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आज का समय, समाज और भिखारी ठाकुर

बुद्ध ने भी वर्णगत भेदभाव देखा और भोगा था, भिखारी ठाकुर ने भी देखा और भोगा था। इसीलिए भिखारी ठाकुर अपने व्यत्तिगत और जातिगत पीड़ा को जब कला की चासनी में डूबोकर व्यक्त करते हैं, तो उसका व्यंग्य संपूर्ण सामाजिक व्यवस्था को झकझोर देता है। पढ़ें, प्रो. हरिनारायण ठाकुर का यह आलेख

“भज सीताराम हई जाति के ‘हजाम’, मोर नाम ह ‘भिखारी’ जिला सारन पिअऊ निसइल।
पोस्ट गुलटेनगंज कुतुबपुर मोकाम खास, दिअरा में गंगा के किनार पिअऊ निसइल।।”

(‘कलयुग प्रेम’ उर्फ़ ‘पियवा निसइल’, भिखारी ठाकुर)

आज का समय भिखारी ठाकुर का समय नहीं है। लेकिन आज से छह-सात दशक पहले भिखारी ठाकुर जब लिख रहे थे, गा रहे थे और नाच रहे थे तो आज की सच्चाई भी बोलती थी। व्यक्ति की पहचान उसका नाम, गांव, जिला-जवार और जाति ही होती थी। छोटी जातियों में तो नाम भी नहीं, केवल उसकी जाति। इसीलिए भिखारी ठाकुर को बार-बार अपने नाम के साथ-साथ अपनी जाति, गांव और जिला-जवार का नाम लेना पड़ता है। आज भी समय अधिक नहीं बदला है। भले ही हमारी पहचान जाति नहीं हो, पर जब तक हम किसी की जाति नहीं जान लेते, उसका परिचय पूरा नहीं होता। इसी के आधार पर किसी की सामाजिक, आर्थिक, बौद्धिक और सांस्कृतिक हैसियत का आकलन होता है। आज बाल-विवाह, बेटी बेचने की प्रथा, और छुआछूत वैसी नहीं है, पर दहेज़ प्रताड़ना, स्त्री-पुरुषों का अवैध संबंध, हत्या, बलात्कार, गरीबी, महंगाई, बेरोजगारी, रोजी-रोटी के लिए पलायन, गरीबों का शोषण और मन की छुआछूत आज भी है। भिखारी ठाकुर के समय धार्मिक पाखंड और अंधविश्वास, सामंतवादी रोब-दाब और शोषण थे। महाजनी सभ्यता पूंजीवाद का रूप ले रही थी। आज भी धर्म, पूंजी और राजनीति के गठजोड़ ने समाज को मनुवाद और मनीवाद (पूंजीवाद) की जकड़बंदी में डाल दिया है। भिखारी ठाकुर ने अपने नाच, नाटक और गीतों में समाज और संस्कृति की इन तमाम विसंगतियों और जकड़बंदियों का पर्दाफाश कर समाज की आंखें खोल दीं।

भिखारी ठाकुर अपने नाचों में कहते थे– “नाच कांच है, बात सांच है।” अर्थात् यह नाच कांच जरूर है, पर बात सच्ची है। भिखारी ठाकुर की कला का महत्व इसलिए है कि उसने केवल मनोरंजन नहीं किया, बल्कि समाज में एक सार्थक और व्यवहारिक संदेश दिया। भिखारी के नाच ने बिहार और उत्तर प्रदेश के भोजपुरी क्षेत्र के अतिरिक्त बंगाल, असम, उड़ीसा सहित पूरे उत्तर भारत में ऐसा लोकजागरण किया, जो पहले कभी नहीं हुआ था। भिखारी ने पारंपरिक नाच-तमाशों और नौटंकी को छोड़कर तत्कालीन समाज की ज्वलंत समस्याओं को अपने नाटकों का विषय बनाया। इसने तत्कालीन बांग्ला और मराठी नवजागरण को लोकजागरण में बदल दिया। भिखारी ठाकुर ने जनता की भाषा भोजपुरी में गीत और नाटक लिखे, जनता के बीच प्रचलित सहज-सरल शब्दों और ठेंठ भाषा का प्रयोग किया, उन्हें गाया और सुनाया भी। जनता ने उनके नाटक और गीतों में अपने सुख-दुख, दर्द-पीड़ा और हास-विलास देखा और सुना। वह मंत्रमुग्ध और विभोर हो गई। ऐसा कोई कवि नहीं हुआ, जिसने अपने गांव-जवार, जिला और क्षेत्र के इतिहास-भूगोल, बाढ़-सुखाड़, खेती-बाड़ी, संपत्ति-विपत्ति, अकाल-सुकाल, नदी-नाले, आस्था-विश्वास, जाति-वर्ण, पूजा-त्योहार आदि सबका सांगोपांग वर्णन किया हो। भांट और चारणों ने जहां एक ओर राजा और सामंतों के लिए उनके पुरखे-पुरान के बनावटी गीत गाए, लेकिन भिखारी ने जनता के सुख-दुख को जनता के लिए लिखा और गाया।

भिखारी ठाकुर ने अपने सभी गीतों के अंत में अपना और अपनी जाति का नाम लिया है। उन्होंने अपनी जाति के नाम पर ‘नाई बहार’ और ‘भिखारी जयहिंद-ख़बर’ तथा वर्ण-व्यवस्था के नाम पर ‘चौवर्ण पदवी’ पुस्तकें लिखी हैं। इसके साथ ही अपनी रचना के पात्र और कलाकारों की जाति भी लिखी है। उन्होंने बार-बार अपने पेशेगत औजार और प्रतीकों की चर्चा की है। उनके गीतों में छूरा, कैंची, नहरनी, हजाम, हजामत, नाई, पौनी आदि शब्द अनेक बार आए हैं। इससे पता चलता है कि जाति और वर्ण-व्यवस्था की चिंता भिखारी के मन में गहराई से बैठी हुई है और इसी के उन्मूलन के लिए वे बेचैन हैं।

भिखारी ठाकुर का रचना काल 1916-17 से लेकर 1971 तक है। लगभग 50-55 वर्षों के इस लंबे अंतराल में भारतीय समाज, संस्कृति, साहित्य और राजनीति ने नवजागरण, छायावाद, राष्ट्रवाद और प्रगतिवाद की दूरियां तय कर ली थी। इस बीच भारतीय साहित्य और समाज का मिजाज जाति और संप्रदाय के संघर्षों से टकराता हुआ निरंतर उनके खात्मे की ओर बढ़ रहा था। भिखारी के नाच-तमाशे, अभिनय और गायन इसी के व्यावहारिक प्रयास थे। वह तत्कालीन समाज का यथार्थ चित्रण था। उनकी रचनाओं में कोई इतिहास नहीं था, वर्तमान था। कुछ मिथक अवश्य थे, पर वे वर्तमान की प्रस्तुति के सहायक तत्व थे। आज जाति और सांप्रदायिकता के उन्मूलन के प्रयास शिथिल पड़ गए हैं। बल्कि राजनीति ने इन्हें और हवा देना शुरू कर दिया है। ऐसे में भिखारी ठाकुर जैसे कवि और कलाकार और प्रासंगिक हो गए हैं।

भले ही भिखारी की रचनाओं में समाज-सुधारकों के नाम नहीं आये हों, पर उनकी नजर में राजाराम मोहन राय, जोतीराव फुले, आर्यसमाज, अछूतानंद, महात्मा गांधी और डॉ. आंबेडकर के आंदोलन अवश्य हैं। इसीलिए उन्होंने स्त्री, दलित और शूद्रों की मुक्ति को अपना विषय बनाया और अपनी रोचक शैली में उसका प्रतिकार किया। यह प्रतिकार प्रत्यक्ष प्रतिकार नहीं था। नवजागरण की पृष्ठभूमि में पहले के सिद्ध-नाथ और भक्तिकाल के कबीर, रैदास आदि निर्गुणिया संत भी थे, जिनमें जाति और वर्ण-व्यवस्था का विरोध और शास्त्रीय मतों के खंडन-मंडन की प्रवृत्ति प्रचुरता से मिलती है। इसका प्रभाव भिखारी ठाकुर की रचनाओं में भी दिखता है। उनमें नारी-उत्थान, बाल विवाह, वेश्या और विधवा समस्या आदि हैं। भिखारी जाति वर्ण-व्यवस्था, ब्राह्मणवादी कर्मकांड तथा धार्मिक अंधविश्वासों का सीधा विरोध न करके नाच और स्वांग के माध्यम से हंसी-खेल में कर देते हैं। उनके ‘गंगास्नान’ नाटक में धार्मिक अंधविश्वास का रोचक विरोध है। साथ ही दहेज-प्रथा, विधवा जीवन, भाई-भाई में विरोध, बिखरते परिवार, नशाखोरी, बेमेल विवाह आदि का उन्होंने सीधा विरोध किया है। ये समस्याएं आज भी मुंह बाए खड़ी हैं। इसीलिए भिखारी ठाकुर जैसे लोगों की जरूरत आज भी है।

बिहार के छपरा शहर में भिखारी ठाकुर चौक पर स्थापित भिखारी ठाकुर व उनके दो सहयोगियों की प्रतिमाएं

भिखारी ठाकुर के समय और समाज को देखें तो उन्होंने लिखा है– “नौ बरस के जब हम भइली। बिद्या पढ़न पाट पर गइली।।” दिसंबर, 1887 में उनका जन्म हुआ था और इस हिसाब से नौ वर्ष का वह समय 1896-97 रहा होगा, जब शिक्षा के क्षेत्र में ‘हंटर कमीशन’ की सिफारिशें लगभग लागू हो चुकी थीं और दलित-पिछड़ों (शूद्र व अतिशूद्रों) को शिक्षा का अधिकार मिल चुका था। इसके लिए महाराष्ट्र में जोतीराव फुले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले ने स्त्री और दलित-पिछड़ों के लिए स्कूल खोलकर आंदोलन चलाया था। फुले ने हंटर कमीशन के सामने शूद्रातिशूद्रों की शिक्षा का अपना विस्तृत प्रस्ताव रखा था, जिसे लगभग मान लिया गया था। लेकिन इस वर्ग के बच्चे कम ही स्कूल जा पाते थे। संपन्न शूद्र वर्ग के बच्चे ईसाई मिशनरी स्कूल में पढ़ लेते थे। गुरुकुल जैसी संस्कृत पाठशालाएं थीं, जिनमें सवर्ण बच्चे पढ़ते थे। मदरसे भी थे, जिनमें मुस्लिम बच्चे और कुछ सामान्य बच्चे भी पढ़ते थे। दलित-पिछड़े वर्ग के बच्चे सामान्य सरकारी स्कूल में ही जाते थे। उन्हें चटकुनी (छोटी चटाई) या बोरी पर अलग बिठाया जाता था। गांव-समाज की तरह स्कूल में भी शिक्षक और सवर्ण छात्र उनसे भेदभाव करते थे। सामान्य मान्यता थी कि दलित-पिछड़े वर्ग के लोग मजदूरी-किसानी के लिए बने हुए हैं, शिक्षा उनके वश की चीज नहीं है। आज यह समस्या नहीं है।

इसलिए भिखारी ठाकुर ने अपनी रचनाओं में जात-पांत और छुआछूत पर करारी चोट की है। जात-पांत का यह हाल था कि भिखारी ठाकुर के नाच की प्रसिद्धि के बावजूद जहां वे नाच करने जाते थे, भोजन, रात्रि विश्राम और बात-व्यवहार में भी उन्हें ऊंची जाति के लोगों से वह सम्मान नहीं मिलता था, जो एक सम्मानित कलाकार को मिलना चाहिए। सरकारी कार्यक्रम और कुछ बड़े लोगों के अपवादों को छोड़कर अक्सर उन्हें नाच मंडली के साथ अलग पत्तल पर खिलाया जाता और जमीन पर सुलाया जाता था। इस कारण कभी-कभी भिखारी ठाकुर जब अपने नाच का प्रदर्शन करने जाते, तो आसपास के गांवों में अपनी जाति के लोगों का घर खोजकर वहीं पर भोजन और विश्राम करते थे। वे जहां भी जाते थे, अपने साथ सत्तू की गठरी और चमड़े से बना अपना लोखर (जिसमें वे छूरा-कैंची, नरहनी आदि रखते थे) लेकर चलते थे, ताकि समय पर काम दे। बिहार के गांवों में नाई समाज के पुराने लोग ऐसे कई संस्मरण सुनाते हैं। उस जमाने में जब जातीय शोषण के विरुद्ध बोलना और ऊंची जाति का नाम लेना तक अपराध था, कोई ऐसा साहस तक नहीं कर सकता था। लेकिन भिखारी ठाकुर ने न केवल नाम लिया है, बल्कि आंख में ऊंगली डालकर उनकी बुराइयों का भी पर्दाफाश किया है और उनमें सुधार का भी सुझाव दिया है। लेकिन आज की राजनीति और समाज दर्शन भी उसी वर्चस्ववादी चेतना की ओर लौटते दिखाई दे रहे हैं, जिनसे भिखारी को टकराना पड़ा था।

भिखारी ठाकुर ऊंच-नीच, छुआछूत और भेदभाव को नहीं मानते थे। उन्होंने कहा कि यदि चारों वर्ण ब्रह्मा के शरीर से ही निकले हैं और मुख ब्राह्मण, भुजा क्षत्रिय, जांघ वैश्य और पैर शूद्र हुए, तो ये सभी एक ही शरीर में है और अन्योन्याश्रित हैं। किसी का किसी के बिना काम नहीं चल सकता। वे सभी वर्णों को सामाजिक व्यवहार के आधार पर पदवी देते हैं। ब्राह्मण को ‘बाबा’ कहते हैं, क्षत्रिय को ‘बाबू’, वैश्य को ‘भैया’ और शूद्र को ‘बबुआ’। पहले ‘बबुआ’ बोला जाता है, फिर बड़े होने पर ‘भैया’, फिर और बड़ा होने पर ‘बाबू’ और बूढ़े होने पर ‘बाबा’। यह वयक्रम व सम्मान का सिलसिला और संबोधन सभी जाति और वर्णों में है। इसीलिए सभी जाति और वर्ण एक ही समान हैं। कोई भेदभाव और ऊंच-नीच नहीं हैं। सभी को सबका सम्मान करना चाहिए। इसीलिए भिखारी कहते हैं– 

“बाबा, बाबू, भइया, बबुआ का पदवी का भाव।
कहत भिखारी हाथ जोरि के, ठीक चाही बरताव।।” 

(चौवर्ण पदवी)

यही ‘ठीक चाही बरताव’ समानता और सम्मान है। आज सभी जाति-वर्ण के लोग सभी काम करते हैं। इसीलिए अपनी जाति और पदवी पर गर्व करके दूसरे को छोटा नहीं कहना चाहिए। भिखारी ने छपरा जिले के बड़े लोगों की पदवी पर व्यंग्य करते हुए लिखा है–

“बात-बात में जात के पदवी, छपरा के लोग होखेला।
अवरु जगह ऊंच-निचाई, बुरबक चतुर के जोखेला।।” 

(वही) 

कहा जा सकता है कि भिखारी ठाकुर सामाजिक व्यवस्था को तोड़ते नहीं हैं। उसी व्यवस्था में सबकी महत्ता स्थापित करते हैं। बुद्ध और गांधी ने भी नहीं तोड़ी। उसी में सुधार और उद्धार किया। कबीर, रैदास, फुले, पेरियार और आंबेडकर ने तोड़ने की कोशिश की। लेकिन समुद्र में उठे तूफान और लहरों की तरह व्यवस्था फिर सतह पर आ गई। इतने थपेड़े खाकर भी बद्धमूल व्यवस्था और रूढ़ियां जस-की-तस बनी हुई हैं। फिर भी, भले ही जातियां और वर्ण-व्यवस्था नहीं टूटी हैं, लेकिन उनके बीच की दूरियां कम जरूर हुई हैं। सामाजिक न्याय पहले से अधिक सुगम और सुलभ हुआ है। यह निरंतर उठनेवाली लहरों और थपेड़ों का ही परिणाम है। सामाजिक न्याय के इस आंदोलन में भिखारी ठाकुर का योगदान किसी से कम नहीं है। भिखारी ठाकुर ने कोई तूफान और बवंडर नहीं उठाया, बल्कि अपनी कला रूपी महीन कैंची से विसंगतियों को कतर डाला। भिखारी ने कहा कि मुख भले ही श्रेष्ठ हों, पैर के दर्द से आह मुख से ही निकलती है। भुजा जब सेज सजाती है, तो उस पर सबसे पहले पैर ही बैठता है। पेट की बीमारी पैरों के दौड़ने से ही ठीक होती है। मनुष्य का सबसे पहला नाम ‘बबुआ’ है, फिर ‘भैया’, फिर ‘बाबू’ तब ‘बाबा’। इसीलिए शूद्र सबसे प्राथमिक और श्रेष्ठ है–

“प्रथम शूद्र, द्वितीय बइसए तृतीय क्षत्री हाथ।
चौथे ब्राह्मण बकत मुख, सभी रहत एक साथ।।” 

(वही)

भिखारी ठाकुर अपनी रचनाओं में शूद्रों की श्रेष्ठता को स्थापित करते हैं। इसका कारण क्षत्रिय का दोयम दर्जा और शूद्रों का अपमान-बोध और शोषण ही है। बुद्ध ने भी वर्णगत भेदभाव देखा और भोगा था, भिखारी ठाकुर ने भी देखा और भोगा था। इसीलिए भिखारी ठाकुर अपने व्यत्तिगत और जातिगत पीड़ा को जब कला की चासनी में डूबोकर व्यक्त करते हैं, तो उसका व्यंग्य संपूर्ण सामाजिक व्यवस्था को झकझोर देता है–

“ब्राह्मण क्षत्री वैश्य शूद्र गण, सुनहूं विनय सब मोर।
गिरत ‘भिखारी’ त्राहि चरन में, त्राहि-त्राहि करि शोर।।”

 (नाई बहार, भिखारी ठाकुर)

भिखारी समाज से सामाजिक और आर्थिक न्याय की मांग करते हैं और कहते हैं कि “सबसे अधिक काम करने पर भी सुख-श्राद्ध में नाई को सबसे कम हिस्सा क्यों मिलता है?” वे अधिकार पूर्वक अपना हिस्सा मांगते हैं। उनका तर्क है कि पशु-पक्षियों में गाय सबसे श्रेष्ठ है और कुत्ता और कौवा अश्रेष्ठ। पर मृतक के श्राद्धकर्म में कौवा, कुत्ता और गाय तीनों को पिंड का बराबर हिस्सा दिया जाता है। तो फ़िर नाई को ब्राह्मण से कम हिस्सा क्यों मिलता है? 

“पक्षी में काग चांडाल कहावत, पशु में नीच कहावत कुत्ता।
गाई के माई कहे अगराई के, पूजत बाड़न चार सपूता।।
भाग बरोबर तीनों बनाकर, कर्म सराध में देत बहुता।
अधिका-कमती के ‘भिखारी’ कहे, हम खोजत बानी उहे सबूता।।”

 (वही)

भिखारी ठाकुर ने जन्म से लेकर मृत्यु तक समाज में होनेवाले सभी संस्कारों में नाइयों की सक्रिय भागीदारी और उनकी दीन-दशा एवं शोषण का वर्णन कर उन पर समाज का ध्यान आकृष्ट किया है। भिखारी ठाकुर ने साहसपूर्वक अपने आपको दलित-पिछड़ी बहुजन चेतना और सामाजिक न्याय से लैस और मजबूत किया है। उन्होंने अपने नाटक और गीतों में ऐसे विषय और प्रसंगों की बार-बार चर्चा की है। यद्यपि धनी सिह और दरबारी गिरि जैसे उच्च श्रेणी के सवर्ण कलाकार भी भिखारी ठाकुर के नाचमंडली में शामिल होना चाहते थे, लेकिन उन्होंने सामाजिक पीड़ा के भुक्तभोगी दलित-पिछड़े कलाकारों को ही अपने नाटकों में रखा, ताकि भावनाओं की गहराई तक वे कला का प्रदर्शन कर सकें।

उनके नाटकों के वास्तविक और काल्पनिक दोनों ही पात्र दलित-पिछड़े समुदाय से ही हैं। जिस प्रकार प्रेमचंद ने अपने कथा साहित्य में दलित-पिछड़े पात्रों के नाम और गुण गिनाए हैं, भिखारी ठाकुर ने उनसे आगे बढ़कर यह काम किया है। उनके नाटकों के पात्रों के नाम हैं– बिदेसी, बटोही, देवर, दोस्त, घिचोर, गड़बड़ी, गलीज बहु, उपदर, उदवास, झांटुल, चटक, चेथरू, लोभा आदि। ऐसे नाम दलित-पिछड़े जातियों के ही होते हैं।

इस प्रकार भिखारी ठाकुर ने अपनी जाति की दयनीय अवस्था का वर्णन और उसके प्रति स्वाभिमान दिखाकर शूद्र जातियों में स्वाभिमान की चेतना पैदा की। भिखारी ठाकुर का जागरण ‘शूद्र जागरण’ था, जो काफी हद तक सफल रहा। सामाजिक न्याय की आगे की लड़ाई के लिए भिखारी ठाकुर के नाच ने हिंदी और भोजपुरी पट्टी में एक अनुकूल जमीन तैयार कर दी। दलित-पिछड़े कलाकारों की तरह उनकी रचनाएं भी दलित-पिछड़े समाज और स्त्रियों से ही संबंधित थीं।

मुख्यधारा के समाज में भी अनेक सामाजिक और सांस्कृतिक समस्याएं थीं। भिखारी ने हाशिए के लोगों के बहाने पूरे समाज को देखा। शादी होते ही रोजी के लिए पति का परदेश चला जाना और घर में जवान बहू का दुख-दर्द दलित-पिछड़े समाज की बड़ी समस्या थी, तो विधवा जीवन, बहु-विवाह, वेश्या समस्या आदि संपूर्ण नारी जाति और खासकर सवर्ण समाज की समस्याएं थीं। कभी-कभी परदेश गए पति के बहुत दिनों तक नहीं लौटने पर पत्नी का दूसरे पुरुष से अवैध संबंध हो जाता था और बच्चे तक हो जाते थे। भिखारी ठाकुर ने जहां ‘बिदेसिया’ नाटक में स्त्रियों की पहली समस्या का चित्रण किया है, वहीं ‘गबरघिचाेर’ लोकनाटक में स्त्री-पुरुष संबंधों की दूसरी समस्याएं आती हैं। सामाजिक समस्याओं की यह ईमानदार अभिव्यत्ति, उनकी कला की सार्थकता के प्रमाण हैं। कितने आश्चर्य की बात है कि जिस काल में हिंदी क्षेत्र में दयानंद सरस्वती और राजा राममोहन राय के प्रगतिशील विचार भी खपाए नहीं खप रहे थे, उस कट्टर काल में भी भिखारी ठाकुर ने इन प्रगतिशील विचारों को अपने लोकनाटकों के जरिए हिंदी-भोजपुरी जनता के दिलो-दिमाग में भर दिया। विधवा विवाह का नाम सुनकर ही समाज की भौंहें तन जाती थीं। बाल विवाह, बेटी बेचना, बहु विवाह, दलितों-पिछड़ों से छुआछूत, गंगास्नान आदि द्वारा शुद्धि और पुण्यप्राप्ति के धार्मिक आडंबर। ये सब परंपरा के अंग थे। भिखारी ठाकुर ने न केवल इन विसंगतियों पर प्रहार किया, बल्कि बहुत सारी विसंगतियां उनके नाटक देखकर ही सुधरती चली गईं। यह मिशन ब्रह्मसमाज और आर्यसमाज का था, जिसे भिखारी ठाकुर ने पूरा किया। भिखारी ठाकुर को ‘बेटीबेचवा’ और ‘गबरघिचोर’ जैसे नाटक लिखने की हिम्मत इस कारण से हुई कि नवजागरण का सबसे बड़ा आंदोलन बाल विवाह निवारण और स्त्री अधिकार का ही था।

भिखारी ठाकुर ने सामाजिक, सांस्कृतिक समस्याओं के अलावा व्यक्तिगत जीवन में होनेवाली पारिवारिक समस्याओं का भी वर्णन किया है। उन्होंने जीवन की चारों अवस्थाओं बचपन (ब्रह्मचर्य), जवानी (गृहस्थाश्रम), प्रौढ़ावस्था (वानप्रस्थ) और वृद्धावस्था (संन्यास) के आधुनिक स्वरूप, स्थिति और उनके अधिकार-कर्तव्यों का भी चित्रण किया है। उन्होंने जीवन की इन चारों अवस्थाओं को बबुआ, भैया, बाबू, और बाबा के रूपक से बांधा है। बचपन में बच्चों को खेल-कूद और पढ़ाई-लिखाई करने के अलावा माता-पिता और बड़े बूढ़ों की आज्ञा का पालन करना चाहिए। जवानी में घर-गृहस्थी चलाने के अलावा घर-परिवार और समाज की भी सेवा करनी चाहिए। गरीब, असहाय और बुजुर्गों की सेवा करनी चाहिए। धर्म और कर्म दोनों करने चाहिए। प्रौढ़ावस्था में अपने काम करते हुए भी बच्चे और जवान, दोनों प्रौढ़ और बूढ़ों की मदद करें। बुढ़ापा जीवन का संन्यास है। आधुनिक जीवन में सबके लिए संन्यासी बनकर वन-जंगल और मठ-मंदिर में रहना मुश्किल है। बूढ़े और बुजुर्ग घर की शान और इज्जत हैं। इसीलिए सबको मिलकर उनकी सेवा और देखभाल करनी चाहिए।

लेकिन अपने समय के जटिल और व्यावसायिक जीवन में भिखारी ठाकुर ने समाज में बूढ़े माता-पिता, दादा-दादी और विधवाओं की दुर्दशा देखी थी। उन्हें घर में न भरपेट खाना मिलता, न पूरे कपड़े ही। उनके साथ बेटे-पोतों और बहुओं का व्यवहार अच्छा नहीं होता। बिन मांगे न उन्हें भोजन मिलता, न वस्त्र और बिछावन। उनका जीवन बहुत अभाव और दीनता में कटता है। परिवार और समाज में बूढ़ों की इस दयनीय स्थिति को देखते हुए उन्होंने चार महत्वपूर्ण पुस्तिकाएं लिखीं– ‘देवता विलाप’, ‘विधवा विलाप’, ‘माता भक्ति’ और ‘बूढ़शाला के बेयान’। इनके अतिरिक्त उन्होंने अपने नाटकों में भी प्रसंगवश बूढ़े-बुढ़ियों की दयनीय दशा और उनके विलाप आदि का चित्रण किया है और अंत में उसका समाधान भी बताया है। बूढ़ी मां की दयनीय अवस्था का चित्रण करते हुए भिखारी ठाकुर कहते हैं–

“देवता रोवत बाड़ी घरवा में मतरिया, हंसत बा नगरिया ना। टेक।।
बेटा बोलत बाड़न बात, बुढ़िया खाले पूरा भात।
नइखे बइठल-बइठल बांटत रसरिया। हंसत बा नगरिया ना।
दुख से कहत ‘भिखारी नाई’, जनमवली पोसली माई।
तेकर लिखत बानी कागत में खबरिया। हंसत बा नगरिया ना।”

और–

“कवन कसूर कइली, घर से निकालल गइली,
छूटल जात बा नइहर-ससुरवा हो बबुआ।
कहत भिखारी नाई, विधवा विलाप गाई,
भज रघुराई जान छोड़ द हो बबुआ।”

आज किसी भी समाज-परिवार में बूढ़े-बुढ़ियों की स्थिति बड़ी दयनीय हो गई है, खासकर ऐसे इलीट समाज में जिनके बच्चे रोजी-रोटी के लिए विदेश जाकर बस गए हैं। आज हर देश में वृद्धाश्रम खुल रहे हैं। यह कितने आश्चर्य की बात है कि पूरे नवजागरण काल और आजादी की लड़ाई के दौरान शिक्षा, सफाई, स्वास्थ्य आदि समाज-सुधारों के बीच और आजादी के बाद भी बूढ़ों के लिए वृद्धाश्रम खोलने की कहीं चर्चा तक नहीं है। गांधी और आंबेडकर के आंदोलन में भी इसका कोई संकेत नहीं हैं। लेकिन भिखारी ठाकुर ‘बूढ़शाला’ की बात करते हैं। ब्रिटिश समाज सुधारकों को भी यह बात नहीं सूझी। यह भिखारी ठाकुर की मौलिक और दूरदर्शी सोच थी, जो आज साकार हो रही है। इसीलिए भिखारी कहते हैं– “यह नई बात है। ऐसा न कहीं हुआ है और न हो रहा है। हमने बिना गांव-समाज और बस्ती की राय लिये यह बात कह दी है। पर बात जब मुंह से निकल ही गई तो इसकी इज्जत रखना समाज का कर्तव्य है। यह जरूरी है–

“बूढ़शाला के देली निकाल, बिना इजाजत बस्ती-भर का।
अइसन भइल ना होखत बा, देस-विदेस न कवनो जगहा।
हम नया कइली परचार, आस पुराई बाबू-भइया।
मदद लेके थोरा-थोर, बने ‘बूढ़शाला’ गांव-गांव में।
मांगत बानी अतने भीख, हईं भिखारी बच्चेपन के।” 

(बूढ़शाला के बेयान)

भिखारी कहते हैं कि बूढ़ों की देखभाल के लिए गांव-गांव में एक बूढ़शाला यानी वृद्धाश्रम होना चाहिए, वह भी नदी के किनारे, ताकि मृत्यु के बाद उनके दाह-संस्कार में कोई कठिनाई न हो। वे कहते हैं– “अब देखल जाये कि गाय वास्ते गौशाला खुल गइल। गरीब वास्ते धर्मशाला खुल गइल। बड़ा अच्छा भइल। अब बूढ़ खातिर बुढ़शाला खुल जाइत, बहुत अच्छा रहल ह, काहेकि बूढ़ के बड़ा तकलीफ बीतत बा।” वे कहते हैं कि लोग थोड़ा-थोड़ा चंदा इकट्ठा करके हर गांव में एक वृद्धाश्रम खोल दें और कुछ समाजसेवी युवक-युवतियां बारी-बारी से उनकी देखभाल करें, ताकि बूढ़े-बुढ़ियों को परिवार में तकलीफ न हों। इस प्रकार भिखारी जन्म से मरण तक मनुष्य के हर सुख-दुख की चिंता करते हैं।

इस महान लोक कलाकार और जनकवि का निधन 10 जुलाई 1971 को हो गया। आज भिखारी ठाकुर नहीं है। लेकिन उनकी संपूर्ण नाट्य-परंपरा और उनके गीत-संगीत हमारे बीच हैं।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

हरिनारायण ठाकुर

एम.एस. कॉलेज, मोतिहारी (बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय, मुज़फ्फ़रपुर, बिहार) के अवकाश प्राप्त प्राचार्य हरिनारायण ठाकुर सुविख्यात साहित्य समालोचक हैं। इनकी प्रकाशित कृतियों में ‘बिहार में अति पिछड़ा वर्ग आंदोलन’ (2007, हिमाचल प्रेस, पटना), ‘हिंदी की दलित कहानियां’ (2008, समीक्षा प्रकाशन, मुज़फ्फरपुर-दिल्ली), ‘दलित साहित्य का समाजशास्त्र’ (2009, भारतीय ज्ञानपीठ; पांचवां पेपरबैक संस्करण 2022, वाणी प्रकाशन समूह; देश के सभी विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में), ‘भारत में पिछड़ा वर्ग आंदोलन और परिवर्तन का नया समाजशास्त्र’ (2009, अद्यतन-2022, कई संस्करण, ज्ञान बुक्स, नयी दिल्ली), ‘भारतीय साहित्य का शूद्र-पाठ (शुद्ध-पाठ)’ (2017, समीक्षा प्रकाशन, मुज़फ्फरपुर-दिल्ली; दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय, गया के पाठ्यक्रम में) शामिल हैं। वहीं आत्मकथा ‘आकुल उड़ान’ वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली द्वारा प्रकाशनाधीन है।

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‘गबरघिचोर’ नाटक में भिखारी ठाकुर विस्मित करते हैं। उनकी पृष्ठभूमि ऐसी नहीं थी कि उन्होंने ब्रेख्त का नाटक ‘कॉकेशियन चॉक सर्किल’ पढ़ा या देखा...
ब्राह्मण वर्गों की ‘पवित्रता’ के निशाने पर बहुजन
कोई किसी विशेष नदी में नहाकर ‘पवित्र’ हो सकता है, भले उसका पानी बहुत दूषित हो। इसके विपरीत साफ़-सफ़ाई या स्वच्छता एक मूर्त और...
अगर जीतू मुंडा की जगह एक आदिवासी महिला होती …
आदिवासी समाज के कई हिस्सों में आज भी महिलाओं के प्रति अंधविश्वास, पितृसत्ता और सामाजिक भेदभाव गहराई से मौजूद हैं। ऐसी स्थिति में यदि...
एक दलित छात्रा का कैंपस के भीतर और बाहर का जीवंत अनुभव
अगर डांगावास (14 मई, 2015, राजस्थान), खैरलांजी (27 सितंबर, 2006, महाराष्ट्र) और लक्ष्मणपुर बाथे (1 दिसंबर, 1997) जैसे नरसंहार और प्रताड़नाएं दलित साहित्य का...