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हिजाब और अशराफ़िया पितृसत्ता

पूरी अशराफ़िया राजनीति ज़ज़्बाती मुद्दों की राजनीति रही है। सैकड़ों सालों से यह अपनी संस्कृति, अपनी भाषा, अपने पहनावे को पूरे मुस्लिम समाज की पहचान के रूप में प्रस्तुत करते आए हैं। भारत के धर्मनिरपेक्ष और उदारवादी बुद्धिजीवी अशराफ वर्ग के साथ हमेशा खड़े रहे और मुस्लिम समाज के भीतर की विभिन्नताओं को नकारते रहे। बता रहे हैं अब्दुल्लाह मंसूर

एक तरफ ईरान में लड़कियां #FreeFromHijab लिखकर #NoHijabDay मनाते हुए, हिजाब हवा में लहराकर कई सालों से आंदोलन कर रही हैं, हिजाब उतरवाने के लिए जेल जाती हैं, और दूसरी तरफ यहां भारत में 6 लड़कियां हिजाब के हक़ के लिए उडूपी में क्लास में प्रवेश नहीं कर रही हैं। कर्नाटक में हिजाब विवाद के बाद “हिजाब हमारा अधिकार है” यह नारा “हिजाब हमारा स्वाभिमान है” में बदल गया। मुस्लिम पहचान के प्रतीक के रूप में हिजाब का इतिहास बेहद जटिल है, क्योंकि यह धार्मिक दायित्व और राजनीतिक अभिव्यक्ति दोनों से जुड़ा हुआ है।

बहुत से लोग ‘हिजाब’ शब्द का प्रयोग बुर्का के समानार्थक शब्द के रूप में करते हैं। पर कुरान में इसके उपयोग के संदर्भ में, ‘हिजाब’ एक ‘पर्दा या बाधा’ (42:51) को संदर्भित करता है। कुरान महिलाओं के परदे के संबंध में ‘जिलबाब’ और ‘खिमार’ का भी प्रयोग करता है। नकाब, बुर्का, अबाया, स्कार्फ और हिजाब इन सभी को अलग-अलग संस्कृतियों में परदे के रूप में ही देखा जाता है। लगभग सभी प्राचीन संस्कृतियों ने घूंघट को सम्मान और उच्च सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक माना। सिर पर एक घूंघट या दुपट्टा रखना और चेहरा छुपाना एक ऐसी प्रथा है, जो इस्लाम के उदय से पहले की है। इस लेख में हम नका़ब/हिजाब के इस्लामिक सिद्धांत और सामाजिक महत्व को समझने की कोशिश करेंगे और साथ ही यह भी समझने की कोशिश करेंगे कि नका़ब/हिजाब का पसमांदा समाज पर क्या असर पड़ा है? और यह मुद्दा क्या वाकई धार्मिक अधिकार का है या धर्म के कुछ ठेकेदारों का?

नका़ब/हिजाब का इतिहास

असीरिया एक प्रमुख प्राचीन मेसोपोटामिया सभ्यता थी, जो 21वीं शताब्दी ईसा पूर्व से 14वीं शताब्दी ईसा पूर्व तक एक शहर-राज्य के रूप में अस्तित्व में थी। यहां पहली बार आज़ाद औरतों को नकाब/हिजाब पहनने का आदेश दिया गया। इसकी वजह थी कि उन्हें जंग के समय में एक कबीला दूसरे कबीले को पूरी तरह खत्म कर देता था। पहले दौर में मर्दों को मार दिया जाता था और औरतों को गुलाम बना लिया जाता था। फिर जब दास व्यापार शुरू हुआ तो मर्दों को भी गुलाम बनाना शुरू कर दिया गया। यह संभव तब हुआ जब राज्य सैनिक रूप से मजबूत हुआ, जिसके कारण राज्य किसी तरीके के विद्रोह को रोक सकता था। गुलाम औरतों को लोग अपने घरों में रखते थे, जबकि मर्दों को खेतों में या जंगलों में काम के लिए रखा जाता था। जैसे-जैसे शहरों में गुलाम औरतों की संख्या बढ़ने लगी, आज़ाद औरत और गुलाम औरत के बीच फर्क करना जरूरी हो गया।

असीरिया राज्य ने इस फर्क को बनाए रखने के लिए कानून बना दिया, कानून बनाकर गुलाम औरतों को नकाब न लेने और संभ्रांत औरतों को नकाब लेने का आदेश दिया गया। नकाब गुलाम औरतों को पहचानने का एक प्रतीक चिह्न था, जिन्हें नकाब लगाने की मनाही थी। इस तरह नकाब की जड़ गुलामी व्यवस्था में थी। यहूदी भी इसी क्षेत्र में रहते थे। इस संस्कृति का असर उनके ऊपर भी था। यहूदी जहां जहां गए, इस संस्कृति को साथ ले गए।

नका़ब/हिजाब और अरब समाज

इस्लाम से पहले, अरब प्रायद्वीप विभिन्न संस्कृतियों का घर था, जिनमें अरब, सस्सानिड्स और बीजान्टिन शामिल थे। प्रत्येक समूह के अपने रीति-रिवाज और मान्यताएं थीं, लेकिन उनमें कुछ समानताएं भी थीं। अरब संस्कृति सस्सानिड्स और बीजान्टिन से भिन्न थी, क्योंकि अरब रेगिस्तान में रहते थे और उनका जीवन जीने का अपना तरीका था। इसलिए वह सस्सानिड्स और बीजान्टिन की तरह नहीं थे, जो शहरों में रहते थे और उनकी सरकारें अधिक केंद्रीकृत थीं। प्राचीन अरब में, लोग सस्सानिड्स और बीजान्टिन की तरह अपने चेहरे नहीं ढंकते थे, जबकि ऐतिहासिक साक्ष्यों से पता चलता है कि सस्सानिड्स और बीजान्टिन अक्सर महिलाओं के चेहरे को ढंकते थे और उन्हें पुरुषों से अलग रखा जाता था, खासकर कुलीन वर्ग के बीच। जैसे-जैसे इस्लाम फैला और साम्राज्य बढ़े, चीजें बदलती गईं। उमय्यद और अब्बासिद साम्राज्य बड़े हो गए और उन्होंने अफ्रीका, यूरोप और एशिया से दासों का उपयोग करना शुरू कर दिया। इन दासों ने, विशेष तौर पर गुलाम औरतों ने समाज में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं। जैसे महलों में काम करना और लोगों का मनोरंजन करना। यहां पर आज़ाद औरतों और गुलाम औरतों के बीच फर्क करना ज़रूरी हो गया।

कुरान और नका़ब/हिजाब

हज़रत आइशा (र.अ.) पैगंबर मुहम्मद (स.अ.) और उनके साथियों के साथ यात्रा पर थीं। जैसे ही काफिला मदीना लौटने के लिए तैयार हुए, उन्हें शौच की हाजत हुई। शौच से वापस आने के क्रम में उनका हार कहीं गिर गया और वह उसे खोजने के लिए वापस चली गईं। काफिले को लगा कि वह अपनी ढंकी हुई गाड़ी/पालकी के अंदर हैं और काफिला चल पड़ा। हज़रत आइशा (र.अ.) जब वापस लौटी तो वहां कोई नहीं था। वह एक चट्टान पर बैठ कर इंतज़ार करने लगी। एक सहाबी[1] सफ़वान जो काफिले के पीछे चल रहे थे, उन्होंने हज़रत आइशा (र.अ.) को देखा और अपनी ऊंट पर बैठा कर मदीना ले आए। मुनाफिकों (इस्लाम के दुश्मन) ने इस स्थिति का फ़ायदा उठाना चाहा और अब्दुल्लाह-बिन-उबैय ने यह अफवाह फैलाना शुरू कर दिया कि आइशा और उसके साथी ने ज़िना का गुनाह किया है। पैगंबर मुहम्मद (स.अ.) इस स्थिति से बहुत विचलित हो गए कि अब मुनाफिकों[2] ने उनके घर की औरतों को निशाना बनाना शुरू कर दिया ताकि इस्लाम का मिशन कमज़ोर हो जाए और समाज में उनकी प्रतिष्ठा कम हो जाए। इस मौके पर अल्लाह ने हज़रत आइशा की बेगुनाही साबित करने के लिए कुरान में 11 आयतें (24:11-21) नाज़िल[3] की।

हिजाब पर सवाल

अब यहां से इस्लामी विद्वान जावेद अहमद गामिदी तर्क देते हैं कि कुरान में हिजाब का जो हुक्म है वह सिर्फ पैगंबर मुहम्मद (स.अ.) के घर की औरतों के लिए है, क्योंकि पैगंबर मुहम्मद के घर की औरतों को मुनाफ़िक़ (इस्लाम के दुश्मन) अपनी साजिशों का निशाना बना रहे थे, जिससे कुछ अफवाह बन सके जैसा कि हज़रत आइशा के साथ इन मुनाफ़िकों ने किया था। इसलिए कुरान में हुक्म आया– “ऐ नबी[4]! अपनी पत्नियों, बेटियों और ईमानवाली स्त्रियों से कह दो कि वे अपने ऊपर अपनी चादरों का कुछ हिस्सा लटका लिया करें। इससे इस बात की अधिक संभावना है कि वे पहचान ली जाएं और सताई न जाएं। अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है”। ( कुरान 33:59)

यहां जावेद अहमद गामिदी कहते हैं कि पहचान लिए जाने का जो हुक्म है, वह इसलिए है कि औरतों को कम-से-कम शौच जैसे ज़रूरी काम के लिए घर से बाहर निकलना ही पड़ता था। ऐसे में कोई मुनाफ़िक़ उनके साथ कोई बदसलूकी न कर सके, यह कहते हुए कि वह पहचान न पाया कि यह कोई गुलाम थी या पैगंबर मुहम्मद (स.अ.) के घर की औरत थी। इसलिए यह पहचान आम औरतों से पैगंबर मुहम्मद (स.अ.) की घर की औरतों को अलग करता था।

इस आपात स्थिति में जब पैगंबर मुहम्मद (स.अ.) की घर की औरतें निशाने पर थीं तो उनके लिए कुछ विशेष नियम भी बनाने ज़रूरी हो गए थे। इन नियमों के लागू होने से पहले पैगंबर मुहम्मद (स.अ.) ने उनको विकल्प दिया था कि अगर वह चाहें तो तलाक़ ले कर दूसरी जिंदगी शुरू कर सकती हैं, क्योंकि आम मुसलमान औरतों पर यह नियम लागू नहीं थे। जैसे पैगंबर मुहम्मद (स.अ.) की घर की औरतों को पूरे मुसलमानों के लिए उनकी मां के रूप में घोषित कर दिया गया। अब पैगंबर मुहम्मद (स.अ.) की मृत्यु के बाद भी कोई उनसे शादी नहीं कर सकता था। उनको बिला[5] वजह घर से बाहर जाने पर रोक लगा दी गई। बाहर निकालते वक़्त उनको चादर रखने का हुक्म दिया गया। कुरान कहता है कि “और जब पैग़ंबर की बीवियों से कुछ मांगना हो तो पर्दे के बाहर से मांगा करो।” (अल अहज़ाब : 53)

अब दिक्कत यह हुई कि इस्लाम के विद्वानों ने यह समझा कि पैगंबर मुहम्मद (स.अ.) के घर की औरतें सभी मुसलमान औरतों के लिए आदर्श हैं, इसलिए जो नियम इनके लिए बने थे वह सारी मुस्लिम औरतों के लिए लागू होने चाहिए। जबकि यह एक आपातकालीन प्रावधान था। जैसे कोरोना काल में जो नियम लागू हुए थे, वह सामान्य समय में लागू नहीं होते और जैसे सूरह तौबा[6] की आयतें[7] युद्धक्षेत्रों के लिए आई थीं– “फिर, जब हराम (प्रतिष्ठित) महीने बीत जाएं तो मुशरिकों[8] को जहां कहीं पाओ क़त्ल करो, उन्हें पकड़ो और उन्हें घेरो और हर घात की जगह उनकी ताक में बैठो। फिर यदि वे तौबा कर लें और नमाज़ क़ायम करें और ज़कात दें तो उनका मार्ग छोड़ दो, निश्चय ही अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है।” (9:5) सामान्य समय में यह नियम लागू नहीं होंगे।

आम मुसलमान मर्द-औरतों के लिए जो नियम बने हैं, वह शिष्टाचार के लिए हैं। जैसे कुरान में अल्लाह ताला कहते हैं कि मुसलमान मर्दों को हुक्म दो अपनी निगाहें कुछ नीची रखें और अपनी शर्मगाहों की हिफाजत करें। यह उनके लिए बहुत सुथरा है। बेशक अल्लाह को उनके कामों की खबर है (सुरह नूर आयत 30) और (ऐ रसूल) ईमानदार औरतों से भी कह दो कि वह भी अपनी नज़रें नीची रखें और अपनी शर्मगाहों की हिफाज़त करें और अपने बनाव सिंगार (के मक़ामात) को (किसी पर) ज़ाहिर न होने दें, मगर जो खुद-ब-खुद ज़ाहिर हो जाता हो (छुप न सकता हो तो उसका गुनाह नहीं) और अपनी ओढ़नियों को (घूंघट मारके) अपने गरेबानों (सीनों) पर डाले रहें और अपने शौहर या अपने बाप दादाओं या आपने शौहर के बाप दादाओं या अपने बेटों या अपने शौहर के बेटों या अपने भाइयों या अपने भतीजों या अपने भांजों या अपने (क़िस्म की) औरतों या अपनी या अपनी लौंडियों या (घर के) नौकर चाकर जो मर्द सूरत हैं, मगर (बहुत बूढ़े होने की वजह से) औरतों से कुछ मतलब नहीं रखते या वह कमसिन लड़के जो औरतों के पर्दे की बात से आगाह नहीं हैं, उनके सिवा (किसी पर) अपना बनाव सिंगार ज़ाहिर न होने दिया करें। (सुरह नूर: 31)

यहां स्पष्ट है कि जो लोग पूरे चेहरे के नकाब या बुर्का के लिए बहस करते हैं, वे निश्चित रूप से कुरान और सुन्नत के खिलाफ बहस कर रहे हैं।

अरब के समाज में अब तक सार्वजनिक और निजी क्षेत्र का विभाजन स्पष्ट नहीं था, घरों में आमतौर से लोग आया-जाया करते थे, इसलिए मुसलमानों को शिष्टाचार के नियम भी सिखाना ज़रूरी था। जैसे कुरान में कहा गया है– “ऐ ईमान लानेवालो! अपने घरों के सिवा दूसरे घऱों में प्रवेश न करो, जब तक कि रज़ामंदी हासिल न कर लो और उन घरवालों को सलाम न कर लो। यही तुम्हारे लिए उत्तम है, कदाचित तुम ध्यान रखो।” (सूरह अन नूर:27) इस तरह इस्लाम ने औरत और मर्द के मिलने के कुछ अदब[9] बता दिए हैं।

पसमांदा औरतें और हिजाब/नकाब

जैसा कि हमने ऊपर यह देखा है कि हिजाब/नकाब आम मुसलमान औरतों के लिए नहीं था, फिर भी अशराफ उलेमाओं ने इसे सभी पर लागू कर दिया। अशराफ घर की औरतों के लिए हिजाब/नकाब का पालन करना आसान था, क्योंकि वह घरों में रहती थीं, पर जो प्रजा कौमें थीं, उनकी औरतों के लिए यह संभव न था कि वह हिजाब/नकाब लगा कर अशरफों के घर पानी लाएं, उनकी औरतों का मैला उठाएं, खेतों में धान बोएं, भट्ठों में ईंट लगाएं। अतः अशराफ मौलवी/लेखक/शायर भी इन औरतों को संबोधित नहीं करते हैं।

वकार अहमद हवारी कहते हैं कि उनकी चाची को नकाब लगाने की कोई पाबंदी नहीं, क्योंकि धोबी समाज की औरतों पर इस्लाम वैसे लागू नहीं होता था जैसे अशराफ घरों की औरतों पर लागू होता था। उच्च जाति के मुसलमान घर की औरतों की हैसियत मर्दों की संपत्ति से अधिक नहीं थी, जबकि निम्न जाति के मुसलमान घर की औरतें अपने मर्दों के साथ मिलकर रोजी-रोटी कमाने का काम करती थी। समाज में जहां एक महिला पर एक पुरुष का स्वामित्व होता है, वह आर्थिक रूप से भी मर्दों पर निर्भर होती हैं, उनके पास शिक्षा के सीमित अवसर होते हैं, उसका बाहरी दुनिया से कोई संबंध नहीं होता है, वह घर की दीवारों के भीतर कैद होती हैं और उनके पास उत्तराधिकारी पैदा करने की जिम्मेदारियां होती हैं।

इस्लाम में भी एक गुलाम लड़की को हिजाब पहनने के लिए शरीयत द्वारा बाध्य नहीं किया जाता है। दूसरे खलीफा हज़रत उमर (र.अ.) से एक वाक्या जुड़ा हुआ है, जिसे इमाम इब्न अबी शायबाह ने अपनी किताब अल-मुनसाफ में दर्ज किया है कि उन्होंने एक गुलाम औरत को हिजाब करते देखा तो उसे टोक दिया कि तुम आज़ाद औरतों की तरह कपड़े मत पहनो। (6/236)

सनद रहे कि उस गुलाम औरत का मुसलमान होने के बावजूद गुलाम होना अधिक मायने रखता है।

भारत में अशराफ[10] लेखकों ने जब कभी हिजाब का ज़िक्र किया तो उसे अपनी घर की औरतों तक ही सीमित रखा। इसमें खादिमा[11] और तवायफें शामिल नहीं थीं। राही मासूम रज़ा अपने मशहूर उपन्यास ‘आधा गांव’ में लिखते हैं– “सैयदानियां तो डोली के बिना घर से निकल ही नहीं सकती थीं। ये तो गांव की राकिनें, जुलाहिने, अहिरनें और चमाईनें होती थीं (जो ताज़िया देखने बेपर्दा निकलती थीं)। आप को अकबर इलाहाबादी का यह मशहूर शेर तो याद ही होगा, “बेपर्दा नज़र आयीं जो कल चंद बीबियां/अकबर ज़मीं में ग़ैरत-ए-क़ौमी से गड़ गया/पूछा जो आप का पर्दा वह क्या हुआ/कहने लगीं के अक़्ल पे मर्दों के पड़ गया।”

जब सामाजिक सुधारों के फलस्वरूप तथाकथित अशराफ (मुस्लिम उच्च वर्ग) की बीवियां (उच्च जाति के घरों की औरतों के लिए संबोधित शब्द) घरों से बाहर निकल कर शिक्षा हासिल करने लगीं तब इस बात से अकबर इलाहाबादी को बहुत कष्ट हुआ और वो अपने क़ौम को शर्म दिलाते हुए इसका विरोध अपने व्यंग्यात्मक अंदाज़ में टिप्पणी से की थी। फिर जब सामाजिक बदलाव हुए और पसमांदा में भी शिक्षा और धन आने लगा और उन्होंने अपनी औरतों को भी तालीम के लिए स्कूल भेजने लगे तो पनघट सूना हो गया। इस बदलाव से दुखी अकबर इलाहाबादी ने अपनी व्यथा को कुछ यूं वर्णन किया– “अब ना हिल मिल है ना वो पनिया का माहौल है/एक ननदिया थी सो वो भी अब दाखिले स्कूल है।”

मतलब यह कि इस नए बदलाव की वजह से मनोरंजन का अब यह साधन भी खत्म होने लगा। अब पहले की तरह वो हिलमिल देखने को नहीं मिल रहा है और एक ननदिया भी थी तो वो भी अब स्कूल में चली गई। यहां अकबर इलाहाबादी को छोटी जाति के पर्दे की कोई फिक्र नहीं है।

शिक्षा, हिजाब और अशराफ़िया राजनीति

पूरी अशराफ़िया राजनीति ज़ज़्बाती मुद्दों की राजनीति रही है। सैकड़ों सालों से यह अपनी संस्कृति, अपनी भाषा, अपने पहनावे को पूरे मुस्लिम समाज की पहचान के रूप में प्रस्तुत करते आए हैं। भारत के धर्मनिरपेक्ष और उदारवादी बुद्धिजीवी अशराफ वर्ग के साथ हमेशा खड़े रहे और मुस्लिम समाज के भीतर की विभिन्नताओं को नकारते रहे। जब कर्नाटक हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रितुराज अवस्थी, जस्टिस कृष्ण एस. दीक्षित और जस्टिस जेएम खाजी की पीठ ने 129 पेज के फैसले में यह कहा कि “पवित्र कुरान में मुस्लिम महिलाओं के लिए हिजाब या सिर के पहनावे के संबंध में आदेश नहीं दिया गया है। हमारा मानना है कि सुराओं में जो कुछ भी कहा गया है, वे केवल निर्देश हैं, क्योंकि हिजाब ना पहनने के लिए किसी सजा या प्रायश्चित के निर्देश का ना होना, इस दृष्टिकोण का समर्थन करती है।”

पीठ ने यह भी कहा कि “जिस क्षेत्र और समय में इस्लाम की उत्पत्ति हुई, वह अपवाद नहीं था। इस्लाम की शुरुआत से पहले के युग को जाहिलियत के रूप में जाना जाता है यानि बर्बरता और अज्ञानता का समय। कुरान “निर्दोष महिलाओं के साथ छेड़छाड़ के मामलों पर अपनी चिंता दिखाता है। और इसलिए, इसने सामाजिक सुरक्षा के उपाय के रूप में नकाब या अन्य परिधानों को पहनने की सिफारिश की। हो सकता है कि समय के साथ, धर्म के कुछ तत्व इस प्रथा में प्रवेश कर गए, जैसा कि किसी भी धर्म में होता है।”

कोर्ट के इस फैसले के बाद अशराफ़िया राजनीति में भूचाल आ गया। इस फैसले को इस्लाम में दखल देना करार दिया गया। हमारी अशराफिया मुस्लिम कयादत एड़ी-चोटी का जोर लगा कर हिजाब को इस्लाम धर्म में ‘अनिवार्यता’ के नाम पर बचा के रखना चाहती है। फिर सारी बहसें – व्यक्तिगत सार्वजानिक है – पर आकर टिक जाती हैं। मतलब यह कि आप के निजी मामलों को न सिर्फ निजी समझा जाए, बल्कि ज़रूरत पड़ने पर उसे सार्वजानिक मान कर सरकार उसपर कानून बना सके। हम इस बात से इंकार नहीं कर सकते हैं कि अशरफ अली थानवी से लेकर सर सैयद तक औरतों को आधुनिक शिक्षा देने के खिलाफ थे, जबकि वह दोनों विचारधारा के स्तर पर एक-दूसरे के खिलाफ थे। जैसे कि सर सैयद लिखते हैं– “औरतों की तालीम, नेक अख़लाक़, नेक ख़सलत (अच्छी आदत), ख़ाना-दारी के उमूर (घर के काम), बुज़ुर्गों का अदब, पति की मोहब्बत, बच्चों की परवरिश, धर्म का जानना होना चाहिए। इसका मैं हामी हूं, इसके सिवा और किसी तालीम से बेज़ार हूं। यही तालीम उनके दीन और दुनिया दोनों की भलाई के लिए काफ़ी थी और अब भी यही तालीम काफ़ी है। मैं नहीं समझता कि औरतों को अफ़्रीक़ा और अमरीका का भूगोल सिखाने और अलजेब्रा और त्रिकोणमिति के क़वाइद बताने और अहमद शाह और मुहम्मद शाह और मरहट्टों और देहलियों की लड़ाईयों के क़िस्से पढ़ाने से क्या नतीजा है।” (पृष्ठ 279-280 और 65-66, ख़ुतबात-ए-सर सैयद : जिल्द दोम)

प्रसिद्ध देवबंदी धार्मिक विद्वान मौलाना अशरफ अली थानवी (1868-1943) की किताबें और लेख इस मानसिकता का प्रतिनिधित्व करते हैं। खासकर उनकी सबसे ज्यादा बिकने वाली किताब– ‘बहिश्ती ज़ेवर’ (शाब्दिक अर्थ स्वर्गीय आभूषण)। महिलाओं को वश में करने के लिए मौलाना ने ‘बहिश्ती ज़ेवर’ के दस भाग लिखे, ताकि उन्हें पढ़कर महिला आसानी से पुरुष की श्रेष्ठता को पहचान सके और न केवल अपनी गुलामी से संतुष्ट हो बल्कि इसे गर्व का स्रोत भी समझे। मौलाना ने लड़कियों के स्कूल जाने और वहां शिक्षा प्राप्त करने का भी कड़ा विरोध किया, क्योंकि स्कूल में विभिन्न पृष्ठभूमि, वर्गों और विचारों की लड़कियां शामिल होंगी, जो उनके मूल्यों और नैतिकता को प्रभावित करेंगी। उनका विचार था कि यदि लड़की किसी अंग्रेजी प्रशिक्षक के संपर्क में आती है तो यह उसकी प्रतिष्ठा और विश्वास के लिए अच्छा नहीं होगा। लेखन की कला सीखने के संबंध में, मौलाना इस बात पर जोर देते हैं कि यदि महिला महत्वाकांक्षी नहीं है तो लेखन के बारे में सिखाने में कोई बुराई नहीं है, अन्यथा उसे नहीं सिखाया जाना चाहिए । इसके अलावा, उसे केवल उस सीमा तक ही लिखना सिखाया जा सकता है, जब तक वह आवश्यक पत्र और घरेलू हिसाब-किताब लिखने में सक्षम हो, लेकिन उससे अधिक नहीं। (मौलाना अशरफ अली थानवी, ‘बेहश्ती ज़ेवर’, लाहौर, भाग-1, पृ. 79-80, 84; भाग 4, पृ. 85)

यही नहीं मशहूर शायर अल्लामा इकबाल भी औरतों की आधुनिक शिक्षा के विरोधी थे। यह उनके शे’र में साफ दिखता है–

लड़कियां पढ़ रही हैं अंग्रेज़ी
ढूंढ़ ली क़ौम ने फ़लाह की राह
रविश-ए-मग़रिबी है मद्द-ए-नज़र
वज़-ए-मशरिक़ को जानते हैं गुनाह
ये ड्रामा दिखाएगा क्या सीन
पर्दा उठने की मुंतज़िर है निगाह

(अल्लामा इकबाल, बंग-ए-दारा, 1908, खंड 3 से)

ऐसे में यह सवाल बहुत वाजिब है कि जिस समाज में उसके आधुनिक बुद्धिजीवियों ने भी औरतों के आधुनिक शिक्षा का विरोध किया, ऐसे में लड़कियां अगर हिजाब लगा लेती हैं और इसके बदले उनको उच्च शिक्षा हासिल करने का मौका मिल जाए तो इसमें हर्ज ही क्या है? अगर कोई ईमानवाली औरत यह दलील दे कि पर्दा करने से उसे ख़ुदा की क़रीबी होने का अहसास होता है, तो हम कौन हैं यह कहने वाले कि वह सही है या ग़लत! स्वयं को अभिव्यक्त करने के कई तरीके हो सकते हैं और भारत जैसे दर्जनों धर्मों और सैकड़ों पंथों वाले देश में हज़ारों तरीके की धार्मिक अभिव्यक्ति नजर आती है और यही तो धार्मिक सौंदर्य का हिस्सा है। ऐसे में सिर्फ हिजाब पर ही सवाल क्यों है?

ऊपर बताया जा चुका है कि हिजाब इस्लाम धर्म का अभिन्न हिस्सा नहीं है, इसलिए जैसे और धर्म के धार्मिक विश्वासों को सामाजिक नैतिकता के नाम पर सरकार न्यायालय चुनौती देती है, उसी तरह हिजाब के मामले में भी चुनौती दे सकती है। दूसरी बात ऐसे प्रश्न करने वाले लोग हिजाब के पीछे पितृसत्तात्मक दबाव को पूरी तरह नकार देते हैं। छह और सात साल की उम्र की लड़कियों को अपना सिर ढकने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है या मजबूर किया जाता है। इस तरह सामाजिक कंडीशनिंग उन्हें घूंघट/हिजाब लगाने को उनकी शारीरिक आदत का हिस्सा बनाने मदद करती है। कनाडा में अक्सा परवेज से लेकर ईरान की महसा अमिनी उन महिलाओं में से हैं, जिन्हें हिजाब न पहनने के कारण  मार दिया गया। वास्तविक रूप में हिजाब का समर्थन मजहबी समूह की भावनाओं का समर्थन है, व्यक्तिगत स्वतंत्रता का नहीं। मुस्लिम समाज का धार्मिक समूह यह मानकर चलता है कि जो महिला हिजाब पहनती है, बस वही सम्मान के लायक है और इसका दूसरा पहलू यह है कि जो महिला हिजाब नहीं पहनती, वह खुद अपने ऊपर यौन हमलों को न्यौता दे रही हैं, या फिर ऐसी महिलाओं का चरित्र ठीक नहीं होता। पर हकीकत यह है कि ये सारे आरोप महिलाओं को आगे बढ़ने से रोकने के साजिश के तौर पर इस्तेमाल किए जाते हैं। उन्हें जातिगत और लैंगिक स्तर पर नीचा दिखाने के लिए यह सबसे आसान तरीका भी है।

हकीकत तो यह है कि हिजाब न तो इस्लामिक संस्कृति का हिस्सा है और न ही पसमांदा संस्कृति का। इसलिए यह किसी भी तरह से पसमांदा महिलाओं की वैकल्पिक इच्छा, सामाजिक पहचान या राजनीति का हिस्सा नहीं हो सकती। शिक्षा से ज्यादा महत्त्व हिजाब को देना अशराफी पितृसत्ता की तरफ गुलाम मानसिकता को दर्शाता है, जबकि शिक्षा ही वह हथियार है, जिसकी मदद से हम अपने ऊपर हो रहे शोषण को पहचान सकते हैं और समाप्त कर सकते हैं। जिन महिलाओं ने शिक्षा और हिजाब विवाद में शिक्षा की जगह हिजाब को चुना, इस साल कर्नाटक बोर्ड की बारवहीं की बोर्ड टॉपर तबस्सुम शेख उनके लिए एक मिसाल है। पाकिस्तानी समद याज़दानी ने क्या खूब लिखा है–

और बिलआखिर वे एक दिन
अपने धर्म के विरुद्ध छेड़ेंगी जेहाद
जिस धर्म ने कैद कर लिया था उन्हें
एक बंद, घुटन और उमस से भरे
अंधेरे कमरे में
पहले वे पालन करती थी ‘सौमो-सलात’ का
और अब वह उसी से टक्कर लेने निकल पड़ी हैं।

[1] पैगंबर मुहम्मद के जीवित रहते उनके अनुयायी सहाबी कहे गए
[2] दोहरे चरित्र वाले या फिर वे जिन्होंने इस्लाम दिखावे के लिए कबूल किया
[3] अवतारित
[4] पैगंबर मुहम्मद के लिए एक उपमा
[5] बिना
[6] कुरआन का नौवां अध्याय, तौबा मतलब पश्चाताप
[7] क़ुरआन की सबसे छोटी ईकाई
[8] अल्लाह को नहीं माननेवाला
[9] शिष्टाचार
[10] मुसलमानों की ऊंची जातियां
[11] नौकरानियां

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, संस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

लेखक के बारे में

अब्दुल्लाह मंसूर

लेखक पेशे से शिक्षक हैं और ‘पसमांदा डेमोक्रेसी’ नामक यूट्यूब चैनल के संचालक हैं

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कड़वा सच : ब्राह्मण वर्ग की सांस्कृतिक गुलामी में डूबता जा रहा बहुजन समाज
सरल शब्दों में कहें तो सत्ताधारी ब्राह्मण वर्ग कहता है कि हमें कोट-पैंट छोड़कर धोती-कुर्ता पहनना चाहिए। वह कहता है कि हमें अंग्रेजी छोड़कर...