बीसवीं सदी के आरंभिक दशकों में उभरे आदि-हिंदू आंदोलन ने साहित्यिक और राजनीतिक क्षेत्र में तहलका मचा दिया था। औपनिवेशिक भारत के विलक्षण दलित चिंतक और सिद्धांतकार स्वामी अछूतानंद ‘हरिहर’ (1879-1933) इस आदि-हिंदू आंदोलन के सूत्रधार थे। इस आंदोलन के उभार के साथ ही हिंदी नवजागरण के जनक्षेत्र में दो-तीन बातें स्पष्ट तौर पर देखने को मिली। पहली बात, स्वामी अछूतानंद ‘हरिहर’ के आदि-हिंदू आंदोलन ने अछूतों के भीतर स्व-पहचान का बोध कराकर अखिल हिंदू से अलग अपनी पहचान का दावा पेश कर सवर्ण अग्रदूतों को सकते में डाल दिया था।
दूसरी बात, स्वामी अछूतानंद हरिहर के आंदोलन के दबाव में आकर सवर्ण लेखकों, संपादकों और अग्रदूतों ने समाज सुधार के तहत अछूत समस्या का एजेंडा अपनी परियोजना में शामिल कर लिया था। तीसरी बात, नवजागरणकालीन सवर्ण लेखकों ने अछूतोद्धार परियोजना के तहत अछूतों को हिंदू धर्म के दायरे में लाने की कवायद को अंजाम दिया। चौथी बात, सवर्ण लेखकों ने एक स्वर में स्वामी अछूतानंद ‘हरिहर’ के अछूत आंदोलन का व्यापक स्तर पर विरोध किया। हिंदी के नवजागरणकालीन हिंदू लेखकों और संपादकों के भीतर इस बात का भय व्याप्त हो गया था कि अगर पांच करोड़ अछूत हिंदू का लेबुल अस्वीकार कर दें तो तथाकथित हिंदू धर्मावलंबियों की आबादी में भारी कमी आने से सवर्ण जातियों को एक बहुत बड़ा झटका लगेगा और अछूतों पर सवर्णों का सामाजिक तथा आर्थिक वर्चस्व भी कमजोर पड़ जाएगा। इस विकट समस्या से निपटने के लिए सवर्ण लेखकों ने स्वामी अछूतानंद ‘हरिहर’ के आंदोलन का विरोध करते हुए, अपना अलग से अछूतोद्धार का आंदोलन चलाया, जिसका मकसद अछूतों को हिंदू धर्म के दायरे में लाकर हिंदुओं के संख्याबल में इज़ाफ़ा करना था।
औपनिवेशिक भारत में जब स्वामी अछूतानंद ने पांच करोड़ अछूतों की हिंदू धर्म से अलग पहचान का दावा पेश किया तो हिंदी लेखक उनका विरोध करने पर उतारू हो गए। उन्होंने अपनी पत्र-पत्रिकाओं में अछूतानंद ‘हरिहर’ और उनके आदि-हिंदू आंदोलन के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया। नवजागरणकालीन हिंदी लेखकों और संपादकों का यह विरोध उस समय अधिक उग्र हो गया जब स्वामी अछूतानंद ‘हरिहर’ ने साइमन कमीशन के आगमन के स्वागत का सार्वजनिक तौर पर ऐलान किया। ध्यातव्य है कि बीसवीं सदी के तीसरे दशक में साइमन कमीशन का आगमन औपनिवेशिक भारत की बड़ी परिघटना थी। बड़ी दिलचस्प बात यह कि साइमन कमीशन के गठन में किसी हिंदू सुधारक को तरजीह नहीं दी गई थी। साइमन कमीशन के गठन में हिंदू नेताओं को जगह न मिलने पर हिंदी लेखक और संपादक साइमन कमीशन का बहिष्कार करने पर उतारू हो गए। जहां एक ओर सवर्ण संपादकों ने साइमन कमीशन का विरोध किया, वहीं दलित बौद्धिकों ने साइमन कमीशन के स्वागत का ऐलान किया। उत्तर भारत में स्वामी अछूतानंद हरिहर ने जगह-जगह अपनी सभाएं कर अछूतों को साइमन कमीशन के पक्ष में लामबंद करना शुरू कर दिया था। स्वामी अछूतानंद ने 27 और 28 दिसंबर, 1927 को मयोहाल, प्रयाग में अछूतों की एक विशाल सभा का आयोजन करके साइमन कमीशन के आगमन का खुलकर समर्थन किया। इस सम्मेलन में अछूत समाज के सुधारकों और नेताओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। साइमन कमीशन के समर्थन के बाद ‘चाँद’, ‘माधुरी’, ‘अभ्युदय’ और ‘ब्राह्मण सर्वस्व’ सरीखी पत्रिकाओं ने स्वामी अछूतानंद के खिलाफ़ मोर्चा खोल दिया।

अभ्युदय प्रेस प्रयाग से प्रकाशित होने वाला ‘अभ्युदय’ हिंदी नवजगरणकाल का प्रमुख राजनीतिक और सामाजिक पत्र था। इसके संपादक पंडित कृष्णकांत मालवीय थे। ध्यातव्य है कि पंडित कृष्णकांत मालवीय, पंडित मदनमोहन मालवीय के भतीजे थे। यह पत्र हिंदू महासभा, शुद्धि आंदोलन, हिंदू संगठन के साथ पंडित मदनमोहन मालवीय की सामाजिक और राजनीतिक रणनीतियों का प्रबल पैरोकार था। पंडित कृष्णकांत मालवीय स्वामी अछूतानंद हरिहर के प्रबल विरोधी थे। वे नहीं चाहते थे कि अछूत अपना अलग आंदोलन चलाकर मुलकी हकों की मांग करें। उन्होंने ‘अभ्युदय’ में एक संपादकीय लेख लिखकर स्वामी अछूतानंद ‘हरिहर’ के आंदोलन की शिनाख्त उच्च श्रेणी के हिंदुओं के विरुद्ध के तौर पर की थी। पंडित कृष्णकांत मालवीय का कहना था कि आदि-हिंदू आंदोलन जातीय विद्वेष और सांप्रदायिकता फैलाने का काम कर रहा है। स्वामी अछूतानंद हरिहर अपनी सभाओं में उच्च श्रेणी हिंदुओं के खिलाफ़ खूब विष उगलते हुए गाली-गलौज की भाषा इस्तेमाल करते हैं। इसी के साथ स्वामी अछूतानंद पृथक निर्वाचन की मांग भी करते हैं। पंडित कृष्णकांत मालवीय ने आदि-हिंदू आंदोलन पर अंकुश लगाने के लिए प्रांत के गवर्नर सर अलेक्जेंडर मुडीमैन से मांग कर डाली कि स्वामी अछूतानंद हरिहर को प्रदान की गई सरकारी सुरक्षा तत्काल छीन लिया जाए। इसके पीछे उनका तर्क था कि पता नहीं क्यों आदि-हिंदू आंदोलन में पुलिस इतनी दिलचस्पी ले रही है और क्यों पुलिस अफसरों की मौजूदगी में यह सब कार्य हो रहे हैं? “पता नहीं उच्चाधिकारियों को पुलिस की इन करतूतों का पता भी है या नहीं। इस प्रांत के उच्च अधिकारियों का विशेष कर प्रांत के गवर्नर सर अलेक्जेंडर मुडीमैन का ध्यान आदि-हिंदू सभा और पुलिस-अधिकारियों की कार्यवाहियों की ओर आकृष्ट करते हैं। क्योंकि लोगों को यह संदेह होने लगा है कि आदि हिंदू सभा में सरकारी हाथ है और अछूतानंद के द्वारा शासन की कठिनाइयों को दूर रखने के लिए एक नया आला दल मुसलमानों की भांति तैयार किया जा रहा है।” पंडित कृष्णकांत मालवीय के इस कथन से प्रतीत होता है कि स्वामी अछूतानंद हरिहर के आंदोलन को मिटाने के लिए नवजागरणकालीन सवर्ण संपादक किस तरह से जोर लगा रहे थे।
जब स्वामी अछूतानंद ने साइमन कमीशन के आगमन का समर्थन किया तो हिंदी संपादकों द्वारा उनका घोर विरोध किया गया। ‘चाँद’ पत्रिका के तत्कालीन संपादक रामरखसिंह सहगल ने स्वामी अछूतानंद के आदि-हिंदू आंदोलन का प्रबल विरोध किया। आदि-हिंदू आंदोलन के संबंध में श्री सहगल का मत था कि, “हमें आदि-हिंदुओं तथा अछूत कहे जाने वाले भाइयों से पूरी सहानुभूति है। हम उनकी उन्नति, उनके सुधार, उनके उत्कर्ष तथा उनके अधिकारों की प्राप्ति के लिए ‘चाँद’ के पिछले अंकों में आंकलन करते रहे हैं। हमारा यह दृढ़ विश्वास है कि भारत का अभ्युत्थान तब तक नहीं हो सकता, जब तक हमारे अस्पृश्य करार दिए गए 7 करोड़ भाई अपने मानवीय अधिकारों से वंचित हैं। हम कांग्रेस के अन्य कार्यों से बहुत अधिक अछूतोद्धार कार्य का महत्व देते हैं। इन सब बातों के होते हुए भी हमें उक्त सम्मेलन [आदि-हिंदू सम्मेलन] के साथ बहुत अंशों में सहानुभूति नहीं है। सहानुभूति तो दूर की बात है, हम उक्त सम्मेलन की अधिकांश कार्यवाही के घोर विरोधी हैं।” (आदि-हिंदू सम्मेलन, संपादकीय विचार, चाँद, फरवरी 1928, वर्ष : 6, खंड : 1, संख्या 5, पृ. 428)
स्वामी अछूतानंद और साइमन कमीशन की धमक से नवजागरणकालीन सुधारकों और लेखकों की ओर से अछूतों को हिंदू बनाने की क़वायद बडे़ जोर-शोर से शुरू हो गई थी। इस क़वायद में उन्होंने मंदिरों के दरवाजे अछूतों के लिए खोलने शुरू कर दिए थे। चूंकि साइमन कमीशन अपने देश भ्रमण के दौरान सबसे पहले महाराष्ट्र में आया था। इसलिए सबसे पहले वर्धा के लक्ष्मी नारायण मंदिर का फाटक अछूतों के लिए खोल दिया गया। यह मंदिर सेठ जमुनालाल बजाज के दादा बच्छराज जी ने 1907 में बनवाया था। इस मंदिर में अछूतों को छोड़कर सभी हिंदू जा सकते थे। इस मंदिर के ट्रस्टी सेठ जमुनालाल बजाज ने 19 जुलाई, 1928 को मंदिर के दरवाजे अछूतों के लिए खोल दिए। अछूतों के लिए मंदिर का दरवाजा खोले जाने पर लाला लाजपत राय, पंडित मदनमोहन मालवीय और आचार्य विनोबा भावे साहित हिंदू नेताओं ने सेठ जमुनालाल बजाज की इस पहल का बड़े जोर-शोर से प्रचार किया था। अछूतों के लिए जिस दिन लक्ष्मी नारायण मंदिर का दरवाजा खोला गया उसी दिन शाम को मंदिर परिसर में कीर्तन सभा रखी गई। आचार्य विनोबा भावे ने इस अवसर पर अछूतों के मंदिर प्रवेश पर एक भाषण दिया। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि अछूत हिंदू धर्म में बड़ी आस्था और श्रद्धा रखते हैं। आचार्य विनोबा भावे ने अपने भाषण में कहा कि यह सोचने की बात है। आज कई वर्षों से जिन लोगों को हमने अस्पृश्य मान कर दूर रखा है, उनकी हिंदू-धर्म के प्रति कैसी उत्कट श्रद्धा और भक्ति है। मैंने एक बार एक अस्पृश्य से पूछा कि “तेरी लड़की का नाम क्या है? उसने उत्तर दिया– ‘एकादशी’। सोचिए तो सही इस नाम में कैसा काव्य है। हिंदू-धर्म और हिंदू संस्कृति के प्रति उसकी कैसी भावना है।” (देखें , हमारे अछूत भाई, काशीनाथ नारायण त्रिवेदी, त्यागभूमि, आश्विन, 1928, वर्ष : 2, खंड : 1 अंश : 1, पृ. 128)
स्वामी अछूतानंद और बाबासाहेब आंबेडकर के दबाव में हिंदू सुधारकों के भीतर अछूतोद्धार की एक लहर दौड़ पड़ी थी। जबलपुर में हिंदू महासभा ने अपना ग्यारहवां सम्मेलन किया। इस सम्मेलन में हिंदू महासभा की ओर से स्वामी अछूतानंद के आदि हिंदू-आंदोलन का जबरदस्त विरोध किया गया था। हिंदू सुधारकों ने अछूतों को यह सलाह दे डाली कि स्वामी अछूतानंद के झांसे में किसी कीमत पर न आएं। हिंदू महासभा ने बकायदा स्वामी अछूतानंद के आदि-हिंदू आंदोलन के खिलाफ़ प्रस्ताव पारित कर डाला। हिंदू महासभा की ओर से अछूतों के लिए जो प्रस्ताव पास किए गए उनमें सार्वजनिक स्कूलों में पढने, कुओं व जलाशयों में पानी भरने, सभाओं में साथ बैठने, आम रास्तों पर चलने, देवालयों में देव-दर्शन करने, पुरोहितों, नाई भाइयों और धोबी भाइयों से अछूतों की सेवा का अनुरोध करने, समान सामाजिक और राजनीतिक अधिकार देने, म्यूनिसिपल बोर्डों से अछूतों, खासकर भंगी भाइयों के लिए स्वास्थ्य-प्रद मकानों के प्रबंध की प्रार्थना करने, अछूत भाइयों के स्थानीय बोर्डों, प्रांतीय कौसिलों तथा व्यवस्थापिका सभा में सरकार द्वारा नामंजूर होने का विरोध करने के साथ ही ‘आदि-हिंदू आंदोलन’ का, जो कतिपय स्वार्थी लोगों द्वारा खड़ा किया गया है, विरोध करने का प्रस्ताव पारित हुआ था।” (हमारे अछूत भाई, काशीनाथ नारायण त्रिवेदी, त्यागभूमि, पौष, 1928, वर्ष : 2, खंड : 1 अंश : 4, पृ. 497)
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इसी तरह दयानंद दलितोद्धार मंडल ने अपना अधिवेशन हिसार में किया। इस अधिवेशन में अछूतों को कुएं से पानी भरने, अछूतों की शिक्षा आदि का अधिकार देने की घोषणा की गई। बड़ी दिलचस्प बात है कि इस अधिवेशन में भी स्वामी अछूतानंद के आदि हिंदू-आंदोलन के विरोध में प्रस्ताव पारित किया गया। दयानंद दलितोद्धार मंडल के इस अधिवेशन के संबंध में ‘त्यागभूमि’ पत्रिका के एक लेख में लिखा गया था कि, “दयानंद दलितोद्धार मंडल ने अपने हिसार वाले अधिवेशन मे अछूत-हित के अनेक उपयोगी और अनुकरणीय प्रस्ताव पास किए हैं। उनमें खास-खास ये हैं– सार्वजनिक कुआं से पानी देने का समान अधिकार, सरकारी सस्थाओं में अछूत बालकों के लिए निशुल्क उच्च शिक्षा का प्रबंध, योग्य छात्रों को अधिक संख्या में छात्रवृत्ति देने का प्रबंध, औद्योगिक शास्त्रीय तथा अन्य उपयोगी धंधों की शिक्षा-संस्थानों में अछूत बालकों के लिए विशेष प्रबंध और छूट, हेरी, बावरी जातियों को अपराधी जातियों की श्रेणी से निकालने की प्रार्थना, नेहरू रिपोर्ट में दी सुविधाओं का समर्थन, स्वर्गीय लालाजी को दिल्ली धारा सभा वाली 1 करोड़ की मांग को अस्वीकृत कर देने के सरकारी कार्य का विरोध, अछूतों में परस्पर एक-दूसरे से परहेज या छूत-छात की भावना के प्रचार का विरोध, गोमांस खाने का निषेध, सेवा के बदले रोटी के टुकड़े न लेकर पैसे या धान लेने का निर्णय, ‘आदि हिंदू आंदोलन’ का निषेध और जाति को फिर से जाति में ले लेने के निर्णय आदि।” (वही, पृ. 498)
इस तरह हम देखते हैं कि अछूत हितैषी होने का दावा करने वाले सवर्ण लेखक और संपादक स्वामी अछूतानंद ‘हरिहर’ के आंदोलन को कुचलने का भरसक प्रयास किया। उन्होंने स्वामी अछूतानंद ‘हरिहर’ के अछूत आंदोलन की काट में अपना अलग से अछूतोद्धार का आंदोलन चलाया। उनके आंदोलन का मकसद अछूतों को हिंदू दायरे में लाकर उनपर हिंदू धर्म की ताबेदारी लाद देना था। जबकि स्वामी अछूतानंद ने न सिर्फ़ हिंदुओं की ताबेदारी को नकार दिया बल्कि अछूतों को हिंदू दायरे से निकाल कर उनकी धार्मिक तौर पर अलग पहचान पेश की थी।
(संपादन : नवल/अनिल)
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