मदद के लिए बढ़े हाथ, अब रामजल गार्ड की जगह, जेएनयू के छात्र होंगे

जेएनयू किसी गार्ड को गरीब होने का अहसास नहीं कराता। रामजल मीणा की कहानी जितनी आदिवासी समुदाय की जीवटता के बारे में है, उतनी ही जेएनयू के संजीदा माहौल को लेकर भी है। कमल चंद्रवंशी की रिपोर्ट

जेएनयू ने कभी गरीब होने का अहसास होने नहीं दिया- रामजल मीणा

आदिवासी मजदूर परिवार के रामजल मीणा का फोन पर बातचीत करते-करते गला थक गया है। ये फोन शुभ चिंतकों, नातेदारों-रिश्तेदारों और पत्रकारों के हैं। मुनिरका के अपने घर वे खाना खा रहे थे, जब मैंने उनको फोन किया। मैं उनसे कहा इत्मीनान से खाना खा लिजिए आराम से ग्यारह बजे बात करते हैं। रामजल पूरी तरह से खुलासा तो नहीं करते लेकिन बताते है पिछले तीन दिन से कई ऐसे लोगों के फोन आ चुके हैं जो खुद या अपने एनजीओ की ओर से मदद करना चाहते हैं ताकि आगे गार्ड की नौकरी न करनी पड़ी, बल्कि वो जेएनयू में बीए रशियन की रेगूलर पढ़ाई कर सके।

शिक्षा का लगातार साथ

यही सच है कि जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के गार्ड रामजल मीणा अब छात्र बनकर कक्षा में पढ़ सकेंगे। रामजल मीणा ने रात-दिन मेहनत करके जेएनयू की प्रवेश परीक्षा पास की। नौकरी के साथ-साथ वे प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रहे थे। मीणा पिछले पांच सालों से जेएनयू के मुख्य गेट पर गार्ड की नौकरी कर रहे हैं। यही सामने के मुनिरका गांव में तैंतीस साल के रामजल के तीन बच्चों वाला परिवार रहता है। मीणा ने नवंबर 2014 में जेएनयू में काम करना शुरू किया। उन्होंने कैंपस के वातावरण से प्रभावित होकर एक छात्र के रूप में पठन- पाठन का मन बनाया।

जेएनयू के मुख्यद्वार में तैनात रामजल मीणा

ऐसा भी नहीं है कि रामजल मीणा को सफलता यकायक मिली हो। 2002 में बारहवीं की परीक्षा पास की तो उसके बाद पढ़ाई से लगातार नाता बना रहा। वह राजस्थान यूनिवर्सिटी में रेगुलर पढ़ाई के लिए एडमिशन के लिए निकले थे, लेकिन वहां उन्होंने देखा कि गार्ड की भर्ती के लिए लाइन में कुछ लोग खड़े हैं। उन्होंने सोचा नौकरी के साथ-साथ पढ़ाई करना उचित होगा। ताकि मां-पिता को आर्थिक मदद कर सकें, क्योंकि उन दिनों मजदूरी भी बहुत कम थी। रामजल और उनके पिता नाथेलीराम दोनों दिनभर मनरेगा में मजदूरी करके घर चलाते थे, जिसमें रामजल ने तीन बहनों की शादी के लिए पिता के साथ हाथ बंटाया। बहरहाल, यहीं से उनकी गार्ड की नौकरी शुरू तो हुई। लेकिन साथ साथ उन्होंने राजस्थान विश्वविद्यालय से ओपन से पहले बीए किया और फिलहाल एमए कर रहे हैं।

परिवार का साथ

रामजल कहते हैं, “मुझे गर्व महसूस होता है जब बच्चे कहते हैं कि हां पापा आप ठीक कर रहे हैं, पढ़ने की कोई उम्र नहीं होती, वाइफ और घरवाले कहते हैं बच्चों को पढ़ाओगे या खुद पढ़ोगे…। बीए लैंग्वेज रशियन से मैंने इंटरेंस पास की। मार्च- अप्रैल में हमने फार्म भरे थे, बुक डिपो से हमने किताब खरीदी थी- आर. एस. अग्रवाल की। कई तरह के छोटे बड़े एग्जाम देता रहता हूं तो सुविधा हुई। रशियन इंटरेंस का एग्जाम 28 मई को देने गया था। मैं लगभग डेली मटीरियल भी लाता था। पांच साल के पेपरों की पीडीएफ फाइल मैंने फोन पर डाउनलोड की थी। उनको भी मैं रोज पढ़ता था। इस तरह मैंने पक्का इरादा कर लिया था कि मैं ये इग्जाम पास करके रहूंगा। पढ़ाई मे मैं अच्छा रहा हूं। मेरी फर्स्ट पोजिशन आती थी- पांचवीं क्लास से लेकर दसवीं तक मैं हमेशा सभी दोस्तों से टॉप पर रहता था। 2003 में मेरी पढ़ाई में गैप आया, क्योंकि मैं रोजगार देखने लगा। घर पर मजदूरी करके माता-पिता को कुछ सहयोग कर पाता था।

दिल्ली में अपने परिवार के साथ रामजल मीणा

साथ ही वो कहते हैं, जेएनयू में आकर देखा तो पढ़ाई के माहौल ने बहुत प्रभावित हुआ। ये ऐसा माहौल था जैसा मैं चाहता था। मन में आया कि यूपीएससी की तैयारी के लिए इससे भी काफी मदद मिलेगी। यहां पर 24 घंटे लाइब्रेरी की सुविधा है और सारी सामाग्री जितनी चाहिए सब यहां मिल जाती है। वातावरण तो यहां बहुत ही अच्छा है। बच्चों को लेकर मैं बाद में राजस्थान के करौली जिले के गांव से लाकर मुनिरका (दिल्ली) में ले आया ताकि बच्चे भी देखें कि यहां कैसा माहौल है, लोग कैसे पढ़ते हैं। तीन बच्चे हैं मेरे। सबसे बड़ी बेटी नौवीं में है जो सरकारी स्कूल सर्वोदय में पढ़ रही है, एक बिटिया सातवीं में है और बेटा चौथी में।

“जेएनयू के प्रोफेसर बहुत अच्छे हैं, मुझे जब भी पढ़ते देखा तो प्रोत्साहित किया। छात्रों ने तो किया ही। वो यहां आते-जाते रहते हैं, बराबर सम्मान देते हैं। ना छात्र और ना शिक्षक ये सोचते हैं और ना महसूस कराते हैं कि ये गार्ड है या फिर कोई गरीब है, क्यों पढ़ाई में वक्त बिता रहा है। हम सब परिवार की तरह यहां रहते हैं और सभी एक दूसरे से समान बर्ताव करते हैं। यहां हम सब अपनी-अपनी जात धर्म के हैं, लेकिन यहां किसी से भेदभाव नहीं होता।

आईएएस बनने का है सपना

दरअस्ल, अब रामजल यूपीएससी की परीक्षा पास कर आईएएस अधिकारी बनना चाहते हैं। देश की सेवा के साथ-साथ अपने माता-पिता, पत्नी और बच्चों को बेहतर जीवन देना चाहते हैं। वह सभी को उच्च शिक्षा देना चाहते हैं। रामजल कहते हैं कि मैं नहीं चाहता कि मेरे होनहार बच्चों को किसी तरह की कमी के कारण मेरी तरह मजदूरी करनी पड़े। रामजल अपने बच्चों के साथ बैठकर भी पढ़ाई करते हैं। कहते हैं कि पढ़ाई ही एकमात्र ऐसा माध्यम है जो हमारी किस्मत बदल सकती है…। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं कि जेएनयू से पढ़ाई करने की इच्छा जब मैंने जाहिर की तो कैंपस के कई छात्रों ने मुझे अध्ययन सामग्री के साथ मदद की। नौकरी के बाद रोज तीन से पांच घंटे प्रवेश परीक्षा की तैयारी करता था। मैं परिसर के छात्रों और प्रोफेसरों के साथ जुड़ता गया, यहां हर किसी ने मुझे प्रोत्साहित किया।

रामजल के माता-पिता राजस्थान के आदिवासी करौली जिले के बझेड़ गांव में रहते हैं

दो दिन पहले तक मीणा की चिंता थी कि उनकी कक्षाएं जल्द ही शुरू होने वाली हैं। नौकरी का क्या होगा और अपने परिवार की देखभाल कैसे करूंगा, लेकिन अब लोगों के आर्थिक मदद के लिए फोन आ रहे हैं। जैसे उन्होंने सोचा था कि कोई उम्मीद जरूर बनेगी और रास्ता निकलेगा। कई लोगों के फोन पर परिवार की परवरिश में मदद का भरोसा दिया है ताकि अब गार्ड की नौकरी नहीं करनी पड़ी। जाहिर है रामजल अब गार्ड की नौकरी छोड़ देंगे और रेगूलर छात्र की तरह पढ़ाई करेंगे।

मीणा कहते हैं, “मेरे माता-पिता अब बूढ़े हो चुके हैं, पापा थोड़ी बहुत बेलदारी (मजदूरी) कर लेते हैं लेकिन उनके लिए मुख्य रूप से आजीविका का एकमात्र साधन मैं ही हूं…।” उम्मीद की जानी चाहिए कि रामजल मीणा के दिल्ली और करौली में रह रहे परिवारजनों को कोई आर्थिक संकट नहीं रहेगा और उनकी पढ़ाई बिना व्यवधान के आगे बढ़ सकेगी।


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