ब्रिटिश शासन के चलते ऐसे कई नए सार्वजनिक स्थान अस्तित्व में आए, जिन्हें ब्राह्मणों को पहली बार मजबूरी में गैर-ब्राह्मणों और यहां तक कि आदि द्रविड़ों से भी साझा करना पड़ा। अदालतें, कलेक्टर का दफ्तर, पुलिस थाना, ट्रेन के डिब्बे और ट्राम इनमें से कुछ थे। इस पर ब्राह्मणों ने आपत्तियां उठाईं और इन आपत्तियों को गैर-ब्राह्मणों ने चुनौतियां दीं। इस तरह के विवादों का विवरण एनी बेसेंट के अखबार ‘न्यू इंडिया’ और अयोती दास के तमिल साप्ताहिक ‘ओरु पैसा तामिजान’ में प्रकाशित होते रहते थे। वी. गीता एवं एस.वी. राजदुरई के शब्दों में कहें तो गैर-ब्राह्मणों ने “अधिकारों की भाषा” सीख ली थी।
अयोती दास (20 मई, 1845 – 5 मई, 1914) अछूत परया जाति के थे, जिन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया था। वे अपने साप्ताहिक में एक नियमित स्तंभ लिखते थे, जिसमें जाति की समालोचना होती थी और इतिहास की पुनर्व्याख्या। ‘तामीजान’ में लिखने वालों में एक थे एम. मासिलामणि, जिनकी पुस्तिका “दि एग्जामपिल ऑफ़ द कास्ट डिफरेंस’, जिसे पेरियार ने 1930 में एक उपयुक्त व उपयोगी जाति-विरोधी रचना बताते हुए अपने अनुयायियों से उसे पढ़ने को कहा था। आर्यों के देश में आगमन और वर्ण एवं जाति प्रथा की स्थापना के जोतीराव फुले (1827-1890) और मासिलामणि के वर्णनों में कई समानताएं हैं। मासिलामणि लिखते हैं कि आर्य ब्राह्मणों ने आर्य-पूर्व क्षत्रियों के खिलाफ षड्यंत्र किए, उनके साथ छल किया और अपना प्रभुत्व कायम कर लिया। इसके बाद उन्होंने विजितों का इतिहास मिटा दिया। फुले की तरह, मासिलामणि का भी यह मानना है कि परशुराम द्वारा क्षत्रियों के नरसंहार की कथा, दरअसल, “आर्य ब्राह्मणों के देशज राजाओं पर विजय की प्रतीक है।”[1]
गीता एवं राजदुरई लिखते हैं, “गैर-ब्राह्मणों द्वारा जाति और आर्यवाद की समालोचना, इतिहास का पुनर्लेखन एवं वर्तमान परिस्थितियों को असहनीय बताना आदि वंचना और अपमान के विशिष्ट अनुभवों का परिणाम थे। इन्होंने आगे चलकर इतिहास, संस्कृति और समाज की अधिक व्यापक पड़ताल का स्वरूप ले लिया। ब्राह्मण-विरोधी गुस्से के इन विस्फोटों और ब्राह्मण-विरोधी सोच के उभार के बारे में यह महत्वपूर्ण है कि ये गैर-ब्राह्मण राजनीतिक आंदोलन के पहले हुए और कई अहम मसलों में इनमें उस आंदोलन के संदेशों की झलक देखी जा सकती है।”[2]
महाराष्ट्र में जोतीराव फुले (जो एक शूद्र थे) और उनके गैर-ब्राह्मण सत्यशोधक आंदोलन ने डॉ. आंबेडकर (जो एक अछूत या अति-शूद्र थे) के उदय की राह प्रशस्त की। तमिलनाडु में इसका उल्टा हुआ। वहां एक आदि द्रविड़ (अछूत) ने पेरियार और उनके गैर-ब्राह्मण आंदोलन के उदय की राह प्रशस्त की।
अयोती दास स्वदेशी और स्वराज आंदोलनों के आलोचक थे, क्योंकि इन आंदोलनों की मांगें और उनके उद्देश्य दोनों ब्राह्मणवादी थे। ये आंदोलन राजनीतिक सुधार की मांग करते थे, न कि सामाजिक सुधारों की। क्योंकि इसका मतलब होता ब्राह्मण और आदि-द्रविड़ बच्चों का एक साथ एक स्कूल में पढ़ना, आदि द्रविड़ कृषि श्रमिकों को बेहतर मजदूरी देना और उनके काम के हालातों में सुधार लाना और उन्हें भू-अधिकार देना। आर्थिक सुधारों की मांग करने वाली संस्थाओं में गैर-ब्राह्मणों को प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया था। दास द्रविड़ महाजन संगम के संस्थापक थे और 1892 में ही उन्होंने कांग्रेस को कई ज्ञापन भेजे, जिनमें इनमें से कुछ मांगें उठाई गई थीं। मगर उनके प्रयासों का कोई ख़ास नतीजा नहीं निकला।

गैर-ब्राह्मणों को यह अंदाज़ा था कि स्वदेशी और स्वराज आंदोलनों की सफलता का क्या परिणाम होगा। अयोती दास ने लिखा कि यदि किसी ब्राह्मण को किसी सरकारी दफ्तर में नौकरी मिल जाती है तो बहुत जल्दी सभी पदों पर ब्राह्मणों को बिठाकर उस दफ्तर को ब्राह्मण किला बना देता है। वे ‘वंदे मातरम’ गाते हैं, मगर ब्राह्मणवादी देवों के उनके जुलूस आदि द्रविड़ों के मोहल्लों से कन्नी काट कर निकलते हैं। स्वदेशी आंदोलन के प्रचारकों को अंग्रेजों को ‘श्वेत परया’ कहने में कोई संकोच नहीं होता। वे अपनी सभाओं में लोगों से कहते हैं वे ‘श्वेत परया’ द्वारा बनाये गए मोटे कपड़े का इस्तेमाल अपने मृतकों को ढंकने के लिए न करें।[3]
दास का मानना था कि स्वदेशी और स्वराज विचारधाराओं की गैर-प्रातिनिधिक प्रकृति और विषयवस्तु का कारण है अनुत्पादक और निष्क्रियता को बढ़ावा देने वाली ब्राह्मणवादी शिक्षाएं। “ये शिक्षाएं आलस्य को प्रोत्साहित करती हैं और ज्ञान को सतही बनाती हैं।”[4] पहले फुले और उसके बाद दास ने ब्रिटिश सरकार का बचाव किया और उसका उनके लिए एक दूसरा ही अर्थ था। अंग्रेजों के राज में कानून थे, अदालतें थीं और कम-से-कम सैद्धांतिक तौर पर न्यायाधीश वर्णाश्रम धर्म से ऊपर थे। अंग्रेजों के राज में अछूत भी व्यापार कर सकते थे, संपत्ति के मालिक बन सकते थे और सेना में भर्ती हो सकते थे।
फुले की तरह दास भी मानते हैं कि अंग्रेजों के आने से सदियों से चले आ रहे कुशासन और निरंकुशता का अंत हुआ। मगर जहां फुले बलिराजा के यशस्वी राज की याद करते हैं, वहीं दास बौद्ध काल की बात करते हैं। “ब्राह्मण आक्रांताओं ने बौद्ध शासकों को पदच्युत कर दिया और जाति-वर्ण पर आधारित राज की स्थापना की। नतीजे में बौद्ध शासकों और बौद्ध प्रजा दोनों का हाशियाकरण हुआ। उन्हें समाज से बाहर धकेल दिया गया और निम्न, अस्वच्छ व अछूत माना जाने लगा।”[5]
दास व अन्यों द्वारा ब्राह्मणवाद के खिलाफ लेखन शुरू करने के एक सदी से भी ज्यादा पहले से तमिल भाषा को संस्कृत के प्रभाव से मुक्त करने का अभियान चल रहा था। दो दिशाओं में प्रयास किये जा रहे थे। पहला, वैदिक काल के पूर्व प्रचलित शास्त्रीय तमिल भाषा की खोज और दूसरा, समकालीन ज़रूरतों के अनुरूप तमिल को एक आधुनिक भाषा के रूप में विकसित करना। तमिल समाज में गहरे तक धंसे जातिगत ऊंच-नीच के भाव के चलते जर्मन मिशनरियों बार्थोलोमियोस सीगनबाल्ग, योहान फेब्रिसियस एवं चार्ल्स रीनियस ने यह सुनिश्चित किया कि बाइबिल के तमिल अनुवाद में सहज और आम लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा का इस्तेमाल हो। इनमें से सीगनबाल्ग ने बाइबिल का अनुवाद किया था और बाकी दोनों ने उस अनुवाद के संशोधित संस्करण प्रकाशित किए थे। अपने अनुवाद के ज़रिये सीगनबाल्ग ने “अपने बहु-जातीय भक्तगणों” को एक करने का प्रयास किया। रीनियस की मान्यता थी कि “भाषा जनसमुदायों की संस्कृति की बुनावट के समान होती है और हर भाषा की अपना सांस्कृतिक और ऐतिहासिक बोध होता है और उन भाषाओं में अनुवाद करते समय इसका ख्याल रखा जाना चाहिए।”[6]
फिर, सन् 1856 में बिशप काल्डवेल की पुस्तक “ए कम्पेरेटिव ग्रामर ऑफ़ द्रविड़ियन लैंग्वेजेज” प्रकाशित हुई। इस पुस्तक में तमिल संस्कृति और सभ्यता की अपूर्वता को मान्यता और महत्व दिया गया। उसके बाद अध्येता व इतिहासकार सुंदरम पिल्लै की “सम माइलस्टोन्स इन द हिस्ट्री ऑफ़ तमिल लिटरेचर ऑर दि ऐज ऑफ़ तिरुज्ञान-संबंध” आई। इस पुस्तक में लेखक ने तमिल शैव ग्रंथों के सहारे अतीत की खोज करने की कोशिश की। उन्होंने समय की धुंध में खो चुकी मूल तमिल संस्कृति और बाद में वैदिक धर्म के प्रभाव की पड़ताल की और लिखा कि उसके बाद उभरे बौद्ध आंदोलन ने “तमिल इतिहास पर अपनी स्थाई छाप छोड़ दी।” और इसके बाद, शैव और वैष्णव आंदोलनों के पुनरुत्थान के आगे बौद्ध धर्म ठहर न सका।[7]
इस प्रकार एक सांस्कृतिक ज़मीन तैयार हुई, जिसमें द्रविड़ चेतना के बीज बोए गए। ये बीज ही पहले राजनीति के क्षेत्र में गैर-ब्राह्मण आंदोलन और तत्पश्चात द्रविड़ आंदोलन के रूप में प्रस्फुटित हुए।
संदर्भ :
[1] वी. गीता एवं एस.वी. राजदुरई, ‘टुवार्ड्स ए नॉन-ब्राह्मण मिलेनियम : फ्रॉम अयोती दास टू पेरियार’, साम्य (कोलकाता), 2008
[2] वही
[3] वही
[4] वही
[5] वही
[6] वही
[7] वही