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यूजीसी रेगुलेशन : सच्चाई से मुंह मोड़ रहे हैं इसके विरोधी

ऊंची जाति के विद्यार्थियों के साथ भेदभाव की इक्का-दुक्का घटनाएं हो सकती हैं, मगर एससी, एसटी और ओबीसी समुदायों को संरचनात्मक बहिष्करण का सामना करना पड़ता है, जिसकी जड़ें संस्थागत संस्कृति में होती हैं। पढ़ें, प्रो. मनोज कुमार झा का यह आलेख

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा गत 13 जनवरी, 2026 से लागू किए गए ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने वाले विनियम’ (इक्विटी रेगुलेशंस) पर भारी विवाद खड़ा हो गया है। कहा जा रहा है कि ये रेगुलेशंस जाति-आधारित भेदभाव को सिर्फ एससी, एसटी और ओबीसी समुदायों के संदर्भ में परिभाषित करते हैं और सामान्य श्रेणी के विद्यार्थियों को कोई सुरक्षा प्रदान नहीं करते। इन नए नियमों के आलोचकों का कहना है कि ये उत्पीड़न का एक पिरामिड निर्धारित करते हैं और इनमें एससी, एसटी और ओबीसी से इतर समुदायों के जाति-आधारित उत्पीड़न का सामना कर रहे विद्यार्थियों की शिकायतों को सुनने या सुलझाने की कोई व्यवस्था नहीं है। वे इसलिए भी इन रेगुलेशंस पर प्रश्न उठा रहे हैं क्योंकि इनमें झूठी शिकायत करने वालों के लिए किसी तरह की सज़ा का प्रावधान नहीं है और समता समितियों में सामान्य वर्ग को कोई प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है।

ये रेगुलेशंस पायल तड़वी और रोहित वेमुला जैसे विद्यार्थियों की भेदभाव के चलते त्रासद आत्महत्या की पृष्ठभूमि में लाए गए हैं। ऐसी घटनाओं के बाद यह मांग उठी थी कि उच्च शैक्षणिक संस्थानों में भेदभाव रोकने का तंत्र हो और जो संस्थान ऐसा तंत्र स्थापित न करें उनके लिए सज़ा की व्यवस्था हो। मेरा मानना है कि इस मुद्दे पर जो विवाद खड़ा कर दिया गया है वह न्याय और भेदभाव की संस्थागत प्रकृति की गलत समझ पर आधारित है।

आलोचकों का दावा है कि इन रेगुलेशंस से एक अलग तरह का भेदभाव जन्मेगा क्योंकि ये जाति-आधारित भेदभाव से केवल एससी, एसटी और ओबीसी विद्यार्थियों को सुरक्षा देते हैं, सामान्य श्रेणी के विद्यार्थियों को नहीं। उनका कहना है कि ये रेगुलेशंस समानता के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन करते हैं, दोष की पूर्वधारणा करते हैं और इनमें झूठी शिकायतों से सुरक्षा के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। मगर यह आलोचना भारत में उत्पीड़न और सत्ता के समीकरणों की गलत समझ पर आधारित है। भारत में अतीत में जिस तरह का जातिगत विभाजन रहा है, उसके चलते हमें लक्षित वर्गों को ही सुरक्षा देनी होगी। हम सभी को एक-बराबर सुरक्षा नहीं दे सकते। सन् 2019 और 2021 के बीच देश की शीर्षस्थ शौक्षणिक संस्थाओं में एससी, एसटी और ओबीसी वर्गों के 98 विद्यार्थियों ने आत्महत्या की और भेदभाव की शिकायतों की संख्या में 118 फीसद का इज़ाफा हुआ। ये केवल अमूर्त आंकड़े नहीं हैं। ये हाशियाकृत समुदायों के विद्यार्थियों के खिलाफ हिंसा के जिंदा दस्तावेज हैं।

इसी तरह, ‘झूठी शिकायतों’ का मुद्दा भी प्रक्रियागत कमियों की ओर ध्यान दिलाने की कम और ज़िम्मेदारी से बचने की कवायद ज्यादा है। नए नियमों के समर्थकों का कहना है कि गलत शिकायतों पर सज़ा के प्रावधान से सही शिकायत करने वाले भी डरने लगते हैं, विशेषकर इसलिए क्योंकि पहले से ही उनके संस्थान उन पर भरोसा नहीं करते और उन्हें प्रतिशोधात्मक कार्यवाहियों का सामना भी करना पड़ता है। इतिहास गवाह है कि जातिगत भेदभाव के शिकायतों को हमेशा से खारिज या नज़रअंदाज़ किया जाता रहा है – इसलिए नहीं कि वे झूठी हुआ करती थीं, वरन् इसलिए कि सत्ता, अत्याचारियों का बचाव करना चाहती थी। हमारे पास पहले से बड़े पैमाने पर जातिगत भेदभाव और अत्याचार की प्रमाणित शिकायतें हैं और उनसे निपटना हमारी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। ऐसे में नियमों के संभावित ‘दुरुपयोग’ से बचाव के उपायों की बात करना न्याय की परिकल्पना को सिर के बल खड़ा करना होगा। समस्या यह नहीं है कि ज़रूरत से ज्यादा शिकायतें की जाती हैं। समस्या यह है कि जितनी घटनाएं होती हैं उनमें से बहुत कम सामने आ पाती हैं। झूठी शिकायतों का हौआ खड़ा करने का उद्देश्य है प्रणालीगत हिंसा से ध्यान हटाकर उसे शक्तिशाली वर्ग पर काल्पनिक ज़ुल्म पर केंद्रित करना। इसका एक अर्थ यह भी है कि हम दमित समुदायों की शिकायतों को मूलतः संदेहास्पद मानते हैं – और इन रेगुलेशंस का उद्देश्य इसी तरह के पूर्वाग्रहों से निपटना है।

5 फरवरी, 2026 को यूजीसी रेगुलेशन के समर्थन में बिहार के सुपौल जिले के समाहरणालय के सामने प्रदर्शन करते दलित-बहुजन युवा

‘जाति-निरपेक्ष’ नियमों की मांग इस तथ्य को नज़रंदाज़ करती है कि भेदभाव एकतरफ़ा होता है और इसका स्रोत होती है संरचनात्मक सत्ता। ऊंची जाति के विद्यार्थियों के साथ भेदभाव की इक्का-दुक्का घटनाएं हो सकती हैं, मगर एससी, एसटी और ओबीसी समुदायों को संरचनात्मक बहिष्करण का सामना करना पड़ता है, जिसकी जड़ें संस्थागत संस्कृति में होती हैं।

झूठी या गलत शिकायतों के लिए सज़ा का प्रावधान न होने से सही शिकायतों के सामने आने की संभावना बढ़ जाती है क्योंकि हाशियाकृत समूहों के विद्यार्थी प्रतिशोधात्मक कार्यवाही के डर से अपनी बहुत-सी शिकायतें सार्वजनिक ही नहीं करते। इस विवाद से जातिगत विशेषाधिकार का भाव भी झलकता है। वर्चस्वशाली समूहों को लगता है कि यदि उनकी मनमानी को चुनौती दी जा रही है तो यह उनका दमन है। सही अर्थों में समानता की स्थापना करने के लिए हमें सबसे पहले यह स्वीकार करना होगा कि असमान ढांचे वाले समाज में सभी के साथ एक बराबर व्यवहार करने से असमानता बनी रहेगी। निश्चित रूप से इन रेगुलेशंस में कमियां हो सकती हैं, मगर यह लंबे समय से चले आ रहे उस भेदभाव – जिसने कई विद्यार्थियों की जानें ली हैं – से निपटने की दिशा में एक आवश्यक और अनिवार्य कदम है। ये रेगुलेशन न तो प्रशासनिक दृष्टि से अजीब या नए हैं और न ही वे नियमन का अतिरेक हैं, बल्कि किसी भी तरह के भेदभाव से दृढ़तापूर्वक निपटने का तंत्र विकसित कर ये रेगुलेशन समानता की संवैधानिक गारंटी की पुनरभिपुष्टि करते हैं। यह एक छोटा मगर आवश्यक कदम है। ये रेगुलेशन इस स्वीकार पर आधारित हैं कि भेदभाव न तो व्यक्तिगत स्तर पर होता है और न ही यह कोई एक घटना होती है। भेदभाव तो संस्थागत संस्कृति और आचरण में अंतरनिहित है। प्रगतिशील सुधारों का विरोध न तो कोई नई बात है और न ही यह अजीब है। जब भी सत्ता के जमे-जमाए ढांचे को तोड़ने की कोशिश की जाती है तब हर बार यही होता है। और लगभग हमेशा इस तरह का विरोध स्थायित्व, निष्पक्षता और संस्थागत उपयुक्तता आदि की भाषा में बात करता है। यह मानकर चला जाता है कि जो स्थिति आज है, वही सबसे बढ़िया संतुलन कायम करने वाली है और अगर ढांचागत अन्याय को रोकने के लिए कोई भी हस्तक्षेप किया जाएगा तो वह सामान्य कार्यकलाप में व्यवधान डालेगा। भारत और अन्य देशों का संवैधानिक इतिहास इस दावे को झूठा सिद्ध करता है। कुछ न करने से स्थायित्व बना रहेगा, यह सोचना गलत है। हमेशा से स्थायित्व के लिए विरासत में हासिल सामाजिक व्यवस्थाओं को सोच-समझकर बदला जाता रहा है। यूजीसी की हालिया अधिसूचना को इस व्यापक संवैधानिक और ऐतिहासिक संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

भारतीय संविधान में समानता की जो परिकल्पना है वह कोई जड़ या विशुद्ध औपचारिक गारंटी नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 जिस समानता की बात करते हैं वह वास्तविक और ठोस समानता है। और हमारा संविधान यह मानता है कि जहां भी प्रणालीगत या ऐतिहासिक बहिष्करण हो रहा हो वहां राज्य को हस्तक्षेप करना चाहिए। भेदभाव तो प्रतिबंधित है ही। इसके साथ ही राज्य का यह कर्त्तव्य भी है कि वह ऐसे परिस्थितियों को भी समाप्त करे जिनमें भेदभाव पलता-बढ़ता है। यह बात संविधान के पाठ से तो साफ़ है ही, उसकी व्याख्याओं से भी स्पष्ट है। शुरुआत से हमारे देश का विधिशास्त्र, सकारात्मक कार्यवाही का पक्षधर रहा है और हाल में विधिक संस्थाओं ने यह माना है कि भारत में प्रत्यक्ष एवं परोक्ष संस्थागत भेदभाव हो रहा है।

संवैधानिक व्यवस्था में उच्च शैक्षणिक संस्थाओं का विशिष्ट स्थान है। वे शिक्षा के केंद्र तो हैं, लेकिन साथ ही ऐसे स्थान भी हैं, जहां सामाजिक ऊंच-नीच को या तो चुनौती दी जा सकती है या उसे जस-का-तस बनाए रखा जा सकता है। शिक्षा तक पहुंच, सीखने-सिखाने का वातावरण, अकादमिक मूल्यांकन के तौर-तरीकों, कैंपस की संस्कृति, सामाजिक मदद और शिकायत निवारण तंत्र ये सभी यह निर्धारित करते हैं कि विद्यार्थियों और शिक्षकों दोनों के लिए आगे बढ़ने के कितने दरवाजे खुले होंगे और कितने बंद। और यह बात उन समुदायों के बारे में और सही है जो हाशियाकृत हैं। लेकिन अगर कोई यह सोचता हैं कि विश्वविद्यालय अलग-थलग टापू हैं, जिन पर व्यापक समाज की परछाई तक नहीं पड़ती, तो वह सच्चाई से मुंह मोड़ता है।

यूजीसी की अधिसूचना का विरोध कर रहे लोग यही कर रहे हैं। वे सच्चाई से मुंह मोड़ रहे हैं। यूजीसी के कदम के विरोधी या तो यह मानने को तैयार ही नहीं हैं कि कैंपसों में भेदभाव होता है और या फिर वे शैक्षणिक संस्थानों की स्वायत्तता की दुहाई देते हैं। दोनों ही तर्कों में कोई दम नहीं है। उच्च शैक्षणिक संस्थाओं में जाति, लिंग और विकलांगता के आधार पर भेदभाव होता है, इसके पर्याप्त दस्तावेजी प्रमाण हैं। यह भेदभाव विद्यार्थियों की भर्ती, शिक्षकों की नियुक्ति और रोज़मर्रा के अनुभवों में साफ़ झलकता है। इसमें भी कोई शक नहीं कि कुछ लोगों को अपमान का सामना करना पड़ता है और कुछ को नज़रअंदाज़ किया जाता है। असली हालात ये हैं। इनसे इंकार करना स्वायत्तता का बचाव करना नहीं बल्कि असमानता का सामान्यीकरण करना है। स्वायत्तता की बात करना भी अतार्किक है क्योंकि संवैधानिक जवाबदेही से स्वायत्तता भला कैसे स्थापित हो सकती है। स्वायत्तता अपने आप में कोई लक्ष्य नहीं हो सकती। स्वायत्तता का उद्देश्य यह होता है कि संबंधित संस्थान अकादमिक श्रेष्ठता हासिल कर सके और अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को पूरा कर सके।

हमारे संविधान में स्वतंत्र प्राधिकारियों के ऐसे टापुओं के लिए कोई जगह नहीं है जो संविधान की जद से बाहर हों। सभी सार्वजनिक संस्थाओं की तरह, विश्वविद्यालयों को भी संवैधानिक मूल्यों के साथ तालमेल बिठाना ही होगा। अगर स्वायत्तता के नाम पर समानता और गरिमा सुनिश्चित करने की जवाबदेही से बचने की कोशिश की जाएगी तो वह एक लोकतांत्रिक सिद्धांत की बजाय विशेषाधिकार की रक्षा करने का कवच बन जाएगा। 

हमें यह भी याद रखना होगा कि अछूत प्रथा पर प्रतिबंध, श्रमिकों की सुरक्षा, कमज़ोर वर्गों के लिए सकारात्मक कार्यवाही और आरक्षण से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों को भी शुरू में समाज को बांटने और अस्थिर करने वाला बताया गया था, मगर इन्हें अब संविधान का मूलभूत हिस्सा माना जाता है। इतिहास साक्षी है कि किसी भी पुरातन विशेषाधिकार को समाप्त करने से लोकतंत्र मज़बूत ही होता है। सामाजिक मेल-मिलाप के लिए सबसे बड़ा खतरा सुधारात्मक उपाय नहीं हैं, वरन् अन्याय हो रहा है, इसका अस्वीकार है। 

यूजीसी ने जिन समता समितियों के गठन का प्रस्ताव किया है, वे न तो सजा देने के लिए हैं और न ही उनका स्वरूप आदेशात्मक है। उनका उद्देश्य केवल भेदभाव के प्रति संस्थानों का ध्यान खींचना, शिकायतों के निवारण के लिए मंच उपलब्ध करवाना और शैक्षणिक संस्थानों में समावेशिता को प्रोत्साहन देना है। इस अर्थ में यह कोई क्रांतिकारी कदम नहीं है। यह तो केवल उच्च शिक्षा का संविधान के परिवर्तनकामी लक्ष्यों से तालमेल बिठाने की दिशा में एक कदम है।

जो भी समाज आगे बढ़ना चाहता है उसके लिए यह ज़रूरी है कि वह विरासत में प्राप्त व्यवस्थाओं को प्राकृतिक और श्रेष्ठ मानकर उनका रूमानीकरण न करे। संवैधानिकता का अर्थ यह नहीं है कि जो है, उसमें हम प्रसन्न रहे। इसका अर्थ यह है कि हम न्याय की स्थापना की दिशा में बढें और यह काम अभी चल ही रहा है। अतः यूजीसी की अधिसूचना को अकादमिक क्षेत्र में हस्तक्षेप के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह तो हमें याद दिलाता है कि लोकतंत्र की तरह, शिक्षा के क्षेत्र में भी समानता और गरिमा की स्थापना के लिए परिवर्तन की दरकार है।

(यह आलेख पूर्व में अंग्रेजी दैनिक ‘पायनियर’ द्वारा गत 1 फरवरी, 2026 को प्रकाशित है। यहां हम लेखक की अनुमति से हिंदी में प्रकाशित कर रहे हैं।)

(हिंदी अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

मनोज कुमार झा

प्रो. मनोज कुमार झा राज्यसभा सांसद व दिल्ली विश्वविद्यालय में समाज कार्य विभाग में प्रोफेसर हैं। इनकी प्रकाशित पुस्तकों में 'इन प्रेज ऑफ़ कोअलीशन पॉलिटिक्स एंड अदर एसेज ऑन इंडियन डेमोक्रेसी', स्पीकिंग टाइगर्स, 2025, 'रॉयट्स ऐज रिचुअल्स', मानक पब्लिशर्स, नई दिल्ली, 2009, 'इन अपोजिशन टू साइलेंस', अल्टरनेटिव प्रेस, नई दिल्ली, 2009, 'अंडरस्टैंडिंग पॉलिटिकल डिस्कोर्स', यूएनएड्स पब्लिकेशन, वाशिंगटन डीसी, 2008, 'पीस इज पॉसिबल', ऑक्सफेम-ग्रेट ब्रिटेन, 2007 और 'प्रोस्पेक्ट्स फॉर पीस अमिडस्ट केयोटिक कंफ्लिक्ट', ऑक्सफेम-ग्रेट ब्रिटेन व जीडी पब्लिशर्स, 2006 शामिल हैं।

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