पंजाब के आद धर्म आंदोलन ने अछूतों को दिया मूलनिवासी का दर्जा

बाबू मंगूराम मुगोवालिया द्वारा स्थापित आद धर्म की 95वीं वर्षगांठ पर रौनकी राम बता रहे हैं कि यह आंदोलन पंजाब में अछूतों के जीवन में कांतिकारी बदलावों का कारक बना

अनुसूचित जातियां पंजाब की कुल आबादी का एक-तिहाई हैं। देश के किसी अन्य राज्य में अनुसूचित जातियां जनसंख्या का इतना बड़ा हिस्सा नहीं हैं। इसके बावजूद, इस कृषि-प्रधान राज्य में खेती की ज़मीन में उनकी हिस्सेदारी सबसे कम है। उनमें से केवल 5 प्रतिशत छोटे किसान हैं। यद्यपि जनगणना में उनकी गिनती अन्य समुदायों और जातियों के साथ ही की जाती है, परंतु असल में वे सबके साथ नहीं रहते। दलितों की बस्तियों गांवों की सीमाओं पर होती हैं। पंजाब के तीनों भौगोलिक-सांस्कृतिक क्षेत्रों में इन बस्तियों के अलग-अलग नाम हैं और वे सभी अपमानजनक हैं। दोआब में उन्हें चमारली, मालवा में थाथी और माझा में वेहरा कहा जाता है। पंजाबी कौम के अन्य तबको की तरह, पंजाबी अनुसूचित जातियां भी अन्यायपूर्ण शासकों और सामाजिक दमन के खिलाफ गुरु गोविन्द सिंह के नेतृत्व में खालसा सेना द्वारा किये गए युद्धों में अपनी वीरता के लिए जानी जातीं हैं। सन् 1920 के दशक के उत्तरार्द्ध में गरिमापूर्ण जीवन की चाह में वे आद धर्म के झंडे तले गोलबंद हुईं। यह अविभाजित पंजाब में अछूतों का पहला आंदेालन था, जो 11-12 जून 1926 को शुरू हुआ। पंजाब का आद धर्म आंदोलन, शेष भारत के विभिन्न हिस्सों में उसी कालखंड में उदित आदि आंदोलनों के समानांतर चलता रहा, परंतु उसने अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाये रखा। 

आद धर्म आंदोलन के संस्थापक बाबू मंगूराम मुगोवालिया (14 जनवरी, 1886 – 22 अप्रैल, 1980) थे। वे होशियारपुर जिले के मुगोवाल नामक गांव में चमड़े का व्यवसाय करने वाले एक परिवार में जन्में थे। उनके पिता उन्हें पढ़ाना-लिखाना चाहते थे, ताकि वे व्यवसाय में उनकी मदद कर सकें – जैसे अंग्रेजी में लिखे आर्डर पढ़कर। अपेक्षाकृत समृद्ध परिवार से आने के बावजूद, ‘नीची जाति’ में जन्म लेने के कारण उन्हें सामाजिक बहिष्करण का सामना करना पड़ा। इसी कारण उन्हें अपने गांव के नज़दीक बजवारा में स्थित स्कूल को मैट्रिकुलेशन किये बगैर छोड़ना पड़ा। इसके बाद दोआब के अनेकानेक शुरूआती प्रवासियों की तरह, बेहतर जीवन की तलाश में मंगूराम 1909 में अमरीका पहुंच गए। उस समय, उत्तरी अमेरिका में रह रहे पंजाबी प्रवासी देश को स्वतंत्र करवाने के लिए एक क्रांतिकारी संगठन का गठन करने की योजना बना रहे थे। मंगूराम भी 1913 में स्थापित ग़दर लहर के सक्रिय सदस्य बन गए। वे पांच क्रांतिकारियों के एक ग़दर दल के सदस्य थे, जिसे ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह के लिए हथियार भारत पहुंचाने का कठिन काम दिया था।          

परंतु एसएस मेवरिक नामक जहाज, जिससे हथियार ले जाए जा रहे थे, रास्ते में ही पकड़ लिया गया और मंगूराम फिलीपीन्स में फंस गए। वे छद्य नाम से वहां 12 साल तक गुमनामी का जीवन जीते रहे। सन् 1925 में वे जब अपने गांव लौटे तब उन्हें देखकर लोग चकित रह गए क्योंकि उनके बारे में यह अफवाह फैल गई थी कि उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया है। 

बाबू मंगूराम मुगोवालिया ने पंजाब में वही भूमिका निभाई जो जोतीराव फुले ने महाराष्ट्र में निभाई थी। महाराष्ट्र में फुले ने शूद्रादिशूद्र आंदोलन की परिकल्पना की और उसे प्रारंभ किया। इसी तरह पंजाब में मंगूराम ने अछूतों के आंदोलन की परिकल्पना की और उसे अमली जामा पहनाया। फुले महाराष्ट्र के शूद्रादिशूद्रों को देश के मूलनिवासी मांनते थे। मंगूराम का भी पंजाब के अछूतों के बारे में यही विचार था। अगर फुले पर इंग्लैंड में जन्मे अमरीकी राजनैतिक कार्यकर्ता, विचारक, दार्शनिक और क्रांतिकारी थामस पेन (1737-1809) के लेखन का प्रभाव था तो मंगूराम ने समानता और आजादी का सबक अमरीका के प्रजातांत्रिक और उदारवादी मूल्यों से सीखा था। वे अमरीका में अपने प्रवास के दौरान क्रांतिकारी स्वाधीनता संग्राम सेनानियों, जिन्हें ऐतिहासिक गदर लहर के गदरी बाबाओं के नाम से जाना जाता था, के संपर्क में रहे थे। इससे भारत को ब्रिटिश साम्राज्य के चंगुल से मुक्त कराकर आमजनों को गरिमापूर्ण जीवन सुलभ कराने का उनका संकल्प और मजबूत हुआ। वे चाहते थे कि भारत में ब्रिटिश राज का स्थान प्रजातांत्रिक और समतावादी होमरूल ले जिसमें हर व्यक्ति को उसकी जाति, वर्ग, पंथ, भाषा, लिंग व रहवास के स्थान से परे समानता और स्वतंत्रता हासिल हो।

करीब 16 साल विदेश में बिताने के बाद अपने पैतृक गांव पहुंचे मंगूराम को यह देखकर बहुत धक्का लगा कि वहां अछूत प्रथा बेरोकटोक जारी थी। उनके शब्दों में “विदेश में रहने के दौरान मैं ऊंच-नीच और अछूत प्रथा के बारे में भूल ही चुका था। दिसंबर, 1925 में जब मैं अपने गांव लौटा तो मेरे सारे भ्रम टूट गए। जिस बीमारी से बचने के लिए मैंने देश छोड़ा था, वह मुझे पुनः सताने लगी। मैंने इस पूरी स्थिति के बारे में अपने नेता लाला हरदयालजी को लिखा। मैंने लिखा कि जब तक इस बीमारी का इलाज नहीं होता हिन्दुस्तान सच्चे अर्थों में स्वतंत्र नही हो सकता। उनके निर्देशानुसार 1926 में अछूत कौम को जगाने और उसके उत्थान के लिए एक कार्यक्रम तैयार किया गया।” (कौमी उदारियां, 1986: 23-24) अतः उन्होंने यह निर्णय किया कि वे अपना शेष जीवन अपने साथी ‘नीची जातियों’ के लोगों की मुक्ति और सशक्तिकरण के प्रयासों को समर्पित करेंगे। उन्होंने अपने पैतृक गांव में अछूतों के लिए एक प्राथमिक विद्यालय शुरू किया। आगे चलकर गर्वमेंट ऑफ़ इंडिया (शेडयूल्ड कास्ट) आर्डर, 1936 के अंतर्गत अछूतों को अनुसूचित जाति का दर्जा दिया गया। इस आदेश में ब्रिटिश शासित क्षेत्रों की अछूत जातियों की अनुसूची दी गई थी। अमरीका के गदर नेतृत्व के नक्शेकदम पर चलते हुए वे एक साथ दो मोर्चों पर लड़ना चाहते थे। वे जाति-आधारित सामाजिक बुराई (अछूत प्रथा) को समाप्त कर उसके स्थान पर समग्र सामाजिक स्वतंत्रता की नींव पर नई व्यवस्था कायम करना चाहते थे। इसके साथ ही वे भारत की राजनैतिक स्वतंत्रता के लिए भी संघर्ष करना चाहते थे। फुले की तरह उन्हें भी वर्चस्वादी और दमनकारी व्यवस्था के विरूद्ध अपने संघर्ष में कथित ऊंची जातियों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। 

बाबू मंगूराम मुगोवालिया

जल्दी ही मंगूराम द्वारा शुरू किया गया आद धर्म आंदोलन पंजाब के अछूतों में घर-घर पहुंच गया। ठीक उसी तरह जैसे महाराष्ट्र में सत्यशोधक समाज आंदोलन लोकप्रिय हुआ था। बूतन मंडी के सेठ किशनदास, जो चमड़े के बड़े व्यापारी थे, ने जालंधर में इस आंदोलन के मुख्यालय ‘आद धर्म मंडल’ की स्थापना में मदद की। मंगूराम के अथक प्रयासों से यह आंदोलन उस क्षेत्र के सभी अछूतों का आंदोलन बन गया और वे अछूतों के नायक के रूप में उभरने लगे। आद धर्म आंदोलन के झंडे तले उन्होंने अनुसूचित जातियों को भू-अधिकार दिलवाने के लिए संघर्ष शुरू किया। अन्य गैर-कृषक जातियों के साथ, अनुसूचित जातियों के सदस्यों के जमीन का स्वामी बनने पर भूमि हस्तांतरण अधिनियम, 1900 के अंतर्गत कानूनी प्रतिबंध था। इसके अतिरिक्त पारंपरिक स्थानीय कानून जिसे राईत-नम्मा कहा जाता था, के अंतर्गत नीची जातियों को जमीन के उन टुकड़ों का स्वामित्व भी हासिल नहीं था, जिस पर गांव में अलग-थलग बस्तियों में उनके मकान थे। उन्हें पक्के घर बनाने की इजाजत भी नहीं थी। वे केवल मिट्टी और फूस के मकान बनाकर रह सकते थे और इसके बदले उन्हें जमीन के उस टुकड़े के मालिक के लिए बेगार करनी होती थी।

आद धर्म आंदोलन ने एक और महत्वपूर्ण अभियान भी शुरू किया। इसका उद्धेश्य अछूतों की शिक्षा के लिए विशिष्ट कानूनी प्रावधान करवाना और सरकारी नौकरियों में उन्हें आरक्षण दिलवाना था। पंजाब के इतिहास में यह पहली बार हो रहा था कि अछूत अपने लिए गरिमापूर्ण जीवन और स्थानीय सत्ताधारी संस्थाओं में भागीदारी के लिए संयुक्त रूप से संघर्ष कर रहे थे। 

सन् 1919 में ब्रिटिश सरकार ने देश में सीमित अधिकारों वाली निर्वाचित संस्थाओं के गठन के लिए चुनाव करवाने की घोषणा की। इस घोषणा के बाद सभी समुदाय अपने सामाजिक/ राजनैतिक संगठन बनाने में जुट गए ताकि उनका समुदाय सामाजिक/राजनैतिक शक्ति बन सके। अमरीका और फिलीपींस में लंबा समय बिताकर देश लौटे एक ऐसे युवा, जिसका व्यक्तित्व गदर पार्टी के नेताओं के सानिध्य में गढ़ा गया था, के रूप में मंगूराम अपने समुदाय के साथियों के साथ मिलकर एक अलग सामाजिक-राजनैतिक संगठन बनाने में कामयाब रहे। यह संगठन ऊंची जातियों के हिन्दुओं की हिंदू महासभा, मुसलमानों की मुस्लिम लीग और सिक्खों की सिंह सभाओं से किसी तरह कमतर न था। चुनावों के जरिए विधानमंडलों के गठन की शुरूआत के साथ देश के कई क्षेत्रों में इसी तरह के आदि आंदोलन शुरू हुए। इनमें शामिल थे दक्षिण भारत के आदि आंध्र, आदि द्रविड़ और आदि कर्नाटक आंदोलन और उत्तरप्रदेश का आदि हिंदू आंदोलन। यद्यपि देश के अलग-अलग क्षेत्रों में ये आदि आंदोलन एक साथ उभरे, परंतु इस बात का कोई सबूत नहीं है कि वे एक-दूसरे से प्रभावित या प्रेरित थे। ये सभी आंदोलन अपने-अपने क्षेत्रों में विद्यमान स्थानीय परिस्थितियों की उपज थे। 

आद धर्म आंदोलन की पहली वार्षिक बैठक की घोषणा करने वाले पोस्टर में बाबू मंगूराम मुगोवालिया, स्वामी शूद्रानंद और बाबू ठाकुर चंद ने विस्तार से बताया कि मूलनिवासियों को सवर्णों के हाथों किस तरह के अत्याचारों का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने मूलनिवासियों से यह अपील की कि वे एकजुट होकर अपनी मुक्ति और उत्थान के लिए कार्यक्रम बनाएं। उन्हें ‘बंधुओं’ के रूप में संबोधित करते हुए मंगूराम ने कहा :

“हम इस देश के असली निवासी हैं और आद धर्म हमारा मजहब है। हिंदू कौम बाहर से आई और उसने हमारा देश हमसे छीन लिया तथा हमें गुलाम बना दिया। एक समय हम पूरे हिंद पर राज करते थे। हम राजाओं की संतानें हैं। हिंदू फारस से यहां आए और उन्होंने हमारी कौम को नष्ट कर दिया। उन्होंने हमसे हमारी संपत्ति छीन ली और हमें यायावरों का जीवन जीने पर विवश कर दिया। उन्होंने हमारे घर और हमारे किले ज़मींदोज़ कर दिए और हमारे इतिहास को नष्ट कर दिया। हमारी कुल संख्या सात करोड़ है और हम इस देश में हिंदू के रूप में जाने जाते हैं। इन सात करोड़ को अलग कर आद नस्ल को मुक्त करें … हमारे सात करोड़ लोगों की कोई हैसीयत ही नहीं है। हमने हिंदुओं पर भरोसा किया और बहुत दुःख भोगे। हिंदू बेरहम निकले। हिन्दुओं ने सदियों पहले हमें कुचला – उनके साथ सभी संबंध तोड़ लो। आद नस्ल का खात्मा करने वालों से हम क्या अपेक्षा कर सकते हैं? परंतु अब समय आ गया है। ध्यान से सुनो। अब सरकार लोगों की अपील पर ध्यान देती है। हमसे हमदर्दी रखने वाली सरकार की मदद से हम एकजुट हों और अपनी नस्ल को बचाएं। काउंसिलों में हमारे समुदाय के ज्यादा से ज्यादा सदस्यों को भेजो ताकि हमारी कौम मजबूत बने। अंग्रेजों की सरकार हमेशा बनी रहनी चाहिए। इस सरकार के अलावा हमारा कोई हमदर्द नहीं है। हमें कभी अपने आपको हिंदू नहीं मानना चाहिए। याद रखो कि हमारा मजहब आद धर्म है।” (कौमी उदारियां: 1986: 21-22) 

बाबू मंगूराम के लेखन को ध्यान से पढ़ने वालों को यह समझ में आएगा कि ब्रिटिश राज के मुद्दे पर उनके मन में एक द्वंद्व था। एक ओर उन्हें लगता था कि हिंदू बहुसंख्यकवादी शासन व्यवस्था में उनकी कौम का अंग्रेजी राज की तुलना में और अधिक दमन होगा। वे मानते थे कि अंग्रेज शायद एक अधिक समतावादी भारतीय समाज के निर्माण में साझीदार हो सकते हैं। दूसरी ओर वे देश की स्वतंत्रता को यहां के नागरिकों की गरिमा के लिए जरूरी मानते थे। और स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजों से मुक्ति जरूरी थी। सन् 1947 में भारत के स्वतंत्र होने तक उनके विचारों में यह विरोधाभास स्पष्ट दिखलाई देता है। परंतु स्वतंत्रता मिलने तक वे और आद धर्म आंदोलन के अन्य नेता अछूतों को हिंदू धर्म से पूरी तरह विलग कर उन्हें उनके अपने प्राचीन धर्म (आद धर्म) के झंडे तले एकजुट करने का प्रयास करते रहे ताकि अछूतों को उनकी खोई गरिमा और स्वतंत्रता फिर से मिल सके। आद धर्म के नेताओं का कहना था कि आर्यों के लंबे वर्चस्व के चलते अछूत अपना मूल धर्म भुला बैठे हैं।

बाबू मंगूराम मुगोवालिया (सबसे बाएं) आद धर्म आंदोलन के सदस्यों के साथ

उस काल में आद धर्म आंदोलन यदि राजनैतिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण और लोकप्रिय बन सका तो उसका कारण था आंदोलन के नेतृत्व की दूरदृष्टि, जिसके चलते उन्होंने विविधवर्णी अछूत समुदायों को एक झंडे तले लाने को अपना लक्ष्य बनाया। उन्होंने पंजाबी कौम के भाग के रूप में इन समुदायों को एकजुट किया। यह उत्कृष्ट रणनीतिकार मंगूराम का ही कमाल था कि उन्होंने यह काम ऐसे महत्वपूर्ण मौके पर किया जब प्रांत में सीमित प्रत्यक्ष चुनाव होने वाले थे। उन्होंने 1931 की जनगणना में अछूतों को एक अलग धर्म के अनुयायियों के रूप में दर्ज किये जाने की मांग की। उनकी राय में अछूत न हिंदू थे, न मुसलमान, न सिक्ख और ना ईसाई। वे इस देश के मूलनिवासी थे। मंगूराम का कहना था कि परदेसी आर्यों ने अछूतों ने उनका राजपाट छीन लिया। उनकी संपत्ति लूट ली और उन्हें अपना गुलाम बना लिया। सन् 1929 में कीर्ति किसान पार्टी के मासिक कीर्ति में ‘अछूत द सवाल’ (अछूतों का सवाल) शीर्षक से प्रकाशित अपने शानदार लेख में शहीद भगतसिंह ने ‘विद्रोही’ के छद्म नाम से लिखते हुए जाति प्रथा के खिलाफ और अपने एक अलग धर्म के पक्ष में आद धर्म नेतृत्व के अभियान का समर्थन किया। परंतु भगत सिंह ने उन्हें यह चेतावनी भी दी कि वे अंग्रेजों से दूरी बनाये रखें। 

मंगूराम कहते थे कि बाहरी लोगों के लम्बे दमनकारी शासन के लम्बे समय तक अधीन रहने के कारण मूलनिवासियों ने अपने गुरुओं और धार्मिक प्रतीकों को विस्मृत कर दिया है। उन्हें अपवित्र और अपना अलग धर्मशास्त्र विकसित करने के लिए अपात्र घोषित कर दिया गया। दास बना दिए गए मूलनिवासियों पर अपना राज कायम करने, उसे बनाये रखने और उसे औचित्यपूर्ण सिद्ध करने के लिए आर्य आक्रान्ताओं ने चातुर्वर्ण व्यवस्था की तीन उच्च श्रेणियों (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) पर स्वयं को स्थापित कर लिया। विजित क्षेत्र के कुछ रहवासियों, जो मुख्यतः शिल्पकार थे – को चौथे वर्ण (शूद्र) में शामिल कर दिया गया और शेष को और नीचे धकेल कर अवर्ण और अछूत घोषित कर दिया गया। 

मंगूराम द्वारा अछूतों को इस देश के मूलनिवासी बताने का इस समुदाय पर जबरदस्त मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ा। इससे उनमें गर्व और आत्मसम्मान का भाव जागा और उनकी नयी पहचान को धर्मशास्त्रीय आधार मिला। आद धर्म, भक्ति आंदोलन के संत-कवियों, विशेषकर रविदास, वाल्मीकि, कबीर और नामदेव की शिक्षाओं पर आधारित था। आद धर्म आंदोलन के नेतृत्व ने गुरु रविदास को अपने विमर्श के केंद्र में रखा और उनकी शिक्षाओं के आसपास अपने सामाजिक-राजनैतिक-आध्यात्मिक विचारों और एक नए धर्म की परिकल्पना को बुना। इस तरह, मंगूराम ने इन वर्गों को एक नयी पहचान दी, उनके गुम हो चुके नायकों और गुरुओं को पुनर्स्थापित किया और उनकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से उनका परिचय करवाया। उन्होंने इन वर्गों में देश का शासक बनने की महत्वाकांक्षा जागृत की। 

मंगूराम के प्रयास सफल हुए। ब्रिटिश सरकार को आदधर्मियों की मांग के आगे झुकते हुए आद धर्म को एक अलग मज़हब का दर्जा देना पड़ा। सन् 1931 की जनगणना में पंजाब के अनुसूचित जातियों के करीब पांच लाख सदस्यों ने स्वयं को अपने नए धर्म – आद धर्म – का अनुयायी घोषित किया। आद धर्म आंदोलन की एक अन्य बहुत बड़ी उपलब्धि यह रही कि उसके उम्मीदवारों ने पंजाब में 1937 और 1946 में हुए चुनावों में आरक्षित सीटों पर एकतरफा जीत हासिल की। औपनिवेशिक भारत में पहली बार अछूत विधानमंडल में महत्वपूर्ण शक्ति बन कर उभरे। 

आद धर्म आंदोलन ने बाबासाहेब डॉ. बी.आर. आंबेडकर के मिशन के पंजाब में विस्तार के लिए ज़मीन तैयार की। लंदन में आयोजित गोलमेज सम्मेलनों में दमित वर्गों को अलग मताधिकार दिए जाने की आंबेडकर की मांग का मंगूराम ने समर्थन किया। आंबेडकर और महात्मा गांधी के बीच भारत में दमित वर्गों के नेतृत्व के मुद्दे पर टकराव के दौरान, मंगूराम ने आंबेडकर का समर्थन करते हुए कई तार भेजे।

प्रतिष्टित अमरीकी समाज विज्ञानी मार्क जुएर्गेन्समेयर ने अपनी प्रशंसित पुस्तक, “रिलीजियस रेबेल्स इन द पंजाब: द आद धर्म चैलेंज टू कास्ट” में पंजाब के निम्न में भी निम्न वर्ग में सामाजिक और राजनैतिक चेतना जगाने, उन्हें सदियों पुरानी भेदभावपूर्ण जाति प्रथा के विरुद्ध उठ खड़े होने के लिए प्रेरित करने और गुरु रविदास के बेगमपुरा के मॉडल पर आधारित समतावादी सामाजिक-राजनैतिक व्यवस्था निर्मित करने में आद धर्म आंदोलन के अभूतपूर्व योगदान का वर्णन किया है। 

जोतीराव फुले और बाबू मंगूराम दोनों अपने-अपने क्षेत्रों के विशाल दमित वर्ग की बदहाली से विचलित हुए – फुले के मामले में महाराष्ट्र के शूद्रादिशूद्र और मंगूराम के मामले में पंजाब के अछूत। ये दोनों स्वयं भी इन्हीं वर्गों से थे। दोनों ने उच्च वर्गों के द्वारा दमन के खिलाफ अपने लोगों को गोलबंद किया। दोनों का यह मानना था कि इन वर्गों के दमन के मूल में था आर्यों का भारत पर आक्रमण। आर्य मध्य एशिया से भारत में आये और उन्होंने यहां के निवासियों को दास बना लिये। अपना राज कायम करने के लिए आक्रान्ताओं के स्वलिखित ग्रंथों के द्वारा कई तरह के मिथकों का प्रचार किया। फुले और मंगूराम ने जिस वैकल्पिक सामाजिक-राजनैतिक आख्यान का प्रस्ताव किया वह अत्यंत प्रभावी था और उसने देश के विभिन्न भौगोलिक और संस्कृति क्षेत्रों में समतावादी सामाजिक व्यवस्था की स्थापना के लिए वैकल्पिक राजनीति की नींव रखी। इन आख्यानों में सामाजिक प्रजातंत्र और अंततः जाति के उन्मूलन के आंबेडकरवादी विमर्श के बीज हैं।

संदर्भ :

जुएर्गेन्समेयर, मार्क (2009). “रिलीजियस रेबेल्स इन द पंजाब: द आद धर्म चैलेंज टू कास्ट”, नयी दिल्ली, नवायन

कौमी उदारियां (पंजाबी), खंड 1, क्रमांक 2, जनवरी 1986, पृष्ठ 21-24 (जालंधर), सी.एल. चुम्बर

(अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल)


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