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Abdullah Mansoor

पुस्तक समीक्षा : अशराफी आधिपत्य के बरक्स पसमांदा अस्मिता का घोषणापत्र
पसमांदा विमर्श के समकालीन परिदृश्य में यह पुस्तक महज एक सामान्य अकादमिक अध्ययन या आंकड़ों का पुलिंदा नहीं...
Casteism among Muslims and the battle for rights
This book ‘Pasmanda Jan Andolan 1998’ becomes even more relevant in the context of the current sociopolitical scenario....
Shabbir Ahmed Ansari: Harbinger of Pasmanda consciousness
Shabbir Ahmed Ansari’s life shows that social reform is not only about sloganeering. It is also about making...
शब्बीर अहमद अंसारी : पसमांदा चेतना के अग्रदूत
शब्बीर अहमद अंसारी का जीवन सिद्ध करता है कि सामाजिक सुधार नारों से नहीं, बल्कि संवैधानिक समझ से...
पमरिया : साझा संस्कृति का बोझ और पसमांदा पहचान का बहुजन विमर्श
डॉ. अयुब राईन द्वारा संपादित यह पुस्तक महज़ एक सांस्कृतिक दस्तावेज नहीं, बल्कि अशराफियत और सामंतवाद के गठजोड़...
‘पसमांदा जन आंदोलन 1998’ : मुस्लिम समाज में जातिवाद और हक की जद्दोजहद की दास्तान
मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में यह किताब और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है। पसमांदा समाज के...
अशराफ़िया अदब को चुनौती देती ‘तश्तरी’ : पसमांदा यथार्थ की कहानियां
तश्तरी, जो आमतौर पर मुस्लिम घरों में मेहमानों को चाय-नाश्ता पेश करने, यानी इज़्ज़त और मेहमान-नवाज़ी का प्रतीक...
कुठांव : सवर्ण केंद्रित नारीवाद बनाम बहुजन न्याय का स्त्री विमर्श का सवाल उठाता उपन्यास
अब्दुल बिस्मिल्लाह का उपन्यास ‘कुठांव’ हमें यही बताता है कि बहुजन और पसमांदा महिलाओं का संघर्ष सिर्फ पुरुषों...
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