दलित अस्मिता का ध्वजवाहक

दलित पिछड़ों की राजनीति करने वाले नेताओं को अकादमिक वर्चस्व की ओर भी ध्यान देना चाहिए. यही समाज में स्थाई प्रभाव बना पायेगा – प्रोफेसर रतनलाल

‘बहुत गुमान है खुद पर तो मेरे साथ चलो,
हवा के रूख चलना भी कोई कमाल है क्या’

परोक्त पंक्तियां किस गजलकार की हैं, यह तो याद नहीं लेकिन हिंदू कॉलेज के प्रोफेसर रतनलाल से मिलकर ऐसा लगता है कि जैसे यह पंक्तियां उन्हीं के संदर्भ में लिखी गयी हों।

एक दलित परिवार में जन्में और बिहार के एक छोटे से शहर के कस्बाई माहौल में पले-बढ़े रतनलाल के लिये देश के बडे विश्वविद्यालयों में से एक, दिल्ली विश्वविद्यालय, के सर्वाधिक प्रतिष्ठित कॉलेजों में से एक ‘हिंदू कॉलेज’ के इतिहास विभाग में प्राध्यापक के रूप में नियुक्ति, एक आसान और आत्मकेंद्रित जीवन की शुरुआत हो सकती थी। इतिहास का यह प्राध्यापक, अकादमिक करिअर की सीढियां चढ़ता हुआ, अपने और अपने बच्चों के लिए उच्च मध्यमवर्गीय जीवन की विलासिताएं उपलब्ध कराते हुए, आत्मतुष्ट रह सकता था। उसके बच्चों की जिन्दगी से पिता के बचपन का माहौल और उसकी स्मृतियाँ या तो रुखसत हो गईं होतीं या उनका कोई असर न बचता। लेकिन रतनलाल ने इस सीमित दायरे को अपना आदर्श नहीं बनाया। उनका आदर्श बने डॉ. आंबेडकर और कबीर। बाबा साहब के साहित्य के अतिरिक्त, डॉ. रतनलाल का आदर्श है कबीर की यह पंक्ति कि – ‘जो घर जारे आपना, चले हमारे साथ।’

जब यह लेखक इस जुझारू प्राध्यापक से मिलने पहुँचा, वे अपने घर पर ही विद्यार्थियों को पढ़ा रहे थे। घर के लॉन में डा आम्बेडकर की बनाए रखने का एक तरीका है। जब मैंने इसके विरुद्ध आवाज उठाई तो मुझे अनसुना कर दिया गया। प्रबंधन की दलील है कि सब कुछ नियमानुसार हो रहा है। इस बहुजन विरोधी रुख के जवाब में मैंने कॉलेज में तब तक कक्षाएं न लेने का निर्णय लिया है, जब तक कि मेरी बात मान न ली जाय। इसके जवाब में मुझे आज ही प्रबंधन का नोटिस मिला है, वे कहते हैं।

रतनलाल के पिता रामबली सिंह कभी नहीं चाहते थे कि उनका बेटा शहर छोड़कर दिल्ली जाए। 87-88 में जब बिहार में उच्च शिक्षा में वंचितों की दावेदारी बढ़ रही थी, और कॉलेज, विश्वविद्यालय राजनीतिक-अराजनीतिक हलचलों के केंद्र बन रहे थे, तब पिता ने अपने बेटे को मुजफ्फरपुर के लंगट सिंह कॉलेज से हटाकर पास के छोटे शहर मोतीहारी के एक कॉलेज में भेज दिया। बेटे को वे जिस राजनीति से दूर रखना चाहते थे, बेटा उसी मार्ग के लिए प्रशस्त मन से तैयार था। भागकर दिल्ली पहुंचा और दिल्ली विश्वविद्यालय में पढाई करते हुए हिन्दू कॉलेज में 2000 में नियुक्त हो गया।

2005 -2006 में उच्च शिक्षा में आरक्षण के समर्थन में उन्होंने ‘यूथ फॉर सोशल जस्टिस’ का गठन किया। तब ‘यूथ फॉर इक्वालिटी’ नाम से एक संगठन आरक्षण का विरोध कर रहा था। रतन प्रतीकों के माध्यम से भी दलित-बहुजन चेतना और स्वाभिमान के लिए काम करते रहे हैं। उनके लॉन में स्थापित डॉ आंबेडकर की प्रतिमा के इर्द-गिर्द मंहगी लाइटिंग और फाउंटेन लगे है। ‘मैंने अपने खर्चे से यह सब किया है। डा आम्बेडकर आधुनिक भारत के निर्माता थे लेकिन दुर्भाग्य से उन्हें सिर्फ एक वर्ग का नेता माना जाता है। इसके विपरीत, द्विज नेताओं को सार्वभौम दर्जा प्राप्त होता है। इस रूढ़ी को तोडऩे के लिए मैंने यह प्रतिमा बनवाई और बड़े जोर-शोर से इसका लोकार्पण करवाया। लोग दबी जुबान से तो इसका विरोध करते हैं लेकिन कॉलेज प्रबंधन ने कभी कोई लिखित नोटिस मुझे नहीं दिया।’

इतिहास का यह प्राध्यापक बहुजन इतिहासबोध से भरा है और लकीर बनाने में विश्वास रखता है। इसी क्रम में वे हर वर्ष ‘दशरथ मांझी’ सम्मान एक ऐसे व्यक्ति को देते हैं, जिसका काम समाज में सबसे निम्न दर्जे का माना जाता है। इस योजना के तहत उन्होंने लालू यादव, बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी आदि के हाथों अपने कॉलेज के चतुर्थ वर्गीय कर्मचारियों को सम्मानित करवाया है। रतन कहते हैं, ‘दलित पिछड़ों की राजनीति करने वाले नेताओं को अकादमिक वर्चस्व की ओर भी ध्यान देना चाहिए। यही समाज में स्थाई प्रभाव बना पायेगा।’

 

(फारवर्ड प्रेस के नवम्बर 2014 अंक में प्रकाशित)


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