कुछ वर्ष पहले मुझसे मिलने आई एक शोधार्थी ने यह जानना चाहा था कि क्या झारखंड के आदिवासियों के संघर्ष का केंद्रीय मुद्दा जल, जंगल, जमीन को बचाने का ही संघर्ष है या उसमें बदलाव आया है? उस समय कुछ हिचकिचाहट के बावजूद यही बोला था कि आदिवासी संघर्ष का केंद्रीय मुद्दा आज भी वही है।
लेकिन यह सवाल आज यदि कोई मुझसे पूछेगा, तो मेरा जवाब वह नहीं होगा। आदिवासी संघर्ष का मूल मुद्दा भटक चुका है। कभी कुड़मी बनाम आदिवासी संघर्ष मुद्दा बन जाता है। कभी पेसा को लागू करवाने का मुद्दा और अभी तो ईसाई आदिवासियों की डीलिस्टिंग का मुद्दा सबसे बड़ा बन गया है। डीलिस्टिंग यानि जनजाति सूची से उन्हें हटाने की मांग, ताकि धर्मांतरित आदिवासियों को आरक्षण का लाभ नहीं मिले।
वैसे, यह आंदोलन पूरे झारखंड में नहीं फैला है। रांची और उसके आसपास के इलाके के उरांव आदिवासी इसमें ज्यादा शामिल हैं। इनमें वे उरांव शामिल हैं जो हिंदूकरण के प्रभाव में हैं और उनके कुछ नेता तो खुद को सनातनी हिंदू ही कहते हैं। एक नेता ने तो सार्वजनिक रूप से आदिवासियों के लिए सरना कोड का भी विरोध किया है। उनका कहना है कि आदिवासी हिंदू ही हैं।
इस आंदोलन को जाहिर तौर पर भाजपा द्वारा पोषित बताया जाता है। भाजपा में शामिल अधिकतर नेता चाहे वो बाबूलाल मरांडी हों या अर्जुन मुंडा – ‘सभी सरना-सनातन एक हैं’ – का नारा बुलंद करते रहे हैं। किसी से छुपा नहीं है कि आरएसएस झारखंड में ईसाइयों के खिलाफ दशकों से मुहिम चलाता रहा है। झारखंड में उसकी राजनीति का आधार ईसाई और मुसलमानों के खिलाफ घृणा फैलाना ही रहा है। और यह सतत चलने वाला काम है।
यह गर्व का विषय है कि आदिवासी राजनीति शुरू से सांप्रदायिकता का विरोध करती रही है। बिरसा सेवा दल हो या झामुमो, सभी ने हमेशा सांप्रदायिकता का विरोध किया है। सन् 1967 में बिरसा सेवा दल ने रांची में भड़के सांप्रदायिक दंगे के दौरान दस हजार पर्चे छाप कर बांटे थे। जमशेदपुर में भड़के दंगे के वक्त झामुमो ने मुसलमानों की रक्षा की थी और इस वजह से शैलेंद्र महतो पहली बार सांसद भी बने थे।

ईसाई समुदाय तो हमेशा से झामुमो के साथ रहा है। टुंडी से आगे बढ़ दुमका जब धनकटनी आंदोलन का केंद्र बना तो कई ईसाई आदिवासी नेता शिबू सोरेन के विश्वासपात्र साथी बने। जैसे साइमन मरांडी और स्टीफन मरांडी। झामुमो की ताकत रही है उसकी सांप्रदायिकता विरोधी राजनीति और भाजपा लगातार इस ताने-बाने को तोड़ने की कोशिश करता रहा है।
इस बार झामुमो, जो इंडिया गठबंधन का प्रमुख घटक है, प्रचंड बहुमत से सत्ता में आई है। और संघ पोषित कुछ सामाजिक संगठन लगातार इस कोशिश में है कि कैसे झामुमो के मजबूत जनाधार को तोड़ा जाए। डीलिस्टिंग इसका नया हथियार है।
कहा जा रहा है कि ईसाई आदिवासी एक अल्पसंख्यक समुदाय के रूप में सरकार से सुविधाएं प्राप्त कर ही रहा है, एसटी सूची में शामिल होकर नौकरियों में भी आरक्षण का लाभ उठा रहा है, जबकि आदिवासियों के प्राकृतिक धर्म को छोड़, ईसाई बनते ही वे आदिवासी नहीं रहे।
अल्पसंख्यक समुदाय के रूप में शैक्षणिक संस्थान आदि चलाने के लिए ईसाइयों को सरकार से थोड़ी बहुत सुविधाएं तो मिलती होगी और अपने संस्थानों में वे ईसाई बन गए दलित या आदिवासियों को नौकरी भी देते होंगे, लेकिन इस आधार पर सरकारी नौकरियों में उन्हें आरक्षण नहीं मिलता।
यह जरूर है कि ईसाई बन चुके आदिवासी शैक्षणिक क्षेत्र में अपेक्षाकृत बेहतर सुविधाओं का उपभोग करते हैं। जाहिर है एसटी के रूप में मिलने वाले आरक्षण का लाभ ईसाई आदिवासी ज्यादा उठा पाते हैं। लेकिन इसका उपाय तो यह है कि सरकार आदिवासियों के लिए बेहतर शैक्षणिक व्यवस्था बनाए। बुनियादी और माध्यमिक शिक्षा को मजबूत किया जाए। यह सवाल ज्यादा गंभीर है कि झारखंड में एसटी के लिए 26 फीसदी आरक्षण के बावजूद सरकारी नौकरियों में बमुश्किल 3 से 4 फीसदी आदिवासी क्यों हैं?
(संपादन : नवल/अनिल)
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