h n

मेरी यादों में बी.पी. मंडल

मंडल साहब से उत्सुकतावश लोग बार-बार पूछ रहे थे कि मंडल आयोग की रिपोर्ट में क्या अनुशंसा की गई है। कुछ लोग ऐसा कह रहे हैं कि आप राजा के बेटे हैं और आपने सत्ता मतलब अभिजात्य वर्ग के समर्थन में अपनी संस्तुति दी है। क्या यह सच है? पढ़ें, रघुवंश सिंह का यह संस्मरण

स्वतंत्रता के बाद भारतीय राजनीति ने एक लंबी यात्रा तय की है। इस यात्रा में कुछ ऐसे निर्णायक मोड़ भी हैं, जिन्होंने भारतीय राजनीति की दिशा और दशा बदल दी। इनसे होने वाले परिवर्तनों का प्रभाव न सिर्फ राजनीतिक परिदृश्य तक सीमित रहा बल्कि भारत की सामाजिक संरचना को भी गहराई से प्रभावित किया और एक नए दौर की शुरुआत हुई। इस नए दौर का श्रेय बी.पी. मंडल (25 अगस्त, 1918 – 13 अप्रैल, 1982) को जाता है, जिनकी अध्यक्षता में दूसरे राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने ऐतिहासिक रिपोर्ट तैयार की।

इसी पृष्ठभूमि में 1990 का समय भारतीय राजनीति, समाज और संस्कृति के आमूलचूल परिवर्तन का दौर साबित हुआ, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह के नेतृत्व वाली केंद्र की जनता दल सरकार द्वारा ‘मंडल आयोग’ की आरक्षण संबंधी अनुशंसा को लागू किया गया। सर्वविदित है कि यह ऐतिहासिक मोड़ सिद्ध हुआ।

ऐसी परिवर्तनकारी परिस्थितियों के निर्माण के पीछे प्रायः किसी दूरदर्शी और प्रतिबद्ध व्यक्तित्व की निर्णायक भूमिका होती है, जिसकी दृष्टि केवल तत्कालीन राजनीतिक लाभ तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सामाजिक न्याय के माध्यम से अधिक समतामूलक, न्यायपूर्ण और समावेशी समाज के निर्माण का व्यापक सपना देखती है।

सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय रहने और राजनीति में दिलचस्पी रखने के कारण मुझे अनेक बार कई राजनीतिक और सामाजिक व्यक्तित्वों से मिलने का सुअवसर मिला है। लेकिन बहुत कम ही लोग ऐसे होते हैं जो कम समय की मुलाकात में अपना अमिट प्रभाव छोड़ जाते हैं।

मंडल साहब ऐसे ही प्रभावशाली और दूरदर्शी व्यक्ति थे, जिनसे मिलने का अवसर मुझे प्राप्त हुआ। उनकी अध्यक्षता में गठित मंडल आयोग ने भारत सरकार को ऐसी ऐतिहासिक रिपोर्ट सौंपी, जिसने सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को संवैधानिक न्याय दिलाने की दिशा में ठोस आधार प्रदान किया। मंडल साहब की संस्तुतियां भारतीय संविधान में निहित सामाजिक न्याय, समान अवसर और समतामूलक समाज की अवधारणा को मूर्त रूप देने की दिशा में निस्संदेह मील का पत्थर सिद्ध हुईं।

केंद्र में जनता पार्टी की सरकार में प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के द्वारा मंडल आयोग का गठन सन् 1979 में किया गया। इस आयोग के अध्यक्ष मंडल साहब थे। आयोग को समाज के पिछड़े वर्गों के हितों के संबंध में रिपोर्ट देने का महती दायित्व सौंपा गया था।

समाज के पिछड़े वर्गों को मंडल आयोग से बड़ी उम्मीदें थीं। इसी बीच केंद्र में कांग्रेस पार्टी की सरकार बनी और मंडल साहब कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए। समाजवादी विचारधारा के लोगों में निराशा व्याप्त हो गई और आशंकित होकर मंडल साहब की आलोचना करने लगे।

एक जनसभा को संबोधित करते बी.पी. मंडल

अन्य लोगों की तरह मैं भी ऐसा ही सोचता था। जब मंडल साहब के करीबी लोगों, जिसमें कैलाश सिंह (मेरी पत्नी के नाना जी) भी थे, ने उनसे कहा कि आप क्यों कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए, समाजवादी आपसे नाराज़ हैं और बहुत निराश हो गए हैं। इस पर मंडल साहब ने कहा कि, “कैलाश बाबू, मैंने आयोग (मंडल कमीशन) के उद्देश्य की पूर्ति के लिए यह कदम उठाया है, जिसके लिए अनिवार्य था कि मैं कांग्रेस पार्टी में शामिल हो जाऊं।”

मंडल आयोग की अनुशंसा सरकार को सौंपने के बाद जब मंडल साहब पटना आए तो मंडल आयोग की रिपोर्ट पर चर्चा के लिए विधायक क्लब में एक सभा आयोजित की गई थी। मैं श्री कैलाश सिंह के साथ उस सभा में उपस्थित था। मंडल साहब से उत्सुकतावश लोग बार-बार पूछ रहे थे कि मंडल आयोग की रिपोर्ट में क्या अनुशंसा की गई है। कुछ लोग ऐसा कह रहे हैं कि आप राजा के बेटे हैं और आपने सत्ता मतलब अभिजात्य वर्ग के समर्थन में अपनी संस्तुति दी है। क्या यह सच है?

इस पर मंडल साहब ने कहा कि “आप सभी निश्चिंत रहें। और यदि एक वाक्य में कहूं तो पिछड़े वर्ग के लिए इससे बेहतर अनुशंसा कोई हो ही नहीं सकती। जिस दिन इस आयोग की एक भी अनुशंसा देश में लागू होगी, उस दिन क्रांति हो जाएगी। इससे न्यायोचित अनुशंसा तो ओबीसी के लिए भारत के संविधान में भी नहीं हो सकी, न इसके बाद होगी। राष्ट्र-निर्माण की गहरी भावना से प्रेरित होकर रिपोर्ट में पिछड़े वर्गों के‌ लिए अनुशंसा की गई है, यह अद्भुत रिपोर्ट है। आयोग की अनुशंसाएं एक बेहतर समाज के निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी l इससे समाज के हाशिए के वर्गों को मुख्यधारा में जगह मिलेगी और सामाजिक न्याय का सपना पूरा होगा।”

मैं वहीं पास में बैठा सुन रहा था। मंडल साहब की आंखों में समतामूलक समाज निर्माण के सपने की चमक थी और आवाज में संतुष्टि और दृढ़ता झलक रही थी। वह दृश्य, वह पल आज भी सोचता हूं तो जीवंत हो उठता है। उस समय मैं इंजीनियरिंग की शिक्षा पूरी करने के बाद नौकरी की तलाश में पटना आता रहता था। मंडल साहब के शब्दों से मिली उम्मीद और विश्वास की ऊर्जा ने मेरे भीतर भविष्य के सपनों और संभावनाओं को जीवित रखने का साहस जगाया। भले ही हमें उस परिवर्तन का लाभ नहीं मिल सका लेकिन हमारी अगली पीढ़ी ने उस सामाजिक क्रांति के सकारात्मक बदलावों और वातावरण को अवश्य महसूस किया है l 1990 के बाद से भारत के राजनीतिक, सामाजिक और शैक्षणिक परिदृश्य में सतत परिवर्तन को व्यापक स्तर पर परिलक्षित किया जा रहा हैl

मंडल आयोग की रिपोर्ट में अनेक सिफारिशें की गई थीं, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण सिफारिश सरकारी नौकरियों व शिक्षण संस्थानों में अन्य पिछड़े वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण देने की थी।

वर्ष 1990 में वी.पी. सिंह की सरकार ने मंडल आयोग की केंद्र सरकार की नौकरियों में ओबीसी के लिए 27 फीसदी आरक्षण संबंधी सिफ़ारिश को लागू करने की अधिसूचना जारी की, जिसे लेकर देश के कई सारे हिस्सों में विरोध भी हुआ था। वर्चस्ववादी ताकतों ने हिंसक आंदोलन किया। इसके बाद भी हाशिए पर धकेले गए वर्गों को उनका अधिकार प्राप्त हुआ। सामाजिक न्याय का वह दौर इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज हुआ।

संविधान में निहित प्रावधानों का वास्तविक महत्व तभी है, जब उनका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। केवल संवैधानिक व्यवस्था कर देना पर्याप्त नहीं होता; उसके प्रभावी क्रियान्वयन से ही सामाजिक न्याय की अवधारणा साकार होती है।

कुछ यादें कभी केवल अतीत नहीं होतीं, वे हमारे भीतर ऊर्जा, प्रेरणा और प्रोत्साहन बनकर सदा जीवित रहती हैं।

(संपादन : नवल/अनिल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, संस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

लेखक के बारे में

रघुवंश सिंह

सामाजिक न्याय के पैरोकार रघुवंश सिंह सेवानिवृत्त अभियंता हैं। उन्होंने 1979 में भागलपुर कालेज ऑफ इंजीनियरिंग से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की उपाधि प्राप्त की।

संबंधित आलेख

जानिए, सामाजिक क्रांति के अग्रदूत रामस्वरूप वर्मा के बारे में
अर्जक संघ के माध्यम से रामस्वरूप वर्मा समाज में व्याप्त अंधविश्वास और सामाजिक-सांस्कृतिक कुरीतियों को नकारकर वैज्ञानिक सोच विकसित करने और मानववाद की स्थापना...
इतिहास के पन्नों में डॉ. आंबेडकर की धर्मांतरण संबंधी विचार यात्रा
सवर्ण हिंदुओं को इस्लाम और ईसाई धर्म अपनाने की अपनी झिझक दिखाने में आंबेडकर ने जानबूझकर उन्हीं मुस्लिम और ईसाई विरोधी धारणाओं और अफ़वाहों...
स्वामी अछूतानंद ‘हरिहर’ का आदि-हिंदू आंदोलन और नवजागरणकालीन संपादकों का नजरिया
औपनिवेशिक भारत में जब स्वामी अछूतानंद ने पांच करोड़ अछूतों की हिंदू धर्म से अलग पहचान का दावा पेश किया तो हिंदी लेखक उनका...
फुले दंपति की विरासत और मौजूदा दौर में संघर्ष व चुनौतियां
आज अनेक अवसरों पर फुले दंपति के नाम और व्यक्तित्व का सम्मान किया जाता है, लेकिन उनके मनुस्मृति-विरोधी, जाति-विरोधी और ब्राह्मणवादी ज्ञान-सत्ता की आलोचना...
मंगू राम मुगोवालिया, आद धर्म आंदोलन और रविदास पंथ का उदय
यद्यपि पंजाब के अछूत समुदाय में पहले से ही गुरु रविदास (रैदास) के प्रति गहन श्रद्धा भाव था मगर आद धर्म आंदोलन ने अत्यंत...