उच्च विचार और निम्न आचरण

हमारी सोच इतनी ‘उच्च’ होनी चाहिए कि हम यह समझ सकें कि हमारे देश और हमारी दुनिया को बेहतर बनाने के लिए क्या किया जाना आवश्यक है और हमारा जीवन इतना ‘सादा’ होना चाहिए कि हम इस लक्ष्य की प्राप्ति की राह पर चल सकें

प्रिय दादू,

जहां विश्व समुदाय टिकाऊ विकास के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है वहीं भारत में भी हम प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए अपनी ओर से यथासंभव प्रयास कर रहे हैं। मुझे याद है कि आपने कई बार अपनी पीढ़ी के जीवनदर्शन को ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ के नारे में समाहित बताया था। क्या केवल इससे हमारा काम चल जाएगा?

सप्रेम,
आकांक्षा

प्रिय आकांक्षा,

मेरी पीढ़ी के अधिकांश, या कम से कम काफी लोग, इस नारे पर यकीन रखते थे और उसके अनुरूप आचरण भी करते थे। परंतु कई भारतीय-जिनमें मेरे पहले और मेरे बाद युवा हुई पीढिय़ों के सदस्य शामिल हैं-एक बिल्कुल ही दूसरे नारे का पालन करते दिखते हैं और वह है, ‘निम्न विचार और उच्च जीवन’ या दूसरे शब्दों में ‘बड़े-बड़े नारे और उनके विपरीत आचरण!’

चूंकि हम भारतीयों की संस्कृति पर पौराणिकता का गहरा प्रभाव है इसलिए हमें गुजरे समय और उसके इतिहास को समझने का प्रयास नहीं करते। आओ, हम इस मसले के इतिहास में झांकने का प्रयास करें और हमारी कोशिश यही होनी चाहिए कि हम यथासंभव वस्तुनिष्ठ रहें।

bribe-1-300x267ब्रिटिश राज ने 1927 में ही भारतीय वन अधिनियम लागू कर दिया था। स्वतंत्रता के पूर्व इस अधिनियम का कितना प्रभावी अनुपालन हुआ, यह कहना मुश्किल है। इस संबंध में कोई अध्ययन या आकलन मेरी नजरों से नहीं गुजरा है। परंतु स्वाधीनता के बाद हम अपने जंगलों की रक्षा करने में कितने सफल रहे हैं, यह हम सबके सामने है।

हमने 1972 में वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम लागू किया और कम से कम अब तक, इसके क्रियान्यवन के मामले में हमारा रिकार्ड बहुत खराब रहा है।

क्या तुम्हें मालूम है कि हमारे देश की प्रधानमंत्री, स्टाकहोम में जून 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा आयोजित पहले पर्यावरण वैश्विक सम्मेलन में भाषण देने वाले दो विश्व नेताओं में से एक थीं। परंतु कम से कम मुझे यह जानकारी नहीं है कि इन प्रधानमंत्री महोदया ने पर्यावरण की रक्षा हेतु ‘सादा जीवन’ और ‘उच्च विचार’ को प्रोत्साहित करने के लिए कुछ किया हो। उनके शासनकाल में भी पर्यावरणीय संसाधनों की लूट उसी गति से जारी रही, जिस गति से उनके पूर्व के प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल में चल रही थी।

मैं यहां यह बताना चाहूंगा कि मैं किसी राजनीतिक दल के खिलाफ या उसके समर्थन में कोई बात नहीं कह रहा हूं और ना ही मेरी टिप्पणियों को तुम्हें किसी राजनीतिक नेता विशेष के प्रति मेरे समर्थन या विरोध के रूप में लेना चाहिए। इस मामले में सभी एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं।

तथ्य यह है कि हमारे देश में बहुत कम ऐसे लोग हैं जो अपनी इच्छा से सादा जीवन जीना चाहते हैं। अधिकांश लोग ‘उच्च विचार’ के नाम पर स्वयं को ठगते हैं और दूसरों को यह दर्शाने का प्रयास करते हैं कि वे कोई बहुत बड़ा सकारात्मक कार्य कर रहे हैं।

राष्ट्रीय पाखंड

मंत्रों और काल्पनिक दृष्टांतों का हमारी संस्कृति पर इतना गहरा प्रभाव है कि हममें से कई सचमुच यह मानने लगे हैं कि अच्छे विचार और अच्छे शब्द, अच्छे कार्यों से अधिक महत्वपूर्ण व प्रभावी होते हैं। और यह भी कि अगर हम सही शब्द बोलें तो हम बिना सही काम किए भी अच्छे नागरिक बन सकते हैं।

दूसरे शब्दों में, पाखंड हमारी राष्ट्रीय संस्कृति बन गया है और इस संस्कृति में बदलाव के लिए हम न तो कोई बात और ना ही कोई कार्य करना चाहते हैं क्योंकि हम सब पाखंड में गहरे तक डूबे हुए हैं।

tri-1-300x199अगर तुम हमारे इन राष्ट्रीय पाखंडों से थोड़ा भी दूर खिसकने की कोशिश करोगी तो तुम्हें या तो तुरंत महात्मा बना दिया जाएगा या तुम्हारे मुंह पर कालिख पोत दी जाएगी।

समस्या यह है कि अद्वैत के ‘उच्च विचार’ के कारण ही जातिवाद की शैतानी प्रथा हमारे देश में अब भी जीवित है। उसी तरह, अन्य श्रेणियों के ‘उच्च विचारों’ (उदाहरणार्थ पर्यावरण के संबंध में) को हम मैदानी कार्य का विकल्प मान बैठते हैं। हमें ऐसा लगता है कि केवल बड़ी-बड़ी बातें करके हम उन निहित स्वार्थों का मुकाबला कर पाएंगे जो हमारे पर्यावरण को हानि पहुंचा रहे हैं।

वास्तविकता यह है कि कोई भी ‘उच्च विचार’ (उदाहरणार्थ कोई कानून) एक ऐसी बाधा मात्र होता है, जिसे मेज के नीचे से पर्याप्त धनराशि चुकाकर आसानी से पार किया जा सकता है। ठीक उसी तरह, जिस तरह हम अपने भगवानों की पूजा कर उन्हें रिश्वत देते हैं ताकि वे हमारे पक्ष में रहें।

इसलिए हमें केवल ‘सादा जीवन उच्च विचार’ की जरूरत नहीं है। हमें एक ऐसी व्यवस्था की जरूरत है जो हमारे कानूनों को दंतविहीन बनाने वाली झूठी ‘पूजा’ (या रिश्वत) की पहचान कर उसे उखाड़ फेंके। हमें एक ऐसी संस्कृति की आवश्यकता है जिसमें इस तरह की ‘पूजा’ अस्वीकार्य मानी जाए। दूसरे शब्दों में, हमें महत्वपूर्ण पदों पर ऐसे लोग चाहिए जो स्वयं तो कार्यकुशल और मूल्यों में आस्था रखने वाले हों हीं, साथ ही उनकी रूचि ऐसे लोगों की नियुक्तियां करने में हो, जो उनकी तरह कार्यकुशल और उच्च नैतिक मूल्यों वाले हों।

इसकी बजाए, कम से कम आपातकाल के बाद से, इस देश में चाहे जिस पार्टी की सरकार रही हो, सभी की रूचि ऐसे लोगों की नियुक्ति करने में रही है जिनमें न्यूनतम योग्यता और उनकी नियुक्ति करवाने वाले व्यक्ति के प्रति उच्चतम ‘वफादारी’ हो। इसका एक ताजा उदाहरण पिछले माह सामने आया जब राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की दृष्टि से एक अत्यंत महत्वपूर्ण पद पर नियुक्ति के लिए, हमारे प्रधानमंत्री ने वैश्विक स्तर के अनुभवी और उच्च अर्हता प्राप्त व्यक्तियों में से सबसे योग्य की बजाए सबसे वफादार व्यक्ति को चुना।

मैं इसी बात को दूसरे शब्दों में कहूंगा: ‘सादा जीवन उच्च विचार’ एक ऐसा नारा है जो हमें शुचिता के वैश्विक स्तर पर स्वीकार्य सिद्धांतों के अनुरूप अपना जीवन जीने की प्रेरणा दे सकता है परंतु यह एक ऐसा नारा भी बन सकता है, जो हमें ऐसा जीवन जीना सिखाए, जिसमें हम गलत काम करने वालों से सांठगांठ कर लें या कम से कम उन्हें कभी चुनौती न दें।

हमारी सोच इतनी ‘उच्च’ होनी चाहिए कि हम यह समझ सकें कि हमारे देश और हमारी दुनिया को बेहतर बनाने के लिए क्या किया जाना आवश्यक है और हमारा जीवन इतना ‘सादा’ होना चाहिए कि हम इस लक्ष्य की प्राप्ति की राह पर चल सकें।

प्रिय आकांक्षा, क्या इस पैमाने पर तुम्हारी सोच पर्याप्त ऊँची है? और क्या इस पैमाने पर तुम्हारी जीवन शैली पर्याप्त सादा है?
मैं जब इस पैमाने को स्वयं पर लागू करता हूं तो मेरा मन कांपने लगता है

सप्रेम
दादू

(फारवर्ड प्रेस के फरवरी, 2016 अंक में प्रकाशित )


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +919968527911, ईमेल : info@forwardmagazine.in

About The Author

Reply