फिर सामने आया मीडिया का ब्राह्मणवादी चेहरा

दरअसल मीडिया पर ब्राह्मणवाद इस कदर हावी है कि उससे निष्पक्षता की उम्मीद की ही नहीं जा सकती। इससे क्षत्रिय और वैश्य पत्रकार भी परेशान हैं

इलााहाबाद में आरक्षण समर्थकों ने दैनिक जागरण के दफ्तर में तोडफ़ोड़ की तो मीडिया आग-बबूला हो गई। यह अखबार देश में सबसे ज्यादा पाठक संख्या होने का दावा करता है। प्रशासन ने तत्काल हरकत में आते हुए आरक्षण समर्थक छात्र नेता दिनेश यादव समेत 21 छात्रों को गिरफ्तार कर लिया और उन पर संगीन धाराओं के अंतर्गत मुकदमा दर्ज कर लिया। लखनऊ में आरक्षण समर्थकों और मुख्यमंत्री के बीच वार्ता विफल होने के बाद जब छात्र इलाहाबाद लौटे तो इलाहाबाद में हमले के शिकार हुए इसी अखबार के लखनऊ संस्करण ने इस बात पर नाराजगी व्यक्त की कि आरक्षण समर्थक छात्रों को विधानसभा भवन के सामने बने धरनास्थल पर रात क्यों गुजारने दी गई? उन्हें वहां से भगाया क्यों नहीं गया?

ज्ञातव्य है कि इलाहाबाद से करीब 2000 छात्र लखनऊ में मुख्यमंत्री से अपना विरोध दर्ज कराने के लिए आए थे। मुख्यमंत्री उस दिन दक्षिण भारत के दौरे पर थे। इसलिए मजबूरन छात्रों को एक रात उसी धरनास्थल पर शरण लेनी पड़ी। अपने घर से करीब 250 किलोमीटर दूर ये छात्र अनजान शहर में कहां आसरा लेते? इनके पास इतने पैसे नहीं थे कि ये महंगे होटलों में रुकते और ना ही इनके पास रेवतीरमण सिंह थे जो अपने खर्चे से समाजवाद का गला घोंटने के लिए पैसे लुटाते।

इसके बाद 6 अगस्त को आरक्षण के समर्थन में भारतीय विद्यार्थी मोर्चा ने विशाल प्रदर्शन किया। उस सभा को पेशे से चिकित्सक एक मुस्लिम नेता संबोधित कर रहे थे। तभी दूरदर्शन के रिपोर्टर ने बाइट लेने के लिए उन्हें बीच में रोक दिया। इसी बीच सभा से एक शख्स ने चिल्लाकर कहा कि आप रुकिये मत, ये टीवी वाले कुछ नहीं दिखाते हैं, ये सिर्फ बेवकूफ बनाते हैं। रिपोर्टर का गला सूख गया और वह लौट गया। यह प्रसार भारती के गाल पर करारा तमाचा था। इसी के अगले दिन पुराने अखबारों में से एक दैनिक ‘आज’ अखबार ने इसी सभा से संबंधित खबर छापी और उसमें ‘आरक्षण’ शब्द का कहीं जिक्र तक नहीं किया और उसके स्थान पर ‘राहत’ शब्द का प्रयोग किया। पाठक इस खबर का आशय ही नहीं समझ पाए।

दरअसल मीडिया पर ब्राह्मणवाद इस कदर हावी है कि उससे निष्पक्षता की उम्मीद की ही नहीं जा सकती। इससे क्षत्रिय और वैश्य पत्रकार भी परेशान हैं। जिसका एक उदाहरण प्रदेश में अभी-अभी दाखिल ‘नवभारत टाइम्स’ है। इस अखबार के लखनऊ संस्करण में कुल 90 प्रतिशत ब्राह्मण पत्रकार हैं। मजे की बात ये है कि इन ब्राह्मणों में 95 प्रतिशत मिश्रा हैं। इस अखबार के स्थानीय संस्करण के संपादक सुधीर मिश्रा हैं।

(फारवर्ड प्रेस के सितंबर 2013 अंक में प्रकाशित)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें 

मिस कैथरीन मेयो की बहुचर्चित कृति : मदर इंडिया

बहुजन साहित्य की प्रस्तावना 

दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

महिषासुर एक जननायक’

महिषासुर : मिथक व परंपराए

जाति के प्रश्न पर कबी

चिंतन के जन सरोकार

About The Author

Reply