संपत्ति में अधिकार के लिए आदिवासी महिलाओं का संघर्ष

महिला कल्याण परिषद की अध्यक्षा रतन मंजरी ने फारवर्ड प्रेस को बताया कि इस सिलसिले में वे पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल व वर्तमान मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह से भी मिली थीं परन्तु इस पारंपरिक कानून के उन्मूलन की दिशा में सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया

हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले में स्थित रेकौंग पियो के महिला संगठन ‘महिला कल्याण परिषद’ ने उन पारंपरिक कानूनों के उन्मूलन का बीड़ा उठाया है, जो महिलाओं को संपत्ति के उत्तराधिकार से वंचित करते हैं।

संशोधित हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 संपत्ति पर महिलाओं और पुरुषों को एक बराबर अधिकार देता है परन्तु किन्नौर, लाहौल व स्पीति आदिवासी जिलों में इस अधिकार की अनदेखी की जा रही है। संगठन द्वारा शुरू किए गए अभियान को प्रदेश के आदिवासी इलाकों में पर्याप्त समर्थन न मिलने के बाद, परिषद ने अदालत का दरवाजा खटखटाने का निर्णय लिया है। आदिवासी जिलों में पारंपरिक कानूनों का बोलबाला है, जिनके अंतर्गत लड़कियों और पत्नियों का क्रमश: अपने पिताओं व पतियों की संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं होता। केवल परिवार के पुरुष सदस्य ही संपत्ति के उत्तराधिकारी हो सकते हैं। अगर परिवार में कोई कानूनी वारिस नहीं है तो संपत्ति परिवार के किसी भी निकट पुरुष रिश्तेदार को हस्तांतरित हो जाती है। परन्तु महिलाओं को संपत्ति में कोई हक नहीं मिलता।

इस पारंपरिक कानून, जिसे रिवाज-ए-आम या वाजिब-उल-अर्ज कहा जाता है, का विवरण अंग्रेज सरकार के सन् 1926 के राजस्व रिकार्डों में भी मिलता है। यह कानून इसलिए बनाया गया ताकि आदिवासियों की जमीन (जो कि सेब और चिलगोजे की फसल उगाने के लिए अत्यंत उपयुक्त है), किसी आदिवासी महिला द्वारा गैर-आदिवासी से विवाह कर लेने की स्थिति में, बाहरी लोगों के हाथ में न पहुंच जाए।

पहले ऐसी परंपरा भी थी कि ससुर अपनी जमीन का एक हिस्सा बहू के नाम कर देते थे और उससे संबंधित कागजात बहू के पिता को सौंप दिए जाते थे ताकि परिवार में, विशेषकर पति-पत्नी या पत्नी और ससुरालवालों के बीच, कोई विवाद होने पर महिला का भविष्य सुरक्षित रहे।

परन्तु इस तरह के कानून विधवाओं और अविवाहित महिलाओं के लिए मुसीबत बन गए हैं क्योंकि उन्हें अपने परिवार के सदस्यों की दया पर निर्भर रहना पड़ता है। उनके माता-पिता या पति की मृत्यु के बाद, उनके भाईयों या ससुरालवालों द्वारा महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार करने की घटनाएं सामने में आती रही हैं। अधिकांश महिलाओं ने ऐसे मामलों में कानून का सहारा लेना उचित नहीं समझा क्योंकि इससे “परिवार की इज्जत पर बट्टा लग जाता”।

महिला कल्याण परिषद की अध्यक्षा रतन मंजरी ने फारवर्ड प्रेस को बताया कि इस सिलसिले में वे पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल व वर्तमान मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह से भी मिली थीं परन्तु इस पारंपरिक कानून के उन्मूलन की दिशा में सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया। मंजरी का कहना है कि परिषद ने महिलाओं व स्थानीय निवासियों को इस मुद्दे पर जागृत और शिक्षित करने के लिए कई सामाजिक अभियान चलाए परन्तु उन्हें सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली। लेकिन अब हम वकीलों से सलाह-मशविरा कर रहे हैं और जल्द ही हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय में याचिका दायर करेंगे। उन्होंने बताया कि हम अपनी मांगों के समर्थन में भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी को ज्ञापन भी देंगे। वे कहती हैं, “हमें पुरुषों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि उनका मानना है कि अगर आदिवासी महिलाओं को संपत्ति में उत्तराधिकार दे दिया गया तो आदिवासियों की बेशकीमती भूमि गैर आदिवासियों के हाथों में चली जाएगी, क्योंकि बड़ी संख्या में आदिवासी महिलाएं गैर आदिवासियों से विवाह कर रही हैं”।

मंजरी आदिवासी महिलाओं को संपत्ति में अधिकार दिलाने के लिए कटिबद्ध हैं। वे बताती हैं कि उन्होंने दोनों जिलों का गहन दौरा किया है और उनके आंदोलन को जिला परिषदों और कुछ स्थानीय रहवासियों का समर्थन मिल रहा है। “वे कहती हैं अगर महिलाओं को संपत्ति में हिस्सा मिलेगा तो वे मुसीबत के समय भी सिर उठाकर जी सकेंगी।”

मंजरी बताती हैं कि भारत सरकार ने कई कानूनों और अधिसूचनाओं के जरिए यह सुनिश्चित किया है कि महिलाओं को उनकी पैतृक व पति की संपत्ति में हिस्सा मिले परन्तु शायद आदिवासी इन कानूनों की हद से बाहर हैं। परिषद् ने इस मुद्दे को राज्यपाल उर्मिला सिंह के समक्ष भी उठाया है। उर्मिला सिंह, मध्यप्रदेश के एक आदिवासी परिवार से हैं। एनजीओ ने इस सिलसिले में एक हस्ताक्षर अभियान की भी शुरूआत की है जिसके अंतर्गत अब तक लगभग 10,000 हस्ताक्षर करवाए जा चुके हैं। परिषद ने अकेले किन्नौर जिले में 200 महिला मंडलों का गठन किया है।

(फारवर्ड प्रेस के सितंबर 2013 अंक में प्रकाशित)


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