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आदिवासी प्रश्न और मुख्यधारा के समाजशास्त्र की सीमाएं (संदर्भ : निर्मल कुमार बोस की पुस्तक ‘ट्राइबल लाइफ़ इन इंडिया’)

आदिवासियों या उनकी आर्थिक व्यवस्था को ‘पिछड़ा’ कहना या उनको ‘बैकवर्ड हिंदू’ कहना केवल एक वर्णनात्मक श्रेणी का प्रयोग नहीं है; इसका वास्तविक उद्देश्य उनके स्वतंत्र इतिहास, विशिष्ट पहचान और ज्ञान-परंपरा को नकारना है। पढ़ें, नीतिशा खलखो व अभय कुमार का यह आलेख

निर्मल कुमार बोस (1910–1972) का शुमार भारत के प्रमुख मानवशास्त्रियों और समाजशास्त्रियों में किया जाता है। उन्होंने अपने शिक्षण-जीवन की शुरुआत कलकत्ता विश्वविद्यालय से की, जहां वे मानवशास्त्र और भूगोल का अध्यापन करते थे। उन्होंने रांची से प्रकाशित शोध-पत्रिका ‘मैन इन इंडिया’ का भी संपादन किया। उनकी विद्वत्ता और प्रशासनिक क्षमता को देखते हुए तत्कालीन भारत सरकार ने उन्हें शेड्यूल्ड कास्ट्स एंड शेड्यूल्ड ट्राइब्स का कमिश्नर तथा एंथ्रोपोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया का डायरेक्टर नियुक्त किया। अकादमिक जीवन के साथ-साथ वे राष्ट्रीय आंदोलन में भी सक्रिय रहे और एक समय महात्मा गांधी के निजी सचिव के रूप में भी कार्य किया। मानवशास्त्र, समाजशास्त्र और गांधीवाद पर उन्होंने अनेक ऐसी पुस्तकें लिखीं, जिनका व्यापक रूप से उद्धरण दिया जाता है और जिनका सामाजिक विज्ञान और पॉलिसी-मेकिंग के क्षेत्र में गहरा प्रभाव रहा है।

यहां हम उनकी जिस पुस्तक की चर्चा कर रहे हैं, वह उनके जीवन के अंतिम दौर में प्रकाशित कृतियों में शामिल है। यह पुस्तक है– ‘ट्राइबल लाइफ़ इन इंडिया’। इसका पहला संस्करण 1971 ई. में आया। लगभग 90 पृष्ठों की यह छोटी-सी पुस्तक केवल मानवशास्त्र और समाजशास्त्र ही नहीं, बल्कि सामाजिक विज्ञान तथा नीति-निर्माण के क्षेत्र में भी अत्यंत प्रभावशाली रही है। आदिवासी समाज के बारे में प्रचलित समझ और धारणाओं के निर्माण में इस पुस्तक ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह स्वीकार करना होगा कि बोस ने इस पुस्तक को अत्यंत सरल और प्रभावशाली भाषा में लिखा है। उनकी शैली इतनी सहज है कि सामाजिक विज्ञान की जटिल अवधारणाएं भी सामान्य पाठक के लिए सुगम हो जाती हैं। मगर, इस पुस्तक की कुछ गंभीर सीमाएं हैं। इस किताब की मूल समस्या इसकी पद्धति में निहित है। इसके अलावा, इस किताब में आदिवासी समाज के ऐतिहासिक और राजनीतिक आंदोलनों के बारे में कई ‘स्वीपिंग स्टेटमेंट’ (अत्यधिक सामान्यीकृत कथन) दिए गए हैं।

बोस की सीमाएं यह हैं कि वे आदिवासी समाज को उसकी अपनी दृष्टि, अनुभवों और ज्ञान-परंपरा के आधार पर समझने के बजाय एक बाहरी, गैर-आदिवासी और ‘ऊपर से नीचे’ दृष्टिकोण अपनाते हैं। परिणामस्वरूप आदिवासी समाज इस पुस्तक में एक सक्रिय ऐतिहासिक समुदाय के रूप में नहीं, बल्कि अध्ययन की वस्तु के रूप में उपस्थित है। उसकी अपनी आवाज़, अनुभव और आत्मबोध अपेक्षाकृत अनुपस्थित हैं, जबकि विश्लेषण मुख्यतः गैर-आदिवासी समाज की धारणाओं, मूल्यों और पूर्वाग्रहों से संचालित होता दिखाई देता है। यही कारण है कि आदिवासी और बहुसंख्यक हिंदू समाज के बीच के संबंधों को समानता के आधार पर समझने के बजाय पुस्तक में एक स्पष्ट पदानुक्रम निर्मित होता दिखाई देता है, जिसमें आदिवासी समाज और उसकी अर्थव्यवस्था को अपेक्षाकृत निम्न तथा बहुसंख्यक हिंदू समाज को अपेक्षाकृत उच्चतर मानकर देखा गया है। जिस प्रकार नदियां अंततः समुद्र में जाकर मिल जाती हैं, उसी प्रकार पुस्तक यह स्थापित करने का प्रयास करती है कि आदिवासी समुदाय धीरे-धीरे हिंदू समाज और जाति-व्यवस्था में समाहित हो रहे हैं।

यद्यपि कई स्थानों पर बोस ने आदिवासी संस्कृति की विशिष्टताओं को रेखांकित भी किया है और यह स्वीकार किया है कि हिंदू समाज में समाहित होने के बाद भी आदिवासी समुदाय अपनी अनेक सांस्कृतिक परंपराओं और जीवन-पद्धतियों को बनाए रखते हैं। फिर भी पुस्तक का केंद्रीय निष्कर्ष यही प्रतीत होता है कि आदिवासी समाज बहुसंख्यक हिंदू समाज की तुलना में कम आत्मनिर्भर है और जनसंख्या वृद्धि के साथ उसका बहुसंख्यक समाज पर आश्रित होना लगभग अपरिहार्य है।

मगर ऐतिहासिक, सामाजिक और आर्थिक वास्तविकता इससे भिन्न है। इसके ठोस प्रमाण नहीं हैं कि आदिवासी समाज किसी ऐसी बड़ी आंतरिक सभ्यतागत या आर्थिक संकट से गुजर रहा था, जिसके कारण उसे किसी बाहरी समाज के ‘उद्धार’ की आवश्यकता थी। यदि आदिवासी समाज की अर्थव्यवस्था इतनी ही कमजोर और असफल होती, तो गैर-आदिवासी समुदायों को आदिवासी क्षेत्रों में जाकर बसने की आवश्यकता क्यों पड़ती? इसी प्रकार, औपनिवेशिक दौर की हुकूमत और स्वतंत्रता के बाद की भारतीय सरकारों ने आदिवासी क्षेत्रों के प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण स्थापित करने और उनके दोहन के लिए इतना व्यापक प्रयास क्यों किया?

इससे भी अधिक आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि यह पुस्तक 1970 के दशक में तब लिखी गई, जब राष्ट्र-निर्माण और विकास परियोजनाओं के नाम पर लाखों आदिवासियों को उनके घरों और पुश्तैनी भूमि से विस्थापित किया जा चुका था। उनकी आजीविका, संस्कृति और जीवन-पद्धति पर लगातार हमले हो रहे थे।[1] लेकिन इन ऐतिहासिक प्रक्रियाओं और राज्य और पूंजी-प्रेरित विस्थापन का उल्लेख पुस्तक में लगभग अनुपस्थित है।

निर्मल कुमार बोस व उनकी पुस्तक ‘ट्राइबल लाइफ इन इंडिया’ का मुख्य पृष्ठ

शब्दावली और पद्धति

उपर्युक्त पुस्तक में प्रयुक्त शब्दावली और पद्धति भी आलोचना से परे नहीं हैं। इस पुस्तक में बोस आदिवासी समुदायों के लिए ‘आदिवासी’ शब्द का प्रयोग करने से बचते हैं, जबकि यही वह शब्द है जिससे वे स्वयं अपनी पहचान व्यक्त करते हैं। कुछ लोगों का तर्क है कि ‘आदिवासी’ शब्द अपेक्षाकृत हाल की राजनीति की उपज है। लेकिन यह दावा ऐतिहासिक तथ्यों से मेल नहीं खाता। स्वतंत्रता-पूर्व काल में ही जयपाल सिंह मुंडा के नेतृत्व में ‘आदिवासी महासभा’ एक प्रभावशाली संगठन के रूप में उभर चुकी थी और उसे व्यापक जनसमर्थन प्राप्त था। संविधान सभा की बहसों के दौरान भी जयपाल सिंह मुंडा ने अपने समुदाय के लिए बार-बार ‘आदिवासी’ शब्द का ही प्रयोग किया था।[2]

यह संभव नहीं है कि बोस जैसे विद्वान इन बातों से अनभिज्ञ रहे होंगे। फिर भी उन्होंने अपनी पुस्तक के शीर्षक से लेकर पूरे पाठ में ‘जनजाति’ और ‘जनजातीय’ शब्दों का प्रयोग किया है। यह केवल शब्दों का चयन नहीं, बल्कि उस मुख्यधारा के मानवशास्त्र और समाजशास्त्र की दृष्टि का भी परिचायक है, जिसमें आदिवासी समुदायों को उनकी अपनी पहचान के बजाय बाहरी वर्गीकरणों के माध्यम से देखा जाता है।

यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि किसी समुदाय को ‘ट्राइब’ या ‘ट्राइबल’ कहना औपनिवेशिक काल और उसकी ज्ञान-परंपरा की उपज है। यही कारण है कि जैसे ही कोई मानवशास्त्री या समाजशास्त्री किसी समुदाय को ‘ट्राइब’ के रूप में चिह्नित करता है, उसी क्षण वह उसके समक्ष एक तथाकथित ‘नॉन-ट्राइबल’ समाज भी निर्मित कर देता है। इस प्रकार ‘ट्राइबल’ और ‘नॉन-ट्राइबल’ का एक बाइनरी स्थापित होता है, जो केवल वर्णनात्मक नहीं, बल्कि सत्ता-संबंधों, पदानुक्रम और सामाजिक भिन्नताओं को भी वैधता प्रदान करता है। उपनिवेशवाद और मानवविज्ञान के बीच रहे गहरे रिश्ते के बारे में सामाजिक मानवविज्ञानी तलाल असद कहते हैं कि “यह कोई विवाद का विषय नहीं है कि सामाजिक मानवविज्ञान उपनिवेशवादी दौर के शुरुआत के साथ एक खास विद्या के तौर पर उभरा।”[3]

इसलिए, ‘ट्राइब’ जैसी श्रेणियों को केवल तटस्थ वर्णनात्मक शब्द मान लेना उचित नहीं होगा। इस द्वैत के भीतर पहला समुदाय प्रायः ‘असभ्य’, ‘पिछड़ा’ और ‘विकास की प्रतीक्षा में’ दिखाई देता है, जबकि दूसरे समुदाय को प्रगति, सभ्यता और आधुनिकता का प्रतिनिधि मान लिया जाता है। यद्यपि बोस ने कहीं भी आदिवासी समाज के लिए ‘असभ्य’ शब्द का प्रयोग नहीं किया है, फिर भी उनके विश्लेषण में मुख्यधारा के समाजशास्त्र और मानवशास्त्र की यही अंतर्निहित पूर्वधारणाएं अनेक स्थानों पर दिखाई देती हैं।

पुस्तक की भूमिका में ही बोस आदिवासी समाज और बहुसंख्यक हिंदू समाज के बीच एक स्पष्ट द्वैत निर्मित कर देते हैं। वे एक ओर आदिवासी समाज को ‘अत्यंत अभावग्रस्त’ बताते हैं, तो दूसरी ओर हिंदू समाज को ‘अधिक समृद्ध’ के रूप में प्रस्तुत करते हैं।[4] इस प्रकार, दोनों समाजों के बीच असमानता और पदानुक्रम की एक पूर्वनिर्धारित धारणा आरंभ से ही स्थापित कर दी जाती है। बोस के शब्दों में, “इस तरह, मैदानी क्षेत्रों के किसानों की अपेक्षाकृत अधिक दक्ष उत्पादन-प्रणाली भारत की अनेक जनजातियों की कम दक्ष उत्पादन-प्रणाली को निगलती जा रही है। परिणामस्वरूप, हिंदू समाज की सामाजिक व्यवस्था ने भी उन पर अपना असर डालना शुरू कर दिया है।”[5]

आदिवासियों या उनकी आर्थिक व्यवस्था को ‘पिछड़ा’ कहना या उनको ‘बैकवर्ड हिंदू’[6] कहना केवल एक वर्णनात्मक श्रेणी का प्रयोग नहीं है; इसका वास्तविक उद्देश्य उनके स्वतंत्र इतिहास, विशिष्ट पहचान और ज्ञान-परंपरा को नकारना है। उपनिवेशवादी तथा उत्तर-उपनिवेशवादी सरकारों और उनके द्वारा पोषित अनेक विद्वानों ने आधुनिक समाज तथा औद्योगिक अर्थव्यवस्था को विकास के आदर्श मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया। लेकिन विडंबना यह है कि आज उसी आधुनिक समाज के भीतर गहरी आर्थिक विषमता, व्यापक ग़रीबी, सामाजिक असमानता, हिंसा और पर्यावरणीय संकट अपने चरम पर दिखाई देते हैं। इस संकट का मूल कारण यह है कि आधुनिक समाज का आधार मुनाफ़ा-केंद्रित व्यवस्था है, जिसमें मनुष्य और प्रकृति – दोनों का मूल्यांकन मुख्यतः उनकी आर्थिक उपयोगिता के आधार पर ही किया जाता है।

इसके विपरीत, आदिवासी समाज की ‘कॉस्मोलॉजी’ (विश्व-दृष्टि) स्वार्थ-केंद्रित नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व के आधार पर केंद्रित है। आदिवासियों के लिए परिवार केवल उनके घर-परिवार या मानव समुदाय तक सीमित नहीं होता, बल्कि उसमें संपूर्ण प्रकृति – पेड़-पौधे, नदियां, पर्वत, पक्षी और पशु – सभी समान रूप से सहभागी होते हैं। सबसे छोटी चिड़िया से लेकर सबसे बड़े वन्य जीव तक, सभी उनके जीवन-दर्शन के अभिन्न अंग हैं। जंगल, नदी और पहाड़ उनके लिए मुनाफ़ा कमाने के संसाधन नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व और सांस्कृतिक जीवन का अविभाज्य हिस्सा हैं।

यही कारण है कि जिस तथाकथित ‘सभ्य समाज’ ने कभी आदिवासियों को ‘सभ्यता’ का पाठ पढ़ाने का दावा किया था, वही आज पर्यावरणीय विनाश और मानवीय संकट के कगार पर खड़ा दिखाई देता है। इसके विपरीत, समकालीन पर्यावरणविद्, मानवशास्त्री तथा वैकल्पिक विकास के पक्षधर अनेक चिंतक आदिवासी जीवन-पद्धति में एक अधिक संतुलित, टिकाऊ और मानवीय भविष्य की संभावनाएं देखते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि बोस के लेखन में इन बुनियादी प्रश्नों तथा आदिवासी दृष्टि की इन महत्वपूर्ण विशेषताओं पर पर्याप्त विचार नहीं मिलता।

‘कालभ्रम’

सामाजिक विज्ञानों में गहन विद्वत्ता के बावजूद, बोस की ‘मेथोडोलॉजी’ (शोध-पद्धति) में गंभीर दोष दिखाई देते हैं। उदाहरण के लिए, ‘जनजातियों’ का इतिहास खोजने की प्रक्रिया में बोस हिंदू धर्मग्रंथ ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ तक पहुंच जाते हैं। उनका दावा है कि जनजातियों का संबंध रामायण और महाभारत काल से है। अपनी दलील के समर्थन में वे लिखते हैं कि इन ग्रंथों में उल्लिखित ‘जनस्थान’ का अर्थ ‘जन’ अर्थात् ट्राइबल अथवा जनजातीय समुदायों के निवास-स्थान से है।

यह व्याख्या कई स्तरों पर प्रश्न खड़े करती है। सबसे पहले, ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ के काल-निर्धारण, उनकी ऐतिहासिकता तथा उनके स्रोत-मूल्य को लेकर इतिहासकारों के बीच आज भी सर्वसम्मति नहीं है। उससे भी अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या ‘जन’ जैसे प्राचीन शब्द का अर्थ आधुनिक सामाजिक-राजनीतिक श्रेणी ‘ट्राइब’, ‘जनजाति’ या ‘आदिवासी’ मान लेना उचित है? क्या किसी प्राचीन शब्द को उसके मूल भाषिक और ऐतिहासिक संदर्भ से अलग करके आज की अवधारणाओं के आधार पर परिभाषित किया जा सकता है? यही वह बिंदु है जहां बोस की व्याख्या ‘अनाक्रोनिस्टिक’ (कालभ्रमित) प्रतीत होती है।

ब्रिटिश दार्शनिक क्वेंटिन स्किनर जब हमें ‘अनाक्रोनिज़्म’ (कालभ्रम) से बचने की सलाह देते हैं, तो उनका आशय यही होता है कि हमें वर्तमान संदर्भ में प्रचलित शब्दों, अवधारणाओं और पारिभाषिक शब्दावली का अर्थ अतीत पर आरोपित नहीं करना चाहिए।[7] स्किनर स्पष्ट रूप से आगाह करते हैं कि किसी भी ऐतिहासिक पाठ की व्याख्या उसके अपने ऐतिहासिक और भाषिक संदर्भ में की जानी चाहिए, न कि समकालीन अर्थों, वैचारिक धारणाओं और राजनीतिक-सामाजिक श्रेणियों के आलोक में। इसका कारण यह है कि शब्दों, अवधारणाओं और सामाजिक श्रेणियों के अर्थ समय के साथ बदलते रहते हैं। इसलिए अतीत की किसी संज्ञा को वर्तमान की अवधारणाओं के आधार पर परिभाषित करना इतिहास की व्याख्या नहीं, बल्कि अतीत पर वर्तमान का आरोपण है।

इसी पद्धतिगत दृष्टि से देखें तो बोस द्वारा ‘जन’ शब्द का प्रयोग ‘आदिवासी’ या ‘जनजाति’ के अर्थ में करना, अथवा कुछ लेखकों द्वारा ‘रामायण’ के पात्र ‘निषादराज’ और ‘शबरी’ को आधुनिक अर्थ में ‘आदिवासी’ या ‘जनजाति’ या दलित घोषित करना, ऐतिहासिक तथ्य की अपेक्षा एक पद्धतिगत भ्रांति अधिक प्रतीत होता है। जो लोग ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ में आदिवासियों की उपस्थिति खोजने का प्रयास करते हैं, वे प्रायः इस मूल प्रश्न पर विचार नहीं करते कि आदिवासी समुदायों का इतिहास अधिक प्राचीन है या इन ग्रंथों का? यदि आदिवासी समुदायों की ऐतिहासिक उपस्थिति इन ग्रंथों से भी पूर्व की है, तो उनके इतिहास की खोज क्यों ग़ैर-आदिवासी समुदाय के धार्मिक ग्रंथों से प्रारंभ की जाए?

जब आदिवासियों के इतिहास को समझने के लिए ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ को प्रमुख संदर्भ-बिंदु बनाया जाता है, तो इसके पीछे यह निहित मान्यता भी कार्य करती है कि भारत के अतीत को समझने का सबसे प्रामाणिक स्रोत यही ग्रंथ हैं। आदिवासियों के संबंध में फैली अनेक भ्रांतियों का एक प्रमुख कारण यह भी है कि उन्हें समझने के लिए उनके अपने इतिहास, उनकी सामूहिक स्मृतियों, उनकी सांस्कृतिक परंपराओं, उनके लोकगीतों, उनकी मौखिक परंपराओं तथा उनके उपलब्ध लिखित स्रोतों की अपेक्षा गैर-आदिवासी स्रोतों को अधिक महत्व दिया गया है।

बोस जैसे राष्ट्रवादी विद्वानों के लेखन में निहित इस अंतर्विरोध पर गंभीरतापूर्वक गौर किया जाना चाहिए। औपनिवेशिक काल में राष्ट्रवादी विद्वानों ने औपनिवेशिक ज्ञान-परंपरा की इस आधार पर आलोचना की थी कि किसी भी समाज को समझने के लिए उसके अपने स्रोतों, उसकी अपनी स्मृतियों और उसके अपने साहित्य को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। लेकिन जब वही राष्ट्रवादी दृष्टिकोण आदिवासी समाजों की व्याख्या करता है, तब वह स्वयं औपनिवेशिक ज्ञान-पद्धति से पूरी तरह मुक्त दिखाई नहीं देता। परिणामस्वरूप, आदिवासी समुदायों की व्याख्या में औपनिवेशिक और उत्तर-औपनिवेशिक समाजशास्त्र के बीच अपेक्षित वैचारिक विच्छेद दिखाई नहीं देता। दोनों के बीच निरंतरता के अनेक ऐसे बिंदु मौजूद हैं, जहां आदिवासियों को उनके अपने ज्ञान-संसार के बजाय बाहरी वैचारिक और सांस्कृतिक ढांचों के भीतर समझने का प्रयास किया जाता है।

आदिवासी और धर्मांतरण

आदिवासियों की अपनी विशिष्ट उपासना-पद्धति है और उनकी एक बड़ी आबादी आज भी किसी संगठित धर्म का हिस्सा नहीं है। आदिवासी समाज का यह हिस्सा प्रकृति-पूजक है और किसी आसमानी धार्मिक ग्रंथ, स्वर्ग-नर्क की अवधारणा से परे अपना जीवन व्यतीत करता है। उपनिवेशवादी काल की जनगणना में आदिवासियों को अपने धर्म की स्वतंत्र पहचान दर्ज कराने का अवसर प्राप्त था। आज भी आदिवासी समाज के भीतर एक व्यापक आंदोलन सक्रिय है, जो ‘सरना धर्म’ को जनगणना में पृथक धार्मिक श्रेणी के रूप में मान्यता दिए जाने की मांग करता है। जो आदिवासी अपने लिए ‘सरना’ धर्म की संवैधानिक मान्यता की मांग कर रहे हैं, उनकी यह मांग पूरी तरह भारतीय संविधान की भावना और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के अनुरूप है। उन्हें इस अधिकार से वंचित करना संविधान द्वारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन होगा। इन बिंदुओं पर भी बोस अपनी पुस्तक में ख़ामोश हैं।

यह भी एक सामाजिक सच्चाई है कि आदिवासी समाज का एक हिस्सा समय के साथ हिंदू, ईसाई अथवा मुसलमान बन चुका है। मगर विडंबना यह है कि इस देश के मुख्यधारा के समाजशास्त्रियों ने अपनी बौद्धिक ऊर्जा का बड़ा हिस्सा यह सिद्ध करने में लगाया कि आदिवासी कहां-कहां और किस प्रकार ‘हिंदू’ बन गए हैं। उनके लेखन में आदिवासियों के हिंदू बनने को प्रायः एक स्वाभाविक, क्रमिक और स्वैच्छिक प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया गया, मानो उसमें किसी प्रकार के राजनीतिक, सामाजिक या सांस्कृतिक पहलू की कोई भूमिका ही न रही हो। इसके विपरीत, यदि कोई आदिवासी ईसाई या मुसलमान बन जाता है, तो उसके धर्मांतरण को प्रायः उसकी स्वतंत्र इच्छा के बजाय तथाकथित ‘उपनिवेशवादी’, ‘बाहरी’ तथा ‘राष्ट्र-विरोधी’ शक्तियों के प्रभाव, दबाव अथवा बलपूर्वक धर्मांतरण के आरोपों से जोड़कर देखा जाता है। धर्मांतरण के प्रश्न पर इससे मिलते-जुलते पूर्वाग्रह बोस के लेखन में भी देखे जा सकते हैं।

मिसाल के तौर पर, वे बार-बार यह प्रतिपादित करने का प्रयास करते हैं कि आदिवासियों की आर्थिक व्यवस्था इतनी निर्बल है कि उन्हें हिंदू समाज पर निर्भर होना पड़ता है, और इसी प्रक्रिया में उनका हिंदू समाज में समावेशन होता जाता है। बोस इस प्रक्रिया को मुख्यतः एक स्वाभाविक सामाजिक विकास के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जिसमें किसी प्रकार के दबाव, शक्ति-संबंध या राजनीतिक हस्तक्षेप की भूमिका पर वे पर्याप्त विचार नहीं करते। उनके शब्दों में, “हिंदू ग्रामीण समुदायों में प्रचलित उत्पादन-व्यवस्था के साथ जुड़ाव ने जुआंगों [एक आदिवासी समुदाय] के कुछ वर्गों को व्यवहारतः एक नई हिंदू जाति में परिवर्तित कर दिया है। यह उल्लेखनीय है कि यह समूचा परिवर्तन हिंदुओं द्वारा उन्हें धर्मांतरित करने के किसी भी संगठित प्रयास के बिना ही घटित हुआ।”।[8]

राजनीति और आदिवासी

केवल धर्मांतरण के प्रश्न पर ही नहीं, बल्कि आदिवासियों के ऐतिहासिक आंदोलनों के संबंध में भी बोस ने कई विवादास्पद टिप्पणियां की हैं। एक ओर उनके लेखन में औपनिवेशिक शासन-व्यवस्था की प्रशंसा मिलती है कि उसने कानून-व्यवस्था स्थापित की और कल्याणकारी कार्यों को किया। दूसरी ओर, आदिवासियों द्वारा अंग्रेज़ी राज और उसके साथ गठजोड़ किए हुए देशी अभिजन के शोषणकारी तंत्र के विरुद्ध चलाए गए आंदोलनों को वे यह कहकर कमतर आंकते हैं कि उनमें राजनीतिक चेतना का अभाव था। उनके शब्दों में, “यह अनुमान लगाया गया है कि उन्नीसवीं शताब्दी और उसके बाद पूरे भारत में इस प्रकार के सौ से अधिक विद्रोह हुए। किंतु अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि ये आर्थिक विद्रोह राजनीतिक धार विकसित करने में पूरी तरह असफल रहे। वे एकमात्र वर्ग, जो इन बिखरे हुए विद्रोहों को संगठित करके विदेशी शासन को उखाड़ फेंक सकता था, शहरी, पाश्चात्य-शिक्षित, पेशेवर तथा नौकरशाही से संबंधित वर्ग था।”[9]

केवल शिक्षित और मध्यवर्ग को ही सामाजिक परिवर्तन का वाहक मानना एक अत्यंत कुलीनवादी दृष्टिकोण है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि समाज में बुनियादी और दूरगामी परिवर्तन हुए हैं, उनमें निर्णायक भूमिका मेहनतकश वर्गों और समाज के हाशिये पर स्थित समुदायों ने निभाई है। इसका कारण यह है कि शोषणकारी व्यवस्था का सबसे अधिक दुष्प्रभाव इन्हीं वर्गों और समुदायों को झेलना पड़ता है। इसलिए ऐसी व्यवस्था को चुनौती देने और उसे बदलने की सबसे प्रबल ऐतिहासिक प्रेरणा भी इन्हीं के भीतर निहित होती है।

इतना ही नहीं, बोस ने स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी आदिवासियों के राजनीतिक आंदोलनों को अपेक्षित गंभीरता से नहीं लिया। उन्होंने ‘भाषा, जनजाति, जाति अथवा संप्रदाय’ के आधार पर उभरने वाले आंदोलनों को संदेह की दृष्टि से देखा। यहां तक कि उन्होंने यह भी संकेत किया कि आदिवासियों के बीच राजनीतिक आंदोलनों और राजनीतिक चेतना के विस्तार में ‘वयस्क मताधिकार’ की भी एक महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

क्या बोस आदिवासियों को वयस्क मताधिकार दिए जाने को भारत की लोकतांत्रिक प्रगति के लिए एक समस्या के रूप में देखते थे? यद्यपि उन्होंने ऐसा निष्कर्ष प्रत्यक्ष रूप से व्यक्त नहीं किया, फिर भी उनके लेखन में स्वायत्त आदिवासी राजनीतिक आंदोलनों के प्रति एक प्रकार की आशंका और असहजता स्पष्ट दिखाई देती है। संभवतः यही कारण है कि उन्होंने स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद आदिवासियों के राजनीतिक आंदोलनों के संबंध में यह आशंका भी व्यक्त की कि यदि उन्हें उचित नेतृत्व और मार्गदर्शन न मिला, तो वे ‘अलगाववाद’ की दिशा में भटक सकते हैं।[10]

निष्कर्ष

जैसा कि उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट होता है, निर्मल कुमार बोस की पुस्तक ‘ट्राइबल लाइफ़ इन इंडिया’ में आदिवासियों के संबंध में प्रयुक्त अनेक श्रेणियां, उनके इतिहास से जुड़े कई निष्कर्ष, तथा उनके सामाजिक परिवर्तन और राजनीतिक आंदोलनों की व्याख्याएं आदिवासी समाज के वास्तविक ऐतिहासिक अनुभवों और जीवन-संसार से मेल नहीं खातीं। पुस्तक में अनेक ऐसे तर्क और मान्यताएं प्रस्तुत की गई हैं, जिनका आधार उपनिवेशवादी ज्ञान-परंपरा, राष्ट्रवादी विमर्श और मुख्यधारा के समाजशास्त्रीय पूर्वाग्रहों से निर्मित प्रतीत होता है। परिणामस्वरूप, आदिवासी समाज की ऐतिहासिक चेतना, उसकी ज्ञान-परंपरा, सांस्कृतिक विशिष्टता और राजनीतिक आकांक्षाओं को पर्याप्त महत्व नहीं मिल पाता। इसके बावजूद, यह निर्विवाद है कि ‘ट्राइबल लाइफ़ इन इंडिया’ अपने समय की अत्यंत प्रभावशाली कृति रही है और आज भी आदिवासी प्रश्न पर होने वाले अकादमिक और सार्वजनिक विमर्श को गहराई से प्रभावित करती है। यही कारण है कि इस पुस्तक का आलोचनात्मक अध्ययन अत्यंत आवश्यक है। ऐसा अध्ययन केवल एक पुस्तक की समीक्षा भर नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक राजनीति को अधिक समतामूलक, न्यायपूर्ण और बहुलतावादी बनाने की दिशा में एक विनम्र बौद्धिक हस्तक्षेप भी है।

संदर्भ :

[1] मैथ्यू अरीपरम्पिल, ट्राइबल्स ऑफ झारखंड: विक्टिम्स ऑफ डेवलपमेंट: ए स्टोरी ऑफ इंडस्ट्रीज़, माइन्स, एंड डिस्पोज़ेशन ऑफ इंडिजिनस पीपुल्स, इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट, नई दिल्ली, 1995
[2] जयपाल सिंह मुंडा, आदिवासीडम: सेलेक्टेड राइटिंग्स एंड स्पीचेज़ ऑफ जयपाल सिंह मुंडा, संपादक : अश्विनी कुमार पंकज, प्यारा केरकेट्टा फ़ाउंडेशन, रांची : 2022
[3] वही
[4] तलाल असद, ‘इंट्रोडक्शन, तलाल असद (संपा.), एंथ्रोपोलॉजी एंड द कॉलोनियल एनकाउंटर, इथाका प्रेस, लंदन, 1975, पृ. 14
[5] निर्मल कुमार बोस, ट्राइबल लाइफ़ इन इंडिया‘, नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली, 2014, पृ. 19
[6] गोविन्द सदाशिव घुर्ये, द शेड्यूल्ड ट्राइब्स, पॉपुलर बुक डिपो, मुंबई, 1959, पृ. 18-19
[7] क्वेंटिन स्किनर, ‘मीनिंग एंड अंडरस्टैंडिंग इन द हिस्ट्री ऑफ आइडियाज़’, हिस्ट्री एंड थ्योरी, खंड 8, अंक 1, 1969, पृ. 7-9
[8] बोस, उपरोक्त, 2014, पृ. 20
[9] वही, पृ. 40
[10] वही, पृ. 39-40

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

नीतिशा खलखो व अभय कुमार

नीतिशा खलखो बी.एस.के. कॉलेज, मैथन (झारखंड) में हिंदी विभाग की अध्यक्ष व कवयित्री हैं। वहीं अभय कुमार मगध विश्वविद्यालय, बोधगया के अधीन एस.एन. सिन्हा कॉलेज, टेकारी (गया) में पॉलिटिकल साइंस के असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।

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