यथा-कथा सुनाता है, उनकी तकलीफ को सार्वजनिक करता है, पितृसत्ता को आइना दिखाता है।

ब्रिटेन के प्रसिद्ध विचारक जॉन स्टुअर्ट मिल ने तत्कालीन अत्यधिक चर्चित विषय – ‘नारी-विमर्श’ – की चर्चा लगभग डेढ़ सौ वर्ष पूर्व ही ‘द सब्जेक्शन ऑफ वूमैन’ (1869) नामक पुस्तक में कर दी थी। जिसका बाद में हिंदी अनुवाद प्रगति सक्सेना ने ‘स्त्रियों की पराधीनता’ नाम से किया। इस पुस्तक में मिल ने स्त्रियों की पराधीनता के कारणों का बेबाकी से उल्लेख किया।

भिखारी ठाकुर ने भी परकाया प्रवेश कर स्त्रियों के दुख, दर्द और उनके साथ हो रहे लैंगिक भेदभाव को उकेरने का प्रयास किया है। साथ ही ‘बिदेसिया’ जैसे नाटकों के माध्यम से महिला की व्यथा-कथा को कहने का भी प्रयास किया। सत्येंद्र किशोर लिखते हैं– “भिखारी ठाकुर का काम कई लोकप्रिय लोक-परंपराओं का एक प्रतिनिधि पैटर्न है जो स्पष्ट रूप से अपने ग्राहकों का मनोरंजन करता है और विशेष रूप से उन सभी को संतुष्ट करता है जो अपने प्रवासन और शहरों में रहने की प्रक्रिया में सामान्य प्रकृति के अभाव का सामना करते हैं, और पुन: बसने की योजना बनाते हैं या उम्मीद करते हैं।”[12]

निष्कर्ष के तौर पर भिखारी ठाकुर ने अपने नाटकों में नारी जीवन, उनकी सामाजिक स्थिति, उनकी समस्या विशेषकर हाशिए की महिलाओं के दुख, ग्रामीण दलित-पिछड़ी महिलाओं की तकलीफों को अपना विषय बनाया। यह भी सत्य है कि उनकी नाटकों का तीन चौथाई हिस्सा नारियों को समर्पित है। कभी नायिका रूप में, कभी माता के रूप में, कभी प्रेयसी के रूप में या फिर वियोगिनी नारी के रूप में। वे बहुविवाह, नशा खोरी, बेमेल शादी का विरोध करते हैं तो कहीं-न-कहीं वे डॉ. आंबेडकर के हिंदू कोड बिल का समर्थन करते दिखते हैं। जब बेमेल शादी में बेटी बेचने की कुप्रथा का विरोध हुआ, विधवा के पुनर्विवाह की प्रवृति बढ़ी, बाल विवाह पर रोक लगी, संपत्ति में महिलाओं को अधिकार मिला। अत: कहा जा सकता है कि भिखारी ठाकुर के नाटकों में नारी विमर्श के समस्त सूत्र उपस्थित हैं, लेकिन इस बारे में अभी मुकम्मिल बात होना शेष है।

संदर्भ:

[1] Becomeshakespeare.com, 2022
[2] स्त्री : उपेक्षित, पृ. 29
[3] थेरीगाथा, रोहिणी अग्रवाल, आलोचना डॉट कॉम
[4] गबरघिचोर, भिखारी ठाकुर रचनावली, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना, 2005. पृष्ठ 169
[5] गोलमेज, आलोचनात्मक निबंध व टिप्पणियां अरुण कमल, भिखारी ठाकुर : भिखारी से भीख, वाणी प्रकाशन, 2009, पृष्ठ 97
[6] डॉ. बाबासाहब आंबेडकर : जीवन-दर्शन, विजय कुमार पुजारी, गौतम बुक सेंटर, दिल्ली, पृष्ठ 111
[7] समान नागरिक संहिता, सरला माहेश्वरी, राधाकृष्ण प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, दिल्ली, 2004, पृष्ठ 35
[8] रंगमंच का जनतन्त्र, भिखारी ठाकुर : लोकजिजीविषा के निश्छल प्रतीक, हृषीकेश, राजकमल प्रकाशन प्रा. लि.दिल्ली, 2009 पृष्ठ 100
[9] बेटी वियोग, भिखारी ठाकुर रचनावली, बिहार राष्ट्रभाष परिषद, पटना, 2005, पृष्ठ 86
[10] जाग चेत कुछ करौ उपाई, मिथिलेश्वर, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2015 पृष्ठ 75
[11] भोजपुरी साहित्य : देश से देस तक, बलभद्र, सर्वभाषा ट्रस्ट, 2020, पृष्ठ 53
[12] री-सेटलमेंट ऑफ एक्स-सर्विसमेन इन इंडिया, प्रोब्लेम्स, पैटर्न्स एंड प्रोस्पेक्ट्स, कॉनसेप्ट पब्लिशिंग कंपनी, नई दिल्ली, 1991, पृष्ठ 204


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, संस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

लेखक के बारे में

संतोष पटेल

बेतिया (बिहार) में जन्मे डॉ. संतोष पटेल बहुआयामी लेखक और संपादक हैं। उन्होंने भोजपुरी साहित्य में पीएच.डी. के अलावा बौद्ध अध्ययन में उच्च शिक्षा प्राप्त की है। इनकी प्रकाशित कृतियों में ‘भोर भिनुसार’, ‘अदहन’, ‘अछरंग’, ‘अपने देसवा निक बा’, ‘शब्दों की छांव में’, ‘जारी है लड़ाई’, ‘नो क्लीन चिट’ तथा ‘लाजगी’ (उज़्बेकिस्तान की प्रो. गवहर मत्याकुबोवा के साथ सह-लेखन) आदि शामिल हैं। इसके अलावा डॉ. पटेल ‘भोजपुरी ज़िन्दगी’ और ‘पूर्वांकुर’ सहित अनेक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया है। संप्रति दिल्ली कौशल एवं उद्यमिता विश्वविद्यालय (डीईएसयू) में सहायक कुलसचिव के पद पर कार्यरत हैं।

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