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यूजीसी रेगुलेशन : बिहार के चप्पे-चप्पे में दलित-बहुजनों का हल्ला बोल

सिवान जिले के प्रिंस पासवान कहते हैं कि मुट्ठी भर लोगों के विरोध से एक बड़ी आबादी को भेदभाव से सुरक्षा प्रदान करने वाले कानून पर रोक लगा दिया गया। सामाजिक न्याय के विमर्श के खिलाफ काम किया जा रहा है। आज रेगुलेशंस पर रोक लगाया गया, कल को आरक्षण खत्म किया जाएगा। पढ़ें, यह रपट

यूजीसी रेगुलेशंस, 2026 पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोक लगाए जाने के बाद बिहार सहित देश के अनेक विश्वविद्यालयों और शहरों में दलित, पिछड़े और आदिवासी छात्रों का व्यापक विरोध प्रदर्शन जारी है। बिहार की ही बात करें तो राजधानी पटना सहित अनेक जिलों यथा– बक्सर, सुपौल, अरवल, जहानाबाद, भागलपुर, गया आदि में बड़ी संख्या में युवा छात्र सड़क पर उतरे तथा यूजीसी रेगुलेशंस, 2026 को पुनः लागू करने की मांग की।

इस क्रम में 2 फरवरी, 2026 को पटना में ‘मंडल 2.0 छात्र संघर्ष समिति’ के बैनर तले दलित-पिछड़े समुदाय के छात्रों ने बड़ा प्रदर्शन किया। हजारों छात्र पटना कॉलेज से मार्च निकालते हुए जेपी गोलंबर की ओर बढ़े, जहां पुलिस ने बैरिकेडिंग कर मार्च को रोक दिया। इस दौरान पुलिस और छात्रों के बीच झड़प हुई, जिसमें कई छात्र घायल हुए और कई को पुलिस ने हिरासत में ले लिया, जिन्हें बाद में छोड़ दिया गया।

इसके पहले 30 जनवरी, 2026 को छात्र संगठन आइसा और युवा संगठन आरवाईए ने प्रदर्शन किया। इस कड़ी में बिहार के आरा और सिवान में बड़ी गोलबंदी देखने को मिली, जहां छात्रों ने इसे सामाजिक न्याय पर हमला बताते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया। वहीं 2 फरवरी को सामाजिक न्याय आंदोलन (बिहार) और बहुजन स्टूडेंट्स यूनियन (बिहार) के संयुक्त आह्वान पर भागलपुर के अंबेडकर चौक के पास प्रदर्शन किया गया। इसी दिन अरवल में भी सामाजिक न्याय आंदोलन के बैनर तले प्रतिरोध सभा आयोजित हुई।

बिहार के सीवान में यूजीसी रेगुलेशंस, 2026 लागू करने की मांग को लेकर सड़क पर उतरे दलित-बहुजन

इसके एक दिन बाद 3 फरवरी, 2026 को सारण जिले में अंबेडकर छात्रावास और विभिन्न कैंपसों में पढ़ने वाले दलित-पिछड़े छात्रों ने छपरा शहर के नगरपालिका चौक से दरोगा राय चौक तक सैकड़ों की संख्या में मार्च निकाला। इसी दिन मगध विश्वविद्यालय, बोध गया में सैकड़ों छात्रों ने मार्च निकाला और यूजीसी रेगुलेशंस, 2026 को लागू करने की मांग की।

इस आंदोलन की खासियत यह है कि यह केवल पटना तक सीमित नहीं है। 5 फरवरी, 2026 को सुपौल जिला मुख्यालय में छात्र युवा संघर्ष समिति के नेतृत्व में हजारों छात्रों ने डिग्री कॉलेज से गौरवगढ़ चौक, बस स्टैंड, लोहिया चौक और गांधी मैदान होते हुए समाहरणालय तक मार्च किया। इसी दिन बक्सर में किला मैदान से अंबेडकर चौक तक मार्च निकाला गया, जहां अंबेडकर चौक पर सभा भी आयोजित की गई।

इन तमाम आंदोलनों की एक उल्लेखनीय विशेषता यह है कि छात्र बिरसा मुंडा, जोतीराव फुले, फातिमा शेख, जगदेव प्रसाद, सावित्रीबाई फुले और डॉ. भीमराव आंबेडकर जैसे बहुजन नायकों की तस्वीरें लेकर सड़कों पर उतरे। नारों में ‘ब्राह्मणवाद-मनुवाद की छाती पर बिरसा-फुले-अंबेडकर’ जैसे नारे प्रमुखता से गूंज रहे हैं। यूजीसी रेगुलेशंस, 2026 को लागू करने की मांग के साथ-साथ इन आंदोलनों में कॉलेजियम सिस्टम को खत्म करने, निजी क्षेत्र में आरक्षण लागू करने और 65 प्रतिशत आरक्षण की मांग भी जोर-शोर से उठाई जा रही है। प्रदर्शनकारी छात्रों का कहना है कि यूजीसी रेगुलेशंस उच्च शिक्षा में समानता और प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हैं, और इन पर रोक सामाजिक न्याय की प्रक्रिया को पीछे धकेलने वाला फैसला है।

बिहार के छपरा में विरोध प्रदर्शन करते दलित-बहुजन युवा

देश के विभिन्न कैंपसों में जारी इन प्रदर्शनों से साफ है कि दलित-बहुजन छात्र समुदाय यूजीसी रेगुलेशंस, 2026 और सामाजिक न्याय के व्यापक सवाल पर निर्णायक लड़ाई के मूड में है, और आने वाले दिनों में यह आंदोलन और तेज होने की संभावना है। प्रदर्शन में शामिल पटना विश्वविद्यालय में सामाजिक कार्य विभाग के छात्र आशीष साह कहते हैं कि यह रेगुलेशंस बहुत जरूरी है। दलित पिछड़े समुदाय को यह कॉन्फिडेंस देगा कि वो निर्भीक होकर कैंपस में शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं। कैंपस में जातिवाद व्याप्त है। शिक्षक भी भेदभाव करते हैं। आंतरिक परीक्षाओं के अंक में या किसी इंटर्नशिप प्रोग्राम में भी सवर्ण शिक्षक भेदभाव करते हैं।

वहीं सिवान जिले के प्रिंस पासवान कहते हैं कि मुट्ठी भर लोगों के विरोध से एक बड़ी आबादी को भेदभाव से सुरक्षा प्रदान करने वाले कानून पर रोक लगा दिया गया। सामाजिक न्याय के विमर्श के खिलाफ काम किया जा रहा है। आज रेगुलेशंस पर रोक लगाया गया, कल को आरक्षण खत्म किया जाएगा।

पटना विश्वविद्यालय में स्नातक की पढ़ाई कर रही छात्रा अदिति कहती हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने कैंपस में जातिगत भेदभाव के खिलाफ सख्त रेगुलेशंस की बात कही थी और अब वही इसके ऊपर रोक लगा रहा है। कैंपस में भेदभाव है, यह यूजीसी भी मानता है तो फिर उस भेदभाव को खत्म करने के लिए कदम भी उठाए जाने चाहिए।

प्रदर्शन में शामिल अंग्रेजी स्नातकोत्तर की छात्रा सबा कहती हैं कि पटना विश्वविद्यालय के छात्र आज सड़कों पर हैं और हम यह कह रहे हैं कि हमारे साथ जाति, लिंग, धर्म और नस्ल के आधार पर भेदभाव हो रहा है। यहां एडमिन से लेकर कुलपति, विभागाध्यक्ष से लेकर प्रोफेसर सब सवर्ण मानसिकता को बढ़ावा देते हैं और इनका यह सवर्ण वर्चस्व का नेक्सस हाशिए के तबके से आने वाले छात्रों को उत्पीड़ित करता है और रोज़मर्रा की कैंपस लाइफ में जातिगत भेदभाव को नॉर्मलाइज़ करता है।

यूजीसी गाइडलाइंस पर रोक के बाद सुप्रीम कोर्ट भी सवालों के घेरे में है। कॉलेजियम सिस्टम खत्म करने एवं जजों की नियुक्तियों में आरक्षण नीति लागू करने की मांग भी जोर पकड़ने लगा है। समस्तीपुर की छात्रा मनीषा यादव कहती हैं कि आज सुप्रीम कोर्ट में भी सवर्ण वर्चस्व है, इसलिए इस तरह का फैसला सुप्रीम कोर्ट ने लिया है। देश में कई कानून आएं लेकिन सुप्रीम कोर्ट उसपर रोक नहीं लगाता है।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

कुमार दिव्यम

लेखक पटना विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग में स्नातकोत्तर छात्र व स्वतंत्र लेखक हैं

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