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जब दयानंद सरस्वती के विरोधियों के सामने खड़े हो गए फुले

विभिन्न लेखकों द्वारा दिए गए विवरणों से पता चलता है कि दयानंद के जुलूस की तैयारी कर रहे रानाडे जैसे सुधारवादी नेताओं ने जुलूस से एक दिन पहले ही, जोतीराव से मदद मांगी थी। यह मानते हुए कि दयानंद का आध्यात्मिक दृष्टिकोण चाहे जो भी हो, अंततः वे भी समाज सुधार चाहते हैं, जोतीराव तुरंत उनकी मदद को तैयार हो गये थे। पढ़ें, ओमप्रकाश कश्यप का यह आलेख

[जोतीराव फुले का जन्म 11, अप्रैल 1827 को हुआ था और इस लिहाज से यह वर्ष उनके जन्म के दो सौवीं जयंती का आगाज है। फारवर्ड प्रेस इस अवसर पर प्रस्तुत कर रहा है जोतीराव फुले व उनके विचारों पर आधारित आलेखों की शृंखला। आज पढ़ें ओमप्रकाश कश्यप का यह आलेख]

जोतीराव फुले, स्वामी दयानंद (1824) से तीन साल छोटे थे; हालांकि समाज सुधार के क्षेत्र में वे दयानंद से बहुत पहले प्रवेश कर चुके थे। जोतीराव ने 20 वर्ष की अवस्था में, 1848 में पहली कन्या पाठशाला की स्थापना की थी, दयानंद पर उन दिनों अध्यात्म की खोज की सनक थी। 23-24 वर्ष की अवस्था में उन्होंने संन्यास धारण किया था। समाज सुधार के क्षेत्र में तो उन्होंने 1875 के बाद कदम रखा था। उस समय तक जोतीराव को लोकहित के लिए, जमीनी स्तर पर कार्य करते हुए करीब 27 वर्ष बीत चुके थे। संगठन के स्तर पर पहल करने में भी जोतीराव आगे थे। सत्यशोधक समाज की स्थापना सितंबर, 1873 में हुई थी। जॉर्डन्स के अनुसार, आर्यसमाज की स्थापना की पहली कोशिश 16 जनवरी, 1875 को राजकोट में हुई थी। संस्था के गठन हेतु बुलाई गई बैठक में मात्र तीस लोग शामिल थे। उसमें भी अधिकांश प्रार्थना समाज की स्थानीय शाखा के सदस्य थे। एक तरह से वह प्रार्थना समाज की स्थानीय शाखा का अधिग्रहण था। दयानंद ने नई संस्था के नियम बनाए थे, जिनकी राजकोट में छपाई हुई थी। नियोग तथा विवाह की न्यूनतम उम्र पर विवाद; तथा परिस्थितिगत कारणों से वह संस्था ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकी थी। असल में जिस धार्मिक सुधार को दयानंद अपना लक्ष्य बनाना चाहते थे, उसके लिहाज से गुजरात की जमीन बहुत पुरातन थी। बाद में 10 अप्रैल, 1875 को मुंबई में आर्यसमाज की औपचारिक नींव रखी गई थी।[1]

आर्यसमाज को समाज सुधारक संगठन के रूप में जाना गया। दयानंद को प्रतिष्ठा भी समाज सुधारक के रूप में मिली; लेकिन राजा राममोहन राय की तरह, वे भी हिंदू पुनरुत्थानवादी ही थे। उदाहरण के रूप में बंगाल के एक कट्टरपंथी का कथन था– “मनुष्य को ईश्वर के बारे में जानने से पहले, वेदों और स्मृतियों में बताए गए समस्त रीति-रिवाजों और कर्तव्यों को बिना किसी चूक के पूरा करना चाहिए।” इसपर राजा राममोहन राय ने जवाब दिया था– “हम मानते हैं कि ईश्वरीय ज्ञान अर्जित करने से पहले, समाज के प्रत्येक वर्ग के लिए उनके धर्म के अनुसार शास्त्रोक्त कर्तव्यों एवं रीति-रिवाजों का पालन करना ही मनुष्य का कर्तव्य है।”[2] इससे ब्रह्मसमाज के जातिवादी नजरिए का अनुमान लगाया जा सकता है। असल में वह बंगाल के भद्र लोगों का संगठन था, जो अपने प्राचीन वैभव को जिसे भारत पर विधर्मियों के शासन के दौरान विरूपित कर दिया गया है, प्राप्त करना चाहते थे।

विचारधारा की दृष्टि से जोतीराव फुले और दयानंद दो अलग-अलग ध्रुवों के रहवासी थे। दयानंद के लिए वेद सब कुछ थे। वे भारतीय मनीषा के स्वर्णिम अतीत में विश्वास करते थे। तब तक सैंधव सभ्यता की खोज नहीं हुई थी। दयानंद के लिए पूरी भारतीय जनता आर्य-वंशज थी। आर्य कौन हैं? इसके लिए उन्होंने अष्ठाध्यायी को आधार बनाया था, जिसमें कहा गया है कि ब्रह्मचारी और ब्राह्मण ही आर्य हैं।[3] वर्ण-व्यवस्था को उन्होंने जन्म के बजाय कर्म पर आधारित माना, तथापि यह मानना गलत होगा कि वे तथाकथित शूद्रों पर ज्यादा कृपालु थे, अथवा सामाजिक-सांस्कृतिक असमानता को मिटा देना चाहते थे। असल में वे ब्राह्मणधर्म के आसन्न संकट को देखकर व्यावहारिक सोच अपनाना चाहते थे। उस समय तक सरकार प्रतिनिधि शासन की ओर बढ़ चुकी थी। चौथे वर्ण में आने वाले बहुसंख्यक समाज को आगे भी अलग-थलग रखने का अर्थ था, ब्राह्मण धर्म का अल्पसंख्यक हो जाना। वर्ण-व्यवस्था को उन्होंने भारतीय समाज की विशेषता बताया था। शूद्रों को मर्यादित (वर्णानुसार) शिक्षा, वेदाध्ययन की ढील के साथ वे, वैदिक धर्म के नाम पर ब्राह्मण-युग की वापसी चाहते थे। तदनुसार उतने ही सामाजिक सुधार की कामना करते थे, जो स्वर्णिम ब्राह्मण अतीत की कल्पना को साकार करने में सहायक हो।

जोतीराव फुले और दयानंद सरस्वती

जोतीराव के लिए धर्म पहली-दूसरी तो क्या तीसरी-चौथी प्राथमिकता में भी नहीं था। ब्राह्मण-वर्चस्व की समाप्ति के साथ-साथ वे चाहते थे कि शूद्रातिशूद्रों को लिखने-पढ़ने, सोचने, काम करने और अपने श्रमोत्पाद का लाभ स्वयं उठाने की स्वतंत्रता हो। स्वर्णिम अतीत की परिकल्पना जोतीराव ने भी की थी, किंतु वह ब्राह्मणों की सतयुगी परिकल्पना से अलग थी। उन्होंने ब्राह्मणों द्वारा प्रस्तुत वर्ण-सिद्धांत को एकदम खारिज़ कर दिया था। उनका मानना था कि शूद्रातिशूद्र भारत के मूल निवासी हैं। ‘गुलामगिरी’ में उन्होंने दर्शाया था कि बाहर से आए आर्यों ने किस तरह छल-छद्म द्वारा, भारत-भूमि के आदि शासक रहे शूद्रातिशूद्रों पर, तरह-तरह के षड्यंत्रों के माध्यम से विजय प्राप्त की, उनकी संस्कृति को विकृत किया और स्वयंभू शासक बन बैठे। जोतीराव ने समाज सुधार अभियान की शुरुआत स्त्री शिक्षा से की थी। स्त्री-शिक्षा, समान संपत्ति अधिकार आदि का समर्थन दयानंद ने भी किया था, लेकिन स्त्रियों के वेदाध्ययन को लेकर वे पूर्णतः रूढ़िवादी थे–

1866 के आसपास वे [दयानंद] अजमेर की यात्रा पर, वहां एक बाग में ठहरे हुए थे। अकस्मात कुछ स्त्रियां उनके दर्शन को आ गईं, पूछा‘क्या हम आपकी सभाओं में आ सकती हैं?’

‘हमारे पास तुम्हारा क्या प्रयोजन?’ दयानंद ने कहा था। इसपर स्त्रियों ने उत्तर दिया

‘हम आपके उपदेश सुनना चाहती हैं।’

दयानंद ने यह कहकर कि वे स्त्रियों को उपदेश नहीं देते। चाहें तो अपने पतियों को भेज सकती हैं, उन स्त्रियों को विदा कर दिया।[4]

स्त्री शिक्षा को लेकर दयानंद तिलक जैसे परंपरावादियों की तुलना में थोड़े उदार भले हों, लेकिन वर्ण-व्यवस्था के सिद्धांतों से समझौता करना उन्हें स्वीकार्य न था। ‘मनुस्मृति’ में शूद्रों को शिक्षा के अधिकार से वंचित किया हुआ था। दयानंद ने बस उन्हें वर्ण-व्यवस्था के अनुरूप शिक्षा प्राप्त करने की छूट दी थी, ताकि वे शीर्षस्थ वर्गों को बेहतर सेवा प्रदान कर सकें। शूद्रा और ब्राह्मणी की शिक्षा के बारे में उनका कहना था कि ब्राह्मणी को सभी विद्याएं प्राप्त करने का अधिकार है। क्षत्रिय स्त्री को शेष विद्याओं के साथ-साथ धनुर्वेद, वैश्य स्त्री को केवल व्यवहार (हिसाब-किताब), तथा शूद्र स्त्री को पाकादि (खाना पकाने आदि) सेवाओं का ज्ञान अवश्य हासिल करना चाहिए।[5]

कुल मिलाकर दयानंद स्त्री शिक्षा के वहीं तक समर्थक थे, जहां तक वे वर्ण-व्यवस्था के अनुसार निर्धारित कार्यों में अपने पिता या पति के कार्य में मददगार सिद्ध हो सकें। उनकी तुलना में जोतीराव पूर्ण स्वाधीनतावादी थे।

लैंगिक विषमता आर्य समाज की आरंभिक नियमावली से भी साफ झलकती है। उसके अनुसार आर्य समाज के प्रमुख तथा क्षेत्रीय संगठनों में, स्त्रियों को पहले (अध्यक्ष) और दूसरे (सचिव) पदों पर नियुक्ति का अधिकार नहीं था। वे केवल सदस्य के रूप में स्थान पा सकती थीं। इसी तरह दयानंद ने स्त्री और पुरुष की शिक्षा पर तो जोर दिया था, लेकिन सहशिक्षा की अवधारणा उन्हें अमान्य थी। नियमावली में स्पष्ट निर्देश था कि स्त्रियों की पाठशाला में अध्यापन तथा प्रबंधन के सभी कार्य स्त्रियों द्वारा तथा पुरुष पाठशाला में केवल पुरुषों द्वारा किए जाएंगे। उस नियमावली में वर्ण-व्यवस्था का जिक्र नहीं था, किंतु यह कहकर कि “केवल वेदों को ही स्वतःप्रमाण ही माना जाएगा”, उन्होंने यथास्थिति बनाए रखी थी।[6]

अलग-अलग राह के इन दो यात्रियों – जोतीराव फुले व दयानंद – को इतिहास ने संयोगवश कुछ समय के लिए मिला दिया था। दयानंद के जीवनीकारों ने इसे अधिक महत्व नहीं दिया है। ऐसा शायद इसलिए कि महाराष्ट्र में आर्यसमाज को वैसी सफलता नहीं मिल पाई थी, जैसी हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश आदि में मिली थी। दरअसल पेशवाई ब्राह्मण, दक्षिण के नंबूदरी ब्राह्मणों के जितने ही रूढ़िवादी और कट्टरपंथी थे। आर्यसमाज की स्थापना के बाद दयानंद के आगे बड़ी चुनौती उसके प्रचार-प्रसार की थी। मुंबई में उन्हें मूलजी ठाकर्शी, लखमीदास खीमजी, मथुरादास लावजी, छबीलदास लल्लुभाई जैसे प्रतिष्ठित उद्यमियों एवं व्यापारियों का समर्थन मिला था। इन सभी ने किसी-न-किसी रूप में दयानंद के अभियान को आगे बढ़ाने के लिए खुला सहयोग किया था। मुंबई महाराष्ट्र की व्यापारिक नगरी थी तो पूना वहां की सांस्कृतिक नगरी। बिना पूना को प्रभावित किये, महाराष्ट्र में पांव जमा पाना मुश्किल था। वहां जोतीराव फुले, महादेव गोविंद रानाडे, रामकृष्ण गोपाल भंडारकर जैसे समाज सुधारक पहले से ही कार्यरत थे। उनमें भी जोतीराव धार्मिक-सामाजिक कर्मकांडों से ब्राह्मण पुरोहित का बहिष्कार कर, पूरे ब्राह्मण समुदाय के लिए चुनौती बने हुए थे। दयानंद को महाराष्ट्र में आमंत्रित करने वाले महादेव गोविंद रानाडे थे। उन्हीं के आग्रह पर दयानंद जुलाई, 1875 में पूना पहुंचे थे, वहां रानाडे ने न केवल उनका स्वागत किया था, बल्कि उनके पूना प्रवास के दौरान दिये गये कुल पंद्रह भाषणों को पुस्तकाकार छपवाने का इंतजाम भी किया था।[7]

जॉर्डन्स के अनुसार रानाडे द्वारा दयानंद को पूना आगमन के लिए न्योंतना, तथा उनके प्रचार अभियान में शामिल होना, एक सुधारवादी का दूसरे सुधारवादी को दिया गया सहयोग मात्र था। क्या सचमुच यह सहयोग ही था?

पूना में जोतीराव फुले लगभग तीन दशकों से सुधार-अभियान चला रहे थे। रानाडे उनके काम से प्रभावित थे, लेकिन इस तरह से जोतीराव का सहयोग उन्होंने कभी नहीं किया था। कहने की आवश्यकता नहीं कि दयानंद को पूना आमंत्रित कर उनके प्रचार अभियान में मदद करना, रानाडे सहित दूसरे ब्राह्मण सुधारकों की व्यावहारिक जरूरत बन चुका था। वे दयानंद के वेदोन्मुखी अध्यात्म से सहमत नहीं थे, उनकी चिंता उस ब्राह्मणवाद की सुरक्षा थी, जिनपर जोतीराव का चौतरफा हमला जारी था। दयानंद आर्यसमाज के माध्यम से समाज सुधार के क्षेत्र में नए-नए आए थे, वह स्वर्णिम ब्राह्मण अतीत के प्रवक्ता भी थे, जो सुधारवादी ब्राह्मणों को लालायित करता था। रानाडे के लिए यह बड़ी बात न थी। दयानंद को पूना आमंत्रित करने के अपने निर्णय पर उन्होंने कहा था– “दयानंद वेदों को सर्वोपरि मानते हैं। वे मानते हैं कि केवल वेदों के रास्ते पर चलकर ही मोक्ष संभव है। इसके अलावा उनके विचारों में क्या ऐसा कुछ नहीं है, जो हमारे सिद्धांतों के खिलाफ हो।”[8]

सत्यशोधक समाज अनीश्वरवादी संगठन नहीं था। ब्रह्मसमाज, प्रार्थना समाज आदि की तरह जोतीराव भी एकेश्वरवाद में विश्वास करते थे। लेकिन धार्मिक कर्मकांडों, अनुष्ठानों आदि में रानाडे जैसे सुधारक, ब्राह्मण पुरोहित की भूमिका को बनाए रखने के पक्ष में थे; वहीं जोतीराव उसको एकदम समाप्त करने के लिए आंदोलन चला रहे थे। उनका मानना था कि भारतीय समाज की अनेकानेक बुराइयां पुरोहितवाद की देन हैं। आराधक को आराध्य से संवाद करने के लिए किसी भी बिचौलिए की आवश्यकता नहीं है। इतना ही नहीं, जाति, वर्ण-व्यवस्था के साथ-साथ जोतीराव ने हर उस चीज के बहिष्कार का आह्वान करते थे, जो ब्राह्मणों के एकाधिकार अथवा किसी भी प्रकार के वर्चस्ववाद को मान्य ठहराती थी–

प्रार्थना समाज और ब्रह्म समाज, दोनों ही ईश्वरवाद में विश्वास रखते थे। सत्यशोधक समाज भी ऐसा ही मानता था। तीनों संस्थाओं का विचार था कि ईश्वर एक है, सभी मनुष्य उसकी संतान हैं। आराधक अपने आराध्य को सीधे संबोधित कर सकता है। पूजा-अर्चना अथवा अन्य किसी भी धार्मिक अनुष्ठान हेतु, पुरोहित, गुरु जैसे मध्यस्थ की आवश्यकता नहीं है। तीनों संस्थाएं साप्ताहिक स्तर पर प्रार्थनाओं और बैठकों का आयोजन करती थीं… प्रार्थना समाज और ब्रह्म समाज दोनों प्रार्थना की शक्ति पर विश्वास करते थे। आध्यात्मिक कल्याण के निमित्त ही वे प्रार्थना करते थे। जोतीराव क आध्यात्मिक कल्याण जैसी बातों पर भरोसा नहीं था, न ही इनपर ज्यादा जोर देते थे। वे भगवान के नशे से दूर थे।[9]

पंडित लेखराम के अनुसार दयानंद जून, 1875 में पूना आए थे। वहां वे शंकर शेठ के विट्ठलपेठ स्थित मकान में ठहरे थे। उसके बाद उन्होंने सार्वजनिक पर्चा निकाला था, जिसमें उन्होंने उन छह ग्रंथों के नाम लिखे थे, जिन्हें वे वैदिक परंपरा के अनुसार प्रामाणिक मानते थे। कहा था कि इस सूची से बाहर जितने भी ग्रंथ हैं, वे सब अप्रामाणिक हैं। पूना में उनके व्याख्यान हेतु दो सभास्थल तय किए गए थे। पहला बुद्धवार पेठ स्थित भिड़े बाड़ा, दूसरा पूना छावनी इलाके में मराठी विद्यालय। उनका पहला भाषण 4 जुलाई को भिड़े बाड़ा में हुआ था। कुछ दिनों पश्चात पूना में आर्यसमाज की शाखा की स्थापना भी की थी। इसके बावजूद वे पूनावासियों के मन में आर्यसमाज और उसकी विचारधारा के प्रति वांछित अनुराग जगाने में नाकाम रहे थे। शूद्रातिशूद्रों ने तो दयानंद के सुधार-अभियान को इसलिए नकार दिया था, क्योंकि उनके पास पहले ही जोतीराव जैसा भरोसेमंद मार्गदर्शक था, जिसे वे बीते तीन दशकों से परखते आए थे। दयानंद के अतीतोन्मुखी दर्शन-चिंतन और सुधार-अभियान से रूढ़िवादियों के साथ-साथ सुधारवादियों को भी आपत्ति थी। प्रोफेसर रामकृष्ण गोपाल भंडारकर, विष्णुशास्त्री पंडित जैसे प्रकांड विद्वान तथा सुधारवादी उनके आलोचकों में थे। विष्णुशास्त्री ने अपनी पत्रिका ‘इंदुप्रकाश में दयानंद की आलोचना की थी। दयानंद के पूना-अभियान की असफलता के लिए रूढ़िवादियों को दोषी ठहराते हुए लेखराम ने लिखा था–

हां के चटोरे, उपद्रवी, मूर्ख, विचारहीन, स्वार्थी और द्वैषी लोग स्वामी जी का सत्कार सहन न कर सके और उन्होंने जो कुछ नहीं करना चाहिए था, वह सब किया…ऐसे जगत् पूज्य महानुभाव के साथ हमारे पूना जैसे अत्यंत सभ्य नगर में कभी कोई ऐसा छल नहीं करना चाहि था, परंतु कुटिल, स्वार्थी और मत्सर लोगों ने अपने साथ-साथ इस नगर को भी कलंकित कर दिया है। खैर! जहां बहुत से उत्तम लोगों का वास होता है, वहां चांडालों के घर भी होते हैं, इस लोकोक्ति से यदि हम अपने मन को संतोष भी करा लें तो भी यह बात बुरी हो गई।[10]

रूढ़िवादियों की हालत थी कि जो भी परिवर्तन की मांग करता, नए ज्ञान और सुधारों के समर्थन में खड़ा होता, छूआछूत की आलोचना कर उसे खत्म करने को उद्यत होता, सामाजिक न्याय, समानता, और अधिकारों की बात करता, उसे वे अपने दुश्मन की तरह देखने लगते तथा उसके विरुद्ध सुनियोजित निंदा अभियान छेड़ देते थे। आलोचकों को हिंदू धर्म का दुश्मन घोषित कर देना तो आम बात थी। दयानंद ने अपने भाषणों में विवाह की न्यूनतम उम्र, वेदाध्ययन का अधिकार, छूआछूत, स्त्री शिक्षा, यज्ञ और यज्ञ-बलि जैसे विषय उठाये थे। इन मामलों में सुधार की मांग सुधारवादी बहुत पहले से करते आ रहे थे, दयानंद ने इन विषयों को वेदादि ग्रंथों के प्रमाण के साथ प्रस्तुत कर रहे थे, इसलिए पूना के रूढ़िवादियों का चिढ़ना स्वाभाविक था। 4 जुलाई, 1875 से 4 अगस्त, 1875 तक, मात्र एक महीने में उन्होंने कुल पंद्रह प्रवचन दिए थे, जिन्हें बाद में ‘उपदेश मञ्जरी’ शीर्षक से पुस्तकाकार छापा गया था। दयानंद के प्रवचनों से जहां सुधारवादी उत्साहित थे, वहीं धार्मिक कट्टरपंथियों का गुस्सा बढ़ता जा रहा था। अंततः रूढ़िवादी ब्राह्मणों की ओर से 15 अगस्त, 1875 को विष्णु मंदिर में बैठक आयोजित की गई। उसमें दयानंद के विचारों का जमकर उपहास किया गया था। बैठक के बाद पंडित रामदीक्षित आप्टे तथा पंडित नारायण शास्त्री गोडबोले ने एक नोटिस जारी करते हुए दयानंद से शास्त्रार्थ की चुनौती को स्वीकारने की सहमति दी थी। इसपर ‘इन्दुप्रकाश’ ने 16 अगस्त, 1875 के संपादकीय में लिखा था–

पूना आने के बाद महर्षि दयानंद ने नोटिस के जरि बताया था कि कौन से ग्रंथ प्रामाणिक हैं, कौन से नहीं। उस समय कोई भी पंडित शास्त्रार्थ को आगे नहीं आया था। इसका कारण है कि पूना के पंडित वेदों के बारे नहीं जानते, न ही वे इन ग्रंथों को, जिन्हें दयानंद ने प्रामाणिक कहा है, पढ़-समझ सकते हैं। पूना के पंडितों को यह डर भी था कि यदि वे और मौन रहे तो लोग उन्हें मूर्ख समझने लगेंगे। इसलि यह कहकर कि वे स्वामीजी के साथ शास्त्रार्थ को तैयार हैं, उन्होंने आमजन की नजर में अपनी इज्जत बचा ली थी। हालांकि पत्र में उन्होंने ऐसी शर्तें लिख दी थीं, जिनके बारे में उन्हें लगता था कि वे दयानंद को शायद ही स्वीकार्य होंगी।[11]

गोपाल हरि देशमुख ने तो अपने अखबार ‘हितेच्छु’ में साफ-साफ लिखा था कि पूना के रूढ़िवादी ब्राह्मणों में इतनी हिम्मत ही नहीं थी कि वे स्वामी दयानंद के समक्ष शास्त्रार्थ के लिए उपस्थित हो सकें। इसलिए वे शास्त्रार्थ को टालने के लिए एक के बाद एक प्रपञ्च रच रहे थे।[12] शास्त्रार्थ का दिन तय हुआ। एक ओर वेदज्ञ दयानंद थे, दूसरी ओर पूना के पौराणिक। वे दयानंद की इन घोषणाओं से नाराज थे कि जाति और वर्ण जन्म पर निर्भर नहीं होते, स्त्री और पुरुष दोनों को शिक्षार्जन का अधिकार है, मूर्तिपूजा के लिए वेदों में कोई स्थान नहीं है आदि। सुधी पाठक जानते हैं कि जोतीराव यही बातें तीन दशक पहले से ही कहते आए थे। यही उनके अनुयायी तुकाराम तात्या पडवळ ने अपनी पुस्तक ‘जातिभेद विवेकसार’(1861) में लिखा था। शताब्दियों पहले यही संदेश कबीर और रैदास ने भी दिया था। लेकिन तब उनमें से किसी को किसी ने भी नोटिस नहीं लिया था। क्योंकि तब आलोचना को शूद्र (क्षुद्र) का विचार कहकर टाल देना आसान था। दयानंद न केवल ब्राह्मण थे, बल्कि अपने पक्ष के समर्थन में वेदादि ग्रंथों से तर्क दे रहे थे। इसलिए ब्राह्मणों द्वारा उनकी उपेक्षा आसान न थी। प्रस्तावित शास्त्रार्थ हेतु कट्टरपंथियों का नेतृत्व नारायण भीखाजी जोगलेकर कर रहे थे। वे पूना में सह-आयुक्त थे। दयानंद के विचारों का खंडन करने के लिए उन्होंने ही बैठक का आयोजन किया था। लेकिन भीतर ही भीतर वे दयानंद के सामने पड़ने से कतरा रहे थे।

दयानंद मूर्तिपूजा का विरोध करते थे। उन्हें बदनाम करने के लिए कुछ कट्टरपंथियों ने षड्यंत्र रचा। उन्होंने गणपति की मूर्तियां मंदिर के आगे फेंक दीं। इससे भी तसल्ली न हुई तो शहर का माहौल बिगाड़ने के लिए अहिल्या की मूर्तियां नाली में फेंक दीं। इससे पूरे शहर में तनाव फैल गया। साजिश के तहत कुछ लोगों ने आरोप लगाया कि यह सब दयानंद के कहने पर किया गया है। वही मूर्तिपूजा से घृणा करते हैं। कुछ मूर्तियां बलवंतराव मंदिर के आगे नाली में मिली थीं। अफवाह यहां तक थी कि स्वयं दयानंद ने पंढरपुर के विठोबा मंदिर के आगे मूर्तियां तोड़ी थीं। कुछ लोगों ने यह कहना आरंभ कर दिया था कि स्वामी जी ने अपने प्रवचन में राम को गालियां दी थीं। स्थानीय अखबार इन अफवाहों को हवा देने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे। सरकार को डर था कि लोकप्रिय हिंदू आस्था पर दयानंद द्वारा किए गए प्रहार 1857 जैसी अस्थिरता पैदा कर सकते हैं। इसलिए वह भी उनसे नाराज थी।[13] यह देखते हुए दयानंद ने पूना छोड़ने का फैसला कर लिया। इन्हीं परिस्थितियों के बीच दयानंद तथा उनके विरोधियों के मध्य शास्त्रार्थ हुआ, जिसमें उनके समक्ष पूना के 30-40 पंडित उपस्थित थे।[14]

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दयानंद की पूना से सम्मानजनक विदाई हेतु समाज सुधारकों ने जुलूस निकालने का फैसला किया। इसके लिए 5 सितंबर, 1875 का दिन तय किया गया। पूना के रूढ़िवादियों ने उसमें व्यवधान डालने का पक्का इरादा कर लिया। हिंसक विरोध की संभावना को देखते हुए सुधारकों ने एक दिन पहले ही मदद के लिए जोतिराव से संपर्क किया था। दयानंद वर्ण-व्यवस्था के समर्थक थे। उनके भाषणों में निचली जातियों की कोई रुचि न थी। दयानंद के समाज सुधार संबंधी कुछ विचार जोतीराव के अपने मिशन का भी हिस्सा थे, यही सोचकर उन्होंने आयोजकों की मदद करने का निर्णय लिया था। आयोजकों ने जुलूस के लिए हाथी का इंतजाम किया था। योजना के अनुसार दयानंद एक सजे-धजे हाथी पर विराजमान थे। वेदादि ग्रंथ एक पालकी में ले जाए जा रहे थे। जुलूस के आगे ढोल-बाजे और शंख ज़ोर-ज़ोर से बज रहे थे। जोतीराव स्वयं उस जुलूस में शामिल थे। वे रानाडे तथा अन्य समाज सुधारकों के साथ पैदल चल रहे थे। जूलूस की रक्षा के लिए जोतीराव के समर्थकों में लहुजी द्वारा प्रशिक्षित पहलवान तथा धोंडीबा साळवे, ग्यानोबा कृष्णाजी ससाणे आदि युवा सत्यशोधक कार्यकर्ता शामिल थे।[15] उन्हें देखकर विरोधियों के हौसले पस्त हो गए। उन्होंने वहां से कदम वापस खींचने में ही अपनी भलाई समझी।

कुछ पुस्तकों में लिखा है कि दयानंद स्वामी के पास जब सजा-धजा हाथी लाया गया तो उन्होंने हाथी पर सवार होने से मना कर दिया। कहा कि सिर्फ वेदादि ग्रंथों को हाथी पर ले चलो। संतसेवक पांडुरंग बाळाजी कवडे ने पूरी घटना को इस प्रकार अभिव्यक्त किया है–

स्वामी (दयानंद) के भाषण से पूरा पुणे शहर जाग गया था। उनका प्रत्येक मत वेद-सम्मत होता था; जबकि पुणे के ब्राह्मणों ने वेद सिर्फ़ रटा हुआ था। इसलिए, किसी की भी स्वामी से सीधे बहस करने की हिम्मत नहीं हुई। जस्टिस रानाडे ने जोतीराव की मदद से दयानंद का जुलूस हाथी पर निकालने का फ़ैसला किया। इसपर स्वामी ने कहा, ‘सिर्फ़ वेद हाथी पर ले चलो, मैं पैदल चलूंगा!’ पुणे के कट्टरपंथियों ने जुलूस पर हमला किया, लेकिन जोतीराव के सत्यशोधकों ने पलटकर जवाब दिया तथा हमलावरों को मुंह छिपाकर भागने को मजबूर कर दिया।[16]

जुलूस में शामिल लोगों को लगा कि बला टल गई। मगर सनातनी इतनी आसानी से बाज आने वाले नहीं थे। उनके रहते कोई सुधारवादी अभियान आसानी से सफल हो जाए, भला यह कैसे संभव था! पूना के कट्टरपंथियों और गुंडों ने तय किया था कि जुलूस को बिना किसी रुकावट और परेशानी के नहीं जाने देंगे। जब उसमें नाकाम हुए तो खीझ मिटाने के लिए उन्होंने एक गधे को सजाया, उसे उसी रंग की पगड़ी पहनाई जो स्वामी जी ने पहनी हुई थी। उसका नाम गर्दभानंद रखा; और जुलूस बनाकर उसके पीछे-पीछे चलने लगे। सुधारवादियों का जुलूस अपनी मंज़िल पर पहुंचने के तुरंत बाद, विरोधियों का गर्दभानंद वाला जुलूस भी वहां पहुंच गया। इससे दोनों गुटों के बीच खुला संघर्ष होने लगा। रानाडे को इसका अंदेशा था, इसलिए उन्होंने पुलिस सुरक्षा का इंतज़ाम पहले ही कर लिया था। पुलिस के लाठीचार्ज के बाद उपद्रवी भीड़ बदहवास होकर बिखर गई।[17]

‘महर्षि दयानंद : काल और कृतित्व’ के लेखक डॉ. कुशलदेव शास्त्री का मत है कि दयानंद ने पूना में पचास से अधिक व्याख्यान दिए थे, तथा जोतीराव फुले ने उनमें से अधिकांश में हिस्सेदारी की थी। उनके अनुसार स्वयं जोतीराव ने उन्हें मोमिनपुरा स्थित पाठशाला में प्रवचन के लिए आमंत्रित किया था, जहां उन्होंने 16 जुलाई, 1875 को वेदों पर प्रवचन दिया था। यह कथन संदिग्ध नजर आता है। दयानंद, रानाडे के आग्रह पर पूना पहुंचे थे। उनके आगमन से लेकर विदाई समारोह तक, रानाडे उनके साथ थे। उन्होंने ही दयानंद के 15 व्याख्यानों को संकलित कर छापने में मदद की थी। यह भी सच है कि वे पूना में दो महीनों से अधिक रहे थे। जहां तक जोतीराव फुले की बात है, विभिन्न लेखकों द्वारा दिए गए विवरणों से पता चलता है कि दयानंद के जुलूस की तैयारी कर रहे रानाडे जैसे नेताओं ने जुलूस से एक दिन पहले ही, जोतीराव से मदद मांगी थी। यह मानते हुए कि दयानंद का आध्यात्मिक दृष्टिकोण चाहे जो भी हो, अंततः वे भी समाज सुधार चाहते हैं, जोतीराव तुरंत उनकी मदद को तैयार हो गये थे। यदि वे दयानंद और उनके पूना अभियान में विशेष रुचि ले रहे होते तो उन्हें अवश्य ही पूना के ब्राह्मणों द्वारा विरोध में चलाए जा रहे षड्यंत्र का पता होता। उस अवस्था में वे जुलूस की सफलता की जिम्मेदारी स्वयं अपने कंधों पर उठा लेते। हो सकता है कि दोनों नेताओं के बीच संवाद रहा हो, लेकिन जोतीराव दयानंद को शूद्र पाठशाला में वेदों पर प्रवचन के लिए आमंत्रित करेंगे, यह विश्वसनीय नहीं लगता। यह बात धर्मग्रंथों के प्रश्न पर आर्यसमाज के नेताओं की ओर से प्राप्त पत्र के उत्तर से भी साफ हो जाती है। जोतीराव ने उसमें लिखा था–

हमें धर्मग्रंथ की आवश्यकता नहीं है, हमारा मस्तिष्क ज्ञान के लिए खुला होना चाहिए और बौद्धिक जिज्ञासा को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।[18]

जोतीराव फुले तर्कसम्मत ज्ञान को प्राथमिकता देते थे, यही बात उन्हें अपने समकालीन समाज-सुधारकों से अलग सिद्ध करती है।

संदर्भ :

[1] जोसफ टेरेसा फ्लोरेंट जॉर्डन्स, दयानंद सरस्वती : हिज लाइफ एंड आइडियाज [1960 : 133-134]

[2] शिवनाथ शास्त्री, हिस्ट्री ऑफ ब्रह्मो समाज-एक [1911 : 68-69]

[3] आर्यो ब्राह्मणकुमारयोः। अष्ठाध्यायी 6।2।58।। स्वामी दयानंद, उपदेश मञ्जरी [2005 : 69]

[4] पण्डित लेखराम, जीवनचरित्र : महर्षि स्वामी दयानंद [1960 : 67]

[5] स्वामी दयानंद सत्यार्थप्रकाशः तीसरा समुल्लास [2008 : 68]

[6] पण्डित लेखराम, जीवनचरित्र : महर्षि स्वामी दयानंद [1960 : 255-256]

[7] धनञ्जय कीर, महात्मा जोतीराव फुले [1960 : 138]; जॉर्डन्स, दयानंद सरस्वती : हिज लाइफ एण्ड आइडियाज् [1960 : 136]

[8] जॉर्डन्स, दयानंद सरस्वती : हिज लाइफ एण्ड आइडियाज् [1960 : 136]

[9] धनञ्जय कीर, महात्मा जोतीराव फुले [1960 : 129]

[10] पण्डित लेखराम, जीवनचरित्र : महर्षि स्वामी दयानंद [1960 : 268-270]

[11] हरविलास शारदा, लाइफ ऑफ दयानंद सरस्वती [1946 : 145-146]

[12] हरविलास शारदा, लाइफ ऑफ दयानंद सरस्वती [1946 : 146]

[13] हरविलास शारदा, लाइफ ऑफ दयानंद सरस्वती [1946 : 146-147]

[14] पण्डित लेखराम, जीवनचरित्र : महर्षि स्वामी दयानंद [1960 : 265-266]

[15] धनञ्जय कीर, महात्मा जोतीराव फुले [1960 : 139], श्रीराम गुंदेकर, सत्यशोधक महात्मा जोतिबा फुले [2004 : 57]

[16] स्वामींस पुण्यास आणण्यासाठी न्यायमूर्ती रानडे यांनी पुढाकर घेतला होता। स्वामींच्या व्याख्यानाने सारे पुणे शहर खडबडून जागे झाले। स्वामींच्या प्रत्येक तत्त्वास वेदांचा आधार असे। पुण्यातील ब्राह्मणांचे वेदांचे ज्ञान फक्त पाठांतरात होते! त्यामुळे स्वामींशी प्रत्यक्ष वादविवाद करण्यास कोणी धजले नाहीत। न्यायमूर्ती रानडे यांनी जोतीरावांच्या मदतीने स्वामींची हत्तीवरून मिरवणूक काढण्याचे ठरविले। परंतु स्वामींनी सांगितले, हत्तीवर फक्त वेद ग्रंथ ठेवणे, मी स्वतः पायी चालेन! मिरवणुकीवर पुण्यातील कर्मठांनी हल्ला केला पण जोतीरावांच्या सत्यशोधकांनी तो परत फिरवून उलट त्यांचीच फटफजिती केली। संतसेवक पांडुरंग बाळाजी कवडे। महात्मा जोतीराव फुले ह्यांचे चरित्र [1968 : 144]

[17] स्वामी बांधीत असलेल्या फेट्याप्रमाणेच सनातन्यांनी एक फेटा गाढवाच्या डोक्यास बांधला व गाढवाची मिरवणूक काढून आपले सत्यधर्मद्रोही हृदय प्रगट केले। संतसेवक पांडुरंग बाळाजी कवडे। महात्मा जोतीराव फुले ह्यांचे चरित्र [1968 : 144] तथा धनञ्जय कीर, महात्मा जोतीराव फुले [1960 : 139]

[18] दीनमित्र, 31 जनवरी 1912, एम भव्यांश, जोतिबा फुले एण्ड दि आर्ट ऑफ डिस्सेंट, 2019 दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा उद्धृत

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

ओमप्रकाश कश्यप

साहित्यकार एवं विचारक ओमप्रकाश कश्यप की विविध विधाओं की पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं। बाल साहित्य के भी सशक्त रचनाकार ओमप्रकाश कश्यप को 2002 में हिन्दी अकादमी दिल्ली के द्वारा और 2015 में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के द्वारा समानित किया जा चुका है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन।

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