h n

बेजुबानों की जुबान लाल सिंह दिल की कविताएं

लाल सिंह दिल अंतिम सांस तक अपने आसपास की शोषक व्यवस्था की बारीकियों का पर्दाफाश करते रहे। संघर्षों से भरे अपने जीवन में जो कुछ उन्होंने अनुभव किया उसे अभिव्यक्त करने के लिए उन्होंने कविताओं को अपना माध्यम बनाया। बता रहे हैं रौनकी राम

क्रांतिकारी कवि लाल सिंह दिल (11 अप्रैल, 1943 – 14 अगस्त, 2007) ने पंजाब में 1960 के दशक उत्तरार्ध में समानता, आजादी और सामाजिक न्याय के लिए शुरू हुए संघर्ष (जिसे नक्सलवादी लहर कहा जाता है) पर अपनी कविताओं के माध्यम से अमिट छोड़ी। वे अपने नाना के गांव घुंघराली सिक्खां में पैदा हुए थे। यह गांव चंडीगढ़ से लुधियाना जाने वाले राजमार्ग पर समराला नाम के एक कस्बे के नजदीक है। 

पूरा आर्टिकल यहां पढें : बेजुबानों की जुबान लाल सिंह दिल की कविताएं

लेखक के बारे में

रौनकी राम

रौनकी राम पंजाब विश्वविद्यालय,चंडीगढ़ में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर हैं। उनके द्वारा रचित और संपादित पुस्तकों में ‘दलित पहचान, मुक्ति, अतेय शक्तिकरण’, (दलित आइडेंटिटी, इमॅनिशिपेशन एंड ऍमपॉवरमेंट, पटियाला, पंजाब विश्वविद्यालय पब्लिकेशन ब्यूरो, 2012), ‘दलित चेतना : सरोत ते साररूप’ (दलित कॉन्सशनेस : सोर्सेए एंड फॉर्म; चंडीगढ़, लोकगीत प्रकाशन, 2010) और ‘ग्लोबलाइजेशन एंड द पॉलिटिक्स ऑफ आइडेंटिटी इन इंडिया’, दिल्ली, पियर्सन लॉंगमैन, 2008, (भूपिंदर बरार और आशुतोष कुमार के साथ सह संपादन) शामिल हैं।

संबंधित आलेख

पमरिया : साझा संस्कृति का बोझ और पसमांदा पहचान का बहुजन विमर्श
डॉ. अयुब राईन द्वारा संपादित यह पुस्तक महज़ एक सांस्कृतिक दस्तावेज नहीं, बल्कि अशराफियत और सामंतवाद के गठजोड़ के खिलाफ एक पसमांदा ‘चार्जशीट’ है।...
आंबेडकर मिशन के नायक बुद्ध शरण हंस का साहित्य कर्म
हंस जी किस्सागो नहीं थे, वह कल्पना भी उनमें नहीं थी, जिससे कथा-शिल्प का निर्माण होता है। उनकी कहानियां उसी तरह की हैं, जिस...
आदिवासी, इकोसिस्टम, पूंजीवाद और नीला कॉर्नफ्लावर
लेखक का उद्देश्य प्रकृति संरक्षण के प्रति सजगता जगाना प्रतीत होता है। आदिवासी जीवन का संघर्ष इस उपन्यास का बायप्रोडक्ट जान पड़ता है। चूंकि...
युवा आंबेडकर का भारत-अमरीका व्यापार ज्ञापन
“हम भारत के प्रतिनिधि और इंडियन सोसाइटी फॉर द प्रमोशन ऑफ़ कॉमर्स के सदस्य, ब्यूरो ऑफ़ कामर्शियल इकोनॉमिक्स के अत्यंत मेधावी अधिकारियों से अनुरोध...
‘हेरि महां दरद दिवाणी म्हारा दरद न जाण्या कोय’
पति की मृत्यु और पुनर्विवाह न होने की स्थिति में मीरा का यह पक्ष अधिक मुखरता से अभिव्यक्त हुआ है। उन्हें कुछ भी मानने...