इतिहास केवल अतीत की घटनाओं का अभिलेख भर नहीं होता, बल्कि सत्ता, स्मृति और सामाजिक वर्चस्व का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक दस्तावेज भी होता है। इतिहास में किसे स्थान दिया जाएगा, किसे विस्मृत कर दिया जाएगा, ये केवल शैक्षणिक निर्णय नहीं होते, बल्कि वे सत्ता-संबंधों द्वारा नियंत्रित राजनीतिक निर्णय होते हैं।
इसी कारण महात्मा जोतीराव फुले और क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले के इतिहास को समझना केवल दो महान व्यक्तित्वों की जीवनी को जानना नहीं है, बल्कि भारतीय समाज में ज्ञान, सत्ता, धर्म, जाति और इतिहास पर उनके विचारों तथा कार्यों के प्रभाव को समझना है। साथ ही यह भी समझना आवश्यक है कि उनके समतावादी दर्शन ने जाति और धर्म पर आधारित प्रभुत्वशाली सत्ता-संरचनाओं को किस प्रकार गहराई से चुनौती दी।
प्रो. गेल ऑम्वेट के शब्दों में, फुले तथा सत्यशोधक समाज का अध्ययन वस्तुतः औपनिवेशिक काल के सांस्कृतिक विद्रोहियों और परंपरागत सामाजिक-सांस्कृतिक वर्चस्व की रक्षा करने वाली शक्तियों के बीच हुए संघर्ष का अध्ययन है। वहीं इतिहासकार रोज़ालिंड ओ’हैनलॉन अपनी पुस्तक ‘कास्ट, कन्फ्लिक्ट एंड आइडियोलॉजी’ में जोतीराव फुले और सावित्रीबाई फुले को केंद्र में रखते हुए 19वीं शताब्दी के जातीय संघर्षों की वास्तविकता को सामने लाती हैं।
आज भारत के लगभग प्रत्येक राज्य में फुले दंपति का नाम सम्मानपूर्वक लिया जाता है। उनकी जयंतियां मनाई जाती हैं, उनकी प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं और अनेक सरकारी योजनाओं तथा संस्थाओं को उनके नाम दिए जाते हैं। विशेष रूप से दलित, आदिवासी, विमुक्त-घुमंतू, अल्पसंख्यक, पिछड़े वर्गों तथा अन्य वंचित समुदायों ने उन्हें अपने सामाजिक न्याय और आत्मसम्मान के प्रतीक के रूप में स्वीकार किया है।
लेकिन विडंबना यह है कि जैसे-जैसे समाज में फुले दंपति के प्रति सम्मान और स्वीकार्यता बढ़ी है, वैसे-वैसे वर्णवादी वर्चस्ववादी शक्तियों की बेचैनी भी बढ़ती गई है। परिणामस्वरूप फुले, शाहू और आंबेडकरवादी समतामूलक विचारधारा के सार्वजनिक प्रभाव को सीमित करने के प्रयास तेज़ हुए हैं। उनके नाम को स्वीकार किया जाता है, लेकिन मनुस्मृति-विरोधी, जाति-विरोधी, ब्राह्मणवादी ज्ञान-सत्ता की आलोचना करने वाले तथा सामाजिक क्रांति के उनके मूल विचारों को योजनाबद्ध ढंग से हाशिए पर धकेलने का प्रयास किया जाता है। कभी पाठ्यपुस्तकों से उन्हें हटाया जाता है, तो कभी उनके क्रांतिकारी विचारों को केवल ‘सामाजिक सुधार’ तक सीमित कर दिया जाता है। यहीं से सामाजिक न्याय के इस विद्रोही इतिहास को मिटाने की आधुनिक प्रक्रिया आरंभ होती है। यद्यपि इसे आज की प्रक्रिया कहा जा सकता है, लेकिन यह वस्तुतः अत्यंत पुरानी, रूढ़िवादी और कर्मकांडी परंपरा का ही नया रूप है, जो शोषित समुदायों के जीवन में परिवर्तन को स्वीकार करने के लिए कभी भी तैयार नहीं रही।
इतिहास को मिटाने का अर्थ
इतिहास को मिटाने का अर्थ केवल किसी व्यक्ति का नाम पाठ्यपुस्तकों से हटा देना या साहित्य से उसका उल्लेख समाप्त कर देना नहीं होता। इतिहास को मिटाने का वास्तविक अर्थ है– उस व्यक्ति के विचारों को संदर्भहीन बना देना, उसके संघर्ष को केवल एक सीमित सामाजिक सुधार आंदोलन के रूप में प्रस्तुत करना, उसकी वैचारिक क्रांति के व्यापक सामाजिक प्रभावों को धूमिल कर देना और अंततः उसे केवल एक प्रतीक में बदल देना, जिससे उसके क्रांतिकारी विचार निष्प्रभावी हो जाएं। इसीलिए जोतीराव फुले और सावित्रीबाई फुले की विरासत को समझते समय केवल इतिहास नहीं, बल्कि इतिहास की राजनीति को भी समझना आवश्यक है।
जोतीराव फुले का जन्म 11 अप्रैल, 1827 को पुणे में माली समाज के एक परिवार में हुआ था। उनके बचपन की एक घटना ने उनके पूरे जीवन की दिशा बदल दी। एक ब्राह्मण मित्र के विवाह समारोह में उनके साथ किया गया अपमान केवल व्यक्तिगत अनुभव नहीं था; वह जन्म-आधारित श्रेष्ठता और हीनता पर आधारित जाति-व्यवस्था का घृणित चेहरा था। उस अनुभव ने उनके मन में एक मूलभूत प्रश्न खड़ा किया– यदि किसी मनुष्य का अपमान केवल उसके जन्म के कारण किया जाता है, तो ऐसी व्यवस्था की नैतिक और सामाजिक वैधता क्या है? यही प्रश्न आगे चलकर उनके समूचे वैचारिक संघर्ष की आधारशिला बना।
3 जनवरी, 1831 को जन्मी सावित्रीबाई का विवाह बाल्यावस्था में ही जोतीराव फुले से हुआ। उस समय स्त्रियों को शिक्षा देना धर्मविरुद्ध माना जाता था। ऐसे वातावरण में जोतीराव ने सबसे पहले अपनी पत्नी को शिक्षित किया। भारतीय स्त्री-मुक्ति के इतिहास में यह घटना अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि स्त्री-शिक्षा का पहला प्रयोग घर से आरंभ हुआ। सावित्रीबाई केवल एक विद्यार्थी नहीं रहीं। वे आगे चलकर शिक्षिका, लेखिका, कवयित्री, संगठक और सामाजिक क्रांति की अग्रणी नेता बनीं।
सन् 1848 में पुणे के भिड़ेवाड़ा में लड़कियों के लिए पहली विद्यालय की स्थापना हुई। यह विद्यालय मात्र एक वर्ष तक चल सका। कट्टरपंथी शक्तियों के तीव्र विरोध के कारण उसे बंद करवा दिया गया। भय का वातावरण इतना गहरा था कि जिसने प्रारंभ में विद्यालय के लिए स्थान उपलब्ध कराया था, उसने भी आगे अपनी जगह देने से इनकार कर दिया। उसे आशंका थी कि यदि उसने फुले दंपति को सहयोग दिया तो उसके परिवार को भी वही सामाजिक बहिष्कार और हिंसा झेलनी पड़ेगी।

आज भी पुणे में दगडूशेठ हलवाई गणपति मंदिर के सामने स्थित वह ऐतिहासिक भिड़ेवाड़ा जर्जर अवस्था में खड़ा है। मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ और धार्मिक अनुष्ठान निरंतर बढ़ते गए, लेकिन उसी के सामने स्थित उस ऐतिहासिक भवन में फिर कभी उन बालिकाओं की आवाज़ नहीं गूंजी, जो कभी वहां वर्णमाला और पहाड़े सीखा करती थीं।
वास्तव में फुले दंपति ने उस विद्यालय की स्थापना केवल शूद्र और अतिशूद्र बालिकाओं के लिए नहीं की थी। उनका उद्देश्य यह भी था कि ब्राह्मण समाज की लड़कियां भी शिक्षा प्राप्त कर सकें। इसी कारण उन्होंने विद्यालय ब्राह्मण-बहुल क्षेत्र में स्थापित किया, ताकि वहां के ब्राह्मण भी अपनी बेटियों को विद्यालय भेज सकें। इस दृष्टि से भारत की प्रत्येक शिक्षित स्त्री, चाहे वह किसी भी जाति की हो, फुले दंपति की ऐतिहासिक भूमिका की ऋणी है।
सावित्रीबाई फुले ने 1 जनवरी, 1848 को सार्वजनिक रूप से लड़कियों को पढ़ाना प्रारंभ किया। उस समय कश्मीर से कन्याकुमारी तक किसी भी भारतीय स्त्री ने औपचारिक रूप से शिक्षिका के रूप में कार्य आरंभ नहीं किया था। अक्सर पंडिता रमाबाई का उल्लेख किया जाता है, लेकिन यह ऐतिहासिक तथ्य है कि उनका जन्म 1858 में हुआ था। अर्थात जब सावित्रीबाई ने 1848 में भारत का पहला बालिका विद्यालय प्रारंभ किया, तब पंडिता रमाबाई का जन्म भी नहीं हुआ था। वे सावित्रीबाई से लगभग 28 वर्ष छोटी थीं। सावित्रीबाई की सहयोगी शिक्षिका सावित्रीबाई गोवंडे पहले उनकी छात्रा थीं और बाद में शिक्षिका बनीं। यह भारतीय महिला-शिक्षा के इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है।
कट्टर ब्राह्मणवादी शक्तियों को सबसे अधिक यह बात असह्य थी कि सदियों तक शिक्षा पर एकाधिकार रखने वाले पुरुष पंडितों के सामने अब एक स्त्री शिक्षिका खड़ी थी, जो मनुस्मृति द्वारा स्त्रियों और शूद्रों पर लगाए गए ज्ञान के प्रतिबंध को अपने कार्य द्वारा अस्वीकार कर रही थी। उन्होंने न केवल स्वयं शिक्षा प्राप्त की, बल्कि ज्ञान को समाज के प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार घोषित करते हुए उसे सबके लिए उपलब्ध कराया। इसी ऐतिहासिक योगदान के सम्मान में महाराष्ट्र सरकार ने सावित्रीबाई फुले जयंती को ‘भारतीय स्त्री-मुक्ति दिवस’ के रूप में मनाने का आदेश पारित किया।
जोतीराव फुले और सावित्रीबाई फुले को सामाजिक एवं शैक्षिक क्रांति का क्रमश: जनक और जननी मानते हुए महाराष्ट्र सरकार ने उनके समग्र साहित्य के संकलन और संपादन के लिए एक उच्चस्तरीय समिति गठित की। धनंजय कीर, य.दि. फडके और डॉ. स.ग. मालशे जैसे प्रतिष्ठित विद्वानों ने इस कार्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके प्रयासों से फुले दंपति का बहुमूल्य साहित्य ‘समग्र वाङ्मय’ के रूप में उपलब्ध हुआ। इसी प्रकार मा.गो. माली ने सावित्रीबाई फुले के व्यक्तित्व और कृतित्व को उनके विस्तृत चरित्र-ग्रंथों के माध्यम से समाज के सामने रखा।
लेकिन समय के साथ राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं। फुले, शाहू, आंबेडकर और पेरियार की समतामूलक विचारधारा और मनुस्मृति-विरोधी दृष्टि को लेकर वैचारिक संघर्ष भी अधिक तीव्र होता गया। यही कारण है कि फुले दंपति के योगदान और उनके मूलगामी विचारों को लेकर सार्वजनिक विमर्श में नए विवाद खड़े होने लगे।
इतिहास का यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि 1848 में फुले दंपति ने शिक्षा और सामाजिक समता के माध्यम से मनुवादी व्यवस्था को पहली बार खुली चुनौती दी। लगभग 100 वर्ष बाद डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भारतीय संविधान के माध्यम से जन्म-आधारित असमानता को कानूनी वैधता से वंचित करने का ऐतिहासिक कार्य किया। यह सामाजिक परिवर्तन भारतीय इतिहास की एक निर्णायक प्रक्रिया थी।
इसी पृष्ठभूमि में पिछले कुछ वर्षों की अनेक घटनाएं विचारणीय हैं। महात्मा फुले के जीवन पर आधारित निर्देशक अनंत महादेवन की फिल्म को लेकर विवाद उत्पन्न हुए। टेलीविजन धारावाहिक ‘मैं सावित्रीबाई ज्योतिराव फुले’ को भी विरोध का सामना करना पड़ा। इसी प्रकार विभिन्न स्तरों पर पाठ्यक्रमों में फुले दंपति से संबंधित सामग्री के स्थान और प्रस्तुति को लेकर भी बहसें सामने आईं। इन घटनाओं ने इतिहास, शिक्षा और सांस्कृतिक स्मृति के प्रश्नों को पुनः सार्वजनिक विमर्श का विषय बना दिया।
उन्नीसवीं शताब्दी के पुणे में, जहां पेशवाई की सामाजिक संरचना का गहरा प्रभाव था, वहां फुले दंपति ने शिक्षा, तर्क, अनुभव और सामाजिक न्याय के आधार पर स्थापित परंपराओं को चुनौती दी। उनके संघर्ष का विरोध केवल रूढ़िवादी शक्तियों तक सीमित नहीं रहा; अनेक स्तरों पर उन्हें वैचारिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। लेकिन इन सबके बावजूद न सावित्रीबाई विचलित हुईं और न ही जोतीराव पीछे हटे।
उन्होंने बालहत्या प्रतिबंधक गृह की स्थापना की। उस समय समाज में विशेषकर अविवाहित और विधवा स्त्रियों की गर्भावस्था को कलंक माना जाता था। अनेक स्त्रियां सामाजिक अपमान के भय से नवजात शिशुओं की हत्या करने या आत्महत्या करने के लिए विवश हो जाती थीं। फुले दंपति ने ऐसी स्त्रियों के लिए सुरक्षित आश्रय उपलब्ध कराया और उन्हें सम्मानपूर्वक प्रसूति की सुविधा दी। आश्रय गृह के बाहर लगा संदेश अपने समय के लिए अत्यंत क्रांतिकारी था–
“डरिए मत। यहां आइए और सुरक्षित प्रसव कीजिए।”
इस पहल के कारण अनेक स्त्रियों और नवजात शिशुओं का जीवन बचाया जा सका। ऐसी ही एक ब्राह्मण विधवा काशीबाई के पुत्र यशवंत को फुले दंपति ने दत्तक ग्रहण किया। उन्होंने उसका पालन-पोषण किया, उसे उच्च शिक्षा दिलाई और वह आगे चलकर चिकित्सक बना। यह घटना इस बात का प्रतीक थी कि उनके लिए मानवता जन्म और जाति से कहीं अधिक महत्वपूर्ण थी।
इसी प्रकार फुले दंपति ने अस्पृश्य माने जाने वाले समुदायों के लिए अपने घर का पानी का हौद भी खोल दिया। उस समय जब सार्वजनिक जलस्रोतों से पानी लेने का अधिकार भी जाति के आधार पर नियंत्रित था, तब यह कदम केवल मानवीय संवेदना नहीं, बल्कि सामाजिक समानता की एक क्रांतिकारी घोषणा थी।
भारतीय इतिहास में यह एक नए युग की शुरुआत थी। सदियों से कुछ वर्णों तक सीमित ज्ञान और सामाजिक अधिकारों को पहली बार सार्वजनिक रूप से चुनौती दी गई। फुले दंपति ने यह स्थापित किया कि ज्ञान जन्मसिद्ध विशेषाधिकार नहीं, बल्कि प्रत्येक मनुष्य का मौलिक अधिकार है। यहीं से संघर्ष का एक नया और अधिक तीखा चरण प्रारंभ हुआ। सावित्रीबाई फुले जब प्रतिदिन विद्यालय पढ़ाने जाती थीं, तब कट्टरपंथी लोग उन पर गोबर, कीचड़, पत्थर और कूड़ा फेंकते थे। उन्हें अपमानित किया जाता, अश्लील गालियां दी जातीं और उनके चरित्र पर लांछन लगाए जाते। समाज ने उनका बहिष्कार किया। उनके परिवार पर दबाव बनाया गया। जोतीराव फुले के पिता पर भी धार्मिक और सामाजिक दबाव डाला गया। अंततः फुले दंपति को अपना पैतृक घर छोड़ना पड़ा। इन घटनाओं का उल्लेख करते समय हमें एक मूलभूत प्रश्न अवश्य पूछना चाहिए कि सावित्रीबाई पर गोबर क्यों फेंका गया?
उत्तर स्पष्ट है, क्योंकि वे केवल लड़कियों को अक्षरज्ञान नहीं दे रही थीं; वे ज्ञान पर सदियों से स्थापित वर्ण-आधारित एकाधिकार को चुनौती दे रही थीं। उनके ऊपर फेंका जाने वाला गोबर केवल एक स्त्री का अपमान नहीं था, बल्कि समानता, शिक्षा और मानवाधिकार की अवधारणा पर किया गया हमला था। उन पर फेंके गए पत्थरों का उद्देश्य केवल उनके शरीर को घायल करना नहीं था; उनका वास्तविक लक्ष्य उनके विचारों को रोकना था। लेकिन सावित्रीबाई ने इस हिंसा का उत्तर दृढ़निश्चयी होकर दिया। वे प्रतिदिन अपने साथ एक अतिरिक्त साड़ी लेकर निकलती थीं। विद्यालय पहुंचने पर गंदी साड़ी बदलतीं और बिना किसी शिकायत के अपनी छात्राओं को पढ़ाना आरंभ कर देतीं। भारतीय स्त्री-मुक्ति के इतिहास में यह दृश्य केवल करुणा का नहीं, बल्कि प्रतिरोध, साहस और नैतिक दृढ़ता का सबसे उज्ज्वल प्रतीक है। उन्होंने हिंसा का उत्तर हिंसा से नहीं, बल्कि शिक्षा से दिया।

इसी काल में फुले दंपति ने केवल बालिकाओं के लिए ही नहीं, बल्कि शूद्र और अतिशूद्र बच्चों के लिए भी विद्यालय स्थापित किए। उन्होंने फातिमा शेख को शिक्षिका के रूप में प्रशिक्षित किया। एक मुस्लिम महिला को शिक्षिका बनाकर उन्होंने धर्म और जाति की सीमाओं से ऊपर उठकर समानता और साझी मानवता का आदर्श प्रस्तुत किया। आज भारतीय शिक्षा के इतिहास में फातिमा शेख का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है, लेकिन उनके पीछे खड़े फुले दंपति के धर्मनिरपेक्ष, समतामूलक और साहसी दृष्टिकोण पर अपेक्षित गंभीरता से चर्चा कम होती है।
इसी काल में जोतीराव फुले का लेखन भी अधिक प्रखर और वैचारिक रूप से परिपक्व होता गया। उन्होंने धर्मग्रंथों, पुराणों, वर्णव्यवस्था तथा जन्माधारित श्रेष्ठता की गहन आलोचनात्मक समीक्षा की। उनके लिए लेखन साहित्यिक अभिव्यक्ति भर नहीं था; वह सामाजिक मुक्ति और बौद्धिक क्रांति का साधन था। इसी वैचारिक यात्रा का ऐतिहासिक परिणाम था 1873 में प्रकाशित ‘गुलामगिरी’। यह ग्रंथ भारतीय सामाजिक चिंतन के इतिहास का एक मील का पत्थर है। अमेरिका के दासप्रथा-विरोधी आंदोलन के कार्यकर्ताओं को समर्पित इस पुस्तक में जोतीराव फुले ने भारतीय जाति-व्यवस्था और वैश्विक दासता-विरोधी संघर्षों के बीच एक महत्वपूर्ण वैचारिक संबंध स्थापित किया।
उन्होंने स्पष्ट लिखा कि भारत में शूद्रों और अतिशूद्रों की गुलामी केवल आर्थिक नहीं है। वह धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक और मानसिक गुलामी भी है। इसलिए उसकी मुक्ति का संघर्ष भी व्यापक और बहुआयामी होना चाहिए।
‘गुलामगिरी’ के प्रकाशित होते ही जोतीराव फुले के खिलाफ विरोध की एक नई लहर उठ खड़ी हुई। उन्हें धर्मद्रोही, हिंदू-विरोधी, समाज-विघातक और परंपरा-विरोधी जैसे विशेषणों से संबोधित किया गया। उनके विचारों को बदनाम करने का प्रयास किया गया, लेकिन फुले ने अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया। इसके विपरीत, उन्होंने सत्य की खोज और सामाजिक न्याय के संघर्ष को और अधिक तीव्र कर दिया।
यहीं भारतीय इतिहास का एक मूलभूत वैचारिक संघर्ष स्पष्ट दिखाई देता है। एक ओर सत्यशोधक परंपरा थी, जो समानता, विवेक, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सार्वभौमिक शिक्षा और मानवीय गरिमा पर आधारित समाज का निर्माण करना चाहती थी; दूसरी ओर वह व्यवस्था थी, जो जन्म-आधारित विशेषाधिकारों, जातिगत पदानुक्रम और सामाजिक वर्चस्व को बनाए रखना चाहती थी। यह संघर्ष केवल दो व्यक्तियों या दो संगठनों के बीच नहीं था। यह दो परस्पर विरोधी सामाजिक दर्शन और दो भिन्न सभ्यतागत दृष्टियों के बीच का संघर्ष था।
इसी वैचारिक यात्रा में 24 सितंबर, 1873 को सत्यशोधक समाज की स्थापना हुई। इस संगठन का उद्देश्य जाति-वर्चस्व, पुरोहितवाद, अंधविश्वास और सामाजिक असमानता के विरुद्ध संगठित सामाजिक आंदोलन खड़ा करना था। सत्यशोधक समाज ने जन्माधारित श्रेष्ठता को अस्वीकार करते हुए मानव-समता को सामाजिक जीवन का आधार बनाने का प्रयास किया।
इसके बाद फुले ने ‘शेतकऱ्याचा आसूड’ (किसान का कोड़ा) के माध्यम से किसानों के आर्थिक शोषण का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया। ‘सार्वजनिक सत्यधर्म’ के द्वारा उन्होंने धर्म की ऐसी अवधारणा प्रस्तुत की, जिसका आधार कर्मकांड नहीं, बल्कि सत्य, समानता और मानवता थी। हंटर आयोग के समक्ष प्रस्तुत अपने निवेदन में उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि शिक्षा का अधिकार समाज के बहुसंख्यक लोगों तक नहीं पहुंचेगा, तो भारत का वास्तविक विकास कभी संभव नहीं होगा। उन्होंने विशेष रूप से शूद्रों, अतिशूद्रों, स्त्रियों और वंचित समुदायों की शिक्षा को राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी बताया। उनके सामाजिक योगदान को देखते हुए 11 मई, 1888 को मुंबई में आयोजित एक सार्वजनिक समारोह में जनसाधारण ने उन्हें ‘महात्मा’ की उपाधि प्रदान की। यह उपाधि किसी राजा, शासक या औपनिवेशिक सत्ता ने नहीं दी थी; यह उस बहुजन समाज की ओर से मिला सम्मान था, जिसके जीवन को उन्होंने अपने संघर्ष से बदलने का प्रयास किया था। यह केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं था; यह भारतीय बहुजन समाज द्वारा अपने क्रांतिकारी नेतृत्व को दी गई ऐतिहासिक मान्यता थी।
समता-भूमि और आधुनिक ज्ञानपीठ : फुलेवाड़ा भी संकट में
पुणे स्थित फुलेवाड़ा जोतीराव फुले और सावित्रीबाई फुले का निवास-स्थान भारतीय सामाजिक न्याय, स्त्री-मुक्ति और ज्ञान-आधारित परिवर्तन के इतिहास का एक जीवंत स्मारक है। यहीं से फुले दंपति ने निरंतर सामाजिक परिवर्तन का कार्य संचालित किया। भीषण विरोध, सामाजिक बहिष्कार और हिंसा के बावजूद उन्होंने शिक्षा, स्त्री-मुक्ति और सामाजिक समानता का अभियान कभी नहीं रोका।
भारतीय इतिहास में शायद ही कोई अन्य दंपति ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करता हो, जिसने पति-पत्नी के समान वैचारिक साझेदारी, समान सामाजिक प्रतिबद्धता और समान नेतृत्व के आधार पर इतना व्यापक परिवर्तनकारी कार्य किया हो।
जब पंडिता रमाबाई को लेकर समाज में तीखी आलोचनाएं हो रही थीं और उन पर अनेक प्रकार के प्रतिबंध लगाए जा रहे थे, तब जोतीराव फुले ने खुले रूप से उनका समर्थन किया। उन्होंने उनके कार्य की सार्वजनिक सराहना की और उनके पक्ष में लेख लिखे। इसी प्रकार, जब सत्यशोधक चिंतक ताराबाई शिंदे ने अपनी ऐतिहासिक कृति ‘स्त्री-पुरुष तुलना’ प्रकाशित की और उन्हें तीव्र विरोध का सामना करना पड़ा, तब भी फुले ने निर्भीकता से उनका समर्थन किया।
फुले दंपति ने अपने जीवन में कभी कर्मकांड को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने रूढ़ियों और अंधविश्वासों का विरोध किया तथा प्रकृति के प्रति गहरा प्रेम व्यक्त किया। उन्होंने अपने परिसर में अनेक वृक्ष लगाए, उनका संरक्षण किया और आने वाली पीढ़ियों के लिए पर्यावरण को सुरक्षित रखने का संदेश दिया। उन्होंने वृक्षों की पूजा नहीं की, बल्कि उन्हें जीवनदायी प्रकृति का अंग मानकर संरक्षित किया।
फुलेवाड़ा में आज भी लगभग दो सौ वर्ष पुराना वह विशाल वट वृक्ष खड़ा है, जिसके बारे में मान्यता है कि इसे फुले दंपति ने लगाया था। यह वृक्ष केवल प्रकृति-प्रेम का प्रतीक ही नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, ज्ञान और मानवता के मूल्यों का भी साक्षी है।

पिछले कुछ वर्षों से इस वटवृक्ष के नीचे वट-सावित्री व्रत मनाने के उद्देश्य से कुछ महिलाएं आने लगीं। अनेक सत्यशोधक कार्यकर्ताओं ने उनसे संवाद करते हुए पूछा कि यदि पुराणों की कथा के अनुसार व्रत रखने से मृत पति पुनः जीवित हो सकते हैं, तो महामारी और अन्य कारणों से जिन असंख्य महिलाओं के पति मृत्यु को प्राप्त हुए, वे इस व्रत के माध्यम से उन्हें पुनः जीवित क्यों नहीं कर सकीं? उन्होंने यह भी प्रश्न उठाया कि यदि यह व्रत वास्तव में इतना प्रभावशाली है, तो इसे करने वाली महिलाओं के जीवन में इसका प्रत्यक्ष परिणाम कहां दिखाई देता है?
इसके विपरीत, सावित्रीबाई फुले ने स्त्रियों से कहा था– शिक्षित बनो, आत्मनिर्भर बनो, अन्याय का प्रतिरोध करो और अपने जीवन का निर्णय स्वयं करो। उन्होंने हजारों महिलाओं को शिक्षा देकर सम्मानपूर्वक जीने का मार्ग दिखाया। उनके कारण असंख्य स्त्रियां अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने लगीं।
ऐसे में प्रश्न उठता है कि जिस स्थान पर ज्ञान, समानता और स्त्री-मुक्ति का इतिहास रचा गया, उसी स्थान को कर्मकांड का केंद्र बनाने का प्रयास क्यों किया जाता है? यह सांस्कृतिक प्रतीकों के अर्थ बदलने का प्रश्न है।
इसी संदर्भ में कुछ अवसरों पर भारतीय जनता पार्टी की नेता और सांसद मेधा कुलकर्णी के फुलेवाड़ा पहुंचने तथा वहां वट-सावित्री पूजा करने को लेकर सार्वजनिक विवाद भी सामने आए। आलोचकों का आरोप था कि फुले दंपति ने जिन रूढ़ियों और कर्मकांडों का जीवनभर विरोध किया, उसी स्थान पर ऐसे धार्मिक अनुष्ठान करना उनके वैचारिक संदेश के विपरीत है।
इसी प्रकार यह भी प्रश्न उठाया गया कि फुले दंपति के विचारों का सम्मान उनके जीवन-दर्शन, सामाजिक संघर्ष और समतावादी मूल्यों को अपनाकर किया जाना चाहिए, या केवल प्रतीकों और अनुष्ठानों के माध्यम से?
यह उस व्यापक प्रश्न से जुड़ा है कि क्या किसी क्रांतिकारी व्यक्तित्व की स्मृति को उसके मूल विचारों से अलग करके केवल सांस्कृतिक प्रतीक में बदल दिया जा सकता है?
यदि सावित्रीबाई फुले ने स्त्रियों को शिक्षा, स्वाभिमान, स्वतंत्र चिंतन और सामाजिक नेतृत्व का मार्ग दिखाया, तो क्या उनकी विरासत का सम्मान उन्हीं मूल्यों को आगे बढ़ाकर नहीं किया जाना चाहिए?
इसी प्रकार, यदि जोतीराव फुले ने मनुस्मृति, जाति-व्यवस्था, पुरोहितवाद और अंधविश्वास की आलोचना की, तो उनके स्मारकों का उपयोग उन्हीं मान्यताओं को पुनर्स्थापित करने के लिए करना उनके वैचारिक जीवन से मेल खाता है या नहीं, यह प्रश्न इतिहास और समाज, दोनों के सामने विचारणीय है।
जब किसी क्रांतिकारी व्यक्तित्व की स्मृति को उसके मूल वैचारिक संदर्भ से अलग कर केवल सांस्कृतिक प्रतीक में बदल दिया जाता है, तब उसके परिवर्तनकारी विचारों के क्षीण होने का खतरा उत्पन्न होता है। इसलिए फुले दंपति की विरासत की रक्षा केवल उनकी प्रतिमाओं, स्मारकों या जयंती समारोहों से नहीं होगी, बल्कि उनके समतामूलक, वैज्ञानिक, लोकतांत्रिक और मानवतावादी विचारों को समाज में जीवित रखने से होगी। यही कारण है कि आज के दौर में फुले दंपति के इतिहास और विचारों को लेकर चल रही बहस केवल अतीत की नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के भारत की सामाजिक दिशा से भी जुड़ी हुई है।
इतिहास, सत्ता और स्मृति की राजनीति : फुले दंपति की विरासत का आलोचनात्मक विश्लेषण
उपरोक्त ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के आधार पर यह स्पष्ट है कि जोतीराव फुले और सावित्रीबाई फुले के इतिहास के इर्द-गिर्द आज जो बहसें चल रही हैं, उनका मूल्यांकन केवल भावनात्मक स्तर पर नहीं किया जा सकता। उनका विश्लेषण इतिहास, समाजशास्त्र, सांस्कृतिक अध्ययन तथा सत्ता के सिद्धांतों के आलोक में करना आवश्यक है।
किसी भी क्रांतिकारी व्यक्तित्व का इतिहास केवल उसके जीवन का इतिहास नहीं होता; वह उस समाज में ज्ञान, सत्ता, संस्कृति, स्मृति और प्रतिरोध के बीच चलने वाले संघर्षों का भी इतिहास होता है। इतालवी मार्क्सवादी चिंतक अंतोनियो ग्राम्शी ने ‘सांस्कृतिक वर्चस्व’ की अवधारणा प्रस्तुत करते हुए बताया कि सत्ता केवल सेना, कानून या प्रशासन के बल पर कायम नहीं रहती। वह विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, धर्म-संस्थाओं, परिवार, साहित्य, मीडिया और इतिहास के माध्यम से लोगों की चेतना का निर्माण करती है। वह यह तय करती है कि समाज किसे सामान्य, स्वाभाविक और वैध मानेगा। जब कोई प्रभुत्वशाली व्यवस्था अपने मूल्यों को पूरे समाज के सार्वभौमिक मूल्य के रूप में स्थापित कर देती है, तब सांस्कृतिक वर्चस्व निर्मित होता है।
यदि फुले दंपति के इतिहास को इस दृष्टिकोण से देखा जाए, तो स्पष्ट होता है कि उन्होंने केवल सामाजिक अन्याय का विरोध नहीं किया, बल्कि उस संपूर्ण ज्ञान-व्यवस्था को चुनौती दी, जो उस अन्याय को वैध ठहराती थी। यही कारण है कि उनके विरोधियों को उनके व्यक्तित्व से अधिक उनके विचारों से भय था।
आज भी अनेक अवसरों पर उनके नाम और व्यक्तित्व का सम्मान किया जाता है, लेकिन उनके मनुस्मृति-विरोधी, जाति-विरोधी और ब्राह्मणवादी ज्ञान-सत्ता की आलोचना करने वाले मूलगामी विचारों को अपेक्षाकृत कम महत्व दिया जाता है। ऐसी स्थिति को समझने में ग्राम्शी की सांस्कृतिक वर्चस्व की अवधारणा अत्यंत उपयोगी सिद्ध होती है।
फ्रांसीसी दार्शनिक मिशेल फूको ने सत्ता और ज्ञान के बीच गहरे संबंध को स्पष्ट करते हुए कहा कि ज्ञान कभी भी पूरी तरह तटस्थ नहीं होता। ज्ञान का निर्माण सत्ता-संबंधों के भीतर होता है। कौन-सा इतिहास आधिकारिक माना जाएगा, कौन-सा ज्ञान पाठ्यक्रम का हिस्सा बनेगा, किन विचारों को मुख्यधारा में स्थान मिलेगा और किन्हें हाशिए पर रखा जाएगा – यह सब सत्ता-संबंधों से प्रभावित होता है। फूको के दृष्टिकोण से प्रश्न यह उठता है कि आज फुले दंपति के किन विचारों को व्यापक रूप से पढ़ाया जाता है और किन्हें अपेक्षाकृत कम महत्व दिया जाता है?
देखा जाए तो उनके स्त्री-शिक्षा के कार्य का उल्लेख अवश्य होता है, लेकिन ‘गुलामगिरी’ में प्रस्तुत ब्राह्मणवादी सत्ता-संरचना की उनकी मूलगामी आलोचना पर कितनी गंभीर सार्वजनिक चर्चा होती है?
उनके विद्यालयों का सम्मान किया जाता है, लेकिन सत्यशोधक समाज के पुरोहितवाद-विरोधी कार्यक्रम पर कितना विमर्श होता है?
यह केवल पाठ्यक्रम का प्रश्न नहीं है। यह ज्ञान-सत्ता का प्रश्न भी है। इतिहासकार एरिक हॉब्सबॉम ने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘द इन्वेंशन ऑफ ट्रेडिशन’ में यह प्रतिपादित किया कि अनेक परंपराएं वास्तव में उतनी प्राचीन नहीं होतीं, जितना उन्हें प्रस्तुत किया जाता है। अनेक बार वे विशेष राजनीतिक और सांस्कृतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए नए रूप में निर्मित की जाती हैं।
जब किसी सत्ता को अपनी वैधता स्थापित करनी होती है, तब वह इतिहास का पुनर्पाठ करती है, चयनित स्मृतियों को सुरक्षित रखती है और उन ऐतिहासिक तथ्यों को हाशिए पर डाल देती है जो उसके लिए असुविधाजनक हों।
इसी प्रक्रिया का दूसरा पक्ष सांस्कृतिक अध्ययन के विद्वान स्टुअर्ट हॉल की ‘प्रतिनिधित्व’ की अवधारणा में दिखाई देता है। उनके अनुसार किसी व्यक्ति का केवल उल्लेख कर देना पर्याप्त नहीं है; बल्कि उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि समाज के सामने उसका अर्थ किस रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
यदि फुले को ‘महान शिक्षाविद’ के रूप में प्रस्तुत किया जाए और उनके जाति-विरोधी, मनुस्मृति-विरोधी तथा सामाजिक क्रांति के कार्यक्रम की उपेक्षा की जाए, तो यह भी प्रतिनिधित्व की एक राजनीतिक प्रक्रिया है।
इसी प्रकार यदि सावित्रीबाई फुले को केवल ‘भारत की प्रथम शिक्षिका’ कहकर सम्मानित किया जाए, लेकिन उनके स्त्रीवादी नेतृत्व, सामाजिक न्याय के संघर्ष और जाति-विरोधी राजनीतिक हस्तक्षेप को गौण कर दिया जाए, तो उनके इतिहास का वास्तविक अर्थ भी बदल जाता है।
यही कारण है कि फुले दंपति की विरासत को समझने के लिए केवल घटनाओं का अध्ययन पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना आवश्यक है कि इतिहास में उन्हें कैसे प्रस्तुत किया जा रहा है, क्या याद रखा जा रहा है, और क्या भुलाया जा रहा है।
सत्यशोधक विरासत के समक्ष चुनौतियां
अमेरिकी अश्वेत नारीवादी चिंतक बेल हुक्स ने अपने लेखन में विस्तार से बताया है कि प्रभुत्वशाली संस्कृति प्रायः उन व्यक्तित्वों और प्रतीकों को सांस्कृतिक रूप से आत्मसात कर लेती है, जिन्होंने कभी उसी व्यवस्था को चुनौती दी थी। जब किसी क्रांतिकारी व्यक्तित्व को पूरी तरह नकार पाना संभव नहीं रह जाता, तब सत्ता उसके विचारों को निष्प्रभावी बनाने के लिए एक नई रणनीति अपनाती है। वह उसके नाम, प्रतिमा और सार्वजनिक स्मृति को तो स्वीकार कर लेती है, लेकिन उसके विचारों की परिवर्तनकारी शक्ति को धीरे-धीरे निष्क्रिय कर देती है।
अर्थात प्रतिमा स्वीकार कर ली जाती है, परंतु प्रतिरोध को अस्वीकार कर दिया जाता है। फुले दंपति के संदर्भ में भी यह प्रश्न गंभीरता से उठाया जाना चाहिए। आज उनके चित्र सरकारी कार्यालयों, विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और सार्वजनिक संस्थानों में दिखाई देते हैं। उनकी जयंतियां बड़े उत्साह से मनाई जाती हैं। उनके नाम पर अनेक योजनाएं और संस्थाएं संचालित की जाती हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या उनके ग्रंथों का उसी गंभीरता से अध्ययन किया जाता है? क्या ‘गुलामगिरी’, ‘शेतकऱ्याचा आसूड’ (किसान का कोड़ा), ‘सार्वजनिक सत्यधर्म’, ‘स्त्री-पुरुष तुलना’ और सत्यशोधक साहित्य पर सार्वजनिक विमर्श उतनी ही गंभीरता से होता है? क्या उनके जाति-उन्मूलन, स्त्री-मुक्ति, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सामाजिक लोकतंत्र और ज्ञान के सार्वभौमिक अधिकार के कार्यक्रम को सार्वजनिक नीति और शिक्षा में समान महत्व प्राप्त है?
यदि उत्तर नकारात्मक है, तो यह केवल स्मृति का प्रश्न नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मसातीकरण से जुड़ा प्रश्न भी है।
फुले दंपति पर होने वाले आक्रमण समाप्त नहीं हुए हैं। उसका स्वरूप बदल गया है। पहले उन्हें बोलने से रोका जाता था, उनके विद्यालय बंद कराए जाते थे, उन पर सामाजिक बहिष्कार और शारीरिक हिंसा की जाती थी। आज अनेक स्थानों पर उनके नाम का सम्मान किया जाता है, लेकिन उनके मूलगामी विचारों को सार्वजनिक विमर्श से धीरे-धीरे अलग कर देने की प्रवृत्ति भी दिखाई देती है। यही आज की चुनौती है। सत्यशोधक परंपरा के सामने आज केवल इतिहास को याद रखने का प्रश्न नहीं है, बल्कि इतिहास के वास्तविक अर्थ की रक्षा करने का प्रश्न है। यह केवल स्मारकों की रक्षा का प्रश्न भी नहीं है, बल्कि उन मूल्यों की रक्षा का प्रश्न है जिनके लिए फुले दंपति ने अपना संपूर्ण जीवन समर्पित किया।
इसलिए आज आवश्यकता केवल उनके जन्मदिवस और पुण्यतिथि मनाने से बढ़कर उनके विचारों को शिक्षा, समाज, राजनीति, संस्कृति और सार्वजनिक जीवन में जीवित रखने की है। सनद रहे कि इतिहास वर्तमान की चेतना और भविष्य की दिशा भी निर्धारित करता है। यदि इतिहास से उसके क्रांतिकारी विचारों को अलग कर दिया जाए, तो केवल व्यक्ति बचता है, परिवर्तन की प्रक्रिया नहीं।
फुले की विरासत हमें यह सिखाती है कि ज्ञान, समानता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सामाजिक न्याय और मानव-मुक्ति वैचारिक आदर्श के साथ ही लोकतांत्रिक समाज की आधारशिलाएं भी हैं। इसीलिए सत्यशोधक परंपरा के समक्ष आज सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह है कि वह इतिहास, स्मृति, विचार और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के इस संघर्ष को निरंतर आगे बढ़ाए। यही भारत के लोकतांत्रिक, समतामूलक और न्यायपूर्ण भविष्य के निर्माण का संघर्ष भी है।
(संपादन : नवल/अनिल)
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