बीसवीं सदी के दूसरे-तीसरे दशक में अछूत समस्या एक ज्वलंत मुद्दा बनकर उभरी थी। बीसवीं सदी के इन्हीं दशकों में स्वामी अछूतानंद ‘हरिहर’ और डॉ. आंबेडकर सरीखे दलित अग्रदूतों ने अछूतों की अखिल हिंदू दायरे से अलग पहचान पेश कर गांधी सहित तमाम सवर्ण बौद्धिकों के समक्ष नई चुनौतियां पेश कर दी थीं। मसलन, डॉ. आंबेडकर ने गोलमेज़ सम्मेलनों में अछूतों के पृथक निर्वाचन का दावा पेश कर सवर्ण अग्रदूतों को सकते में डाल दिया था। पूना समझौते के वक्त गांधी ने दलित नागरिक समूह को अस्पृश्यता-निवारण का वचन दिया था। अपने वादे का अनुसार गांधी ने 1932 से व्यापक स्तर पर अछूतोद्धार का आंदोलन चलाया।
इसका असर हिंदी संपादकों के ऊपर भी पड़ा। उन्होंने हिंदू सुधारकों के तर्ज पर समाज सुधार के तहत अपनी-अपनी पत्रिकाओं में अछूतोद्धार का एजेंडा जोड़ लिया था। इनमें शामिल ‘सरस्वती’ (महावीर प्रसाद द्विवेदी), ‘प्रताप’ (गणेश शंकर विद्यार्थी), ‘हंस’ (प्रेमचंद), ‘उषा’ (संतराम बी.ए.), ‘स्वदेश’ (दशरथ द्विवेदी), ‘चांद’ (रामरख सिंह सहगल), ‘विश्वामित्र’ (हेमचंद्र जोशी), ‘अभ्युदय’ (कृष्णकांत मालवीय) और ‘युगांतर’ (संतराम बी.ए.) आदि के कारण एक बौद्धिक जनक्षेत्र विकसित हुआ।
हालांकि हिंदी के जिन संपादकों ने छुआछूत के विरुद्ध अपनी पत्रिकाओं से मुहिम छेड़ी, उनमें सबसे अग्रणी नाम संतराम बी.ए. का था। ध्यातव्य है कि संतराम बी.ए. औपनिवेशिक दौर के बड़े लेखक और संपादक थे। इनकी वैचारिकी का निर्माण आर्य-समाजी विचारों के इर्द-गिर्द हुआ था। इन्होंने जात-पांत तोड़क मंडल की स्थापना की; जिसका मुख्य एजेंडा वर्ण-व्यवस्था का उच्छेद और अंतरजातीय विवाह को बढ़ावा देना था। संतराम बी.ए. ने इसी इरादे से मार्च, 1932 में ‘युगांतर’ पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। उन्होंने इस पत्रिका के जरिए विभिन्न गतिविधियों को अंजाम देकर जाति-प्रथा के विरुद्ध एक विमर्श निर्मित किया। ‘युगांतर’ पत्रिका अपने तेवर और प्रकृति में जाति और वर्ण की विरोधी थी। इसमें प्रकाशित होने वाला अधिकांश साहित्य जाति विरोधी और अस्पृश्यता निवारण की मनोकामना से लैस होता था। संतराम बी.ए. ने अपनी पत्रिकाओं में उन अनाम लेखकों और कवियों को स्थान दिया जो सामाजिक बदलाव की आकांक्षा रखते थे।
नवजागरणकालीन हिंदी साहित्य के अध्येता और आलोचक सुजीत कुमार सिंह ने ‘युगांतर’ पत्रिका में प्रकाशित होने वाले ऐसे ही अल्पज्ञात कवियों की अछूतोद्धार और देश की तत्कालीन दशा को उजागर करने वाली कविताओं को खोज कर ‘अछूतों की आह’ शीर्षक से किताब की शक्ल में हमारे सामने पेश किया है। इसमें शामिल कविताएं गोलमेज़ कांफ्रेंस और पूना-समझौता के हलचलों के दौरान लिखी गई थीं। इसलिए किताब में शामिल अधिकांश कविताएं गांधीवादी मॉडल के अछूतोद्धार का हिस्सा हैं। यह बड़ी दिलचस्प बात है कि ‘युगांतर’ पत्रिका के संपादक संतराम बी.ए. अछूतों के पृथक निर्वाचन के विरोधी थे। उन्होंने पृथक निर्वाचन के मसले पर डॉ. आंबेडकर का पक्ष न लेकर गांधी का साथ दिया था। (संपादकीय टिप्पणी, संतराम बी.ए., ‘युगांतर’, अक्टूबर, 1932: 350)
सुजीत कुमार सिंह द्वारा इस संकलित किताब की कविताओं की विषय-वस्तु पर आने से पहले इसकी भूमिका पर बात करना उचित रहेगा। संतराम बी.ए. के संपादन में ‘युगांतर’ का पहला अंक मार्च, 1932 में प्रकाशित हुआ था। इस अंक में प्रकाशित सामग्रियों को केंद्र बिंदू बनाकर सुजीत कुमार सिंह ने अपनी किताब की भूमिका लिखी है। अपनी भूमिका में उन्होंने ‘युगांतर’ पत्रिका के पहले अंक की सामग्री और संपादकीय टिप्पणियों की पड़ताल करते हुए, सवाल उठाया है कि क्या संतराम बी.ए. एक हिंदू संगठनकर्ता थे? वे लिखते हैं– “‘युगांतर’ में प्रकाशित संतराम बी.ए. के लेख, संपादकीय टिप्पणियां आदि पढ़ने से पता चलता है कि वे हिंदू धर्म में रहकर ही जाति सुधार करना चाहते थे। वे चाहते थे कि अछूत धर्म-परिवर्तन न करें। सवर्ण हिंदू अछूतों से भेदभाव न करें। उनके शब्दों को पढ़ते हुए पता चलता है कि वे सवर्ण हिंदुओं के अछूतोद्धार आंदोलन में उनके कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे थे। मार्च, 1932 तक वे अपने समकालीनों – स्वामी अछूतानंद, बाबू मंगूराम, डॉ. आंबेडकर आदि – के विचारों से भिन्न मार्ग पर चल रहे थे। संतराम बी.ए. के विचारों में होनेवाले परिवर्तनों को समझने के लिए उनके संपूर्ण साहित्य का अध्ययन आवश्यक है। फिर भी ‘युगांतर’ के प्रवेशांक को पढ़ते हुए उनमें दुचितापन साफ-साफ देखा जा सकता है।” (अछूतों की आह, संकलन व संपादन सुजीत कुमार सिंह, पृष्ठ 20)

दूसरी तरफ इतिहासकार मानते हैं कि 1920 के दशक में उपनिवेश के विरोध में स्वराजवादी बौद्धिकों का उदय एक बड़ी परिघटना थी। इन बौद्धिकों ने जहां एक तरफ औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध भारतीय जनमानस को गोलबंद किया, वहीं दूसरी तरफ हिंदू अस्मिता और उसके मूल्यों को अक्षुण्ण रखने के इरादे से हिंदू-संगठन पर जोर दिया। बीसवीं सदी के आरंभिक दशकों में हिंदू-संगठन का विचार मुख्य तौर पर हिंदू महासभा के सम्मेलनों से निकाला था। इस हिंदू-संगठन के जन्मदाता पंडित मदन मोहन मालवीय, लाला लाजपत राय और भाई परमानंद सरीखे बौद्धिक थे। जब यह हिंदू-संगठन का विचार पंडित मदन मोहन मालवीय और लाला लाजपत राय की अगुआई में आकार ले रहा था, उसी समय संतराम बी.ए. जात-पांत तोड़क मंडल के मंच से हिंदू धर्म की मेरुदंड कहलाने वाली वर्ण-व्यवस्था के संहार की बात कह हिंदू-सुधारकों को सकते में डाल दिया था। संतराम बी.ए. ने वर्ण-व्यवस्था के रक्षकों से दो टूक कहा कि वर्ण-व्यवस्था उच्च श्रेणी हिंदुओं की रीढ़ और मान-सम्मान का प्रतीक भले हो पर यह शूद्रों और अछूतों के लिए मरण-व्यवस्था है। इसलिए, हम सामाजिक समता के लिए इसकी आलोचना भी करेंगे और इसे ठुकरा भी देंगे। जब संतराम बी.ए. ने वर्ण-व्यवस्था के खात्मे की बात कि तो मेहता लज्जाराम शर्मा, किशोरीदास बाजपेयी, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ और रामसेवक त्रिपाठी जैसे हिंदी लेखकों ने उन्हें हिंदू धर्म का संगठनकर्ता नहीं बल्कि हिंदू धर्म का तोड़क कहा था।
सन् 1930 के आरंभिक वर्षों तक संतराम बी.ए. एक ऐसे समाज सुधारक के तौर पर हमारे सामने प्रस्तुत होते हैं, जो हिंदू धर्म के दायरे में रहकर ही अस्पृश्यता की समस्या का समाधान खोज रहे थे। इसके बावजूद वर्ण-व्यवस्था और जाति के विनाश वाला उनका विचार उन्हें बहुजन चेतना के दायरे में लाकर खड़ा कर देता है।
मेरा विनम्र दावा है कि हिंदू-संगठन की चेतना से लैस सुधारक अस्पृश्यता के विरुद्ध आंदोलन तो चला सकता है लेकिन वह वर्ण-व्यवस्था के संहार की कल्पना सपने में भी नहीं कर सकता है। उदाहरण के लिए गांधी ने यरवदा अनशन के बाद अछूतोद्धार स्कीम के तहत अस्पृश्यता निवारण और मंदिर-प्रवेश का आंदोलन चलाया था। राष्ट्रव्यापी अछूतोद्धार की लहर में ब्राह्मण पुजारियों ने अछूतों के लिए मंदिर का फाटक खोलने से इंकार कर दिया था। सनातनी मॉडल के दायरे में अछूतों के मंदिर-प्रवेश को वर्णाश्रमी धर्म के मूल्यों पर कुठाराघात के तौर पर देखा गया था। संतराम बी.ए. ने ‘युगांतर’ पत्रिका में सनातनियों के मंदिर-प्रवेश विरोधी रवैया को गांधी के अछूतोद्धार को पीछे धकेलने वाला करार दिया था।
‘अछूतों की आह’ संकलन में कई कविताएं मंदिर-प्रवेश आंदोलन पर हैं। इन कविताओं के बिंब कहते हैं कि पुजारी और पोथाधारी अछूतों को मंदिर में प्रवेश की इजाजत न देकर हिंदू धर्म का बंटाधार करने पर तुले हैं। दूसरी बात इन कविताओं में यह दिखाने का भरसक प्रयास किया गया कि अछूत हिंदू मंदिरों में बड़ी आस्था रखते हैं। मसलन, कामेश्वर ‘कमल’ की मंदिर-प्रवेश आंदोलन पर लिखी गई ‘मंदिर के द्वार पर अछूत’ शीर्षक कविता का अंतिम हिस्सा देखिए– “आंखों के पानी में प्रभुवर, नहाने को ललचते हैं! जरा खोल दे द्वार पुजारी, हमको नाथ बुलाते हैं।” इसी तरह धर्मचंद्र ‘चंद्र’ ने ‘देव-दर्शन’ शीर्षक कविता में मंदिर-प्रवेश की समस्या को उठाया है। कविता इस ओर इशारा करती है कि गांधी के अछूतोद्धार के बावजूद पुजारी हिंदू मंदिरों के फाटक खोलने के लिए राजी नहीं थे। इस कवि ने अछूतों से कहलवाया है कि– “देव दर्शन के भी, पड़े हुए लाले। कैसे दिखलाये दिल में, पड़े हुए हैं छाले। किस निर्दयता निष्ठुरता के, पड़े हुए हैं पाले! तेरे द्वार पर ऊंच-नीच के, पड़े हुए हैं ताले।। आज धर्म के बने हुए हैं, ठेकेदार पुजारी। तुम्ही बताओं नाथ! नहीं हम, दर्शन के अधिकारी?”
मंदिर उच्च श्रेणी हिंदुओं की आध्यात्मिक और धार्मिक अस्मिता के प्रतीक रहे हैं। अछूतों का हिंदू मंदिरों में प्रवेश करना ऊंची जाति के हिंदुओं पर साख पर बट्टा जैसा था। अछूतों के मंदिर प्रवेश के विरुद्ध हिंदुओं के तमाम संगठन मैदान में कूद पड़े थे। इसकी सटीक बानगी रसुल पुरी की कविता मंदिर-प्रवेश की यह पंक्तियां हैं– “हरि दर्शन के प्यासे आये हरि के पास। धर्म-ध्वजा धारी पंडे ने दूर-हटो कह मारा बांस।। हरिजन का हरि दरवाजे पर देख घोरतर यह अपमान। मन मसोसते खड़े सुधारक शांति, अहिंसा कर ध्यान।।”
संतराम बी.ए. भले ही अपनी पत्रिका ‘युगांतर’ के हवाले से अछूतों के मंदिर-प्रवेश को हवा दे रहे थे, लेकिन दलित अग्रदूतों ने गांधी के मंदिर-प्रवेश आंदोलन में किसी तरह की कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई थी। डॉ. आंबेडकर ने गांधीवादी मॉडल के मंदिर प्रवेश को नकार दिया था। उनकी दृष्टि में दलितों का सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षिक और आर्थिक विकास महत्वपूर्ण था। डॉ. आंबेडकर का यह भी दावा था कि हिंदू सुधारकों ने मंदिर-प्रवेश का आंदोलन दलितों के सामाजिक और राजनीतिक अधिकारों को हाशिया पर धकेलने के लिए चलाया है। उस समय के दलित चिंतकों की नज़रों में गांधी का मंदिर-प्रवेश आंदोलन अस्पृश्यता-निवारण का कोई ठोस समाधान प्रस्तुत नहीं कर सका था। लिहाज़ा, दलितों ने हिंदू सुधारकों के मंदिर-प्रवेश आंदोलन से दूरी बना ली थी।
तत्कालीन सवर्ण नागरिक, गांधी की अस्पृश्यता-निवारण के विरुद्ध तर्क और दलीलें सुनने के तैयार नहीं थे। हिंदी जनक्षेत्र में अछूतोद्धार का विरोध तुरंत होना शुरू हो गया था। एक तरह से गांधी का आत्म-शुद्धि आंदोलन भी अछूतों के प्रति सवर्णों का आचरण रूपांतरित नहीं कर सका था। सुजीत कुमार सिंह ने अपनी इस किताब में अस्पृश्यता-निवारण आंदोलन से संबंधित अधिकांश कविताओं को शामिल किया है। इनमें ‘अब तो चेत करो कुछ प्यारे’, ‘अछूतों की आह’, ‘जाति-पाँति का चक्कर’, ‘दलित अछूत’, ‘नवयुवकों से’, ‘एक भाव’, ‘छुआछूत के उपासकों से’, ‘अछूत पुकार’, ‘युगांतर’, ‘छूत छूट जायगी’, ‘विचित्र छूत-छात!’, ‘अछूत समस्या’, ‘अछूतपन’, ‘शुभ घड़ी आई है!’ और ‘अछूत विनय’ आदि कविताएं मुख्य तौर पर चिह्नित की जा सकती हैं। ये कविताएं तत्कालीन कवियों द्वारा लिखी गई थीं, जिनके लिए गांधीवादी मॉडल महत्वपूर्ण था और उनका मुख्य प्रोजेक्ट अछूतों को हिंदू धर्म में समाहित कर लेना था। इन कविताओं की विषय-वस्तु में इस विमर्श को दिशा देने का प्रयास किया गया कि अस्पृश्यता का विचार और आचरण हिंदू धार्मिकता के खिलाफ़ है। ‘छुआछूत के उपासकों से’ कविता में सवर्ण कवि हिंदुओं से इस बात की अपील करता है कि अछूतों को मंदिर और कुआं के जगत पर चढ़ने दें। इसके पीछे कवि का तर्क था–
मंदिर पर चढ़ने दो उनको, कुएं पर पानी पीने दो।
जिस भांति जगत् में जीते तुम, उस भांति उन्हें भी जीने दो।।
निज भ्रात समझ करके उनको, अब झटपट गले लगाओ तुम।
वह राम-भरत का प्रेम दृश्य, इस जग को दिखलाओ तुम।।
इन कविताओं को इस दृष्टि से भी देखा जाना चाहिए कि औपनिवेशिक भारत में धर्मांतरण की समस्या एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरी थी। अछूत धर्मांतरण ने हिंदी लेखकों को सकते में डाल दिया था। हिंदी लेखक इस बात से भयभीत थे कि यदि पांच करोड़ अछूत हिंदू धर्म से पलायन कर गए तो हिंदू समाज बलशाली नहीं रहेगा। दूसरा भय था कि कहीं अछूत हिंदुओं के हाथों से निकल गया तो उनकी सेवा टहल और गुलामी कौन करेगा। अछूत उच्च श्रेणी के हिंदुओं के जातिगत अत्याचारों से तंग आकर धर्मांतरण में अपनी मुक्ति तलाशने लगे थे। अछूत धर्मांतरण को लेकर सवर्ण अग्रदूतों की चिंताएं तुलसी दास ‘नवल’ की इस कविता से महसूस की जा सकती है–
तब तो केवल भंगी ही था अब है साहब सा ठाठ।
पहले छाया से थी धृणा अब देते हैं कुर्सी खाट।
तब था राम कृष्ण का चेला अब ईसाई कहलाता।
आज के दौर में पुस्तकालय में जाकर धूल भरी सौ साल पुरानी पत्रिकाओं की फ़ाइलों को खंगालना बहुत मेहनत और जोखिम से भरा काम है। सुजीत कुमार सिंह ने कई वर्षों तक अनेक पुस्तकालयों की खाक छानकर यह संकलन तैयार किया है। इस तरह के अध्ययन और दस्तावेजीकरण से वे हिंदी नवजागरण की प्रचलित धारणा से एक अलग छवि हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं।
बहरहाल, जैसा कि सुजीत कुमार सिंह ने स्वयं उद्धृत किया है कि संतराम बी.ए. के विचारों में होनेवाले परिवर्तनों को समझने के लिए केवल प्रवेशांक में प्रकाशित सामग्रियों को ही नहीं, बल्कि उनके संपूर्ण साहित्य का अध्ययन आवश्यक है। इसी संदर्भ में डॉ. आंबेडकर के साथ उनके पत्रों के अदान-प्रदान और उसके बाद के उनके लेखन को भी देखा जाना चाहिए।
समीक्षित पुस्तक : अछूतों की आह
संकलन व संपादन : सुजीत कुमार सिंह
प्रकाशक :रुद्रादित्य प्रकाशन, प्रयागराज
मूल्य: 450 रुपए
(संपादन : नवल/अनिल)
फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्त बहुजन मुद्दों की पुस्तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्य, संस्कृति व सामाजिक-राजनीति की व्यापक समस्याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in