डीयू के पाठ्यक्रमों से हटाए जा रहे दलितों, आदिवासी और ओबीसी से जुड़े पाठ

पिछले दिनों जब विश्वविद्यालय के विद्वत परिषद की बैठक चल रही थी तब एबीवीपी के कार्यकर्ताओं ने हुड़दंग किया था। उनका विरोध डीयू के पाठ्यक्रमों में दलितों, आदिवासियों, ओबीसी और महिलाओं के आदि के सवालों को लेकर है। बता रहे हैं प्रेम कुमार

आजकल दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) का माहौल गरमाया हुआ है। एक तरफ नए सत्र के लिए नामांकन अपने अंतिम चरण में है तो दूसरी तरफ नए सत्र के लिए पाठ्यक्रमों में संशोधन का कार्य भी जोर-शोर से चल रहा है। इस पाठ्यक्रमों में संशोधन के कार्य को विश्वविद्यालय की विद्वत परिषद युद्ध स्तर पर जुटी है और जल्द से जल्द पास करना चाहती है ताकि उसे नए सत्र में लागू किया जा सके। 

विद्वत परिषद विश्वविद्यालय की सबसे उच्च संस्था है जो पाठ्यक्रम का निर्धारण करती हैं। इसी बीच एक घटना घटित हुई। हुआ यह कि विद्वत परिषद की मीटिंग के दौरान अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के सदस्यों का कुलपति के प्रांगण में दाखिल होकर हुड़दंगई की और परिषद के कार्य को बाधित किया।

पाठ्यक्रमों में संशाेधन को लेकर विवाद पहले भी होते रहे हैं। मसलन, पिछले वर्ष कांचा आइलैया की किताबों को सिलेबस से बाहर किए जाने को लेकर पूरे देश में सवाल उठे थे। सामान्यत: ये विवाद मुख्य रूप से वैचारिक या राजनैतिक अथवा कभी-कभी शैक्षणिक होते हैं। लेकिन हाल में जो विवाद सामने आया है वह विवाद राजनैतिक ज्यादा और शैक्षणिक कम दिखाई देता है। 

एबीवीपी के खिलाफ प्रदर्शन करते दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र

पाठ्यक्रमों के निर्धारण में ‘जिसकी लाठी, उसकी भैंस’ वाली कहावत चरितार्थ होती है। पाठ्यक्रमों से उन हिस्सों को निकाल देना, जो किसी खास समूह की विचारधारा से मेल नहीं खाता, यह आम बात है। इस संदर्भ में यहाँ उस वाकये का उल्लेख करना वाजिब है कि चंद महीने पहले कैसे सरकार ने एनसीईआरटी की कक्षा नौवीं की इतिहास की पुस्तक ‘भारत और समकालीन विश्व’ से तीन अध्यायों को निकाल दिया। अध्याय-8 जो पहनावे के सामाजिक इतिहास की कहानी कहता है कि कैसे त्रावणकोर रियासत में शनार/नाडर (शूद्र) जाति के स्त्रियों को अपने स्तन ढंकने का अधिकार नहीं था और कैसे यह अधिकार उन्हें 1822 से लेकर 1859 तक के हिंसात्मक संघर्ष से हासिल हुआ। शूद्रों की अस्मिता की इस लड़ाई को सरकार बच्चों को पढ़ाने के लायक नहीं समझती। अध्याय-7 ‘इतिहास और खेल : क्रिकेट की कहानी’ कहानी कहता है, जिसमें पावलंकर बालू नामक एक दलित खिलाड़ी का वर्णन है, जो आजादी के पूर्व खेलते थे, परन्तु उन्हें सवर्ण चयनकर्ताओं ने कभी कप्तान नहीं बनाया जबकि बाद में उनके छोटे भाई विट्ठल को टीम का कप्तान बनाया गया और उनकी जीत हिन्दुओं की जीत बताया गया। इसी प्रकार अध्याय-6 में किसानों और काश्तकारों के शोषण के संबंध में जानकारी थी, उसे भी हटा दिया गया। 

दिल्ली विश्वविद्यालय में भी इसी तरह के संशोधन किए जा रहे हैं। दलितों, आदिवासियों, ओबीसी आदि से जुड़े सवालों को लेकर आरएसएस समर्थित शिक्षक संघ एनडीटीएफ को आपत्ति है। वे अंग्रेजी विभाग में पूर्व में शामिल एक लेख पर आपत्ति जता रहे हैं जो गुजरात दंगों पर आधारित है। इनका कहना है कि यह लेख आरएसएस और बजरंग दल जैसे देशसेवी संस्थाओं को बदनाम करने की यह साजिश है। उनकी दूसरी आपत्ति समलैंगिकों से जुड़े एक पाठ को लेकर है जो भारतीय मिथकों में एलजीबीटी के संदर्भों की पड़ताल करता है। यह तब है जबकि अभी हाल में सर्वोच्च न्यायालय ने इसे कानूनी मान्यता दी है।  

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वहीं दूसरी तरफ अंग्रेजी विभाग ने ‘कास्ट एंड लिटरेचल’ पेपर को मुख्य पेपर से हटाकर वैकल्पिक पेपर में बदल दिया है। इसी प्रकार राजनीतिक विज्ञान विभाग ने माओवादी आंदोलन को एक सामाजिक आंदोलन के रूप में पाठ्यक्रम में शामिल किया है जिसका विरोध् किया जा रहा है। परन्तु असली विरोध् माओवाद का नहीं बल्कि ‘वामपंथ’ का है। इनके अनुसार विश्वविद्यालय के सभी वामपंथी कथित तौर पर ‘अर्बन नक्सल’ हैं और नक्सलवाद को बढ़ावा देते हैं। 

वर्तमान में इतिहास विभाग पर यह आरोप है कि वह राजपूतों के इतिहास, आंबेडकर, शेरशाह सूरी और आमिर खुसरो जैसे ऐतिहासिक व्यक्तित्व को अपने पाठ्यव्रफम में उचित स्थान नहीं दिया है। हालांकि यह भी एबीवीपी की राजनीति का हिस्सा ही है। आंबेडकर से जुड़ी किताबों को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। लेकिन एबीवीपी के लोग अब इस सवाल को इसलिए उठा रहे हैं ताकि विश्वविद्यालय में हाेने वाले छात्र संघ के चुनाव में दलितों-बहुजनों का वोट हासिल किया जा सके। शेरशाह सूरी और आमिर खुसरो पहले पाठ्यव्रफम का हिस्सा हुआ करते थे। लेकिन अब इन दोनों को पाठ्यक्रम से बाहर कर दिया गया है। 

समाजशास्त्रा विभाग आदिवासियों से जुड़ी किताबों को पाठ्यक्रम से बाहर निकाल चुका है। 2017 में नंदिनी सुंदर की किताब ‘सबाल्टर्न एंड सोवरेन : ऐन एंथ्रोपोलोजिकल हिस्ट्री ऑफ बस्तर’ तथा अर्चना प्रसाद की पुस्तक ‘अगेंस्ट वर्निर एल्विन एंड मेकिंग ऑफ ऐन मार्डन ट्राइबल आइडेंटिटी’ जैसी महत्वपूर्ण किताबों को दिल्ली विश्वविद्यालय के अकादमिक मामलों की स्टैंडिंग कमेटी पहले बाहर कर चुकी है। इसी प्रकार नंदिनी सुंदर की एक और किताब ‘द बर्निंग फॉरेस्ट : इंडियाज वार इन बस्तर’ का विरोध हुआ था।

(कॉपी संपादन : नवल)


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