विश्वविद्यालयों के लिए बने विशेष कानून ताकि अब कोई और रोहित वेमुला नहीं करे खुदकुशी

एससी-एसटी व ओबीसी, कुल मिलाकर, भारत की आबादी का 75 प्रतिशत हैं। अगर वे भारत की शेष 25 प्रतिशत आबादी के समकक्ष शैक्षणिक अहर्ता हासिल करने के बाद भी, किन्हीं पदों पर नियुक्ति के लिए ‘अनुपयुक्त’ पाए जाते हैं, तो इस देश के लोगों की योग्यता और प्रतिभा के बारे में क्या कहा जाये!

(भारत सरकार के नौकरशाहों में जिन चंद लोगों ने अपने को वंचित समाज के हितों के लिए समर्पित कर दिया, उनमें पी.एस. कृष्णन भी शामिल हैं। वे एक तरह से आजादी के बाद के सामाजिक न्याय के जीते-जागते उदाहरण हैं। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने सामाजिक न्याय संबंधी अपने अनुभवों को डॉ. वासंती देवी के साथ साझा किया। वासंती देवी मनोनमनियम सुन्दरनर विश्वविद्यालय, तमिलनाडु की कुलपति रही हैं। संवाद की इस प्रक्रिया में एक विस्तृत किताब सामने आई, जो वस्तुतः आजादी के बाद के सामाजिक न्याय का इतिहास है। इस किताब का हिंदी अनुवाद किताब के रूप में शीघ्र प्रकाश्य है। हम किताब प्रकाशित करने से पहले इसके कुछ हिस्सों को सिलसिलेवार वेब पाठकों को उपलब्ध करा रहे हैं। आज की कड़ी में पढ़ें कि प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा में किस तरह के बदलाव किए जाने चाहिए और कानूनों में किस तरह के संशोधन हों ताकि वंचित तबकों से आने वाले छात्रों को शोषण का शिकार होने से बजाया जा सके)

(गतांक से आगे)


आजादी के बाद के सामाजिक न्याय का इतिहास : पी.एस. कृष्णन की जुबानी, भाग – 25

वासंती देवी : आपने और अन्यों ने भी जोर देकर यह कहा है कि एससी और एसटी के सशक्तिकरण और उन्हें गरिमापूर्ण जीवन प्रदान के लिए सबसे महत्वपूर्ण साधन है शिक्षा। परन्तु दलित बुद्धिजीवियों में इस विषय पर एक राय नहीं है कि किस तरह की शिक्षा प्रणाली दलितों के हित में होगी। शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत अधिकांश कार्यकर्ताओं की मांग है कि बच्चों के घरों के नज़दीक, सरकार द्वारा पूर्णतः वित्तपोषित ऐसे स्कूल होने चाहिए जहां सभी वर्गों और समुदायों के बच्चे एक साथ पढ़ें। इन स्कूलों में शिक्षा नि:शुल्क हो और शिक्षा का माध्यम मातृभाषा/क्षेत्रीय भाषा हो। उनके अनुसार, शुल्क वसूलने वाले अंग्रेजी माध्यम के निजी स्कूल, पारंपरिक रूप से दमित समुदायों के बच्चों के लिए उपयुक्त नहीं हैं। दूसरी ओर, कुछ दलित बुद्धिजीवियों का मानना है कि शुल्क लेने वाले अंग्रेजी माध्यम के स्कूल, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करेंगे और इस प्रकार दलित बच्चों को असमान स्पर्धा का सामना नहीं करना पड़ेगा। वे जोर देकर कहते हैं कि दलितों के सशक्तिकरण के लिए अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा ज़रूरी है। यह दावा भी किये जाता है कि भारतीय भाषाएं भेदभाव और जाति प्रथा पर आधारित समाज से उपजी हैं और इस कारण उनमें अब भी दलितों को नीची दृष्टि से देखने की प्रवृति दिखाई देती है। अंग्रेजी प्रजातान्त्रिक भाषा है और दलितों को उसे अपनाना चाहिए। इस सम्बन्ध में आपके क्या विचार हैं?

आपके विचार से शिक्षा के मामले में एससी, एसटी, निम्न ओबीसी व अल्पसंख्यकों और अगड़ी व अन्य जातियों के बीच की गहरी खाई – जो और गहरी होती जा रहे है – को पाटने के लिए क्या कदम उठाये जाने चाहिए?

पी.एस. कृष्णन : शिक्षा से जुड़े कुछ मूलभूत मुद्दें हैं, जो दलितों के साथ-साथ अन्यों के लिए भी प्रासंगिक हैं। परन्तु उन पर चर्चा के लिए एक बड़े कैनवास की ज़रुरत होगी। यहां मैं केवल देश की वर्तमान शिक्षा प्रणाली – और भविष्य में यदि इससे बेहतर कोई प्रणाली अस्तित्व में आयी तो – के सन्दर्भ में उन क़दमों की चर्चा करूंगा, जो दलितों को शिक्षा के क्षेत्र में समानता दिलवाने के लिए ज़रूरी हैं।

मेरे विचार में सभी जिलों और तत्पश्चात सभी प्रखंडों में, एससी के लिए उच्च गुणवत्ता की शिक्षा प्रदान करने वाले आवासीय स्कूलों की स्थापना सबसे महत्वपूर्ण है। इस तरह के स्कूल, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में पिछले तीन सालों से अस्तित्व में हैं और उनके अच्छे नतीजे सामने आये हैं। मैंने एक दलित धार्मिक-सामाजिक सुधारक स्वामी सहजानंद द्वारा चिंदम्बरम में दलितों के लिए स्थापित एक विशाल आवासीय स्कूल देखा है। तत्कालीन वित्त मंत्री – जो बाद में देश के राष्ट्रपति भी बने – श्री प्रणब मुख़र्जी की अध्यक्षता में सन 2005 में गठित दलितों मामलों पर मंत्री समूह ने इस प्रस्ताव पर भी विचार किया था। समिति के सदस्यों ने इस विषय पर मुझसे भी विचार विनिमय किया था। मेरी सलाह पर मंत्रियों के समूह ने सन 2008 में प्रस्तुत अपनी रपट में देश के प्रत्येक प्रखंड में दलित बच्चों के लिए आवासीय स्कूल स्थापित करने की सिफारिश की थी। परन्तु इस पर कोई कार्यवाही नहीं की गयी। लोकसभा के सन 2009 के चुनावों के लिए, कांग्रेस का घोषणापत्र तैयार करने के लिए प्रणब मुख़र्जी की अध्यक्षता में गठित समिति ने 5 नवम्बर 2008 को मुझे चर्चा के लिए आमंत्रित किया था। अन्य मसलों के साथ-साथ, मैंने मंत्री समूह द्वारा की गयी इस महत्वपूर्ण अनुशंसा पर कोई कार्यवाही न होने की ओर समिति का ध्यान आकर्षित किया और यह सलाह दी कि समूह के इस व अन्य अनुशंसाओं को लागू करने के लिए सरकार को तुरंत आदेश जारी करने चाहिए।  मैंने समिति को बताया कि मेरे द्वारा तैयार किया गया, तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी का दिनांक 12 मार्च 1980 का ऐतिहासिक पत्र जिन केंद्रीय मंत्रियों को संबोधित था, उनमें से केवल श्री प्रणब मुख़र्जी ही अब जीवित और राजनीति में सक्रिय हैं। श्री मुख़र्जी, घोषणापत्र समिति के अध्यक्ष भी रहे और वे ही मंत्री समूह के अध्यक्ष भी थे। अतः यह अपेक्षित था कि मंत्री समूह की आवासीय स्कूलों की स्थापना सहित सभी सिफारिशों को अमलीजामा पहनाया जाएंगे और संबंधित मंत्रालय इसके लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। जब मैं यह बात कह रहा था, तब मैं देख सकता था कि श्री प्रणब मुख़र्जी उसे अपनी नोटबुक में लिख रहे थे। परन्तु फिर भी इस महत्वपूर्ण सिफारिश पर अमल नहीं हुआ। जब मैं दलितों के लिए आवासीय स्कूलों की बात करता हूं तो मेरा आशय यह नहीं होता कि इन स्कूलों के सभी विद्यार्थी दलित होने चाहिए। परन्तु हां, उनमें से अधिकांश दलित होने चाहिए, जैसे 75 प्रतिशत विद्यार्थी दलित हो सकते हैं और 25 प्रतिशत अन्य वंचित वर्गों व अगड़ी जातियों के गरीब परिवारों से। इसी तरह के स्कूल एसटी व ओबीसी के लिए भी ज़रूरी हैं। मैं यहां पाठ्यक्रम, शिक्षणशास्त्र इत्यादि की बात नहीं कर रहा हूं, जो कि अलग से विस्तृत चर्चा के विषय हैं।

भारत सरकार के पूर्व सचिव पी.एस. कृष्णन

जहां तक, शिक्षा के माध्यम और भाषा संबंधी नीति का प्रश्न है, उनका निर्धारण अभिभावकों की इच्छानुसार, और जब बच्चे निर्णय लेने में सक्षम हो जाएं, तब उनकी इच्छानुसार किया जाना चाहिए। न केवल दलित बुद्धिजीवियों वरन आम दलितों का भी यह मानना है ज़िन्दगी में आगे बढ़ने के लिए, अंग्रेजी का ज्ञान ज़रूरी है। वे अंग्रेजी को प्राथमिकता अपने इस अनुभव के कारण देते हैं कि समृद्ध परिवारों के बच्चे, जिनमें से अधिकांश सामाजिक दृष्टि से अगड़े परिवारों से आते हैं और जो अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा प्राप्त करने हैं, उन्हें स्थानीय भाषाओं के माध्यम से शिक्षा हासिल करने वाले दलित और ‘नीची जातियों’ के बच्चों की तुलना में आगे बढ़ने के अधिक अवसर उपलब्ध होते हैं। यह अंतर भारत और विदेशों में उच्च शैक्षणिक संस्थाओं में प्रवेश और रोज़गार के अवसरों की उपलब्धता, दोनों में देखा जा सकता है। उनकी प्राथमिकता उनके व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित है और उसका सम्मान किया जाना चाहिए।

इसका यह अर्थ नहीं है कि हम स्थानीय भाषाओं के महत्व को कम करके आंक रहे हैं। किसी भी भाषा को भेदभाव व नैतिक गिरावट का वाहक मानकर उसकी निंदा नहीं की जा सकती। भाषा तो आत्माभिव्यक्ति का साधन है। किसी भी भाषा का इस्तेमाल, प्रजातान्त्रिक सोच, विचारों और भावनाओं को अभिव्यक्त करने के लिए भी किया जा सकता है और अप्रजातांत्रिक सोच, विचारों और भावनाओं को अभिव्यक्त करने के लिए भी। जब किसी समाज का प्रजातांत्रिकरण हो जाता है, तब उसकी भाषा भी इस प्रजातांत्रिकरण को प्रतिबिंबित करने लगती है। पहले, अंग्रेजी और अन्य यूरोपीय भाषाओं पर, सामंती समाज और उसके पदक्रम की छाप थी और साहित्यिक समालोचक उस सन्दर्भ को ध्यान में रखते थे, जिसमें कोई रचना लिखी गयी है। शेक्सपियर के प्रसिद्ध नाटकों में भी हम अप्रजातांत्रिक सोच की छाप देख सकते हैं जैसे ‘जूलियस सीज़र’ में आम लोगों को ‘अधीर भीड़’ बताया जाना और ‘द टेमिंग ऑफ़ द श्रु’ में पेत्रुचियो द्वारा ‘मगरूर’ कैथरीन को ‘आज्ञाकारी पत्नी’ बनाने का तरीका। परन्तु इसके बावजूद, शेक्सपियर, मार्क्स के सबसे प्रिय लेखक थे।  पूर्व में, भारतीय भाषाएं, ऊंची जातियों की सोच, उनके विचारों और भावनाओं की वाहक थीं। परन्तु बाद में, जैसे-जैसे ‘निम्न जातियां’ शिक्षित होती गयीं, उन्होंने और उनके अतिरिक्त सामाजिक दृष्टि से अगड़ी जातियों के समतावादी तबके ने इन्हीं भाषाओं का प्रयोग, विद्रोह और परिवर्तन के स्वर को मुखर करने के लिए किया। उन्नीसवीं सदी के अंत से, कई भारतीय भाषाओं में दलित साहित्य का लेखन शुरू हुआ जो आज भी जारी है। अंग्रेजी की शिक्षा और अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा को प्राथमिकता देने का कारण यह नहीं है कि कोई भी भाषा अपने संपूर्ण इतिहास में प्रजातान्त्रिक या अप्रजातांत्रिक विचारों की वाहक रही है बल्कि यह है कि जो अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा प्राप्त करने वालों को बेहतर मौके उपलब्ध होते हैं।

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स्कूल, शिक्षा का एक चरण हैं. परन्तु इसके पहले और इसके बाद भी शिक्षा के कई चरण होते हैं. स्कूल में दाखिला लेने से पूर्व भी बच्चे कुछ-न-कुछ सीखते हैं। इसके लिए, पूरे देश में आंगनवाड़ियों का जाल बिछाया गया है। ये अत्यंत उपयोगी संस्थाएं हैं, जो प्री-स्कूल शिक्षा प्रदान करती हैं। हर दलित और आदिवासी बसाहट और मछुआरों जैसे पिछड़े वर्गों की अलग-थलग बस्तियों में आंगनवाड़ी स्थापित की जानी चाहिए।

परन्तु आंगनवाड़ी योजना में, प्री-स्कूल शिक्षा प्रदान करने के लिए समुचित रूप से प्रशिक्षित अध्यापकों की नियुक्ति का प्रावधान नहीं है। यह सुनिश्चित करने के लिए कि आंगनवाड़ी उपयुक्त शिक्षा दे पाएं, मोंटेसरी या शिक्षा प्रदान करने आधुनिक तरीकों में प्रशिक्षित अध्यापकों को उचित वेतन व सेवा शर्तों के साथ, हर आंगनवाड़ी में नियुक्त किया जाना चाहिए। इसके लिए, युवा पुरुषों व महिलाओं को आधुनिक प्री-स्कूल शिक्षण विधियों में प्रशिक्षित करने के लिए एक व्यापक कार्यक्रम चलाया जाना होगा। इन युवाओं को मुख्यतः उन समुदायों से लिया जाना चाहिए, जो शिक्षा के मामले में सबसे पिछड़े हैं। इसे आरक्षण नीति का भाग नहीं माना जाना चाहिए बल्कि यह उन सामाजिक समूहों के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण प्री-स्कूल शिक्षा उपलब्ध करवाने के लिए मानव संसाधन व अधिसंरचनागत सुविधाएं उपलब्ध करवाने का प्रयास होगा, जो बच्चे अब तक इससे वंचित हैं।

स्कूली शिक्षा के बाद आती है उच्च शिक्षा, जहां एससी, एसटी व ओबीसी की उपस्थिति सबसे कम है। उच्च शैक्षणिक संस्थाओं में इन वर्गों का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए विभिन्न उपाय किये जाने ज़रूरी है। जैसे कि मैं पहले ही कह चुका हूँ, सरकार को संविधान (93वां) संशोधन अधिनियम के प्रकाश में, निजी शैक्षणिक संस्थाओं में आरक्षण का प्रावधान बहुत पहले ही कर देना था।

मुझे विश्वास है कि अगर सरकारें, राजनैतिक दल और समाज के नेता गंभीरता और निष्ठा से काम करें तो शिक्षा के हर स्तर पर दलितों-आदिवासियों व अगड़ी जातियों और ओबीसी और व अगड़ी जातियों के बीच के अंतर को पाटा जा सकता है।

वासंती देवी : जब हम शिक्षा के विषय पर बात कर रहे हैं, इसी बीच, हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में दलित शोधार्थी रोहित वेमुला की आत्महत्या की दुखद खबर, ने देश की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया है। हमारे देश के सबसे प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थाओं, जो सरकारी धन से चलती हैं, में दलितों के साथ भेदभाव व अपमानजनक और घिनौने व्यवहार के कारण वे अक्सर स्वयं को असहाय महसूस करने लगते हैं, अवसाद का शिकार हो जाता हैं, बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं और यहां तक कि अपनी जान तक ले लेते हैं। आपके अनुसार इन तथाकथित उत्कृष्ट शिक्षण संस्थानों को मानवीय, प्रजातान्त्रिक और कानून का सम्मान करने वाले संस्थाएं बनाने के लिए क्या किया जा सकता है?

पी.एस. कृष्णन : हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में श्री रोहित वेमुला की आत्महत्या, इसी विश्वविद्यालय में नौ विद्यार्थियों (जिनमें से सात एससी-एसटी थे) की आत्महत्याओं की कड़ी में सबसे ताज़ा है। श्री रोहित वेमुला एक मेधावी विद्यार्थी थे। उन्हें पीएचडी कार्यक्रम में प्रवेश एक खुली प्रतियोगिता में मिला था। उन्होंने आरक्षण का सहारा नहीं लिया जबकि एससी विद्यार्थी होने के कारण, वे उसके लिए पात्र थे। उन्हें आईसीएसएसआर द्वारा जूनियर रिसर्च फ़ेलोशिप अवार्ड के लिए विद्यार्थियों का चयन करने हेतु आयोजित परीक्षा में काफी उच्च अंक मिले थे और वे थोड़े ही अंतर से इस परीक्षा में टॉप नहीं कर सके थे। रोहित वेमुला की आत्महत्या के कुछ ही दिनों बाद 23 जनवरी 2016 को एसवीएस योग मेडिकल कॉलेज, कालाकुरिची, तमिलनाडु की तीन महिला ओबीसी विद्यार्थियों ने ‘यंत्रणा’ और मनमानी फीस वसूले जाने से परेशान होकर आत्महत्या कर ली।

ये सभी आत्महत्याएं, सरकारों, राजनैतिक दलों और समाज के कुलीन तबके का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास थीं। इन सभी को रोका जा सकता था यदि सरकारों और राजनैतिक दलों ने अपने कर्त्तव्य निष्ठापूर्वक निभाए होते और समाज के उच्च तबके ने सतर्कता और सहानुभूति से व्यवहार किया होता। सरकारों, पार्टियों और ऊंची जाति के लोगों की अछूत प्रथा, जातिगत भेदभाव और अन्य प्रकार के अमानवीय व्यवहार के प्रति संवेदना समाप्त हो चुकी है और वे इन्हें सामान्य मानने लगे हैं। वे केवल आत्महत्याओं के संज्ञान लेते हैं, और वह भी अल्पकाल के लिए. कुछ समय बाद, उन्हें भी भुला दिया जाता है। सरकार के कुछ लोगों का यह दावा कि रोहित वेमुला की आत्महत्या, दलितों से जुड़ा मुद्दा नहीं है, शर्मनाक है और यह दर्शाता है कि वे भारत में दलितों और आदिवासियों की जो स्थिति है और जो अपमान व तिरस्कार उन्हें झेलने पड़ते हैं, उनसे नावाकिफ हैं।

दलितों को विश्वविद्यालयों व अन्य उच्च शैक्षणिक संस्थानों में जो कष्ट झेलने पड़ते हैं, वे, दरअसल, गांवों और शहरों में व्याप्त अछूत प्रथा का विस्तार हैं। जब बड़ी संख्या में दलित उच्च शैक्षणिक संस्थाओं में प्रवेश पाने लगे, तब उन्हें वहां भी, एक नए स्वरुप में, इस प्रथा का शिकार बनाया जाने लगा। व्यापक समाज में व्याप्त अछूत प्रथा और उससे उद्भूत भेदभाव से निपटने के लिए जो कदम उठाये जा रहे हैं, उनके अतिरिक्त, इन संस्थाओं में इस घिनौनी प्रथा को घर करने से रोके के लिए कुछ विशिष्ट कदम उठाये जाने चाहिए। इनमें से कुछ का विवरण मैं यहां दे रहा हूं :

(1) प्रत्येक विश्वविद्यालय और व्यावसायिक शिक्षण संस्थान – चाहे वह सरकारी हो या निजी – में एक स्वतंत्र व शक्तिशाली शिकायत निवारण तंत्र की स्थापना, ताकि भेदभाव और प्रताड़ना की हर शिकायत की सुनवाई हो, आवश्यक जांच के बाद उसका तत्परता से निराकरण हो और ऐसे प्रणालीगत सुधार हो सकें, जिनसे दलित और आदिवासी सहित कमज़ोर ओबीसी जातियों के विद्यार्थियों को अछूत प्रथा, भेदभाव, अपमानजनक व्यवहार व उन्हें नीची निगाहों से देखने की प्रवृत्ति से रक्षा की जा सके।

यह तंत्र ओम्बड्समैन/लोकपाल की तरह के प्राधिकारी के अधीन होना चाहिए जो प्राचार्य/कुलपति या किसी भी विभाग या मंत्रालय से स्वतंत्र हो और उनके प्रति जवाबदेह न हो। इस प्राधिकारी को ऐसे आदेश/निर्देश जारी करने का अधिकार होना चाहिए जो प्राचार्यों व कुलपतियों सहित सभी प्राधिकारियों पर बंधनकारी हों। उसे यह अधिकार भी होना चाहिए कि वह स्वतः संज्ञान लेकर, किसी भी ऐसे अध्यापक या अधिकारी, जिसका एससी-एससी व ओबीसी विद्यार्थियों के साथ व्यवहार उचित न हो, को अपना व्यवहार सुधारने का निर्देश दे सके। इस प्राधिकारी के आदेशों/निर्देशों को पलटने का अधिकार न तो राज्य सरकार को होना चाहिए और ना ही केंद्र सरकार को।

इस पद पर ऐसे व्यक्ति को नियुक्त किया जाना चाहिए:

अ) जो निष्पक्ष व सामाजिक न्याय के प्रति समर्पित हो,

ब) जो अराजनैतिक हो, परन्तु जिसे.

 स) भारतीय समाज की समझ हो और जो स्वतंत्रता के पूर्व सदियों तक और स्वतंत्रता के पश्चात, एससी-एसटी व ओबीसी के हालातों से वाकिफ हो और यह जानता हो कि इसके पीछे निम्न कारण थे:

  1. जाति और अछूत प्रथा और उसके कारण, एससी को शिक्षा प्राप्त करने से वंचित किया जाना (जो कि स्वतंत्रता के काफी समय पूर्व, प्रायद्वीपीय भारत में महाराजाओं के कारण और केंद्रीय स्तर पर 1943  से डॉ. आंबेडकर के प्रयासों से आरक्षण दिए जाने तक जारी रहा और जिस व्यवस्था को हमारे संविधान में बनाये रखा गया, यद्यपि उस पर अमल की स्थिति बहुत संतोषप्रद नहीं कही जा सकती।)
  2. एसटी को दूर-दराज के क्षेत्रों में धकेल दिया जाना।
  3. ओबीसी को समाज में निम्न दर्जा दिया जाना और उन्हें शिक्षा प्राप्त करने के अवसरों से वंचित किया जाना (जो तब तक जारी रहा, जब तक कि स्वतंत्रता पूर्व प्रायद्वीपीय भारत और दो या तीन उत्तर भारतीय राज्यों में स्वतंत्रता के पूर्व और केंद्रीय स्तर पर 1990-92 और 2006-08 में उन्हें आरक्षण प्रदान किये जाने तक जारी रहा)।

यह कदम, हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के रोहित प्रकरण व पूर्व में इसी तरह के प्रकरणों सहित, अन्य विश्वविद्यालयों व इसी तरह के अन्य संस्थानों जैसे एम्स, दिल्ली, रोहतक विश्वविद्यालय व पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च, चंडीगढ़ आदि के मामले में उठाया जाना चाहिए।

सरकार को चाहिए कि वह आत्महत्याएं ही नहीं, एससी-एसटी व ओबीसी के साथ होने वाली हर तरह की प्रताड़ना और भेदभाव को समग्र रूप से देखे। अतः, ऊपर वर्णित कदम आत्महत्याओं के अलावा, इन वर्गों के साथ होने वाले हर प्रकार के भेदभाव व प्रताड़ना के संदर्भ में उठाये जाने चाहिए। इस तरह की कई घटनाओं पर तो ध्यान तक नहीं दिया जाता है।

2) इस घटना को जाति प्रथा, अछूत प्रथा व हर तरह के भेदभाव के खिलाफ युद्ध की घोषणा के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए। इस भेदभाव के सबसे बड़े शिकार एससी व एसटी हैं।

3) रोहित के मामले में, एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम, जो 2015 में संशोधित किया गया है, के प्रावधानों के अनुरूप कार्यवाही सुनिश्चित की जानी चाहिए।

यहां मैं मूल मुद्दे से ध्यान भटकाने के लिए, रोहित के एससी होने या होने पर शुरू की गयी बेवजह की बहस पर भी कुछ कहना चाहूंगा। रोहित के एससी होने पर इस बिना पर संदेह जताया जा रहा है कि उनके पिता वद्दर समुदाय के थे। जिस तरह इस मामले में बाल की खाल निकाली जा रही है, उससे ऐसा लगता है मानो वद्दर, ब्राह्मण या ठाकुर जैसा कोई ऊंची जाति हो और चूंकि उनके पिता वद्दर थे, इसलिए रोहित समाज के उच्च तबके का सदस्य था। दरअसल, अधिकांश लोग, वद्दरों की सामाजिक हैसियत से वाकिफ नहीं हैं। वद्दर समुदाय, प्रायद्वीपीय भारत में पाया जाता है और अत्यंत शोषित है। यह समुदाय, अछूत प्रथा की विभाजक रेखा के ठीक ऊपर या नीचे है। मैसूर और त्रावणकोर के महाराजा, वद्दरों को अछूत मानते थे और इसलिए मैसूर / कर्नाटक व केरल के दक्षिणी हिस्सों (जो पहले त्रावणकोर का भाग थे) में राष्ट्रपति के आदेश में, उन्हें एससी का दर्जा दिया गया है। आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, उत्तरी केरल और महाराष्ट्र में वे ओबीसी सूची में हैं. जिन राज्यों में ओबीसी का उपवर्गीकरण हुआ है, वहां वद्दर को अत्यंत पिछड़े समुदायों की श्रेणी में रखा गया है। आंध्र प्रदेश में, वे ओबीसी की ‘ए’ श्रेणी में शामिल हैं। इसी समूह में आदिम जनजातियां, विमुक्त जातियां और घुमंतू व अर्ध-घुमंतू जनजातियां भी हैं।

जहां तक यह सवाल है कि किसी एससी व गैर-एससी के बीच विवाह से उत्पन्न संतान को एससी माना जाए या नहीं, इस विषय में उच्चतम न्यायालय ने रमेशभाई दभाई नायीका बनाम गुजरात राज्य (2012) प्रकरण में अपने निर्णय में पूरी तरह से स्पष्ट कर दिया था। न्यायालय द्वारा इस प्रकरण में निर्धारित मानदंडों के अनुसार, वेमुला एससी ही हैं।

हाल में, मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा नियुक्त न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) ए.के. रूपनवाल की अध्यक्षता वाला एक-सदस्यीय जांच आयोग इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि रोहित वेमुला एससी नहीं बल्कि पिछड़े वर्ग से हैं। आयोग की रपट को दिनांक 11 अगस्त 2017 को संसद के पटल पर रखा गया। मुझे नहीं पता कि आयोग ने सन 2012 के उच्चतम न्यायालय के उपर्वर्णित निर्णय को ध्यान में रखा है अथवा नहीं। मुझे यह भी नहीं पता कि आयोग ने रोहित की मां के माता-पिता के एससी होने सम्बन्धी प्रमाणों का संज्ञान लिया है या नहीं। मुझे नहीं लगता कि अभी इस मामले में हम किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं। परन्तु, अगर, अंततः यह निष्कर्ष निकलता है कि वे एससी नहीं बल्कि वद्दर, जो कि एक अति पिछड़ी जाति है, से थे, तब भी पीड़ित परिवार के पुनर्वास, और भेदभाव को रोकने के लिए जिन उपायों का सुझाव मैंने दिया है, वे उतने ही आवश्यक और महत्वपूर्ण होंगे और उन्हें तत्परता से क्रियान्वित किया जाना चाहिए।

4) रोहित वेमुला के परिवार का पुनर्वास किया जाना चाहिए और इसके लिए निम्न कदम उठाये जाने चाहिए.

  1. रोहित के भाई भूगर्भशास्त्र में एमएससी हैं। उन्हें तुरंत, उनकी योग्यता के अनुरूप, भूगर्भशास्त्र या भूजल से सम्बंधित किसी विभाग या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम में नौकरी दी जा सकती है। वे पीएचडी करना चाहते हैं। उन्हें नौकरी के साथ-साथ पीएचडी करने के इज़ाज़त और वित्तीय व अन्य सुविधाएं दी जा सकती हैं।
  2. रोहित की बहन 10वीं कक्षा उत्तीर्ण हैं। उन्हें हैदराबाद के किसी सरकारी कार्यालय में सहायक के पद पर नियुक्त किया जा सकता है।
  3. उनकी मां दसवीं फेल हैं। उन्हें हैदराबाद में मध्याह्न भोजन योजना में रसोईया या इसी तरह का कोई अन्य काम दिया जा सकता है। परन्तु उन्हें सफाईकर्मी नहीं बनाया जाना चाहिए। वे कपड़े सिलने का काम करती हैं। उन्हें अपने काम को बढ़ाने में सहायता दी जा सकती है।

आंध्र प्रदेश में ऐसे कई उदाहरण हैं जब अपने कर्त्तव्य पालन के दौरान मारे गए अधिकारियों की पत्नियों को, उनकी योग्यतानुसार, डिप्टी कलेक्टर जैसे पदों पर नियुक्त किया गया है। उनमें ऊंची जातियों के अधिकारियों की पत्नियां शामिल हैं।

5)  इसी तरह के पुनर्वास की व्यवस्था, इसके पूर्व हुई त्रासदियों के मामलों में भी की जानी चाहिए। इनमें से अधिकांश मामलों में पीड़ित दलित थे। इनमें से कुछ मामलों में सहायता तो दी गयी है परंतु पुनर्वास नहीं किया गया।

6) प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों के नेतृत्व में, ‘स्वच्छ भारत’ और ‘बेटी बचाओ बेटी पढाओ’ की तर्ज पर अछूत प्रथा मुक्त भारत, अत्याचार मुक्त भारत, असमानता मुक्त भारत और जाति व्यवस्था मुक्त भारत के निर्माण का आह्वान करते हुए राष्ट्रीय स्तर पर अभियान चलाना जाना चाहिए।

इनमें से अछूत प्रथा के विरुद्ध अभियान को सबसे अधिक प्राथमिकता दी जानी चाहिए। प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों और अन्य नेताओं को चाहिए कि वे जनता – और विशेषकर ऊंची जातियों – को बताएं कि जाति प्रथा एक शर्मनाक और राष्ट्र-विरोधी बुराई है और लोगों को भारत की तेजी से प्रगति के लिए दलितों, आदिवासियों और ओबीसी से सहयोग कर जाति-मुक्त समतावादी समाज बनाने में अपना योगदान देना चाहिए। उन्हें यह बताया जाना चाहिए कि अगर वे वंचित वर्गों से सहयोग करेंगे तो इससे देश तेज गति से आगे बढ़ेगा, सभी की स्थिति बेहतर होगी और सामाजिक न्याय व सौहार्द की स्थापना से समाज और राष्ट्र की एकता मज़बूत होगी।

जाति प्रथा के विरोध पर फोकस के साथ, मानवाधिकारों के विषय में जानकारी सभी शैक्षणिक संस्थानों के पाठ्यक्रम में शामिल की जानी चाहिए। इसके साथ ही, अध्यापकों व आईएएस व आईपीएस अधिकारियों से लेकर पुलिस उपनिरीक्षकों तक के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में मानवाधिकारों की बारे में बताया जाना चाहिए। इस सिलसिले में तमिलनाडु के मदुरै में स्थित इंस्टीच्यूट ऑफ़ ह्यूमैन राइट्स एजुकेशन काफी अच्छा काम कर रहा है। इस इंस्टीच्यूट को आर्थिक सहायता उपलब्ध करवाई जानी चाहिए ताकि वह अपनी गतिविधियों का विस्तार कर सके।

शिक्षकों को यह सिखाया जाना चाहिए कि वे सभी विद्यार्थियों को अपने बच्चों जैसा माने और एससी-एसटी व अन्य वंचित वर्गों के विद्यार्थियों पर विशेष अनुराग रखें। अगर अध्यापक स्वयं को विद्यार्थियों का अभिभावक मानेंगे तो उनके दिमाग में यह कभी नहीं आएगा कि वे उनका स्टाईपेंड बंद कर दें, उन्हें हॉस्टल से खदेड़ दें और सर्दी के मौसम में उन्हें खुले में सोने पर मजबूर करें, जैसा कि हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में हुआ।

7) कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न रोकने हेतु बने कानून की तरह, विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और अन्य शैक्षणिक संस्थानों में एससी-एसटी व अन्य कमज़ोर वर्गों के विद्यार्थियों के साथ जाति व अछूत प्रथा के कारण होने वाले भेदभाव और पूर्वाग्रहपूर्ण व्यवहार को रोकने के लिए एक नया कानून बनाया जाना चाहिए।

इस कानून में एससी, एसटी या ओबीसी के विद्यार्थी के साथ किसी अध्यापक अथवा अधिकारी के अनुचित व्यवहार की स्वतंत्र जांच (जो उपरलिखित अनुच्छेद 1 में वर्णित प्राधिकारी द्वारा करवाई जा सकती है) और दोषियों को कड़ी सजा के प्रावधान होने चाहिए। इस कानून को अंतिम रूप देने से पहले, दलित और आदिवासी विद्यार्थियों के प्रतिनिधियों, शिक्षकों और सामाजिक न्याय के लिए काम रहे व्यक्तियों और इस क्षेत्र को समझने वाले जानकारों से परामर्श किया जाना चाहिए।

8) संविधान के 93वें संशोधन अधिनियम, जिसके तहत अनुच्छेद 15 में उपबंध (5) जोड़ा गया था, के अनुपालन में निजी मेडिकल व अन्य व्यावसायिक शिक्षण संस्थानों में एससी, एसटी व ओबीसी को आरक्षण प्रदान करने हेतु कानून, जो लम्बे समय से लंबित है, को जल्दी से जल्दी बनाया जाना चाहिए।

अगर इस तरह का कानून, जिसमें शिक्षण शुल्क के नियमन और इस संस्थानों के पर्यवेक्षण के सम्बन्ध में समुचित प्रावधान होते हैं, 93वें संशोधन के तुरंत बाद, या तो केंद्रीय शैक्षणिक संस्थान (प्रवेश में आरक्षण) अधिनियम 2006 के भाग के रूप में, या अलग से, बना दिया गया होता तो निजी संस्थाओं में आत्महत्याओं व प्रताड़ना की कुछ घटनाओं को रोका जा सकता था।

9) यूजीसी विनियम 2012  [उच्च शैक्षिक संस्थानों में समानता की प्रोन्नति) को कड़ाई से लागू किया जाना चाहिए। अब तक ये विनियम केवल कागजों तक सीमित रहे हैं। इन विनिमयनों को मजबूती देने के लिए उन्हें कानून में परिवर्तित कर दिया जाना चाहिए या उन्हें उपरलिखित अनुच्छेद 8 में वर्णित कानून का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

10) जिन कानूनों को बनाने की सलाह मैंने उपरलिखित अनुच्छेद 7 और 9 में दी है, वे एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम 2015 के अतिरिक्त होंगे और यह अधिनियम देश भर के सभी एससी एवं एसटी के साथ-साथ, विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और सभी उच्च शैक्षणिक संस्थानों के इन वर्गों के विद्यार्थियों पर पहले की तरह लागू होगा। इस अधिनियम के अतिरिक्त, इन कानूनों से उच्च शैक्षणिक संस्थानों के कैंपसों में इन वर्गों के विद्यार्थियों को अतिरिक्त सुरक्षा उपलब्ध होगी।

11) एससी-एसटी पूरे आत्मविश्वास से और शांतिपूर्वक अछूत प्रथा और इससे जनित भेदभावों का प्रतिरोध कर सकें, इसके लिए यह आवश्यक है कि उन्हें सामाजिक दृष्टि से अगड़ी जातियों के समकक्ष लाया जाय। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए मैंने जो नए कानून बनाये जाने चाहिए और जो कार्यक्रम व योजनायें लागू की जानी चाहिए, उनके सम्बन्ध में एक पूरा रोडमैप पूर्व प्रधानमंत्रियों और वर्तमान प्रधानमंत्री को 12 जुलाई 2013 को, फिर 19 जुलाई 2013 को और उसके बाद कई मौकों पर मेरे द्वारा सौंपा जा चुका है। इसे तत्परता से और समग्र रूप से कार्यान्वित किये जाने की ज़रुरत है।

12) यह ज़रूरी है कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों के कुलपतियों और आईआईटी व आईआईएम जैसी संस्थाओं के प्रमुखों की नियुक्ति, ज़रूरी अहर्ता प्राप्त एससी-एसटी व ओबीसी वर्गों, और ओबीसी के मामले में अधिक, अत्यंत व अति पिछड़ी जातियों के प्रोफेसरों  में से उचित अनुपात में की जाय।

पिछले डेढ़ साल में नियुक्त कुलपतियों में से एक भी दलित नहीं है और शायद एक या दो एसटी या ओबीसी हों। सामान्यतः, एससी-एसटी व ओबीसी वर्गों से कुलपतियों को नियुक्त न करने के लिए यह तर्क दिया जाता है कि इन वर्गों के योग्य उम्मीदवार उपलब्ध नहीं होते. कई बार, ‘योग्य’ शब्द की जगह ‘उपयुक्त’ शब्द का प्रयोग भी किया जाता है. यह सही नहीं है. इन तीन वर्गों के उम्मीदवारों की उपयुक्तता के निर्धारण की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है और चयनकर्ताओं के दिल और दिमाग पर पूर्वाग्रह हावी हो जाते हैं। विश्वविद्यालयों, आईआईटी व आईआईएम से अच्छे अंकों से उतीर्ण होने वाले एससी-एसटी व ओबीसी वर्गों के विद्यार्थियों की संपूर्ण सूची तैयार की जानी चाहिए। इनमें से जो अपनी संस्था या किसी अन्य तकनीकी, व्यावसायिक अथवा अन्य उच्च शैक्षणिक संस्थान में शिक्षण कार्य करने में रूचि रखते हों, उनके लिए सम्बंधित विषयों के जानकारों के चयन बोर्ड बनाये जाने चाहिए। चयनकर्ता ऐसे होने चाहिए जो सामाजिक न्याय और निष्पक्षता के हामी हों। इससे कुलपति व प्रोफेसर के पदों पर नियुक्ति के लिए इन तीन वर्गों के अनेक ऐसे उम्मीदवार सामने आयेंगे, जिन्हें पूर्व में ‘अनुपयुक्त’ बता कर नियुक्ति के लिए अपात्र घोषित कर दिया गया था।

एससी-एसटी व ओबीसी, कुल मिलाकर, भारत की आबादी का 75 प्रतिशत हैं। अगर वे भारत की शेष 25 प्रतिशत आबादी के समकक्ष शैक्षणिक अहर्ता हासिल करने के बाद भी, किन्हीं पदों पर नियुक्ति के लिए ‘अनुपयुक्त’ पाए जाते हैं, तो इस देश के लोगों की योग्यता और प्रतिभा के बारे में क्या कहा जाये!

कहने की ज़रुरत नहीं कि वर्तमान चयन प्रणाली में पारदर्शिता नहीं है और अगर उन वर्गों – जो देश की आबादी का 75 प्रतिशत हैं – के सभी उम्मीदवार ‘अनुपयुक्त’ पाए जाते हैं तो यह देश और उसकी प्रगति के लिए घातक है।

मैंने प्रधानमंत्री को उपयुक्त कदम उठाने की सलाह दी और उनसे कहा कि अगर इन्हें निष्ठापूर्वक और ईमानदारी से क्रियान्वित किया जायेगा तो इससे उच्च शैक्षणिक संस्थाओं के एससी, एसटी व ओबीसी विद्यार्थियों के जीवन में एक नया अध्याय खुलेगा। दुर्भाग्यवश, अब तक किसी सरकार ने इस दिशा में प्रयास नहीं किया है।  

(क्रमश: जारी)

(अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, कॉपी संपादन : नवल)


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