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पसमांदा विमर्श पर संवाद करती किताब

भारत में दलित आंदोलन ने लंबे समय तक मुख्य रूप से हिंदू दलितों के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया है, लेकिन मुस्लिम और ईसाई समाज के दलित समुदायों की समस्याओं को उतनी प्राथमिकता नहीं मिली है। पढ़ें, फैयाज आलम की यह समीक्षा

भारत एक बहु-धार्मिक, बहु-जातीय और बहु-सांस्कृतिक देश है जहां विविधता समाज की पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस विविधता के बीच मुस्लिम समाज को अक्सर एक समतामूलक और बराबरी पर आधारित समुदाय के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इस्लाम की मूल शिक्षाएं भी समानता, भाईचारे और भेदभाव-रहित समाज की बात करती हैं। लेकिन सामाजिक यथार्थ अलग दिखाई देता है। इस समाज के भीतर भी जाति-आधारित विभाजन मौजूद है, जिसे सामान्यतः अशराफ, अजलाफ और अरजाल के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। अशराफ वर्ग को सामाजिक रूप से उच्च माना जाता है, जबकि अजलाफ और अरजाल वर्ग सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े हुए हैं। यही वर्ग आज ‘पसमांदा मुसलमान’ के रूप में पहचाना जाता है।

पसमांदा मुसलमानों की बड़ी आबादी आज भी गरीबी, अशिक्षा, बेरोज़गारी और सामाजिक उपेक्षा जैसी गंभीर समस्याओं का सामना कर रही है। वे केवल व्यापक समाज में ही नहीं, बल्कि कई बार अपने ही धार्मिक समुदाय के भीतर भी जातिगत भेदभाव का अनुभव करते हैं। इस भेदभाव के कारण उनके लिए शिक्षा प्राप्त करना, सम्मानजनक रोजगार पाना और सामाजिक प्रतिष्ठा हासिल करना कठिन हो जाता है। इसके साथ-साथ उनकी राजनीतिक भागीदारी भी सीमित रहती है, जिससे उनकी समस्याएं नीति-निर्माण के स्तर पर पर्याप्त रूप से सामने नहीं आ पातीं। अक्सर पसमांदा मुसलमानों की पिछड़ी स्थिति को केवल उनके धार्मिक अल्पसंख्यक होने से जोड़कर देखा जाता है, जबकि उनके पिछड़ेपन के पीछे जाति और वर्ग की गहरी और जटिल भूमिका भी मौजूद है।

इसी सामाजिक सच्चाई को पूर्व राज्यसभा सांसद व बहुचर्चित किताब ‘मसावात की जंग’ के लेखक अली अनवर अपनी पुस्तक ‘सम्पूर्ण दलित आंदोलन : पसमान्दा तसव्वुर’ के माध्यम से सामने लाते हैं। यह किताब भारतीय समाज के उस पहलू पर प्रकाश डालती है, जिस पर लंबे समय तक पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। अली अनवर इस पुस्तक में यह स्पष्ट करते हैं कि जाति-आधारित भेदभाव केवल हिंदू समाज तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक सामाजिक संरचना का हिस्सा है, जो विभिन्न धर्मों और समुदायों में अलग-अलग रूपों में मौजूद है। लेखक मुस्लिम समाज के भीतर मौजूद जातिगत असमानताओं और पसमांदा समुदाय की वास्तविक स्थिति का गंभीर और तथ्यात्मक विश्लेषण करते हैं। वे एक सौ दलित मुस्लिम परिवारों का सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक अध्ययन प्रस्तुत करने के साथ ही साथ समय-समय पर इन वर्गों की बेहतरी के लिए उठाई गई आवाजों को भी प्रस्तुत करते हैं।

समीक्षित पुस्तक का मुख पृष्ठ

मुसलमानों में कोई ऊंच-नीच नहीं होता है। सभी मुसलमान आपस में भाई-भाई होते हैं। सिद्धांत के रूप में यह बात सही भी है, लेकिन वास्तविक जीवन में मुस्लिम समाज के भीतर सिद्धांत और व्यवहार के बीच जो अंतर दिखाई देता है, उसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। इसी फर्क को देखते हुए डॉ. आंबेडकर अपनी किताब ‘पाकिस्तान अथवा भारत का विभाजन’ में मुस्लिम जातियों को तीन वर्गों में विभाजित करते हैं, जिसका हवाला वे 1901 की बंगाल प्रांत की जनगणना को देते हैं, जो इस प्रकार है–

  1. अशराफ़ अथवा उच्च वर्ग के मुसलमान : सैयद, शेख, पठान, मुगल, मलिक, मिर्जा।
  2. अजलाफ़ अथवा निम्न वर्ग के मुसलमान – खेती करने वाले शेख, दर्जी, जुलाहा, फ़क़ीर, रंगरेज, बाढ़ी, भठियारा, चिक, चूड़ीहार, दाई, धोबी, धुनिया, गद्दी, कलाल, कसाई, कुला कुंजड़ा, लहेरी, माहीफरोश, मल्लाह, नालिया, निकारी, अब्दाल, बक्खो, बेड़िया, भाट, चम्बा, डफाली, हज्जाम, मुचो, नगारची, नट, परवाडिया, मडारिया, तुंतिया।
  3. अरजाल अथवा निकृष्ट वर्ग : भानार, हलालखोर, हिजड़ा, लालबेगी, भोगता, मेहतर।

इस्लाम का उदय अरब में हुआ। इस्लाम धर्म के आखिरी पैगंबर मोहम्मद (सलम) तमाम उम्र ऊंच-नीच के खिलाफ हिदायत देते रहे। उनके आखरी खुतबे (संबोधन) को दुनिया ‘हज्जतुलविदा’ नाम से जानती है। इसमें वे फरमाते हैं– “न गोरे को काले पर, न काले को गोरे पर, न अरबी को अज़मी (गैर-अरबी) पर कोई फ़ौकियत (श्रेष्ठता) हासिल है। अगर है, तो तकवा की बुनियाद पर। तकवा का अर्थ है ईमान वाला, खुदा से डरनेवाला। ईमान वाला और ख़ुदा से डरने का मतलब है, गलत काम से डरना, किसी पर जुल्म नहीं करना, कमजोर लोगों के प्रति रहम दिल होना। उनको सताना नहीं, उनकी मदद करना। हज़रत मोहम्मद (सलम) ने तो एक बार यहां तक फरमाया है कि आज की तारीख से हस्ब नशब (ऊंच नीच) के मामले को अपने पैरों से रौंदता हूं।”  (सम्पूर्ण दलित आंदोलन : पसमान्दा तसव्वुर – पृष्ट सं. 23-24) 

तौसीफ अहमद ‘जर्नल ऑफ पॉलिटी एंड सोसायटी’ में प्रकाशित अपने शोध पत्र ‘पसमांदा एंड दलित मुस्लिम : ए डिस्कसन ऑन रिजर्वेशन एंड रिप्रजेंटेशन’ में बताते हैं– “पूरी दुनिया में लगभग 750 मुस्लिम जनजाति, जातियां और समुदाय हैं, जिनमें 246 भारत में हैं और इनमें 90 देश के उत्तर हिस्से में, पश्चिम में 73, पूरब में 35 और दक्षिण एवं मध्य में 20-20 और पूर्वोत्तर में 8 हैं।” 

सै‌द्धांतिक रूप से इस्लाम समानता पर आधारित समाज है, इसमें न तो कोई जाति-व्यवस्था है और न ही जाति प्रथा जैसी कुरीति। फिर सवाल यह है कि आखिरकार मुस्लिम समाज में जाति आधारित यह वर्ग कहां से आ गया? अली अनवर लिखते हैं– “भारत में ज़्यादातर इतिहासकार और समाजशास्त्री यह मानते हैं कि इस देश में बसी मुस्लिम और ईसाई आबादी में 95 प्रतिशत लोग यहां के ही हैं। उन्होंने हिंदू धर्म में व्याप्त छुआछूत ऊंच-नीच की व्यवस्था से तंग आकर इस्लाम या ईसाई धर्म कबूल किया।” (‘सम्पूर्ण दलित आंदोलन : पसमान्दा तसव्वुर’ – पृष्ठ 23)

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि मुस्लिम सूफी-संतों के असर और उनके व्यक्तित्व से प्रभावित होकर ज़्यादातर हिंदू दलितों और पिछड़ी आबादियों ने इस्लाम धर्म कबूल किया। एक कारण यह भी है कि हिंदू धर्म और उनके पंथों में प्रचलित छुआछूत और ऊंच-नीच की भावना तथा अत्याचार की घटनाओं से तंग आकर निम्न जातियों के लोगों ने धर्म परिवर्तन किया। इस्लाम धर्म में सैद्धांतिक तौर पर जाति-व्यवस्था नहीं है, लेकिन भारत में हिंदू धर्म का प्रभाव इस धर्म पर भी पड़ा और इसमें भी जाति-व्यवस्था बन गई।

इस किताब की एक विशेषता यह है कि लेखक ने केवल सैद्धांतिक बातें नहीं की हैं, बल्कि अपने तर्कों को वास्तविक अनुभवों और शोध के आधार पर प्रस्तुत किया है। उन्होंने दलित-पिछड़े मुस्लिम समुदाय के लोगों के जीवन, उनके अनुभवों और उनके संघर्षों का अध्ययन किया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि ये लोग शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सम्मान के क्षेत्र में कई प्रकार की कठिनाइयों का सामना करते हैं। उन्हें अक्सर समाज के मुख्यधारा से बाहर रखा जाता है और उनकी समस्याओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। न ही इस पर विशेष अध्ययन किया गया है। कमल नयन चौबे प्रतिमान पत्रिका में प्रकाशित अपने लेख ‘दलित मुस्लिम अन्तर्सम्बन्ध सांझापन की तलाश और मुश्किलें’ में कहते हैं– “मुस्लिमों के बीच जातिगत भेदभावों के बारे में लंबे समय तक व्यवस्थित अध्ययन करने का प्रयास नहीं किया गया। इसका एक नतीजा यह भी हुआ कि दलित परिप्रेक्ष्य से विचार करने वाले बहुत से वि‌द्वानों ने भी यह मान लिया कि मुस्लिम धर्म में कोई जातिगत भेदभाव नहीं होता है।…निर्धनता या समृद्धि में जनसंख्या के अनुपात के संदर्भ में ग्रामीण और शहरी, दोनों ही क्षेत्रों में दलित-मुस्लिम सभी दलितों से बुरी स्थिति में हैं।” 

भारत में दलित आंदोलन ने लंबे समय तक मुख्य रूप से हिंदू दलितों के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया है, लेकिन मुस्लिम और ईसाई समाज के दलित समुदायों की समस्याओं को उतनी प्राथमिकता नहीं मिली है। अली अनवर इस स्थिति की आलोचना करते हुए कहते हैं कि सामाजिक न्याय की लड़ाई तब तक अधूरी रहेगी, जब तक सभी धर्मों के दलित और पिछड़े वर्गों को इसमें शामिल नहीं किया जाएगा। वे यह भी कहते हैं कि संविधान में समानता का अधिकार सभी नागरिकों को दिया गया है, इसलिए धर्म के आधार पर किसी भी दलित समुदाय को आरक्षण और अन्य सुविधाओं से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।

अली अनवर की यह किताब राजनीतिक दृष्टिकोण से भी इस मुद्दे का विश्लेषण करती है। वे बताते हैं कि राजनीतिक दल अक्सर मुस्लिम समाज को एक समान समुदाय के रूप में प्रस्तुत करते हैं और उसके भीतर मौजूद जातिगत भेदभाव को नजरअंदाज कर देते हैं। इससे पसमांदा समुदाय की वास्तविक समस्याएं सामने नहीं आ पातीं। वे इस स्थिति को बदलने की आवश्यकता पर जोर देते हैं और कहते हैं कि राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर पसमांदा समुदाय को उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। यह किताब केवल समस्या को उजागर करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाधान के रास्ते भी सुझाती है। लेखक का मानना है कि सामाजिक न्याय के लिए सभी दलित और पिछड़े वर्गों को एकजुट होना होगा और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना होगा। इसके साथ ही सरकार और समाज को भी यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सभी वंचित वर्गों को शिक्षा, रोजगार के समान अवसर और सामाजिक सम्मान मिले।

यह किताब हमारे समय का एक महत्वपूर्ण सामाजिक दस्तावेज है। यह किताब भारतीय समाज की जटिल संरचना को समझने का एक नया दृष्टिकोण प्रदान करती है। लेखक केवल तथ्यों और तर्कों के माध्यम से बहस नहीं करते, बल्कि पाठक को आत्ममंथन के लिए भी प्रेरित करते हैं। यह पुस्तक हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या वास्तव में हमारा समाज समानता के सिद्धांत पर चल रहा है, या फिर आज भी कुछ समुदाय ऐसे हैं जो लगातार भेदभाव, उपेक्षा और हाशियाकरण का सामना कर रहे हैं।

इसी संदर्भ में अली अनवर की यह कृति दलित और पसमांदा आंदोलनों के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु का कार्य करती है। यह सामाजिक न्याय की अवधारणा को संकीर्ण दायरे से निकालकर एक व्यापक और समावेशी परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करती है। लेखक यह स्पष्ट करते हैं कि सामाजिक समानता केवल संवैधानिक प्रावधानों या कानून बनाने से सुनिश्चित नहीं हो जाती, बल्कि इसके लिए समाज की मानसिकता, व्यवहार और संरचनात्मक ढांचे में भी परिवर्तन आवश्यक है।

यह पुस्तक उस विषय को केंद्र में लाती है, जिस पर अक्सर सार्वजनिक विमर्श में पर्याप्त चर्चा नहीं होती। इस प्रकार, यह किताब न केवल दलित आंदोलन की पारंपरिक समझ को विस्तारित करती है, बल्कि पसमांदा समुदाय की वास्तविक स्थिति को भी गंभीरता से सामने लाती है। इसलिए कहा जा सकता है कि यह कृति सामाजिक न्याय, दलित चेतना और पसमांदा विमर्श को समझने के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण और उपयोगी स्रोत है, जो पाठकों को संवेदनशील और जागरूक नागरिक बनने की दिशा में प्रेरित करती है।

समीक्षित पुस्तक : ‘सम्पूर्ण दलित आंदोलन : पसमान्दा तसव्वुर’
लेखक : अली अनवर
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य : 225 रुपए

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

फ़ैयाज़ आलम

लेखक हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद में हिंदी (स्नातकोत्तर) के छात्र हैं

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