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सावित्रीबाई फुले की कविताओं के इतिहासपरक संदर्भ

सावित्रीबाई फुले की कुशाग्रता का परिचय इतिहास की उनकी गहरी समझ से मिलती है। उन्होंने शूद्र शब्द का अर्थ ‘मूलवासी’ बताया है। वह कहती हैं कि शूद्र भारत के मूलवासी हैं, जिन्होंने प्रारंभ में ईरानी-ब्राह्मणों को पराजित किया था और अंग्रेजों को भी धूल चटाया था। बता रहे हैं प्रो. देवेंद्र शरण

‘सावित्रीनामा : सावित्रीबाई फुले का समग्र साहित्यकर्म’ शीर्षक पुस्तक का प्रकाशन फारवर्ड प्रेस, नई दिल्ली द्वारा किया गया है। इसमें सावित्रीबाई फुले की रचनाओं का मूल मराठी से हिंदी में अनुवाद उज्ज्वला म्हात्रे ने किया है। भूमिका प्रो. हरी नरके की है, जिनका हाल ही में परिनिर्वाण हो गया। इसकी एक प्रति मेरे हाथ में है। मैं इसे पढ़कर हर्ष, आश्चर्य और गर्व महसूस कर रहा हूं। इसके जरिए सावित्रीबाई की बहुमुखी प्रतिभा की जानकारी पाकर आनंदित हूं।

सावित्रीबाई फुले एक महान कवि, एक दार्शनिक, इतिहास मर्मज्ञ, प्राख्यात समाज सेविका, सहृदयी शिक्षिका और कबीर की भांति अंधविश्वास के विरुद्ध सतत लड़नेवाली महान योद्धा थीं।

एक कवि के रूप में उनके व्यक्तित्व के दूसरे पक्ष पर नजर पड़ती है। जैसे ‘तितली और फूल की कली’ शीर्षक में वह लिखती हैं–

“मखमली पंख और उसका पीला रंग।
ख्वाब हों जैसे छोटी-बड़ी चित्तियों के संग।।
वक्र पैरों से कैसे उड़ान यह भरता।
एक फूल से दूसरे फूल पर मजे से देखो यह उड़ता।”[1]

पूरी कविता में तितली और फूल के जरिए प्रकृति के शृंगार रस का वर्णन है। तितली का मनमोहक रूप, सुंदर मखमली पंख और कोमल काया देखकर कली का प्रेम जाग गया है और सुकोमल कली तितली को देख होश खो बैठी है, उसके चाहत की कोंपले फूटने लगी हैं और मधु अमृत से भरी कली पर तितली बैठकर उसका रसपान करती है। अमृत से भरी कली प्रेम की मदहोशी में तितली का आलिंगन कर लेती है। इसी तरह की अन्य कविताएं ‘जाई की कली’, ‘गुलाब का फूल’, ‘पीली चंपा’ आदि में प्रकृति का शृंगार और उसका सौंदर्य परिलक्षित होता है।

‘जाई की कली’ में वह लिखती हैं–

“गुलाबी आभा है इस पर छाई।
अति सुंदर यह अधखिली जाई।।

रात को यह रति बन जाती।
सुगंध अपना चहुं ओर फैलाती।।
अंततः मिट जाती है कली जाई की।
हो जैसे छवि हर नारी की।।”[2]

कवयित्री इन पंक्तियों में जाई की कली की तुलना एक स्त्री से करती हैं। जैसे जाई की कली अपनी खुशबू से रात को चारो ओर सुगंध फैलाती है, वैसे ही स्त्री अपने सौंदर्य और कोमलता से परिवार पर सब कुछ निछावर कर देती है।

सावित्रीबाई फुले का विवाह 9 वर्ष की उम्र में जोतीराव फुले से हुआ था। उनमें बचपन से ही असाधारण प्रतिभा और प्रखर बुद्धि रही होगी, जो जोतीराव के सानिध्य से निखर गई थी। तत्कालीन सरकारी दस्तावेज से जानकारी मिलती है कि विवाह के बाद जोतीराव ने सावित्रीबाई को घर पर पढ़ना-लिखना सिखाया और अध्यापिका बनने लिए प्रशिक्षित किया। सावित्रीबाई ने सुश्री फरार के अहमदनगर स्थित संरचना और सुश्री मिशेल के पुणे स्थित नार्मल स्कूल से शिक्षक प्रशिक्षण हासिल किया। वह भारत की प्रथम महिला शिक्षिका थीं।

समीक्षित पुस्तक ‘सावित्रीनामा : सावित्रीबाई फुले का समग्र साहित्यकर्म’ का आवरण पृष्ठ

उनकी कुशाग्रता का परिचय इतिहास की उनकी गहरी समझ से मिलती है। सावित्रीबाई ने शूद्र शब्द का अर्थ ‘मूलवासी’ बताया है। वह कहती हैं कि शूद्र भारत के मूलवासी हैं, जिन्होंने प्रारंभ में ईरानी-ब्राह्मणों को पराजित किया था और अंग्रेजों को भी धूल चटाया था। एक कविता में वह लिखती हैं–

“शूद्र एक शब्द है जिसका मूलवासी अर्थ।
शक्तिशाली आक्रांताओं ने किया अर्थ-अनर्थ।।
ईरानी-ब्राह्मणों को पराजित किया शूद्रों ने।
अंग्रेजों को भी धूल चटाया साहसी शूद्रों ने।।”[3]

आर्य जो सवर्ण कहलाए वे ईरान होते हुए भारत आए। लगभग 4000 वर्ष पहले ऋग्वेद के रचनाकारों ने मातृ, पितृ, अश्व और पेड़ों के नाम लगभग वही लिखा है जो ‘जिंद अवेश्ता’ पारसियों के प्रारंभिक पुस्तक में मिलता है। भाषाविदों के अनुसार अवेश्ता और ऋग्वेद में बहुत से नाम और शब्द एक जैसे मिलते हैं। इसलिए यह बहुत संभव है कि आर्य ईरान होते हुए भारत आए और घोड़े और अस्त्र लाए थे, ऐसा प्रतीत होता है। प्रारंभ में इनके देवता इंद्र, वरूण और अग्नि प्रमुख थे। अग्नि की पूजा और महत्ता तात्कालीन ईरानियों में बहुत अधिक थी।

अपनी कविता के माध्यम से सावित्रीबाई फुले भारत के इतिहास का सुंदर उल्लेख करती हैं–

“ढूंढ़ती हूं इतिहास मैं अपने इंडिया का।
अधर्मी ईरानी, आतातायी विदेशी अक्रांताओं का
तातार भी व्यवहार से बर्बर थे।
आक्रांता धर्म के अनुसार घुसकर रहते थे।”[4]

विदेशी आर्यों के बारे में खुलासा 19वीं सदी के अंत तक तब हुआ जब भारत-ईरानी भाषा परिवार के सिद्धांत की स्थापना हुई। ईरान और यूरोपीय अनेक शब्दों में संस्कृत शब्दों के बीच समानता है। घोड़े के लिए ग्रीक शब्द अक्श, फारसी (ईरानी) में इश्प और संस्कृत में अश्व है। इस प्रकार आर्य (ईरानी) बाहरी थे और आतातायी थे। सावित्रीबाई फुले कहती हैं–

“टीका लगाकर आर्य विजेता कहलाते।
खुद को उच्च व शूद्रों को नीच जाति बताते।।
गुलामी की रूढ़ियां लाद धर्म का प्रचार वे करते।
जिसके कारण स्त्रियां और शूद्र पशुवत जीवन जीते।।”[5]

आर्यों ने संसाधनों पर पूरी तरह कब्जा जमा लिया। अथर्ववेद के पुरुष सुक्त के अनुसार ब्राह्मण और क्षत्रिय उच्च वर्ग बन गए और शूद्रों को निम्न वर्ग बनाकर उन्हें सवर्णों की सेवा करने को कहा गया। इस तरह संसाधनों पर पूरी तरह कब्जा करके आर्यों ने शूद्रों को गुलाम बना लिया। उनका जीवन पशुवत कर दिया। सावित्रीबाई फुले आगे लिखती हैं–

“इन भक्षकों ने छीनी इनसे इनकी मनुष्यता।
चारों वेदों में वर्णित है उनकी पशुता।।
अहंकार में अंधे करने जुल्म भयंकर।
तब जन्मे बुद्ध, दी उन्हें कड़ी टक्कर।।”[6]

शूद्रों और अतिशूद्रों को इन विदेशियों (आर्य) ने बहुत सताया। उन्हें पशु से भी कम अधिकार दिए। उनके जुल्म की चर्चा वेदों में है। तब जाकर बुद्ध हुए, जिन्होंने आर्य ब्राह्मणों के कर्मकांड और शूद्रों के प्रति व्यवहार की कड़ी निंदा की। बुद्ध ने पशुबलि और विभिन्न प्रकार के यज्ञों का विरोध किया। उन्होंने वर्ण-व्यवस्था का तिरस्कार किया तथा अपने धर्म में शूद्रों और स्त्रियों का प्रवेश करवाया।

बुद्ध ने शांति और अहिंसा तथा मध्यम मार्ग की बात की। इसलिए मौर्य अशोक ने धम्म को अपनाया। शूद्रों को उचित स्थान दिया। लेकिन अहिंसा के अनुयायी बौद्धों और हिंसक ब्राह्मणों के बीच अनेकानेक युद्ध हुए। यह युद्ध अंतिम बौद्ध सम्राट वृहद्रथ की हत्या करने के बाद पुश्यमित्र शुंग ने करवाई और रक्त की नदियां बहाई। ब्राह्मणों ने बौद्धों को पराजित कर ‘मनुस्मृति’ के आधार पर चार वर्ण बनाए। फिर जातियां बनी और शूद्रों को अनेक जातियों और उपजातियों में बांट दिया।

“ठना घनघोर युद्ध बौद्ध-ब्राह्मण में।
जीत हुई ब्राह्मणों की, रक्त की नदियां बही कानन में।।
समाज में रहे वर्चस्व, कर विचार चार वर्ण बनाए।
रहे अनेका शूद्रों में, इसलिए जाति-उपजाति बनाए।।”[7]

चंद्रगुप्त से पहले नंद वंश का शासन भी शूद्रों का ही शासन था। नंद वंश के समय पाटलीपुत्र और मगध का तेजी से उत्कर्ष हुआ। मौर्यों के समय में खासकर सम्राट अशोक के काल में बौद्ध धर्म की पुनर्स्थापना हुई और सम्राट अशोक ने शूद्रों अतिशूद्रों और नारियों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति का स्तर ऊंचा उठाया। मध्यकाल में क्षत्रपति शिवाजी ने स्वराज की स्थापना की। शिवाजी महाराज के शासन में शूद्रों और अतिशूद्रों की स्थिति सुधरी। शूद्र और अतिशूद्र समाज के लोगों में जागृति आई। शिवाजी में शूद्रों और अतिशूद्रों को उचित मानवाधिकार देकर उनको सुखी किया। सावित्रीबाई फुले कहती हैं–

“इसीलिए शिवाजी ने स्थापित किया स्वराज।
तब जागा शूद्रोतिशूद्रों का सोया समाज।।
सुखी किया उनको देकर मानवोचित अधिकार।
पर आगे न उठा पाए लाभ शिवसता का, न कर सके प्रतिकार।।”[8]

आगे चलकर पेशवाओं का राज जुल्म और उत्पीड़न से भरा हुआ था। खासकर महिलाओं, शूद्रों और अतिशूद्रों के लिए। इन पेशवाओं ने शूद्रों पर अनेक अनैतिक और अमानवीय नियम लागू किए। थूकने को उन्हें गले से लटकाना पड़ता था मिट्टी की हांडी, और पदचिह्नों को मिटाने के लिए कमर में झाड़ू बांधना पड़ता था। सावित्रीबाई फुले इसे कविता के रूप में कहती हैं–

“आगे चलकर पेशवाओं का राज आया।
उनके जुल्म-उत्पीड़न से शूद्रातिशूद्रों में डर समाया।।
थूकने को लटकाना पड़ता था गले में मृदभांड।
पदचिह्न मिटाने को चलना पड़ता था कमर में झाड़ू बांध।।”[9]

पेशवाओं का पतन तब हुआ अंग्रेजी राज आया और भीमा-कोरेगांव में पेशवाओं के विरुद्ध 500 महार योद्धाओं ने विजय हासिल की।

सावित्रीबाई फुले ने बलिराजा के बारे में कविता की रचना की है। यह एक पौराणिक कथा है। इसके अनुसार, राजा बलि एक मूलवासी असुर राजा महादानी और महाशक्तिशाली थे। बलिराजा को छल से विष्णु ने बामन (बौना ब्राह्मण) का अवतार लेकर तीन डेग में उनकी सारी संपत्ति छीन ली। लेकिन राजा बलि जरा भी विचलित नहीं हुए। विष्णु ने उन्हें पाताल लोक भेज दिया। लेकिन साल में एक बार बलिराजा का अवतरण धरती पर होता है। इस दिन दक्षिण भारत के लोग ‘ओणम’ पर्व धूमधाम से मनाते हैं। सावित्रीबाई फुले लिखती हैं–

“भारत के साम्राज्य पर।
राज करता था बलि नामक एक असुर-राजा।।
दानी-क्षमाशील था महान बलि।
सुखी थी उसकी राज में उसकी सारी प्रजा।।”[10]

अंधविश्वास पर करारा चोट करती उनकी कविता बतलाती है कि पत्थर की मूर्ति के आगे लोग मन्नत मांगते हैं और बकरे चढ़ाते हैं। अगर पत्थर ही बच्चे पैदा कर सकते तो नर-नारी के विवाह और दांपत्य की क्या जरूरत–

“बकरे के चढ़ावे से मन्नत की निभाते रस्म।
जैसे बच्चे की चाह में पूरा करने को खाते हैं कसम।।”[11]

प्रथम शिक्षिका सावित्रीबाई फुले की लेखनी वास्तव में बहुजनों की आंखें खोलने वाली, शिक्षा और साहित्य के महत्व को रेखांकित करने वाली रही हैं। उनके अंदर शूद्रों और अतिशूद्रों को शिक्षित करने, उन्हें इतिहास से अवगत कराने और सभी मुसीबतों को पार करने वाले एक उद्भट योद्धा के गुण हैं, जिसने उन्हें समाजसेवा के लिए इतना अधिक प्रेरित किया कि उन्होंने प्लेग जैसी छूत की बीमारी में खुद की परवाह ना करके समाजसेवा में लगी रहीं, जो उनके मृत्यु का कारण बना।

समीक्षित पुस्तक – सावित्रीनामा : सावित्रीबाई फुले का समग्र साहित्यकर्म
लेखिका – सावित्रीबाई फुले
मराठी से अनुवाद – उज्ज्वला म्हात्रे
प्रकाशक – फारवर्ड प्रेस, नई दिल्ली
मूल्य – 220 रुपए (अजिल्द)

संदर्भ :

[1] सावित्रीबाई फुले, सावित्रीनामा : सावित्रीबाई फुले का समग्र साहित्यकर्म,फारवर्ड प्रेस, नई दिल्ली, 2023, पृष्ठ 52
[2] वही, पृष्ठ 50
[3] वही, पृष्ठ 64
[4] वही, पृष्ठ 112
[5] वही
[6] वही
[7] वही
[8] वही, पृष्ठ 114
[9] वही, पृष्ठ 115
[10] वही, पृष्ठ 65
[11] वही, पृष्ठ 63

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

देवेन्द्र शरण

लेखक रांची विश्वविद्यालय, रांची के सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं। उनकी प्रकाशित कृतियों में ‘शेड्यूल्ड कास्ट्स इन दी फ्रीडम स्ट्रगल ऑफ इंडिया’ (1999), ‘भारतीय इतिहास में नारी’ (2007), ‘नारी सशक्तिकरण का इतिहास’ (2012) और ‘मेरे गीत आवारा हैं’ (काव्य संग्रह, 2009) शामिल हैं।

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