सरकार की गुलाम है यूजीसी, उसका कोई अस्तित्व नहीं

देश में एक तरह से अघोषित तानाशाही का माहौल बना दिया गया है। बल्कि यह तानाशाही तो लागू है ही। देश उसकी इस मानसिकता की स्थिति का परिणाम अपने सामने देख रहा है। यूजीसी की अपनी कोई हैसियत नहीं है, वह तो घुटने टेककर उसकी गुलामी कर रहा है

“वह कितना दुर्भाग्यशाली राष्ट्र होगा जिसके पास युवाओं के रूप में बस आज्ञाकारी और महज अनुयायी दिमाग होंगे। उस देश के लिए यह शोक की बात होगी जो अपने उमर और कन्हैया का साथ नहीं देता, जो उनके द्वारा दी गयी चुनौती को नहीं सहता, जो सवाल पूछने के कारण उन्हें सज़ा दे देता है। हम उनका बलिदान न करें। ख़ुद को उनसे दूर न करें। अपने बच्चों की हत्या न करें।”

प्रोफेसर और लेखक अपूर्वानंद उत्तर भारत में अपने प्रखर लेखन के लिए जाने जाते हैं। वह हिंदी के नामी प्रोफेसर हैं। यूजीसी की कार्रवाई को लेकर वह कहते हैं,”जो लोग तय कर रहे हैं, कौन लोग कर रहे हैं भला? उनको पता है भी या नहीं है उन क्षेत्रों का? जो संबंधित विषय हैं – साहित्य का समाज विज्ञान का या राजनीति विज्ञान का? पत्रिकाओँ का? इसका मतलब है कि यह सब (पत्रिकाओँ को ब्लैकलिस्ट/बाहर करने का काम) बहुत मनमाने ढंग से हो रहा है और यह बहुत चिंताजनक है। यह काम यूजीसी कर रहा है- वहां नितांत, बहुत ही अयोग्य लोग भरे हुए हैं। अगर इसके पीछे कोई मंशा नहीं है तो… यानी अगर मैं ये ना कहूं कि इसके पीछे कोई विचारधारात्मक मंशा है, इरादा है- इन पत्रिकाओं को हटाने के पीछे अगर कोई विचारधारात्मक पूर्वाग्रह नहीं है तो एक ही व्याख्या की जा सकती है कि वहां (यूजीसी में) नितांत अयोग्य लोग ही हैं जो इस काम को कर रहे हैं।”

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