आजाद भारत में सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तन के क्षेत्र में महामना रामस्वरूप वर्मा का अवर्णनीय योगदान रहा। वे नीति, सिद्धांत के पक्के ईमानदार राजनेता, समाज सुधारक, सफल अर्थशास्त्री, कुशल प्रशासक, लेखक, संपादक और हिंदी प्रदेश में हिंदी के प्रबल पक्षधर थे।
उनका जन्म उत्तर प्रदेश के कानपुर (देहात) के गौरीकरन नामक गांव में एक किसान परिवार में 22 अगस्त, 1923 को हुआ था। उनकी प्राथमिक शिक्षा उनके गांव में ही हुई। बाद में उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर और कानून की भी पढ़ाई की। भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बावजूद उन्होंने नौकरी करना पसंद नहीं किया और समाजवादी नेता डॉ. राममनोहर लोहिया के साथ समाजवादी आंदोलन से जुड़ गए।
रामस्वरूप वर्मा पहली बार 1957 में उत्तर प्रदेश के राजपुर विधानसभा क्षेत्र से सोशलिस्ट पार्टी से चुनाव जीते। फिर 1967 में चुनाव जीतने के उपरांत चौधरी चरण सिंह के मंत्रिमंडल में वित्त मंत्री बनाए गए। 1967-68 का बजट उन्होंने पेश किया जो दुनिया के इतिहास में अलग रहा। बिना कोई नया टैक्स लगाए मुनाफे का बजट उन्होंने पेश किया जबकि आमतौर पर घाटे का बजट ही प्रस्तुत किया जाता रहा है।
वे सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक विषमता को हटाना चाहते थे और राजनीतिक क्षेत्र में समाजवाद तथा सामाजिक सांस्कृतिक परिवर्तन के लिए मानववाद स्थापित करना चाहते थे। उनका मानना था कि सारी समस्याओं की जड़ ब्राह्मणवाद है। पुनर्जन्म, भाग्यवाद, जाति-पाति, छुआछूत और चमत्कार – ये ब्राह्मणवाद के पंचांग हैं। धर्म और आस्था के नाम पर लोगों को सांप्रदायिक और हिंसक बनाया जा रहा है। इसे हटाए बिना समता लाना मुश्किल है। वे मानते थे कि जब तक समता नहीं आएगी तबतक समाज नहीं बनेगा और जब तक समाज नहीं बनेगा तब तक देश में समाजवाद नहीं साकार हो सकेगा।
हालांकि वे डॉ. लोहिया के करीबी थे, लेकिन कई मुद्दों पर उनसे असहमत भी थे। इसलिए रामस्वरूप वर्मा ने उनका साथ छोड़कर 1 जून, 1968 को लखनऊ में अर्जक संघ की स्थापना की। उनका कहना था कि समाज में दो तरह के लोग हैं। एक, अर्जक जो शारीरिक श्रम करके जीविकोपार्जन करते हैं और इनकी आबादी 90 प्रतिशत है, जिन्हें पिछड़ा, दलित, आदिवासी और मुसलमान भी कहते हैं। रामस्वरूप वर्मा कहते थे कि केवल अर्जक कौम के लोग ही अर्जक संघ के मेंबर हो सकते हैं।

दूसरे, अनर्जक जिसके अधिकांश लोग मानसिक श्रम करते हैं और शारीरिक श्रम को नीच समझते हैं। इनकी आबादी 10 प्रतिशत है। मानसिक श्रम करके भी ठगकर, लूटकर, छीनकर और साजिश करके जीविकोपार्जन करनेवाले ज्यादा अमीर और इज्जतदार बने हुए हैं। जबकि शारीरिक श्रम करने वाले ज्यादातर गरीब और अपमानजक जिंदगी जीने को मजबूर हैं।
अर्जक संघ के माध्यम से रामस्वरूप वर्मा समाज में व्याप्त अंधविश्वास और सामाजिक-सांस्कृतिक कुरीतियों को नकारकर वैज्ञानिक सोच विकसित करने और मानववाद की स्थापना करने के लिए आजीवन प्रयासरत रहे। धर्म और आस्था के नाम पर तथाकथित धार्मिक ग्रंथों को उन्होंने जलाकर विरोध प्रकट भी किया। वे समाज में व्याप्त सभी तरह की असमानता को मिटाकर समतामूलक समाज की स्थापना पर बल देते थे। उनका कहना था कि अर्जक संघ द्वारा प्रतिपादित शिक्षा संबंधी मांगों पर यदि सरकार अमल करवा दे तो समाज में व्याप्त अशिक्षा, अंधविश्वास, अपराध, बेरोजगारी जैसे कई समस्याओं से छुटकारा मिल जाएगा। यहां तक कि भारत में जेलों की संख्या भी कम हो जाएगी।
चूंकि पूरी मीडिया पर तथाकथित ऊंची जातियों का ही कब्जा था, इसलिए उन्होंने लखनऊ से ही ‘अर्जक साप्ताहिक’ नामक पत्रिका का संपादन और प्रकाशन शुरू किया।
उन्होंने राजनीतिक विषमता को मिटाकर समाजवाद लाने के लिए 1969 में एक नया राजनीतिक दल ‘समाज दल’ की स्थापना की। जब वे विधायक थे तभी सोशलिस्ट पार्टी से विधान परिषद के एक सदस्य चौधरी महाराज सिंह भारती से भी उनकी मुलाकात हुई। दोनों की वैचारिक समानता के कारण आजीवन देशहित में वे दोनों ही एक साथ लगे रहे।
इधर इसी सोच के राजनेता बिहार के तीसरे उपमुख्यमंत्री जगदेव प्रसाद ने ‘शोषित दल’ की स्थापना करके पिछड़े-दलितों को न्याय और सम्मान दिलाने के लिए संघर्षरत थे। उन्होंने पटना से ‘शोषित’ साप्ताहिक का प्रकाशन शुरू किया। उधर रामस्वरूप वर्मा ‘अर्जक साप्ताहिक’ पत्रिका का प्रकाशन कर रहे थे। इसी सिलसिले में दोनों के बीच मुलाकातें हुईं और 7 अगस्त, 1972 को दोनों ने मिलकर ‘शोषित समाज दल’ की स्थापना की। रामस्वरूप वर्मा इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष और जगदेव प्रसाद राष्ट्रीय महामंत्री चुने गए। इस दल का मुख्य उद्देश्य शोषितों का राज, शोषितों द्वारा और शोषितों के लिए कायम करना था। दोनों का मानना था कि इज्जत और रोटी की लड़ाई ही मुख्य मुद्दा है।
महामना रामस्वरूप वर्मा ने शोषित समाज दल का लिखित नीति, सिद्धांत, वक्तव्य और कार्यक्रम तय किए, जिसमें किसानों और मजदूरों की खुशहाली और समृद्धि के लिए सिंचाई नीति, कृषि नीति, विद्यार्थियों के लिए शिक्षा नीति, बेरोजगारों के लिए उद्योग नीति, देश की खुशहाली के लिए विदेश नीति बनाई। उनका मानना था कि वर्ण-संघर्ष और वर्ग-संघर्ष दोनों साथ-साथ चलेंगे। खान-पान, उठने-बैठने और बोलचाल में समता लाना जरूरी है, तभी समाज बनेगा।
अर्जक संघ की स्थापना करने के उपरांत उन्होंने जो मानववादी व्यवस्था लाने का प्रारूप समाज के सामने रखा, वह आज भी प्रासंगिक है। समाज में व्याप्त ऊंच और नीच की भावना, अंधविश्वास तथा कुरीतियों को खत्म करने के लिए उन्होंने आंदोलन चलाए। धर्म और आस्था के नाम पर तथाकथित धार्मिक ग्रंथों के खिलाफ मुहिम चलाए। मनुस्मृति, रामायण महाभारत आदि काल्पनिक कथाओं के खिलाफ लोगों को जागृत किया। इस संदर्भ में उनपर कई मुकदमे हुए पर वहां वे विजयी होकर लौटे। उनपर हमला भी हुआ। फिर भी वे हार नहीं माने। अर्जक संघ के माध्यम से कई प्रकार के आंदोलन किए। समान, निःशुल्क, अनिवार्य और मानववादी शिक्षा के लिए आंदोलन चलाया। विवाह और मृत्युपरांत शोकसभा की अलग व्यवस्था बनाई जो अर्जक संघ की पद्धति कही जाती है। आजकल यह काफी प्रचलित हो गया है। इसके अलावा उन्होंने 14 त्यौहारों को प्रतिपादित किया।
वे उत्तर प्रदेश में 6 बार विधायक बने, जिसमें तीन बार सोशलिस्ट पार्टी से, एक बार निर्दलीय और दो बार शोषित समाज दल से विधानसभा का चुनाव जीते। उनके चुनाव प्रतिनिधि ललई सिंह यादव हुआ करते थे। रामस्वरूप वर्मा इतने ईमानदार नेता थे कि उनपर कभी कोई धब्बा नहीं लगा। सरकारी धन का दुरुपयोग खुद भी नहीं करते थे और न ही दूसरे को करने देते।
वे अपने व्यक्तिगत जीवन में भी ईमानदार रहे। उनकी शादी पढ़ाई के क्रम में ही हो गई थी। शादी के कुछ माह के बाद ही उनकी पत्नी किसी बीमारी से मर गईं। वे आजीवन विधुर ही रहे। परिवार के दबाव के बाद भी उन्होंने दूसरी शादी नहीं की। इसके बाद भी उनके चरित्र पर कोई धब्बा नहीं लगा। इस बाबत उन्होंने शोषित समाज दल के इकलौता विधायक होने की हैसियत से नारी कल्याण नाम का उत्तर प्रदेश विधान सभा में एक विधेयक प्रस्तुत किया था, जो पर्याप्त सदस्य नहीं होने के कारण पास नहीं हो सका।
रामस्वरूप वर्मा ने दर्जनों पुस्तकें लिखीं। इनमें ‘क्रांति क्यों और कैसे’, ‘मानववादी प्रश्नोत्तरी’, ‘मानववाद बनाम ब्राह्मणवाद’, ‘आत्मा पुनर्जन्म मिथ्या’, ‘सांस्कृतिक कुरीतियां’, आदि काफी लोकप्रिय हैं। उन्होंने केंद्र सरकार से यह भी मांग की थी कि नोटों की तरह कारतूसों पर भी अलग-अलग नंबर अंकित किया जाना चाहिए ताकि अपराध पर काबू पाया जा सके। जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण के लिए भी आंदोलन किया। साथ ही, चुनावी सुधार के लिए भी उन्होंने आंदोलन चलाया।
वे बुद्ध, जोतीराव फुले, डॉ. आंबेडकर व पेरियार को अपना आदर्श मानते थे। उन्हें राजनीति का कबीर भी कहा जाता है। सादा जीवन और उच्च विचार उनके जीवन का आधार था। ब्राह्मणवाद को नकारकर मानववाद स्थापित करते-करते 18 अगस्त, 1998 को उनकी लखनऊ में मृत्यु हो गई। लेकिन उनके सिद्धांतों, नीतियों और कार्यक्रमों पर चलने वाले आज भी उनके द्वारा स्थापित अर्जक संघ और शोषित समाज दल को चला रहे हैं। उनकी जयंती 22 अगस्त को ‘क्रांति दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।
(संपादन : नवल/अनिल)
