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मंगू राम मुगोवालिया, आद धर्म आंदोलन और रविदास पंथ का उदय

यद्यपि पंजाब के अछूत समुदाय में पहले से ही गुरु रविदास (रैदास) के प्रति गहन श्रद्धा भाव था मगर आद धर्म आंदोलन ने अत्यंत प्रभावी तरीके से उनकी तस्वीरों का उपयोग कर राज्य की निम्न जातियों की संस्कृति को एक नया, मज़बूत स्थान दिलवाया। बता रहे हैं रौनकी राम

आद धर्म आंदोलन भारत के उत्तर-पश्चिमी इलाके में अपनी तरह का अनोखा आंदोलन था। इसका उद्देश्य था– तत्कालीन अछूतों को समाज में गरिमापूर्ण स्थान देना। और वह धार्मिक सुधारों, आध्यात्मिक सशक्तिकरण, सांस्कृतिक रूपांतरण और राजनीतिक अभिव्यक्ति के ज़रिए इन वर्गों को एक विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक पहचान दिलवाकर अपना लक्ष्य हासिल करना चाहता था। यद्यपि उसके पहले दक्षिण भारत में आदि आंदोलन हो चुके थे, मगर आद आंदोलन इस क्षेत्र की सामाजिक-सांस्कृतिक और धार्मिक परिस्थितियों की उपज था। महाराष्ट्र के शूद्र-अतिशूद्रों के सत्यशोधक समाज आंदोलन की तरह, आद धर्म आंदोलन भी पंजाब के अछूत समुदाय के घर-घर तक पहुंचा।

सन् 1920 के मध्य में शुरू हुए आद धर्म आंदोलन के मुख्य संस्थापक बाबू मंगू राम मुगोवालिया का नाम पंजाब के अछूतों में अत्यंत लोकप्रिय था। जालंधर जिले की बूटन मंडी के बड़े चमड़ा व्यवसायी सेठ किशन दास ने आंदोलन को आर्थिक मदद उपलब्ध करवाई। पड़ोसी होशियारपुर जिले के हज़ारा राम पिपलानवाला, हरी राम पंडोरी बीबी और संत राम आजाद इस आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल थे।

बाबू मंगू राम मुगोवालिया ने आंदोलन की शुरुआत अपने गृहनगर (मुगोवाल, गढ़शंकर तहसील, पंजाब) में स्थित एक स्कूल से की थी। इस स्कूल की स्थापना उन्होंने ही की थी। इसके पहले 16 साल तक वे अमेरिका, सिंगापुर और फिलीपींस सहित अन्य देशों में रह चुके थे। उन्हें भारत में हथियारों की तस्करी करने का प्रयास करने के आरोप में ब्रिटिश सरकार ने मौत की सज़ा सुनाई थी। उससे बचने के लिए उन्होंने लंबा समय निर्वासन में बिताया। गदर पार्टी के उनके चार अन्य साथियों बाबा हरिसिंह उस्मान, गंभीर सिंह, हरनाम चंद्र और हरनाम दास सहित उन्हें अंग्रेज सैनिकों द्वारा गिरफ्तार किया गया था और बाद में उन्हें मौत की सज़ा सुनाई गई। जर्मन सिपाहियों ने अंग्रेजों की हिरासत से भाग निकलने में उनकी मदद की। जब मंगूराम विदेश में थे तब ब्रिटिश सरकार ने गलती से यह घोषणा कर दी कि उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया है। उसके बाद उनकी विधवा पियारी ने रवायत के अनुरूप उनके बड़े भाई से शादी कर ली। जब वे गांव लौटे तो उन्हें जिंदा देखकर सब चकित रह गए। बाद में उन्होंने बिशनो नामक महिला से शादी की और दोनों के चार पुत्र हुए।

बाबू मंगू राम मुगोवालिया ने काफी लंबा समय भारत से दूर बिताया था। मगर जब वे पंजाब लौटे तो उन्हें यह देखकर बहुत अचंभा हुआ कि इतने साल बाद भी उनके समुदाय की जिंदगी में कोई बदलाव नहीं आया था। उनके शब्दों में– “विदेश में रहने के दौरान मैं ऊंच-नीच और अछूत प्रथा को लगभग भुला चुका था और जब मैं दिसंबर, 1925 में घर लौटा तब भी मैं इसी भ्रम में था कि पंजाब बदल चुका होगा। मगर मैंने पाया कि जिस बीमारी से बचने के लिए मैं पंजाब से गया था वह अब भी जिंदा थी और उसने मुझे फिर से त्रास देना शुरू कर दिया। मैंने इन सब के बारे में मेरे नेता लाला हरदयाल जी को लिख भेजा। मैंने उन्हें लिखा कि जब तक इस बीमारी का इलाज नहीं होता तब तक हिंदुस्तान आज़ाद नहीं हो सकता। उनके निर्देशों के अनुसार सन् 1926 में भारत की अछूत कौम को जागृत करने और उसकी उन्नति के लिए एक कार्यक्रम बनाया गया।”

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वे सन् 1909 में सबसे पहले अमेरिका गए थे। कैलिफोर्निया में फार्महाउसों में काम करते हुए वे गदर पार्टी के संपर्क में आए। यह एक क्रांतिकारी संगठन था जो हथियारबंद बगावत के जरिए भारत को अंग्रेजी शासन से मुक्त करवाना चाहता था। (सन् 2022 में अमरीका के कैलिफोर्निया राज्य के सैन फ्रांसिस्को शहर के गदर मेमोरियल हाल में मंगू राम का एक चित्र लगाया गया। यह हॉल उसी भवन में है जो गदर पार्टी का मुख्यालय हुआ करता था।) भारत लौटकर बाबू मंगू राम मुगोवालिया अपने पुश्तैनी गांव में बस गए। वहां उन्होंने अछूत समुदाय के बच्चों के लिए एक स्कूल खोला। प्रारंभ में यह स्कूल गांव के एक ज़मींदार रिसालदार धनपत राय के बगीचे में खोला गया। बाद में गांव के एक अन्य ज़मींदार लंबरदार बीरू राम संघा ने स्कूल के लिए अपनी आधा एकड़ जमीन दान कर दी। इस स्कूल में बाबा मंगू राम सहित पांच अध्यापक थे और इसी स्कूल की भवन में आद धर्म आंदोलन की पहली बैठक 11-12 जून, 1926 को आयोजित की गई थी। 

इस बैठक के आयोजन की घोषणा करते हुए एक पोस्टर प्रकाशित किया गया, जिसमें कथित ऊंची जातियों द्वारा अछूतों की प्रताड़ना का विवरण देते हुए अछूतों से अपील की गई थी कि वे एकजुट होकर अपनी मुक्ति और बेहतरी के लिए एक साझा कार्यक्रम बनाएं। अंततः यह आंदोलन अविभाजित पंजाब के कोने-कोने में फैल गया। मुगोवालिया ने आद धर्म का एकदम स्पष्ट एजेंडा निर्धारित किया। उन्होंने पददलितों के हितों की रक्षा और उनके लिए एक अलग पहचान के निर्माण पर ज़ोर दिया और इस दिशा में प्रभावी कदम उठाए। 

जो महात्मा जोतीराव फुले महाराष्ट्र के लिये थे, वही बाबू मंगू राम मुगोवालिया पंजाब के लिये थे। फुले ने महाराष्ट्र की निम्न जातियों को जागृत किया। बाबू मंगू राम मुगोवालिया ने पंजाब के अछूतों के मामले में यही किया। फुले पर इंग्लैंड में जन्मे 18वीं और 19वीं सदी के अमरीकी राजनीतिज्ञ, विचारक, दार्शनिक और क्रांतिकारी थॉमस पेन का गहरा प्रभाव था। बाबू मंगू राम को पहली बार स्वतंत्रता, सामाजिक समानता और मानवीय गरिमा का स्वाद अपने अमरीका प्रवास के दौरान चखने को मिला। यहीं वे क्रांतिकारी स्वाधीनता सेनानियों के संपर्क में भी आए जिन्हें गदरी बाबा के नाम से पुकारा जाता था। मंगू राम अंग्रेजों से भारत को आजादी दिलवाने के लिए संघर्ष में हिस्सा लेना चाहते थे। इसके साथ ही वे जाति-आधारित अछूत कुप्रथा के खिलाफ भी संघर्ष करना चाहते थे। वे एक ऐसे समाज का निर्माण करना चाहते थे जिसमें जाति के लिए कोई जगह न हो और जिसमें सभी को आज़ादी हासिल हो। 

आद धर्म और रविदास आंदोलन

यद्यपि पंजाब के अछूत समुदाय में पहले से ही गुरु रविदास (रैदास) के प्रति गहन श्रद्धा भाव था, मगर आद धर्म आंदोलन ने अत्यंत प्रभावी तरीके से उनकी तस्वीरों का उपयोग कर राज्य की निम्न जातियों के संस्कृति को एक नया, मज़बूत स्थान दिलवाया। बाबू मंगू राम के कुशल नेतृत्व में आद धर्म आंदोलन ने गुरु रविदास के चित्र को अपना प्रतीक चिह्न बनाया। आंदोलन ने उनकी बानी का गायन करना और उनके जीवन की कहानियां सुनाना शुरू की, जिनसे यह जाहिर होता था कि समाज का दमित वर्ग एक समय कितना प्रभावशाली था और दमित वर्गों को क्यों अपने पर गर्व करना चाहिए। इस सबने आद धर्म आंदोलन की आम लोगों में पैठ बनाने में मदद की।

आद धर्म आंदोलन ने गुरु रविदास की मसीहाई छवि और आदर्श ग्राम बेगमपुरा की उनकी संकल्पना का इस्तेमाल करते हुए ब्रिटिश सरकार को इस बात के लिए राजी कर लिया कि सन् 1931 की जनगणना में पंजाब की निम्न जातियों के लिए आद धर्म को एक नए और अलग धर्म के रूप में मान्यता दी जाए। नतीजा यह हुआ कि पंजाब में सन् 1931 की जनगणना में 4,18,789 लोगों ने अपने आप को आद धर्मी बताया। आगे चलकर अछूतों का यह धर्म एक जाति बन गया – आद धर्मी या रविदासिया। सन् 2011 की जनगणना के अनुसार आद धर्मी या रविदासिया पंजाब में अनुसूचित जातियों (पूर्व अछूतों) की कुल आबादी का 11.48 प्रतिशत हैं। आद धर्मी, गुरु रविदास सभाओं के रूप में संगठित हैं और उन्होंने बड़ी संख्या में रविदास डेरों की स्थापना की है। रविदास डेरों की बढ़ती संख्या को रविदासिया अस्मिता की बढ़ती लोकप्रियता के प्रतीक के रूप में देखा जाता रहा है। सन् 2003 में किए गए एक अध्ययन के अनुसार पंजाब में करीब 100 रविदास डेरे थे। तब से ऐसे और कई डेरे स्थापित हुए हैं। आधे से ज्यादा रविदास डेरे चार जिलों – होशियारपुर, जालंधर, कपूरथला और नवांशहर – में हैं। ये चारों जिले सतलज और व्यास नदियों के बीच स्थित पंजाब के दोआबा क्षेत्र में हैं और इसी क्षेत्र में अनुसूचित जातियों की सबसे बड़ी आबादी रहती है।

बाबू मंगू राम मुगोवालिया के नेतृत्व में चले आद धर्म आंदोलन के पंजाब के पूर्व अछूतों के लिए एक नए सांस्कृतिक स्पेस का निर्माण किया जिसके नतीजे में देश और विदेश में बड़ी संख्या में रविदास डेरे स्थापित हुए। चित्र इंग्लैंड के बरमिंघम में स्थिति एक रविदास डेरे का है।

रविदास डेरों की स्थापना करने में विदेशों में रह रहे पंजाब के अनुसूचित जाति के सदस्य भी पीछे नहीं हैं। उन्होंने दुनिया के कई देशों के शहरों में रविदास डेरे स्थापित किए हैं। इनमें से कुछ हैं कनाडा का वैंकूवर, कैलगरी, ब्रैंपटन, टाेरंटो और मॉन्ट्रियल और अमेरिका के न्यूयार्क, सैक्रामेंटो, पिट्सबर्ग, सीएटल, फ्रेस्नो, ह्युस्टन, सेल्मा एवं ऑस्टिन। ब्रिटेन में वोल्वरथैम्प्टन, बरमिंघम, ब्रेडफोर्ड, कोवेन्ट्री, डर्बी, लंकास्टर, साउथॉल, साउथैम्प्टन, केंट और बेडफ़ोर्ड आदि शहरों में रविदास डेरे हैं। वर्ष 2010 के बाद से आस्ट्रिया, इटली, फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, हॉलैंड, न्यूजीलैंड, ग्रीस एवं लेबनान में भी रविदास मंदिरों/गुरुद्वारों का निर्माण हुआ है। हिंदू मंदिरों और सिक्ख गुरुद्वारों के विपरीत, रविदास डेरों में अनुसूचित जातियों के साथ कोई भेदभाव नहीं होता। इस तरह यह डेरे एक ऐसा वैकल्पिक धार्मिक स्थल उपलब्ध करवाते हैं जिनमें अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों को अपनी पहचान छुपाने की जरूरत नहीं होती। वे इस मामले में भी अलग हैं कि वे मुख्यधारा के किसी धर्म को स्वीकार नहीं करते और न ही उनमें उच्च जातियों के सामाजिक, सांस्कृतिक लोकाचार का पालन किया जाता है। अपनी विशिष्ट पहचान को रेखांकित करने के लिए रविदास डेरों ने अपने अलग धार्मिक अनुष्ठान, रस्मो-रिवाज, नारे, प्रतीक, पवित्र तिथियां, अरदास, कीर्तन, त्यौहार और मूर्तिकला विकसित की है। ये डेरे लंबे समय से निम्न जातियों को जागरूक करने और उनके सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के केंद्रों के रूप में काम कर रहे हैं। रविदास डेरों की धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का आधार गुरु रविदास की शिक्षाएं और उनका जीवन होता है। कुछ डेरों में लंगर चलते हैं और कुछ में आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध हैं। कुछ अन्य डेरों ने अंग्रेजी माध्यम के मिडिल और हाई स्कूल भी खोले हैं, जिनमें आधुनिक तरीकों से शिक्षा प्रदान की जाती है। जालंधर के नजदीक स्थित डेरा सचखंड बल्लां के मुखिया संत निरंजनदास को हाल में पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया। उन्हें रविदासिया समुदाय में सामाजिक मेल-मिलाप, समाजसेवा एवं आध्यात्मिकता के क्षेत्र में जीवनपर्यंत प्रेरणास्पद कार्य करने के लिए यह सम्मान दिया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरु रविदास की 649वीं जयंती के अवसर पर 1 फरवरी, 2026 को डेरा सचखंड बल्लां की यात्रा की। इससे पंजाब की डेरा संस्कृति को बढ़ावा मिला। 

आद धर्म, आंबेडकर और चुनावी राजनीति

बाबू मंगू राम मुगोवालिया ने लंदन गोलमेज सम्मेलन में बाबासाहेब डॉ. बी.आर. आंबेडकर द्वारा डिप्रेस्ड क्लासेज (बाद में जिन्हें अनुसूचित जातियां कहा गया) के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की मांग का समर्थन किया। बाबू मंगू राम मुगोवालिया के नेतृत्व में आद धर्म आंदोलन ने 1937 और 1946 में पंजाब प्रांतीय विधानमंडल के चुनाव लड़ा। इससे पंजाब की अनुसूचित जातियां राज्य विधानमंडल में अपनी मौजूदगी स्थापित कर सकीं। सन् 1937 के विधानसभा चुनाव में पंजाब में आठ सीटें अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित थीं। आद धर्म आंदोलन ने यूनियनिस्ट पार्टी की मदद से इन सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए। आद धर्म के उम्मीदवार सात सीटों पर विजयी रहे। एक सीट (होशियारपुर) से कांग्रेस के उम्मीदवार मूला सिंह जीते। उन्होंने आद धर्म के हजारा राम पिपलानवाला को सात वोटों के अंतर से हराया।

सन् 1946 में बाबू मंगूराम ने होशियारपुर सीट से जीत हासिल की। इसके 50 साल बाद 1996 में होशियारपुर ने ही कांशीराम को लोकसभा में भेजा। स्वाधीन भारत के पहले आम चुनाव के दौरान जालंधर की बूटन मंडी में 27 अक्टूबर, 1951 को आंबेडकर की आमसभा आयोजित थी। इस आमसभा में भाग लेने के लिए शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन की पंजाब शाखा की अपील का जबदरस्त असर हुआ और इसका कारण थी बाबू मंगू राम मुगोवालिया द्वारा तैयार की गई राजनीतिक ज़मीन। अगले दिन बाबासाहेब ने जालंधर डी.ए.वी. कॉलेज के प्रांगण में मॉक पार्लियामेंट का आयोजन किया और विद्यार्थियों एवं शिक्षकों को संबोधित किया। इसके बाद क्रमशः 28 और 29 अक्टूबर को उन्होंने लुधियाना और पटियाला में आयोजित आमसभाओं को संबोधित किया। 

मुगोवालिया के नेतृत्व में आद धर्म आंदोलन ने पंजाब में अनुसचित जातियों को एक अलग पहचान दी, उनके नायकों जैसे भगवान वाल्मीकि, सतगुरु नामदेव, सतगुरु कबीर साहिब और सतगुरु रविदास की स्मृतियों को ताज़ा किया और उनमें शासक बनने की ललक पैदा की। आंबेडकर के नेतृत्व ने इस ललक को और तीव्र किया। पंजाब के एससी समुदाय में सामाजिक-राजनीतिक जागरूकता के विकास में मुगोवालिया की भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

अमेरिका के सांता बारबरा में स्थित कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के शिक्षक और जानेमाने सामाजिक मानवशास्त्री मार्क ज्यर्गंसमेयेर, जिन्होंने आद धर्म आंदोलन पर अपना पीएचडी शोधप्रबंध लिखा था, के मौलिक योगदान पर चर्चा के बगैर आद धर्म और उसके संस्थापक बाबु मंगू राम मुगोवालिया की कहानी अधूरी रहेगी। यह शोधप्रबंध एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ जिसका शीर्षक था– ‘रिलीजियस रेबेल्स इन द पंजाब: द सोशल विज़न ऑफ़ अनटचेबिल्स’। इस आंदोलन और इसके संस्थापक पर इस ज़मीनी अध्ययन ने पंजाब में निम्न जातियों के सामाजिक उत्थान में मुगोवालिया और आद धर्म आंदोलन के शानदार योगदान से दुनिया को परिचित करवाया। मार्क ज्यर्गंसमेयेर ने हाल में मुगोवालिया को एक संत बताया। उन्होंने फेसबुक पर लिखा– “शुरुआत में शहादत, संत का दर्जा हासिल करने की सबसे महत्वपूर्ण शर्त थी। अंग्रेज़ी शब्द मारट्येर (शहीद) यूनानी भाषा के ‘मारटर’ शब्द से उपजा है, जिसका अर्थ होता है अपनी आस्था के प्रति वफ़ादारी। जो लोग अपनी आस्था के प्रति इतने वफादार होते हैं कि वे उसे त्यागने की बजाय अपनी जिंदगी कुर्बान करना बेहतर समझते हैं वे ही सच्चे शहीद होते हैं। यह हमें मंगू राम की याद दिलाता है। इसमें कोई शक नहीं कि वे शहीद की इस परिभाषा पर खरे उतारते हैं। यह सचमुच अद्भुत है कि कैलिफ़ोर्निया में रहने के बाद वे उस भारत में लौटे जो उन्हें अछूत मानता था। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उन्होंने ऊंची जातियों के प्रतिरोध का सामना करते हुए अपने लोगों के अधिकारों की लड़ाई लड़ी। हममें से कितने इतना जोखिम उठा सकते हैं? वे हमें नेल्सन मंडेला की याद दिलाते हैं जिन्हें कई दशकों तक दक्षिण अफ्रीका के रोब्बें द्वीप पर जेल में सड़ना पड़ा – तब तक जब तक कि राजनीतिक माहौल बदल नहीं गया। जब मंडेला अंततः रिहा हुए तब उनके देश ने उनका स्वागत एक महानायक के रूप में किया और उन्हें रंगभेद-मुक्त दक्षिण अफ्रीका का पहला राष्ट्रपति बनाया गया। मंगू राम का जीवन वृत्त भी कुछ ऐसा ही था। हालांकि वे भारत के राष्ट्रपति नहीं बने मगर वे विधानमंडल के सदस्य बने और भारत सरकार ने उन्हें स्वाधीनता सेनानी का दर्जा दिया … मैं बिना किसी संदेह के यह कह सकता हूं कि अपनी महानता के बावजूद, मंगू राम अंततः एक मनुष्य थे और उनमें निश्चय ही वे सारी कमजोरियां रही होंगी, जो मनुष्यों में होती हैं। मगर उनमें कुछ तो ऐसा था जो अलग था। वे एक चमकते हुए सितारे थे – जिस पर मुग्ध होना आसान है मगर जिसकी राह पर चलना बहुत कठिन है। हम सब संत नहीं बन सकते। मगर खुदा की रहमत है कि इस धरती पर उन जैसे लोग रहे। यह हमारा सौभाग्य है कि हम उस दुनिया में रहते हैं जिसमें मंगू राम जैसे लोग हुए।”

(मूल अंग्रेजी से अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

रौनकी राम

रौनकी राम पंजाब विश्वविद्यालय,चंडीगढ़ में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर हैं। उनके द्वारा रचित और संपादित पुस्तकों में ‘दलित पहचान, मुक्ति, अतेय शक्तिकरण’, (दलित आइडेंटिटी, इमॅनिशिपेशन एंड ऍमपॉवरमेंट, पटियाला, पंजाब विश्वविद्यालय पब्लिकेशन ब्यूरो, 2012), ‘दलित चेतना : सरोत ते साररूप’ (दलित कॉन्सशनेस : सोर्सेए एंड फॉर्म; चंडीगढ़, लोकगीत प्रकाशन, 2010) और ‘ग्लोबलाइजेशन एंड द पॉलिटिक्स ऑफ आइडेंटिटी इन इंडिया’, दिल्ली, पियर्सन लॉंगमैन, 2008, (भूपिंदर बरार और आशुतोष कुमार के साथ सह संपादन) शामिल हैं।

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