दलित कारवाँ की हठीली अनदेखी

गांव-गांव, कस्बों और छोटे नगरों में ढेर सारे ऐसे लेखक है जो समाज की संपूर्ण तस्वीर को बदलकर उसमें पूरे समाज की तस्वीर देखने के सपने रचते हैं। उनके पास अपनी भाषा है। अपना व्याकरण है। अपना नजरिया है। लेकिन उन्हें प्रकाशित करने वाला कोई व्यावसायिक प्रकाशन नहीं। मीडिया में उसे जगह देने की मानसिकता तैयार नहीं हुई है।

मुंबई में  आंबेडकर की पचासवीं पुण्यतिथि के दिन जमा लोगों के बारे में मीडिया की भूमिका पर पत्रकार पी. साईनाथ ने लिखा था कि पत्रकारों में यह जानने की जरा सी भी उत्सुकता नहीं थी कि आखिर वह कौन-सी बात है जो कि 85 वर्ष के बूढों को हाथ में मात्र दो रोटी लिए महू, मध्यप्रदेश से दादर मुंबई लाती है। ऐसे लोगों को जिनके लिए यात्रा का मतलब परेशानियां और भूख होता है। गाने बजाने वाले और कवि बिना किसी लालच के दिनभर अपनी रचनाएं सुनाते हैं। कठिनाई में जी रहे लेखक, जो अपनी पुस्तकों और पर्चों को अपने साथियों के लिए अपने पैसे से छापते हैं। इस पर भी वे यात्रा करते है “अपने हृदय के वशीभूत और एक उद्दात सपने के लिए जो अभी अधूरा है। जातिविहीन समाज का।”

यह अंश भारतीय समाज में लेखकों के एक बड़े हिस्से की दुर्गम यात्रा के पड़ाव के दृश्य प्रस्तुत करता है। लंबे इतिहास के बजाय महज पचास-साठ साल में मीडिया और प्रकाशन उद्योग के विकास और उसमें समाज के बड़े हिस्से की भागीदारी का मूल्यांकन करें तो क्या कारण है कि समाज के दबाए और कुचले गए हिस्से के लेखकों के लिए कोई जगह नहीं बन सकी है। यदि एक अध्ययन करें तो शायद अंग्रेजों के बाद के भारतीय समाज में उस हिस्से के पास सबसे ज्यादा लेखक व रचनाकार हैं और अभिवयक्ति के लिए सबसे ज्यादा सामग्री और सामर्थ्य के बावजूद वह प्रकाशन से वंचित हैं। मुंबई में जो तस्वीर पी. साईनाथ ने देखी, यह बहुत-बहुत देऱ से देखी गई। और वह भी पूरे दृश्य का एक छोटा-सा हिस्सा है। गांव-गांव, कस्बों और छोटे नगरों में ढेर सारे ऐसे लेखक हैं जो समाज की संपूर्ण तस्वीर को बदलकर उसमें पूरे समाज की तस्वीर देखने के सपने रचते हैं। उनके पास अपनी भाषा है। अपना व्याकरण है। अपना नजरिया है। लेकिन उन्हें प्रकाशित करने वाला कोई व्यावसायिक प्रकाशन नहीं। मीडिया में उसे जगह देने की मानसिकता तैयार नहीं हुई है।

आखिर व्यावसायिक प्रकाशन अपने लेखकों का चयन कैसे करता है? व्यावसायिक प्रकाशन के लिए कोई लेखक खुद को कैसे तैयार करता है? उसकी कसौटी का निर्धारण कैसे होता है? देश में किसी एक ऐसे जाति समूह के बारे में क्या कोई बता सकता है जिसके ज्यादातर लेखकों को अपने प्रकाशन और प्रसार खुद करने पड़ते हैं? दलितों के अलावा दूसरा कोई नहीं है। आखिर इसके क्या कारण हो सकते है? दलितों के बीच पैदा होने वाला लेखक उसी तरह से सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक स्थितियों को प्रस्तुत करना चाहता है जैसे दूसरे लेखकों को प्रकृति, प्रेम, बेवफाई, रिश्तों के टूटन जैसे विषयों को व्यक्त करने की स्वतंत्रता हासिल है। लेकिन एक की स्वतंत्रता को व्यावसायिक दृष्टि से उचित माना जाता है तो दूसरे की नहीं। वह बृहत्तर समाज के लिए उपयोगी नहीं मानी जाती। दरअसल, किसी भी उत्पीडित समाज में सबसे गहरा दमन उसके बीच के रचनाकरों का होता है। हमारे यहां देखा जाए तो दलितों में लेखकों का चुनाव करने का अधिकार दलित समाज के पास नहीं वरन व्यावसायिक प्रकाशकों के पास है। वह लेखक को नहीं उसकी सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को खारिज करता है। यह बात बताने की जरूरत नहीं कि किसी भी संघर्ष की गति और परिणाम का निर्धारण उसके सांस्कृतिक हथियारों की धार के अनुसार ही तय होते हैं।

लेखक कंवल भारती दलित हैं। वे बताते हैं कि उनका पहला संग्रह 1970 में “नयी चेतना नये राग” नाम से बहुजन समाज कल्याण प्रकाशन, लखनऊ से प्रकाशित हुआ जो हिन्दी क्षेत्र में दलित चेतना के साहित्य के प्रकाशन का एक मात्र केन्द्र था। इसी दौरान कंवल भारती ने भी अपना संस्थान बोधिसत्व प्रकाशन कायम कर लिया और अपनी दो पुस्तकें “ईश्वर, ब्रह्म और आत्मा” एवं “डॉ. आंबेडकर बौद्ध क्यों बने?” प्रकाशित की। दलित समाज में दोनों पुस्तकें बहुत प्रसिद्ध हुई। डॉ. आम्बेडकर वाली पुस्तक का 1985 में इंग्लैंड से पंजाबी में अनुवाद भी छपा। इसकी इतनी मांग हुई कि मैनपुरी के सुन्दर लाल सागर ने इसी नाम से स्वयं पुस्तक लिखकर छाप दी। कंवल भारती के ये अनुभव बताते हैं कि किसी प्रकाशन की योजना महज बाजार में खरीददारों की संख्या पर निर्भर नहीं होती है। वे उस विमर्श की कसौटी पर खरे उतरने चाहिए जो सांस्कृतिक सत्ता को चुनौती देता हो।

आखिर वे कौन से कारण है जो सुंदर लाल सागर को बड़े समाज के लेखक के तौर पर स्वीकृति से रोकते हैं? मैंने सुंदर लाल सागर को पहली बार तब जाना जब उनके स्वंय द्वारा प्रकाशित बत्तीस किताबों का एक बंडल डाक से मेरे घर आया। वे निरंतर अपने विषयों पर लिखते रहे हैं। यदि उनके द्वारा प्रकाशित किताबों के शीर्षकों पर नजर डाली जाए तो यह सवाल पूछा जा सकता है कि भारतीय समाज में किसी दलित लेखक के लिए इससे अलग विषय क्या हो सकते हैं? उनकी पुस्तकों में अछूत कौन और कैसे, अछूत हिन्दू नहीं हैं, धर्म-निरपेक्षता बनाम साम्प्रदायिकता, हिन्दुओं का भारतीयकरण हो, भारत की अनुसूचित जातियां एवं जनजातियां, जातिभेद का उन्मूलन, भारत की न्यायापालिका ब्राहम्णवादी है, रामराज्य कैसा था?, गांधी और आम्बेडकर विवाद, धर्म-परिवर्तन क्यों, मंडल कमीशन की रिपोर्ट, गीता भागवत की शल्य क्रिया, भागवत-बाल्मिकी ब्राह्मण थे शूद्र नहीं, भारत की पराधीनता का कारण, हिन्दू और उनका धर्म, मुसलमानों पर आरोप निराधार, हिन्दू मानसिकता, भारत माता क्या है, सामाजिक न्याय, हिन्दू विदेशी है, हरिजन कौन और कैसे, रामायण और मनुस्मृति की होली क्यों, डा. अम्बेडकर का संक्षिप्त जीवन परिचय, दलितों के बाबू जी, वेदों में क्या है, इस्लाम में ब्राहम्णवाद, आदिनिवासी और उनका संघर्ष, ब्राह्मणवाद क्या है, गर्व से कहो हम हिन्दू नहीं है और सामान नागरिक संहिता प्रमुख है। सागर जैसे दलित लेखकों को क्या लिखना चाहिए जिसे उन्हें भारतीय समाज के सपनों के अनुकूल समझा जाए? सागर की हर अभिव्यक्ति उत्पीडऩ के सांस्कृतिक औजारों को भोथर करने के तरीके बताती है।

इसी तरह शेखर की दो पुस्तकें मिली। पहली “मायावती के गांव में” और “महाड़ का स्वतंत्रता संग्राम।” आखिर महाड़ को महान स्वतंत्रता संग्राम के रूप में कोई गैर दलित लेखक क्यों नहीं देखता है? यदि दलित समाज में जन्में लेखक महाड़ पर नहीं लिखे तो उस इतिहास को कौन संभालकर रखने की जिम्मेदारी लेना चाहेगा?  मायावती के गांव में जो लेखक लिखता है वह दूसरा धर्मनिरपेक्ष लेखक सोचता भी नहीं। उसे समाज में इस तरह से संबोधन की जरूरत ही महसूस नहीं होती है। अभिजात्य संस्कृति कई स्तरों पर प्रगतिशील दिखती है और बड़ी-बड़ी बाते इसकी परवाह किए बिना कहना चाहती है कि वह लोगों के बीच संघर्ष का हथियार बनेगा या नहीं। लेकिन दलित या उत्पीडित समाज का लेखक अपने हर शब्द को अपनी स्थितियों को बदलने की ताकत के रूप में इस्तेमाल करने की सोचता है। शेखर अपनी एक कविता में लिखते हैं, मेरे गांव में रजियाबी, राबिया आपा, बिल्किस खाला, अथवा सायरा मुमानी ने, अपने जीते जी कभी पर्दा नहीं किया, जहां तक मुझे पता है, किसी अजनबी को उन्हें बुर्के में देखने का अवसर नहीं मिला, मैने कभी देखा नहीं मेरे गांव में टेलीविजन में, बेनजीर भुट्टो, मेधावती सुकर्णों, बेगम हसीना, शबाना, खालिदा जिया, मीना कुमारी, नर्गिस, मधुबाला, मुमताज या बेगम अख्तर को पर्दा किए हुए। दलित सबसे ज्यादा सामानधर्मी है। वह हिन्दुत्ववादी साम्प्रदायिकता के खिलाफ लडाई को अपनी पहली जरूरत मानता है। वह स्वभाविक तौर पर धर्म-निरपेक्ष है। सबसे ज्यादा जाति-विरोधी है। सबसे ज्यादा दमन और उत्पीडऩ को नापसंद करता है। लेकिन महान संविधान वाले सत्ता-समूह में वह लेखक के रूप में नहीं जाना जाता है। लेकिन समाज उसे मानता है और उसे इतिहास में स्थापित करता है। बिना किसी व्यावसायिक प्रकाशन के कबीर ने इतिहास रचा है। असंख्य दलित रचनाकारों की कतार बढ़ती ही जा रही है। उस कारवां को कोई रोक नहीं पाएगा।

(फारवर्ड प्रेस के सितंबर 2013 अंक में प्रकाशित)


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