h n

जाति-विरोधी आंदोलनों के समक्ष ‘बहुवादीकरण’ की चुनौती

समकालीन जाति-विरोधी आंदोलन, बहुवाद (अलग-अलग पहचानों के चिह्नीकरण और आरक्षण की व्यवस्था) को बढ़ावा देने की मांग करने में तो आगे हैं, लेकिन वे ‘बहुवादीकरण’ को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं। पूरी दुनिया में लोकतंत्र का संकट, दरअसल, बहुवादीकरण का संकट है। बता रहे हैं डॉ. खालिद अनीस अंसारी

यह आलेख डॉ. खालिद अंसारी द्वारा इंटरनेशनल दलित लिटरेचर फेस्टिवल में दिए गए मुख्य वक्तव्य का आंशिक तौर पर संपादित संस्करण है। इस फेस्टिवल का आयोजन नार्थईस्टर्न इलिनॉय विश्वविद्यालय के साउथ अमेरिकन कोएलिशन टू रिन्यू डेमोक्रेसी और उससे संबद्ध संस्थाओं ने 18 अप्रैल, 2026 को शिकागो स्थित रूजवेल्ट विश्वविद्यालय में किया था।

साथियों एवं सत्यवादियों,

हम यहां अमरीका में आंबेडकर जयंती मनाने के लिए इकट्ठा हुए हैं। अमरीका वह देश है जिसने आंबेडकर को जॉन डेवी के साथ जुड़ने का मौका दिया, उनका परिचय व्यवहारवाद से करवाया व उन्हें यह भी बताया कि लोकतंत्र ‘मिल कर रहने का तरीका’ है। मगर जिस देश ने आंबेडकर को लोकतंत्र के बारे में बहुत कुछ बताया-सिखाया, वही आज लोकतंत्र के सिद्धांतों का सबसे बड़ा और सबसे शक्तिशाली उल्लंघनकर्ता बन गया है। यहां चुनाव की प्रक्रिया में हेर-फेर करने के प्रयास हो रहे हैं, असहमति को अपराध बना दिया गया और इस्लामोफोबिया का बोलबाला है। अमरीका अब लोकतंत्र का पोषक नहीं है। वह लोकतंत्र की राह से डिग रहा है।

और यह सिर्फ अमरीका में नहीं हो रहा है। यह पूरी दुनिया में हो रहा है। श्रेष्ठी वर्ग संसदों पर काबिज़ हो रहा है। कानून-आधारित व्यवस्था का ह्रास हो रहा है और ‘फतह’ की साम्राज्यवादी दौर की भाषा एक बार फिर गूंजने लगी है। इसका सबसे ताज़ा उदाहरण है अमरीका-इजराइल द्वारा ईरान और लेबनान पर हमले। उदारवादी लोकतंत्र आईसीयू में हैं।

हमारे देश के जाति-विरोधी आंदोलनों को यह नहीं मानना चाहिए कि यह सब तो हजारों मील दूर हो रहा है। उससे उन्हें क्या मतलब। दरअसल, यह उनके लिए प्रत्यक्ष खतरा है। इसके चलते हमें अपनी नीतियों और राजनीति पर पुनर्विचार करना ही होगा। और शायद हम इसकी शुरुआत अमरीकी राजनीतिक सिद्धांतकार विलियम कोनोली से कर सकते हैं।

कोनोली हमें चेताते हैं कि हमें बहुवाद और बहुवादीकरण को एक नहीं समझना चाहिए–

  • बहुवाद केवल विविधता को स्वीकार करना है। यह शासन द्वारा इस तथ्य की स्वीकार्यता मात्र है कि समाज में कई अलग-अलग समूह हैं। उदारवादी राज्यों को बहुवाद से कोई तकलीफ नहीं होती क्योंकि उसे आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है। वह समाज को स्पष्ट खांचों में बांटता है (यथा, दलित, मुसलमान, आदिवासी, महिलाएं इत्यादि) और सभी को प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व देता है। बहुवाद उन्हें नियंत्रित करता है।
  • बहुवादीकरण अलग होने और अलग दिखने की प्रक्रिया है। वह स्थापित पदानुक्रम को अनियंत्रित ढंग से झकझोरता है। वह किसी खांचे में बंद होने से इनकार करता है। वह सिर्फ व्यवस्था में अपने लिए जगह नहीं मांगता। वह पूछता है कि व्यवस्था किसने बनाई और यह व्यवस्था पिरामिड के आकार की क्यों हैं। उसमें कोई ऊंचा और कोई नीचा क्यों है?

समकालीन जाति-विरोधी आंदोलन बहुवाद (अलग-अलग पहचानों का चिह्नीकरण और आरक्षण की व्यवस्था) को बढ़ावा देने की मांग करने में तो आगे हैं, लेकिन वे ‘बहुवादीकरण’ को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं। पूरी दुनिया में लोकतंत्र का संकट, दरअसल, बहुवादीकरण का संकट है। श्रेष्ठी वर्ग को कई संस्कृतियों के अस्तित्व में बने रहने से कोई परेशानी नहीं है, बशर्ते उनमें से कोई भी शोषण के आधारभूत ढांचे के लिए चुनौती न बने।

आंबेडकर ने सन् 1935 में ही हिंदू धर्म को अलविदा कह दिया था और 1956 में वे औपचारिक रूप से हिंदू धर्म से जुदा हो गए। यह बहुवाद नहीं, बहुवादीकरण था – एक क्रांतिकारी संबंध विच्छेद था, जाति व्यवस्था पर एक सामूहिक हमला था। आज हमें उस भाव को फिर से जगाना है। इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए मैं एक वैचारिक ढांचे का प्रस्ताव करता हूं। यह चार ‘डी’ ढांचा है– डीकोलोनाईज़ेशन (औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति), डायवर्सिफिकेशन (विविधीकरण), डेमोक्रेटाईज़ेशन (लोकतांत्रिकरण) एवं डेवलपमेंट (विकास)।

अब मैं आपको हर ‘डी’ के बारे में जरा विस्तार से बताऊंगा और यह भी कि वे किस तरह से बहुवादीकरण और लोकतंत्र के क्षीण होते जाने से जुड़े हुए हैं।

सीवान, बिहार में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के “उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने संबंधी यूजीसी विनियम, 2026” पर उच्चतम न्यायालय द्वारा रोक लगाने के विरोध में 4 फरवरी, 2026 को आयोजित विरोध प्रदर्शन

1. डीकोलोनाईज़ेशन – औपनिवेशिक मानसकिता के पिंजरे को तोड़ो

हम भले ही विदेशी शासन से मुक्त हो गए हों मगर औपनिवेशिक प्रशासनिक व्यवस्था और ज्ञान प्रणाली अब भी हमारे जीवन का अभिन्न अंग बनी हुई। हम अब भी औपनिवेशिक सोच के इन चार पिंजरों के कैदी हैं : 

  • धर्म एक अनिवार्य और सर्वोपरि पहचान है।
  • ब्रिटिश इतिहासलेखन, जो हमें बताता है कि हिंदू और मुसलमान एक-दूसरे के शत्रु थे और हैं।
  • यह सोच कि हिंदू धर्म सहिष्णु है मगर उसमें समता नहीं है और इस्लाम एक समतावादी लेकिन कट्टर धर्म है – जिसके नतीजे में जाति को हम हिंदू धर्म का हिस्सा मानते हैं और सोचते हैं कि गैर-हिंदू धर्मों में उसका थोड़ा-सा प्रभाव रह गया है।
  • यह विचार कि किसी धर्म के उद्भव का स्थान उसे विदेशी या स्वदेशी बनाता है, जिसका नतीजा यह है कि इस्लाम और ईसाई धर्म, जिनका सदियों से भारत में अस्तित्व है, को हम अब भी विदेशी धर्म मानते हैं।

यह सब बहुवादीकरण का विलोम है। बहुवादीकरण के लिए ज़रूरी है कि हम अपने आपको औपनिवेशिक सोच से मुक्त करें। हम यह मानें कि जातियां सभी धर्मों में है, हम हिंदू बनाम मुस्लिम की सोच त्यागें और सभी धर्मों के दमित वर्गों को लामबंद करें। जब तक हम औपनिवेशिक मानसिकता के पिंजरे में कैद रहेंगे, तब तक हम वही करते रहेंगे जो हमारे औपनिवेशिक आका चाहते थे।

2. डायवर्सिफिकेशन – अग्रणी जातियों के संस्कृति पर एकाधिकार को समाप्त करो

सभी बहुजन समुदायों को अपनी जाति के कारण अपमान का सामना करना पड़ता है, मगर अलग-अलग ढंग से और अलग-अलग मात्रा में। यह संबंधित व्यक्ति के लिंग, धर्म, भाषा, वर्ग और लैंगिकता पर निर्भर करता है। अधिकांश दलित-बहुजन अब भी हिंदू धर्म का हिस्सा क्यों बने हुए हैं? इस प्रश्न का आम तौर पर उत्तर होता है– ‘भ्रांत चेतना’। मगर जब हम यह कहते हैं तो दरअसल हम यह कह रहे होते हैं कि वे व्यक्तिगत स्तर पर निर्णय लेने में सक्षम नहीं हैं। हमें इस बात की गंभीरता से पड़ताल करनी होगी कि वे अपने जीवन के अनुभवों को किस तरह देखते-समझते हैं। 

बहुजनों ने धर्म के संदर्भ में विविध रणनीतियां अपनायीं– यथा धर्म त्यागना/ धर्म परिवर्तन (आंबेडकर), उग्र  नास्तिकता (पेरियार), आतंरिक सुधार / धर्म की मुक्तिदायनी व्याख्या (नारायण गुरु, अब्दुल कय्यूम अंसारी, अरविंद पी. निर्मल), नए धर्म (फुले का सत्यशोधक समाज, रामस्वरूप वर्मा का अर्जक संघ) आदि।  क्या हम इनमें से एक चुन सकते हैं? नहीं। कदापि नहीं।

बहुवादीकरण के लिए ज़रूरी है संस्कृति का विविधीकरण। हमें संस्कृति में बहुजन महिलाओं, एलजीबीटीक्युआई+, पसमांदा मुसलमानों, आदिवासियों और खानाबदोश कबीलों की अपेक्षाकृत गौण नॅरेटिव्स को भी शामिल करना होगा।

सच्चे बहुवादीकरण में एक आवाज़ सबकी तरफ से नहीं बोलती बल्कि बहुत से आवाजें अपनी-अपनी विशिष्ट अविस्थितियों से बोलती हैं और उनमें से कोई ऊंची और कोई नीची नहीं होती, उनका कोई पदक्रम नहीं होता।

3. डेमोक्रेटाईज़ेशन  – आतंरिक न्याय और प्रतिनिधित्व की सीमाएं

बहुजन समुदाय के अंदर भी अलग-अलग प्रभाव और दर्जे वाले समूह हैं। महादलित, पसमांदा, अति-पिछड़ा आदि जैसी पहचानों का उदय और उनके लिए उप-कोटे की मांग आंतरिक लोकतांत्रिकरण की ओर इशारा करते हैं। मगर हम प्रतिनिधित्व को परिवर्तनकारी एजेंडा से अलग करने की मूर्खता नहीं कर सकते। जाति-विरोधी आंदोलन के संस्थापक नायक, प्रतिनिधित्व को साध्य के रूप में नहीं देखते थे। उनके लिए यह सामाजिक न्याय और सार्थक लोकतंत्र की स्थापना का साधन था।

आज हम बहुजन समुदायों को कोटे के लिए आपस में लड़ते देख रहे हैं। वे आरक्षण की पूरी व्यवस्था के औचित्य और उद्देश्य पर बात ही नहीं करते। यह बहुवादीकरण के बगैर बहुवाद है। लोकतांत्रिकरण के लिए ज़रूरी है बहुजनों में आतंरिक पदक्रम – जिसे बाबासाहेब ‘स्तरीकृत असमानता’ कहते थे – का सतत प्रतिरोध। इसके साथ ही यह भी आवश्यक है कि हम समानुपातिक प्रतिनिधित्व पर आधारित चुनाव प्रणाली लागू करने पर गंभीरता से मंथन करे, जो वर्तमान प्रणाली का स्थान ले जिसमें सबसे अधिक मत पाने वाला विजेता बनता है और अन्यों को कुछ नहीं मिलता।

4. डेवलपमेंट  – पूंजीवाद के प्रतिरोध की वापसी

आंबेडकर ने दो शत्रु चिह्नित किए थे – ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद। मगर हम बिना किसी संकोच के यह कह सकते हैं कि दलित-बहुजन आंदोलनों ने सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक मुद्दों पर तो संघर्ष किया मगर आर्थिक मुद्दों को नज़रअंदाज़ कर दिया। इसका एक कारण यह था कि जाति-विरोधी आंदोलनों पर महत्वकांक्षी मध्यम वर्ग ने कब्ज़ा कर लिए जो ‘अटेंशन इकोनोमी’ (वह अर्थव्यवस्था जिसमें विज्ञापन आदि के ज़रिए लोगों का ध्यान किसी उत्पाद या सेवा के प्रति आकर्षित करने को सबसे अहम माना जाता है) में अस्मितावादी राजनीति करके संतुष्ट था और जिसने व्यापक श्रमिक वर्ग को नज़रअंदाज़ किया।

हमें नवउदारवादी पूंजीवाद के प्रतिरोध को बहुजनों के एजेंडा का हिस्सा बनाना ही होगा। पूंजीवाद का खेल आधुनिकतावादी प्रबोधन की संकल्पना का हिस्सा है। इसमें शामिल है विकास के लक्ष्यों को हासिल करने में साधन को नजरअंदाज़ करते हुए केवल साध्य पर ध्यान केंद्रित करना, उपभोक्तावाद, पर्यावरण का विनाश, स्वचालन और सेना व तकनीकी संस्थाओं का गठजोड़। न तो निजी पूंजीवाद (नव उदारवादी) और ना ही राज्य-पोषित पजीवाद (सोवियत यूनियन व चीन के मॉडल), कार्यस्थल पर लोकतंत्र, अर्थात श्रमिकों की निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी, को प्रोत्साहित करते हैं।

आंबेडकर से प्रेरणा ग्रहण करते हुए, बहुजनों – चाहे वे शिल्पकार हो, किसान हों या श्रमिक वर्ग हों – को राजनीतिक लोकतंत्र के साथ-साथ आर्थिक लोकतंत्र की बात भी करनी चाहिए। उत्तर-पूंजीवादी भविष्य में शामिल होना चाहिए आदिवासियों के ब्रह्मांड विज्ञान से सीखना, सभी के लिए एक मूलभूत आय सुनिश्चित करना और श्रमिकों के नेतृत्व में चलने वाले उद्यमों का विकास। हमें शोषक व्यवस्था में अधिकारों के लिए प्रतियोगिता नहीं करनी है। हमें एक नई दुनिया बनानी है।

यह बहुवादीकरण का सर्वोच्च स्वरूप है। इसमें सिर्फ यह शामिल नहीं है कि हमारा प्रतिनिधित्व कौन करता है, मगर इसमें यह भी शामिल है कि हम उत्पादन कैसे करते हैं, प्रतिनिधित्व कैसे करते हैं, अधिकार क्या हैं और हम निर्णय कैसे लेते हैं।

अब, हम ज्ञान पर बात करें। आंबेडकर ने ‘ज्ञानीजनों’ और ‘बुद्धिजीवियों’ के बीच भेद का विश्लेषण किया है। उनका निष्कर्ष यह है कि ब्राह्मणवादी परंपरा से कई ज्ञानीजन उभरे। मगर उससे कभी कोई वाल्तेयर नहीं निकला।

क्यों? क्योंकि एक सच्चे बुद्धिजीवी को अपनी जाति के हितों से आगे बढ़कर सोचना चाहिए। आंबेडकर का तर्क यह था कि कोई ब्राह्मण, ब्राह्मणवादी जाति व्यवस्था की आलोचना नहीं कर सकता क्योंकि उसका अर्थ होगा अपने विशेषाधिकार खोना। मगर यहां मैं एक असहज करने वाला प्रश्न पूछना चाहूंगा। क्या कोई दलित, पसमांदा या बहुजन अपनी जाति के हितों से आगे जाकर सोच सकता है?

हम यह मान कर चलते हैं कि हशियाकरण से अपने-आप प्रामाणिक और वास्तविक ज्ञान जन्म लेता है। दरअसल, ऐसा नहीं है। अगर कोई दलित नेता केवल अपनी जाति के लिए लड़ता है, अगर कोई बहुजन सामाजिक कार्यकर्ता केवल अपने समुदाय के लाभ के लिए आवाज़ उठाता है, अगर कोई मुसलमान बुद्धिजीवी केवल अपने मौलवियों और मौलानाओं का बचाव करता है – तो वे केवल एक विशिष्ट पहचान के ज्ञानीजन हैं। वे बुद्धिजीवी नहीं हैं। वे वाल्तेयर नहीं हैं।

ज्ञान के उत्पादन से जुड़ी एकमात्र समस्या यह नहीं है कि ब्राह्मणों में से कोई वाल्तेयर नहीं उभरा। समस्या यह भी है कि सभी जाति समूह, जिनमें दमित भी शामिल हैं, अपनी जाति या समुदाय के हितों के आगे सोच नहीं पाते। यही बहुवादीकरण के समक्ष उपस्थित सबसे बड़ी चुनौती है।

हमें एक बहुजन बुद्धिजीवी वर्ग की ज़रूरत है। मगर उसे एक नया श्रेष्ठी वर्ग नहीं बनना चाहिए। हमें ऐसे बहुजन बुद्धिजीवी वर्ग की दरकार है जो–

  • अपने लोगों के खिलाफ हिम्मत से बात कर सके। जो बहुजन जातियों में जातिवाद के निंदा करे, जो बहुजन घरों में पितृसत्तात्मकता पर प्रश्न उठाए और जो जाति-विरोधी सामुदायिक संगठनों के अंदर वर्गीय शोषण का विरोध करे।
  • जो किसी वर्ग को नज़रअंदाज़ किए बिना गठबंधन बनाए। जो क्युअर (वे लोग जो पारंपरिक लैंगिक या यौन मानदंडों में फिट नहीं बैठते), पर्यावरण से संबंधित और आदिवासियों के संघर्षों का अलग-अलग खांचों में बांट कर उनका बहुवादी गठबंधन न बनाए, बल्कि उसे एक ऐसी ताकत का आकार दे जो न्याय की स्थापना करे।
  • जो ज्ञानियों की अपने ज्ञान को अपने तक सीमित रखने की प्रवृत्ति को त्यागे। हर बुद्धिजीवी का यह उद्देश्य होना चाहिए कि वह कुछ समय बाद अप्रासंगिक और पुराना हो जाए।

यही [अमेरिका] वह देश है जहां आंबेडकर जॉन डेवी के लोकतंत्र के संबंध में विचारों से प्रेरित हुए थे। मगर आंबेडकर ने मुंबई की मलिन बस्तियों और संविधानसभा की बहसों में बहुवादीकरण का आविष्कार किया। वे जानते थे कि बिना अलग बनने की सतत और कष्टपूर्ण प्रयास के, लोकतंत्र बहुसंख्यकों की तानाशाही में बदल जाएगा।

आज हमारे सामने जो वैश्विक संकट उपस्थित है – श्रेष्ठी वर्ग का बोलबाला, औपनिवेशिक काल की जीत की भाषा का इस्तेमाल और नियम-कानूनों को धता बताने की प्रवृत्ति – यह सब, दरअसल, बहुवादीकरण का संकट है। श्रेष्ठी वर्ग वास्तविक बदलाव की कठिन प्रक्रिया से गुज़रे बगैर बहुवाद चाहता है।

जाति-विरोधी आंदोलनों को दुनिया बदलने की परियोजना के रूप में चार ‘डी’ – डीकोलोनाईज़ेशन (औपनिवेशिक मानसकिता से मुक्ति), डायवर्सिफिकेशन (विविधीकरण), डेमोक्रेटाईज़ेशन (लोकतांत्रिकरण) एवं डेवलपमेंट (विकास) – के आधार पर फिर से शुरू किया जाना चाहिए। और ये सिर्फ नारे नहीं रहना चाहिए बल्कि इनका आचरण किया जाना चाहिए।

हमें यह तय करना चाहिए कि हम केवल ऐसे ज्ञानीजन नहीं बनेंगे जो बाबासाहेब के नाम की माला जपते रहते हैं। हम ज्ञान का इस्तेमाल समाज को एक नया आकार देने के लिए करेंगे। हम बहुवादीकरण का वरण करेंगे। हम अपने पिंजरों से बाहर निकलेंगे। हम हजारों दलित-बहुजन-पसमांदा वाल्तेयरों का सृजन करेंगे।

जय भीम!

(मूल अंग्रेजी से अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल/अनिल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, संस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

लेखक के बारे में

खालिद अनीस अंसारी

लेखक अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के एसोसिएट प्रोफेसर हैं

संबंधित आलेख

लोकायत केवल धर्म और ईश्वर का नकार नहीं, संपूर्ण जीवन-दर्शन था
गणतांत्रिक प्रणाली के अस्तित्व में आने से पहले, लोकायत देशज व्यवस्था का हिस्सा था। उसमें छोटे-छोटे आत्मनिर्भर और स्वायत्त गांव या गांवों के समूह...
पसमांदा विमर्श पर संवाद करती किताब
भारत में दलित आंदोलन ने लंबे समय तक मुख्य रूप से हिंदू दलितों के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया है, लेकिन मुस्लिम और ईसाई...
सरहुल पर्व : आदिवासी संस्कृति, प्रकृति पूजा और कृषि परंपरा का उत्सव
आज जब पूरी दुनिया ‘पेरिस समझौते’ और ‘कार्बन फुटप्रिंट’ जैसे तकनीकी शब्दों में उलझी है, सरहुल का दर्शन एक सरल लेकिन अचूक समाधान पेश...
ब्राह्मण नहीं, श्रमण थे आयुर्वेद के प्रतिपादक (पहला भाग)
श्रमणों की तरह, चिकित्सक भी ज्ञान के साधक थे। वे घूमते-फिरते, रोग का कारण तथा उसके लिए नई औषधि, उपचार और चिकित्सा ज्ञान प्राप्त...
मिस्र बनाम सिंधु : भाषा और ज्ञान का उद्गम, प्रवाह व अवरोध
भारत के संबंध में भाषा की खोज का सिलसिला भीमबेटका की पहाड़ियों तक ले जाता है। मध्य प्रदेश के विंध्यक्षेत्र की पहाड़ियों में स्थित...