कांचा आइलैय्या शेपर्ड की यह पुस्तक शूद्र कहने से केवल ओबीसी वर्गों की ओर इशारा नहीं करती, बल्कि दलित, आदिवासी और पिछड़े सभी को शूद्र मानती है। इन तीनों वर्गों के पारस्परिक सम्मिलित क्रांति से...
यह पुस्तक लेखक के पूर्व आरएसएस सदस्य होने के कारण अंदरूनी और अधिक प्रामाणिक है। यह शैक्षणिक से ज्यादा आंदोलनकारी-शोधपरक साहित्य है, जो बहुजन साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान रखता है और हिंदुत्व की वैचारिक जड़ों...
कुल 11 अध्यायों वाले इस किताब में प्रो. शेपर्ड बताते हैं कि छिटपुट तौर पर ही सही, शूद्रों के विद्रोह ने मानववादी सभ्यता और समता, समानता व बंधुता जैसे मूल्यों पर आधारित देश व समाज...