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विस्तार से जानें चंद्रू समिति की अनुशंसाएं, जो पूरे भारत के लिए हैं उपयोगी

गत 18 जून, 2024 को तमिलनाडु सरकार द्वारा गठित जस्टिस चंद्रू समिति ने अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री एमके स्टालिन को सौंप दी। इस समिति ने स्कूलों में जाति के उन्मूलन के लिए अपनी अनुशंसाएं प्रस्तावित किए हैं। पढ़ें, यह खास प्रस्तुति

तमिलनाडु के स्कूलों में चिंतातुर करने वाली घटनाओं की एक लंबी शृंखला ने स्कूलों में जाति-आधारित भेदभाव के संबंध में समग्र दृष्टिकोण अपनाए जाने की त्वरित आवश्यकता को रेखांकित किया और इसी संदर्भ में एमके स्टालिन के नेतृत्ववाली राज्य सरकार ने एक-सदस्यीय न्यायमूर्ति चंद्रू समिति का गठन किया। 

दरअसल, अगस्त, 2023 में नन्गुनेरी में छह नाबालिगों के एक समूह द्वारा दो दलित बच्चों पर वीभत्स हमले की घटना ने शैक्षणिक संस्थाओं में जाति-आधारित हिंसा की गंभीरता की ओर सभी का ध्यान आकर्षित किया।

तमिलनाडु अनटचेबिलिटी इरेडीकेशन फ्रंट (टीएनयूईएफ) ने राज्य के 441 स्कूलों का सर्वेक्षण किया, जिसमें यह सामने आया कि स्कूलों में बड़े पैमाने पर जाति-आधारित भेदभाव और हिंसा होती है। सर्वेक्षण में सरकारी, सरकारी अनुदान प्राप्त और निजी स्कूल शामिल थे। अध्ययन से पता चला कि विद्यार्थी जाति के आधार पर एक-दूसरे से भेदभाव करते हैं और इससे भी चौंकाने वाली बात यह कि कई शिक्षक भी जाति-आधारित भेदभाव को बढ़ावा देते हैं।

तमिलनाडु अनटचेबिलिटी इरेडीकेशन फ्रंट (टीएनयूईएफ) द्वारा किये गए सर्वेक्षण अध्ययन के निष्कर्ष

विभिन्न जिलों के 25 स्कूलों में विद्यार्थियों के बीच जाति-आधारित हिंसा की घटनाएं सामने आईं। विद्यार्थी खुलेआम जातिवादी बातें करते हैं, अपनी जाति के आधार पर समूहों में लामबंद होते हैं और अपने जाति को इंगित करने वाले रूमाल, बिंदी, धागे और स्टीकर आदि का प्रयोग करते हैं। सर्वेक्षण में ऐसी 34 किस्म की वस्तुओं का पता चला, जिन्हें विद्यार्थी उनकी जाति के प्रतीक के रूप में प्रयुक्त करते थे।

ऐसे पंद्रह स्कूल सामने आए, जिनमें दलित विद्यार्थियों से शौचालय धुलवाए जाते थे, जबकि अन्य जातियों के विद्यार्थियों से यह काम नहीं लिया जाता था। छह स्कूलों में मध्याह्न भोजन के लिए जाति के आधार पर विद्यार्थियों की अलग-अलग लाइनें लगवाई जाती थीं। चार स्कूलों में भोजन करने के स्थान भी जाति के आधार पर अलग-अलग थे। इस तरह के व्यवहार से दलित विद्यार्थी आहत और अपमानित होते हैं और उनके मस्तिष्क में जातिगत ऊंच-नीच की भावना घर कर जाती है।

अध्ययन से पता चला कि कम-से-कम तीन स्कूलों में अध्यापक भी जातिगत भेदभाव करते हैं। वे अपनी कक्षाओं में जातिगत भेदभाव को बढ़ावा देते हैं। वे दलित विद्यार्थियों को स्पर्श नहीं करते और उन्हें ज़रूरत से ज्यादा कड़ी सजा देते हैं। मदुरै के एक स्कूल में 12वीं कक्षा में अव्वल आनेवाले विद्यार्थियों को सम्मानित करने के लिए आयोजित कार्यक्रम इसलिए रद्द कर दिया गया, क्योंकि पहले और दूसरे नंबर पर विद्यार्थी दलित थे। इससे पता चलता है कि शिक्षा प्रदान करनेवालों में भी जातिगत पूर्वाग्रह कितने मजबूत और गहरे हैं।

नन्गुनेरी नामक नगर में परईयार जाति के 17 साल के दलित लड़के पर थेवर जाति के उसके तीन सहपाठियों ने हमला किया, जिसमें लड़के की जान जाते-जाते बची। कई सालों से इस लड़के के साथ धौंस-धपट और दादागिरी की जा रही थी। जब उसने इसकी शिकायत की, तो उसके ऊपर कातिलाना हमला किया गया। हमलावरों ने अपने सहपाठी के प्रति तनिक भी दया न दिखाते हुए एक-एक करके झाड़ियां काटने वाली कैंची से उसे मारा। यह हमला योजनाबद्ध और क्रूर था। उसके पहले, दलित लड़के और उसकी मां ने स्कूल प्रशासन से शिकायत की थी, मगर कोई कार्रवाई नहीं की गई और अंततः लड़के पर नृशंस हमला हुआ। यह घटना बताती है कि किस प्रकार जातिगत आधारिख रूखा व्यवहार और दादागिरी, जानलेवा हिंसा का स्वरूप ले लेती है।

दिल को हिला देने वाली इन घटनाओं से जाहिर है कि एक-सदस्यीय समिति की अनुशंसाओं को बिना किसी देरी के लागू किया जाना ज़रूरी है। नन्गुनेरी की भयावह घटना और टीएनयूईएफ के अध्ययन से साफ़ है कि प्रदेश में जातिगत भेदभाव आम है। यह विद्यार्थियों के हित में नहीं है और इससे पीड़ितों के शिक्षा प्राप्त करने के अवसर प्रभावित होते हैं। अगर इस तरह की घटनाओं को नज़रअंदाज़ किया जाएगा, तो इससे भय और पूर्वाग्रह की संस्कृति को बढ़ावा मिलेगा और दलित विद्यार्थियों की सुरक्षा और उनकी संभावनाओं को हासिल करने की उनकी क्षमता प्रभावित होगी। समिति की सिफारिशों, जिनमें जातिगत पहचान चिह्नों का उन्मूलन और शिक्षा के माध्यम से सामाजिक न्याय को प्रोत्साहन देना शामिल है, से न केवल अधिक समावेशी वातावरण का निर्माण होगा, वरन हिंसा रुकेगी और शिक्षा हासिल करने के मूलभूत अधिकार की रक्षा की जा सकेगी। यह एक ऐसे भविष्य की ओर महत्वपूर्ण कदम होगा जिसमें तमिलनाडु के स्कूलों के सभी बच्चों – चाहे वे किसी भी जाति के हों – को उनकी पूरे संभावनाएं हासिल करने के लिए सशक्त करेंगे। (वर्ष 2021 में आई फिल्म ‘जय भीम’ वर्ष 1993 में के. चंद्रू के द्वारा लड़े गए एक कानूनी मामले पर आधारित है।)

(स्रोत: सिटीजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस)

मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन को रिपोर्ट सौंपते जस्टिस के. चंद्रू

अनुशंसाएं

(I) बस, अब और नहीं

हिंदुओं को इस बात पर विचार करना चाहिए कि क्या वह समय नहीं आ गया है जब उन्हें यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि कुछ भी स्थिर नहीं है, शाश्वत नहीं है, सनातन नहीं है; यह कि सब कुछ बदल रहा है, यह कि परिवर्तन जीवन का नियम है, जो व्यक्तियों और समाज, दोनों पर लागू होता है। एक बदलते हुए समाज में पुराने मूल्यों का सतत पुनरीक्षण होना चाहिए। हिंदुओं को यह समझना चाहिए कि अगर मनुष्यों के कार्यों को मापने के कोई मानक होने चाहिए तो उन मानकों में संशोधन करने की तत्परता भी होनी चाहिए – डॉ. बी.आर. आंबेडकर (आंबेडकर: एन ओवरव्यू , पृष्ठ 404)

 (1) जातिसूचक नाम हटाए जाएं

(अ) सरकार को प्रशासनिक आदेश जारी कर स्कूलों के नाम के आगे से ‘कल्लर रिक्लेमेशन’ और ‘आदि द्रविड़ वेलफेयर’ जैसे शब्द हटा देने चाहिए और उनकी जगह केवल ‘शासकीय स्कूल’ और उसके बाद स्कूल का स्थान का नाम प्रयुक्त करना चाहिए।

(आ) सरकार को यह आदेश जारी करना चाहिए कि शासकीय स्कूलों के नाम के आगे या पीछे कोई ऐसा शब्द न प्रयुक्त किया जाए जो स्कूल के लिए दान देने वाले व्यक्ति या उसके परिवार की जाति को इंगित करता हो।

(इ) अगर कोई संस्था किसी नए स्कूल की स्थापना करना चाहती है तो उसके लिए अनुमति की शर्तों में यह अनिवार्यता शामिल होनी चाहिए कि स्कूल के नाम में कोई जातिसूचक शब्द शामिल नहीं होगा।

(ई) ऐसे निजी स्कूलों, जिनके नाम में कोई जातिसूचक शब्द शामिल है, से सरकार को अनुरोध करना चाहिए कि वे ऐसे शब्द अपने संस्थान के नाम में से हटा दें। अगर स्कूल संचालक ऐसा नहीं करते हैं तो व्यापक जनहित में नया कानून बनाने सहित उपयुक्त कानूनी कदम उठाने पर विचार किया जाना चाहिए।

(2) सभी स्कूल एक विभाग के नियंत्रण में हों

(अ) शासन को अपने उस नीतिगत निर्णय का तुरंत कार्यान्वयन करना चाहिए, जिसके अंतर्गत कल्लर रिक्लेमेशन स्कूलों (अति पिछड़ा वर्ग विभाग), आदि द्रविड़ स्कूलों (आदि द्रविड़ कल्याण विभाग) व आदिवासी स्कूलों (आदिवासी कल्याण विभाग) सहित सभी प्रकार के स्कूलों को स्कूल शिक्षा विभाग के एकीकृत नियंत्रण में लाया जाना है।

(आ) सभी प्रकार के स्कूलों को स्कूल शिक्षा विभाग के एकीकृत नियंत्रण में लाने के पूर्व उपरोक्त स्कूलों के शिक्षकों की वरिष्ठता, पदोन्नति व वेतन निर्धारण सहित सेवा शर्तों से संबद्ध सभी समस्यायों का निवारण किया जाना चाहिए। अगर आवश्यक हो तो शासन को इस हेतु शीर्ष स्तर के शासकीय अधिकारियों की एक समिति गठित कर उसे इस कार्य को एक निश्चित समय सीमा में पूर्ण करने का उत्तरदायित्व सौंपना चाहिए।

(3) अध्यापक एवं अधिकारी

(अ) उच्च व उच्चतर माध्यमिक स्कूलों के शिक्षकों का समय-समय पर तबादला किया जाना चाहिए।

(आ) सीईओ, डीईओ, बीईओ व उच्च व उच्चतर माध्यमिक स्कूलों के प्रधानाध्यापकों की पदस्थापना के संबंध में इस आशय के मार्ग-निर्देश जारी किए जाने चाहिए कि इन काडरों के अधिकारियों को ऐसे इलाकों में पदस्थ नहीं किया जाएगा, जहां उनकी जाति का वर्चस्व हो।

(इ) वार्षिक गोपनीय रपटों (एसीआर) के संबंध में नियम बनाए जाने चाहिए। अधिकारियों व हेडमास्टरों के एसीआर में एक ऐसा कॉलम होना चाहिए, जिसमें अनुसूचित जातियों व जनजातियों के प्रति उनके दृष्टिकोण को दर्ज किया जाए। इस रिकॉर्ड के संधारण के लिए उपयुक्त प्रक्रिया निर्धारित की जानी चाहिए।

(ई) इस आशय के कानूनी प्रावधान किये जाने चाहिए कि सरकार द्वारा संचालित स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के शिक्षकों व सभी श्रेणियों के कर्मचारियों के लिए आचार संहिता बने।

(उ) अध्यापक भर्ती मंडल (टीआरबी) द्वारा अध्यापकों की भर्ती के समय उम्मीदवारों की योग्यता के साथ-साथ सामाजिक न्याय से जुड़े मसलों के प्रति उनके दृष्टिकोण की पड़ताल भी की जानी चाहिए और भर्ती करते समय इसे ध्यान में रखा जाना चाहिए। 

(ऊ) सभी स्कूलों के शिक्षकों और कर्मचारियों के लिए हर शैक्षणिक सत्र की शुरुआत में सामाजिक समस्यायों, जातिगत भेदभाव व यौन हिंसा, यौन प्रताड़ना, ड्रग्स, रैगिंग एवं अनुसूचित जातियों व जनजातियों के विरुद्ध अपराधों पर केंद्रित ओरिएंटेशन कार्यक्रम में भाग लेना अनिवार्य होना चाहिए। उन्हें इन कानूनों का उल्लंघन करने के परिणामों से भी अवगत कराया जाना चाहिए।

(4) अध्यापकों का प्रशिक्षण

(अ) तमिलनाडु टीचर एजुकेशन यूनिवर्सिटी (टीएनटीईयू) द्वारा तैयार किये जाने वाले बी.एड. के पाठ्यक्रम व तमिलनाडु स्टेट कौंसिल ऑफ़ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग द्वारा बनाये जाने वाले प्राथमिक शिक्षा में डिप्लोमा के पाठ्यक्रम का आद्योपांत पुनरीक्षण कर यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि उनका रुझान समावेशिता की ओर हो।

(5) पाठ्यक्रमों में परिवर्तन

(अ) शासन को एक विशेष सामाजिक न्याय निगरानी समिति का गठन करना चाहिए, जिसके सदस्य शिक्षाविद एवं सामाजिक कार्यकर्ता हों और जो स्कूल के विद्यार्थियों के लिए निर्धारित पाठ्यक्रम के सामाजिक समस्याओं से संबंधित हिस्सों का आंकलन करें और उनमें उपयुक्त परिवर्तन करने के सुझाव दें। इन परिवर्तनों में सामाजिक न्याय, समानता एवं जाति के आधार पर भेदभाव का निषेध आदि जैसे विषयों को समयबद्ध ढंग से पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना शामिल है।

(आ) शासन को सामाजिक न्याय निगरानी समिति की रपट को स्वीकार कर इस आशय के उपयुक्त निर्देश जारी करने चाहिए कि पाठ्यक्रम में ऐसे परिवर्तन किए जाने चाहिए ताकि इन विषयों के बारे में स्कूली बच्चों को जानकारी मिले और उनका ज्ञान बढ़े।

(6) कक्षाओं में बैठक व्यवस्था

सभी स्कूलों और कॉलेजों में कक्षाओं में विद्यार्थियों की बैठक व्यवस्था केवल उनके नामों के अकारादि क्रम पर आधारित होनी चाहिए सिवाय एक अपवाद के कि यदि कक्षा का कोई विद्यार्थी शारीरिक दृष्टि से अपंग हो तो उसे पहले पंक्ति में बिठाया जा सकता है, भले ही अकारादि क्रम में उसका नाम कहीं भी आता हो।

(7) जाति संबंधी जानकारी गुप्त रखी जाए

(अ) विद्यार्थियों के हाजिरी रजिस्टर में उनकी जाति से संबंधित कोई कॉलम या जानकारी नहीं होनी चाहिए।

(आ) कक्षाओं में शिक्षक कभी भी किसी विद्यार्थी को पुकारते समय प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उसकी जाति का हवाला नहीं देंगे, ना ही कभी उसकी जाति के बारे में या उस जाति के कथित चरित्र या प्रकृति के बारे में कोई अपमानजनक बात कहेंगे।

(इ) किसी भी विद्यार्थी के वजीफे के बारे में प्राप्त सूचनाओं की घोषणा के लिए कक्षा उपयुक्त स्थान नहीं है। अगर इस तरह की कोई सूचना प्राप्त होती है तो हेडमास्टर संबंधित विद्यार्थी को अपने कक्ष में बुलाकर उसे इस बारे में जानकारी दें।

(ई) अगर अध्यापक उपरोक्त में से किसी भी निर्देश का उल्लंघन करते हैं तो उनके खिलाफ कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए।

(उ) समिति यह सिफारिश करती है कि विद्यार्थियों की जाति से संबंधित जो रिकॉर्ड स्कूलों में रखा जाए, उस तक केवल हेडमास्टर और स्कूल का निरीक्षण करने वाले अधिकारियों की पहुंच हो, ताकि इस रिकॉर्ड की गोपनीयता बनी रहना सुनिश्चित किया जा सके।

(8) विद्यार्थी

(अ) सरकार को सभी विद्यार्थियों के लिए अनुशासन संहिता बनानी चाहिए और कानून की हदों में रहते हुए, उसे सख्ती से लागू करना चाहिए।

(आ) विद्यार्थियों के कलाई में रंगीन धागे बांधने, अंगूठी पहनने व तिलक लगाने पर प्रतिबंध होना चाहिए। विद्यार्थियों को ऐसी साइकिलों से स्कूल नहीं आना चाहिए जिन पर कोई ऐसा निशान बना या लगा हो जो उनकी जाति को इंगित करता हो या किसी जातिगत भाव को अभिव्यक्त करता हो। इन नियमों का पालन न करने वाले विद्यार्थियों के खिलाफ उपयुक्त कार्रवाई की जानी चाहिए और उनके माता-पिता या अभिवावकों को इस बारे में अवगत कराया जाना चाहिए।

(इ) प्रत्येक शैक्षणिक सत्र की शुरुआत में कक्षा 6 से 12 तक के सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक रूप से ओरिएंटेशन कार्यक्रम आयोजित किया जाना चाहिए। इस कार्यक्रम के लिए प्रशिक्षित पेशेवरों और शिक्षाविदों की मदद ली जानी चाहिए।

(ई) राज्य शासन और स्कूल शिक्षा विभाग को तमिलनाडु में स्थित सभी स्कूलों और कॉलेजों को अपने-अपने संस्थानों में छात्र संघों का गठन करने का अधिकार देना चाहिए। इन संघों का गठन वार्षिक चुनावों से होना चाहिए, जिसमें सभी विद्यार्थियों को वोट देने का अधिकार हो।

(9) मोबाइल फ़ोन पर रोक

(अ) राज्य सरकार और स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा स्कूलों में विद्यार्थियों द्वारा मोबाइल फ़ोन के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाना औचित्यपूर्ण होगा। यह महत्वपूर्ण है कि स्कूलों के प्रांगण में विद्यार्थियों द्वारा मोबाइल फ़ोन के इस्तेमाल पर प्रतिबंध को कड़ाई से लागू किया जाए। यह प्रतिबंध न केवल राज्य शिक्षा मंडल के अधीन स्कूलों वरन सीबीएसई व आईसीएसई सहित अन्य शिक्षा मंडलों से संबंद्ध स्कूलों में भी लागू किया जाना चाहिए ताकि इस मामले में सभी संस्थानों में एकरूपता रहे।

(10) अरा नेरी कक्षाएं

(अ) सभी प्रकार के स्कूलों के कक्षा 6 से 12 तक के विद्यार्थियों को ‘अरा नेरी’ (नैतिकता) का ज्ञान प्रदान करना अनिवार्य होना चाहिए।

(आ) हर सप्ताह एक पीरियड ‘अरा नेरी’ का ज्ञान देने के लिए निर्धारित किया जाना चाहिए। इस पीरियड में व्याख्यान देने का काम काबिल अध्यापकों को सौंपा जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त, स्कूल के बाहर के अन्य योग्य व्यक्तियों को भी इन व्याख्यानों में भागीदारी के लिए आमंत्रित किया जा सकता है।

(इ) ‘अरा नेरी’ के जिन पहलुओं को विद्यार्थियों को पढ़ाया जाना है, उससे संबंधित मार्ग-निर्देश तैयार किए जाने चाहिए। इनमें सामाजिक न्याय, समानता और भेदभाव न करने जैसी अवधारणाएं शामिल हैं।

(11) काउंसिलरों की नियुक्ति

(अ) सरकार को हर प्रखंड में एक प्रशिक्षित काउंसिलर की नियुक्ति करनी चाहिए जो संबंधित प्रखंड के सभी माध्यमिक स्कूलों – चाहे वे शासकीय हों, स्थानीय संस्था द्वारा संचालित हों या निजी हों – को अपनी सेवाएं दे।

(आ) काउंसिलर को हर स्कूल में माह में एक बार जाना चाहिए।

(इ) स्कूल के अध्यापकों और हेडमास्टर द्वारा चिह्नित विद्यार्थियों से बातचीत करने के बाद काउंसिलर को एक डायरी में अपनी टिप्पणी और दी गई सलाह दर्ज करनी चाहिए।

(ई) अगर काउंसिलर के अनुसार किसी विद्यार्थी को इलाज की ज़रूरत है तो वह उसके माता-पिता से संपर्क करेगा और विशेषज्ञ द्वारा उपयुक्त काउंसिलिंग की व्यवस्था करेगा। 

(उ) अगर कोई विद्यार्थी ड्रग्स के सेवन का आदी पाया जाए तो काउंसिलर उसे सरकारी खर्च पर नशा मुक्ति केंद्र में भर्ती करवाने की सिफारिश करेगा और उसकी प्रगति की समीक्षा करेगा।

(12) शाला कल्याण अधिकारी की नियुक्ति

(अ) सरकार को 500 से अधिक विद्यार्थियों वाले प्रत्येक माध्यमिक स्कूल में शाला कल्याण अधिकारी का पद निर्मित करना चाहिए। स्कूल में सहशिक्षा होने की स्थिति में दोनों लिंगों के एक-एक कल्याण अधिकारी नियुक्त किये जाने चाहिए।

(आ) शाला कल्याण अधिकारियों को रैगिंग, ड्रग्स के इस्तेमाल, यौन हमलों और जातिगत विभेद के संदर्भ में स्कूल पर नज़र रखनी चाहिए और इन्हें रोकने के लिए कानून के अनुसार कार्रवाई करनी चाहिए।

(इ) हर शैक्षणिक सत्र की शुरुआत में उपर्युक्त मुद्दों पर ओरिएंटेशन कार्यक्रम संचालित करने का उत्तरदायित्व शाला कल्याण अधिकारी का होगा और वह इस संदर्भ में स्कूल की गतिविधियों पर सतत नज़र रखेगा।

(ई) जिन स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या 500 से कम है, वहां उस शैक्षणिक जिले का जिला शिक्षा अधिकारी संबंधित स्कूल का शाला कल्याण अधिकारी होगा।

(उ) शाला कल्याण अधिकारी अपनी रपटें राज्य-स्तरीय निगरानी समिति को सौंपेगे, जिसका गठन निदेशक, स्कूल शिक्षा (डीएसई) द्वारा निदेशक, स्कूल शिक्षा (निजी स्कूल) (डीएसईपीएस) के साथ मिलकर किया जाएगा।

(ऊ) शाला कल्याण अधिकारियों की भर्ती के लिए योग्यता का निर्धारण राज्य सरकार द्वारा पद के उत्तरदायित्वों को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए।

(ऋ) स्कूल प्रबंधन समिति (एसएमसी) सहित स्थानीय संस्थाओं के सदस्यों के विरुद्ध शिकायतें प्राप्त होने की स्थिति में शाला कल्याण अधिकारी, राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एससीपीसीआर) के समक्ष शिकायत दर्ज करवा सकेगा।

(ए) किसी शिक्षक अथवा अन्य कर्मचारी द्वारा जातिगत भेदभाव या अन्य अनुचित आचरण करने की स्थिति में, शाला कल्याण अधिकारी उनके विरुद्ध कार्रवाई की अनुशंसा कर सकेगा।

(13) शिकायत पेटी

(अ) कई शिकायत पेटियों की बजाय केवल एक शिकायत पेटी (चाहे उसे जो नाम दिया जाए) लगाई जानी चाहिए एवं उसकी चाबी नियुक्त किए जाने वाले शाला कल्याण अधिकारी के पास रहनी चाहिए।

(आ) शिकायत पेटी हफ्ते में एक बार या उससे कम अंतराल में खोली जानी चाहिए और उसमें प्राप्त शिकायतों का बिना किसी देरी के त्वरित निराकरण होना चाहिए।

(इ) शिकायत करने वाले विद्यार्थी का नाम गुप्त रखा जाना चाहिए और किसी भी परिस्थिति में उसे किसी प्रकार की परेशानी या कष्ट नहीं होना चाहिए।

(14) आरक्षण

(अ) राज्य शासन को उच्चतर माध्यमिक कक्षाओं में आरक्षण की व्यवस्था करनी चाहिए ताकि अनुसूचित जाति के विद्यार्थी प्लस टू स्तर पर विज्ञान विषयों का चयन कर सकें और विज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल कर सकें।

(15) राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस)

(अ) स्कूलों में कक्षा 9 से कक्षा 12 तक के विद्यार्थियों को राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) में शामिल किया जाना चाहिए।

(आ) एनएसएस के कार्यक्षेत्र में इस विस्तार के अनुरूप उसके लिए धन उपलब्ध करवाया जाना चाहिए।

(इ) एनएसएस द्वारा खुद संचालित किए जा सकने वाले कार्यक्रमों के संबंध में स्कूल शिक्षा विभाग मार्ग-निर्देश तय कर सकता है, जिसमें परियोजना अधिकारी की नियुक्ति और स्वैच्छिक सेवा के लिए कार्यक्रम शामिल हों।

(16) सोशल जस्टिस स्टूडेंट्स फ़ोर्स (एसजेएसएफ)

(अ) तमिलनाडु सरकार को विद्यार्थियों के एक दल, जिसे सोशल जस्टिस स्टूडेंट्स फ़ोर्स (एसजेएसएफ) कहा जाएगा, का गठन करना चाहिए, जो भारत सरकार से स्वतंत्र होगा। एसजेएसएफ में सभी समुदायों के विद्यार्थी सदस्य होंगे और वे सांप्रदायिक विभाजनों से ऊपर उठकर एवं एक होकर सामाजिक बुराईयों के खिलाफ लड़ेंगे।

(आ) एसजेएसएफ के गठन का मूल उद्देश्य है सामाजिक बुराईयों से संघर्ष करना और सरकार द्वारा चलाए जानेवाले सामुदायिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेना। इसका विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए कि इस बल में अल्पसंख्यक समूहों, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों सहित महिला विद्यार्थियों को भी शामिल किया जाए।

(इ) इस बल की इकाई ग्राम स्तर पर गठित की जाए, जिसमें संबंधित राजस्व ग्राम की सीमाओं के अंदर स्थित सभी स्कूल शामिल हों और इन इकाईयों का प्रबंधन प्रखंड स्तर पर किया जाए।

(ई) एसजेएसएफ की एक वर्दी हो, उसके सदस्य नियमित रूप से कसरत और अभ्यास करें और समाज में समावेशिता, समानता और भेदभाव न करने जैसे मूल्यों का प्रसार करने का काम करें।

(उ) सरकार इस बल के गठन करने की योजना बनाने, उसका गठन करने और उसके लिए धन की व्यवस्था करने के तरीके खोजने के लिए एक समिति का गठन कर सकती है।

(17) ब्लाक स्तर पर रसोईघर

(अ) हर स्कूल की बजाय, सरकार को हर प्रखंड (पंचायत यूनियन) में केंद्रीय रसोईघरों की स्थापना करना चाहिए, जिनमें मध्याह्न भोजन पकाने और उसे स्कूलों में वितरित करने के लिए आवश्यक कर्मी हों।

(आ) हर ब्लाक के लिए कर्मचारियों की भर्ती करते समय सरकार को आरक्षण नियमों का पालन करना चाहिए।

(इ) मध्याह्न भोजन योजना में कार्यरत वर्तमान कर्मियों की सेवाओं का उपयोग उनकी योग्यता और आयु के अनुरूप पंचायतों, पंचायत यूनियनों, नगरपालिकाओं और नगर निगमों में किया जा सकता है।

(ई) किसी भी स्थिति में मध्याह्न भोजन योजना से जुड़े कर्मियों की सेवाएं समाप्त नहीं की जानी चाहिए, जब तक कि कोई कर्मी स्वेच्छा से अपना काम न छोड़ना चाहे।

(उ) ब्लाक-स्तरीय रसोईघर अतिवृष्टि, बाढ़ और महामारी जैसी प्राकृतिक आपदाओं के समय राहत केंद्रों के रूप में भी काम कर सकते हैं।

(18) गैर-शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए स्कूलों के भवनों आदि के उपयोग पर प्रतिबंध

(अ) सरकार को शैक्षणिक संस्थानों के भवन आदि के गैर-शैक्षणिक प्रयोजन के लिए उपयोग का उपयुक्त विनियमन करना चाहिए। ऐसे विनियम निजी सहित सभी स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों पर लागू होने चाहिए।

(आ) इन विनियमनों के अंतर्गत शैक्षणिक संस्थाओं के सभागारों, कक्षों, खेल के मैदानों और खुले स्थानों का प्रयोग सामूहिक अभ्यास, परेड आदि के साथ-साथ सांप्रदायिक या जातिगत प्रचार के लिए करने पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। इन विनियमनों का उल्लंघन करने पर उपयुक्त दंड का प्रावधान होना चाहिए।

(19) चिह्नित क्षेत्रों को जातिगत अत्याचार प्रवण घोषित करना व विशेष गुप्तचर इकाईयों का गठन

(अ) शासन को विचार करना चाहिए कि क्या विशिष्ट इलाकों को जातिगत अत्याचार प्रवण घोषित किया जा सकता है और ऐसे इलाकों में एहतियाती व प्रतिबंधक कदम उठाए जा सकते हैं।

(आ) जातिगत हिंसा के बारे में जानकारी एकत्रित करने और जातिगत भेदभाव को बढ़ावा देने वाले व्यक्तियों और संगठनों की पहचान करने के लिए सरकार विशेष गुप्तचर इकाईयां गठित कर सकती है।

(इ) शिक्षा के भगवाकरण के आरोपों और जातिगत व सांप्रदायिक सद्भाव की स्थापना में रुकावटों की जांच के लिए किसी एजेंसी या विशेषज्ञों की समिति की नियुक्ति की जा सकती है।

(20) सरकार को समाज में सांप्रदायिक सद्भाव की स्थापना और जाति के उन्मूलन के लिए उपयुक्त कदम उठाने चाहिए

इस समिति का विचारार्थ विषय, शैक्षणिक संस्थाओं में जातिगत भेदभाव से निपटने के लिए दिशानिर्देश तैयार करने हेतु सुझाव देने तक सीमित है। लेकिन जातिगत भेदभाव का मसला केवल शैक्षणिक संस्थानों के कैंपसों तक सीमित नहीं है और इसका मुकाबला सामाजिक स्तर पर किया जाना होगा। अतः सरकार को यह सलाह दी जाती है कि वह समाज के स्तर पर जाति के उन्मूलन और सांप्रदायिक सद्भाव को बढ़ावा देने के लिए उपयुक्त कदम उठाए।

(II) दीर्घावधि लक्ष्य

(1) सामाजिक समावेशिता को बढ़ावा देने व जातिगत भेदभाव के उन्मूलन हेतु नीति के कार्यान्वयन के लिए के लिए विशेष कानून बनाना

तमिलनाडु सरकार को एक नया कानून बनाकर स्कूलों से लेकर उच्च शिक्षण संस्थानों तक में सामाजिक समावेशन को बढ़ावा देने व जातिगत भेदभाव के उन्मूलन हेतु नीति लागू करनी चाहिए। इस कानून में विद्यार्थियों, शैक्षणिक व गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों एवं संस्थानों के प्रबंधन के लिए कर्तव्यों व उत्तरदायित्वों का निर्धारण किया जाना चाहिए व संस्थाओं के पर्यवेक्षण, नियंत्रण व निर्देशों का पालन न करने पर दंड के संबंध में क्रियाविधि का प्रावधान होना चाहिए।

(2) स्थानीय संस्थाओं का प्राथमिक शिक्षा पर अधिक नियंत्रण

(अ) स्कूल शिक्षा प्रणाली में स्थानीय संस्थाओं के वर्तमान सीमित नियंत्रण को बढ़ा कर उन्हें प्राथमिक शिक्षा पर पूर्ण नियंत्रण दिया जाना चाहिए।

(आ) प्रखंड-स्तरीय प्रशासन (पंचायत यूनियनों) का स्कूलों पर पूर्ण नियंत्रण होना चाहिए, जिसमें कर्मचारियों की नियुक्ति, पदस्थापना और उन्हें पद से हटाने का अधिकार शामिल हो।

(इ) पाठ्यक्रम व मानकों के संबंध में मार्ग-निर्देशों का निर्धारण व बोर्ड परीक्षाओं का संचालन स्कूल शिक्षा संचालनालय व राज्य सरकार द्वारा किये जाते रहने चाहिए।

(ई) सरकार को वर्तमान में प्रभावी तमिलनाडु पंचायत अधिनियम, 1994 को संशोधित कर स्थानीय संस्थाओं को ठोस स्वायत्तता प्रदान करनी चाहिए ताकि शिक्षा को और जनोन्मुखी बनाया जा सके।

(3) तमिलनाडु सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1975 में संशोधन कर शैक्षणिक संस्थाओं के नाम में किसी जाति का नाम शामिल होने का निषेध

राज्य शासन को विद्यमान तमिलनाडु सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1975 में संशोधन कर उसमें यह प्रावधान जोड़ना चाहिए कि शैक्षणिक संस्थान शुरू करने की इच्छुक सोसाइटी संस्था के नाम में किसी जाति का नाम शामिल नहीं करेगी।

(अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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डॉ. बी.आर. आंबेडकर एक विरले भारतीय जैविक बुद्धिजीवी थे, जिन्होंने ब्राह्मणवादी वर्चस्व को व्यवस्थित और संरचनात्मक रूप से चुनौती दी। उन्होंने हाशिए के लोगों...
मध्य प्रदेश : विकास से कोसों दूर हैं सागर जिले के तिली गांव के दक्खिन टोले के दलित-आदिवासी
बस्ती की एक झोपड़ी में अनिता रहती हैं। वह आदिवासी समुदाय की हैं। उन्हें कई दिनों से बुखार है। वह कहतीं हैं कि “मेरी...
नालंदा विश्वविद्यालय के नाम पर भगवा गुब्बारा
हालांकि विश्वविद्यालय द्वारा बौद्ध धर्म से संबंधित पाठ्यक्रम चलाए जा रहे हैं। लेकिल इनकी आड़ में नालंदा विश्वविद्यालय में हिंदू धर्म के पाठ्यक्रमों को...
लाला हरदयाल का दृष्टि दोष (संदर्भ : भगत सिंह के दस्तावेज)
ऐसा क्या कारण था कि भारतीय समाज-व्यवस्था को जितनी गहराई से पेरियार रामासामी नायकर और डॉ. आंबेडकर जैसे दलित-बहुजन विचारकों ने समझा, उतनी गहराई...