भारत में सामाजिक अन्याय का स्रोत ब्राह्मणवाद है, जिसे मनुवाद भी कहा जाता है। हिंदू धर्म ब्राह्मणवाद का ही दूसरा नाम है। यह ‘मनुस्मृति’ के आधार पर ऊंच-नीच की भावना से ग्रसित है। इसलिए डॉ. आंबेडकर ‘मनुस्मृति’ और हिंदू धार्मिक ग्रंथों की खुल कर आलोचना करते थे। अपने लेखों में वे ब्राह्मणवाद और ब्राह्मणवादी मानसिकता वाले सवर्णाें की जमकर बखिया उधेड़ते हैं। ‘मनुस्मृति’ में ऐसा लिखा गया है कि चार वर्ण आधारित समाज ईश्वर ने बनाई।
जोतीराव फुले और डॉ. आंबेडकर दोनों ने चतुर्वर्ण व्यवस्था के निर्माण के सिद्धांत को एकदम झूठा करार दिया। ‘मनुस्मृति’ में शूद्रों और अंत्यज के बारे में अत्यंत अपमानजनक बातें लिखी गई हैं। मनु ने कई विधान बनाए हैं जिससे शूद्रों की स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। मनु का विचार है कि शूद्रों को संपत्ति जमा नहीं करने देना चाहिए। उनकी मेहनत की कमाई को निर्ममता-पूर्वक जब्त कर लेना चहिए। ब्राह्मणों के प्रति अपराध करने वाले शूद्रों को कठोर सजा का प्रावधान ‘मनुस्मृति’ में रखा गया। यदि कोई शूद्र किसी द्विज को गाली देकर अपमानित करे तो उसकी जीभ काट ली जाए। मनु ने यह भी विदित किया है कि कोई शूद्र किसी द्विज के नाम और जातियों की चर्चा तिरस्कारपूर्वक करे तो उसके मुंह में दस अंगुली लंबी गर्म लोहे की कील ठूंस दी जाए। यदि शूद्र ब्राह्मणों के साथ उद्दंडतापूर्वक व्यवहार करे तो राजा उसके कान में गर्म तेल डलवा दे।
डाॅ. आंबेडकर जाति प्रथा के कट्टर आलोचक थे। इसलिए उन्होंने ‘मनुस्मृति’ को सांकेतिक रूप से जलाने की घोषणा करके ब्राह्मणवादियों में खलबली मचा दी। ‘मनुस्मृति’ जलाने का कार्यक्रम सार्वजनिक जलाशय से दलितों के पानी पीने के अधिकार के लिए महाड़ सत्याग्रह के दौरान 25 दिसंबर, 1927 को महाराष्ट्र में महाड़ नामक स्थान पर हुआ। तब सवर्णों ने बड़ा हंगामा मचाया, लेकिन डॉ. आंबेडकर अडिग थे। हजारों दलितों की उपस्थिति में नियत कार्यक्रम के अनुसार उन्होंने सार्वजनिक रूप से ‘मनुस्मृति’ को जला दिया।
उन्होंने सामाजिक अन्याय की मान्यता पर मौलिक प्रश्न उठाए। मसलन, क्या दुनिया में ऐसा कोई भी समाज है जिसमें अछूत हो, जिनकी परछाई और दृष्टि मात्र से दूसरे लोग गंदे हो जाए? कोई ऐसा भी समाज है, जिसमें अपराधशील जातियां व जनजातियां हो?
डॉ. आंबेडकर पुणे के भीमा-कोरेगांव में हर वर्ष जाया करते थे। कोरेगांव का महत्व मराठी दलितों के लिए आततायी पेशवा राज से मुक्ति से जुड़ा है। कोरेगांव के उस स्थान पर ब्रिटिश सेना में सम्मिलित महारों की 500 की संख्या वाली सेना ने आततायी पेशवा की सेना को 1 जनवरी, 1818 को परास्त कर दिया था। ब्रिटिश सेना की तरफ से लड़ते हुए 49 सैनिक शहीद हुए। सभी शहीद सैनिकों के नाम ब्रिटिश सरकार के द्वारा बनाए गए स्मारक में खुदे हैं। इनमें महार जाति के 22 सैनिकों के नाम हैं। इस तरह कोरेगांव शक्तिशाली सांकेतिक महत्व का केंद्र बन गया। आज भी 1 जनवरी को कोरेगांव में प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में दलित-बहुजन एकत्रित होते हैं।

डॉ. आंबेडकर ने 1930 के अक्टूबर महीने में लंदन में हुए प्रथम गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया और अपने सारगर्भित भाषण में उन्होंने ब्रिटिश सरकार पर आरोप लगाया– “मैं जिन अछूतों के प्रतिनिधि के रूप में यहां आया हूं, उनकी जनसंख्या हिंदुओं की कुल जनसंख्या का पांचवा भाग है। अर्थात अछूतों की जनसंख्या ब्रिटिश या फ्रांस की जनसंख्या के बराबर है। ब्रिटिश सरकार की स्थापना के पूर्व छुआछूत के कारण ही हमारी स्थिति सोचनीय थी। ब्रिटिश सरकार ने अछूतों की स्थिति सुधारने की जरा भी कोशिश नहीं की। डेढ़ सौ वर्षों के ब्रिटिश शासन के बाद भी हमारी दशा में कोई सुधार नही हुआ।”
उन्होंने ब्रिटिश सरकार से मांग की कि दलित वर्ग को समान नागरिकता दी जाए। समान नागरिक के सभी अधिकार दलितों को दिये जाएं। उन्होंने विधानसभा में प्रतिनिधि भेजने के अधिकार की बात भी कही। उन्होंने कहा कि सरकारी नौकरियों में दलितों को जनसंख्या के अनुरूप स्थान मिले। डॉ. आंबेडकर के संबोधन से पहली बार विश्व समुदाय को मालूम हुआ कि अमेरिका में जो स्थिति नीग्रो की है, उससे भी बुरी स्थिति भारत में अछूतों की है।
सन् 1932 में प्रधानमंत्री रामसे मैकडोनाल्ड ने सांप्रदायिक सवाल पर ब्रिटिश सरकार की ‘कम्युनल एवार्ड’ यानी सांप्रदायिक पंचाट की घोषणा कर दी। पंचाट में अछूतों को 20 वर्षों के लिए पृथक निर्वाचन का अधिकार दिया गया था। गांधी उस समय पुणे के यरवदा जेल में बंदी थे। जेल से ही उन्होंने घोषणा कर दी की यदि अछूतों के पृथक निर्वाचन का निर्णय वापस नहीं लिया गया तो वे आमरण अनशन करेंगे। गांधी ने एक महीने तक इंतजार किया। जब उनकी यह बात नहीं मानी गई तो उन्होंने आमरण अनशन शुरू कर दिया। आत्महत्या की यह सार्वजनिक धमकी गांधी की एक चाल थी। यह अछूतों को ब्लैकमेल करने जैसा था। इस मामले में ब्रिटिश सरकार ने बिल्कुल स्पष्ट रूप से कह दिया था कि जब तक अछूत इसके लिए राजी नहीं होते तब तक सरकार सांप्रदायिक पंचाट को निरस्त नहीं करेगी।
गांधी के इस कारनामे से देश में हलचल मच गई। अछूतों के पृथक हो जाने की बात से सवर्ण लोगों को लगने लगा कि अब उनकी सेवा कौन करेगा। उनके लात-जूते कौन खाएगा? इसलिए जिन अछूतों को वे जानवर से बदतर समझते थे, उनके लिए वे अब सहभोज और मंदिरों को खोलने का नाटक करने लगे।
सवर्ण वर्ग और कांग्रेस ने डॉ. आंबेडकर को खलनायक करार दिया। एक ऐसा खलनायक, जो भारत के टुकड़े-टुकड़े करवाना चाहता है और महात्मा की हत्या करने पर तुला हुआ है। नरम दल और गरम दल के राजनीतिक दिग्गज रवींद्रनाथ टैगौर, राजगोपालचारी और नेहरू आदि गांधी के पक्ष में जोर-शोर से खड़े हो गए।
डॉ. आंबेडकर ने अपनी पुस्तक ‘व्हाट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबिल्स’ में इसका जिक्र किया है कि तब उनकी क्या मनोदशा थी? एक ओर हजारों सालों से प्रताड़ित अपने समाज के लोगों के लिए उनके अधिकार की बात पर अड़े रहना था तो दूसरी ओर गांधी के आमरण अनशन से देश में उठ रहे उन्माद को झेलना था। उन्होंने डटे रहने की पूरी कोशिश की। अपनी बात को तर्क और विज्ञान के आधार पर सही बताते रहे, लेकिन उन्माद के माहौल में देशभर से उन्हें धमकियां मिल रही थीं। उन्हें डर था कि यदि गांधी मर गए तो इसका खामियाजा हमारे अछूत बंधुओं के जनसंहार से चुकाना होगा। इसलिए उन्होंने गांधी को निश्चित मौत से बचाने का निर्णय लिया।
गांधी के अनशन के पांचवे दिन डॉ. आंबेडकर यरवदा जेल जाकर गांधी को अपने हाथों से जूस पिलाकर उनका आमरण अनशन तुड़वाया। इसके पश्चात पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर हुआ। पैक्ट के अनुसार अछूतों को पृथक निर्वाचन की जगह सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों में आरक्षित सीटें दी गईं। इसके कारण प्रांतीय विधायिकाओं में सीटें आवंटित की गईं।
पूना पैक्ट से डॉ. आंबेडकर खुश नही थे। वे इसे एक गंदी और घटिया हरकत मानते थे, जिसमें जोर-जबरदस्ती से असहाय दलितों के संवैधानिक अधिकार को लूटने का काम किया गया, जिसे ब्रिटिश प्रधानमंत्री के सांप्रदायिक पंचाट द्वारा प्रदान किया गया था। गांधी ने अछूतों को मजबूर कर दिया कि वे सवर्णों के रहमोकरम पर आश्रित हों। यह अछूतों के लिए घातक था।
यह भी बड़ी अवसरवादिता कही जाएगी कि दूसरे गोलमेज सम्मेलन में गांधी ने आंबेडकर को अछूतों का प्रतिनिधि मानने से इंकार कर दिया, लेकिन पूना पैक्ट के अवसर पर आंबेडकर को अछूतों का प्रतिनिधि मानकर तुरंत पैक्ट पर हस्ताक्षर कराने के लिए राजी हो गए। हालांकि गांधी ने खुद पैक्ट पर हस्ताक्षर नहीं किया, लेकिन बिड़ला, मदन मोहन मालवीय, सावरकर और एक अछूत क्रिकेट खिलाड़ी पलवंकर बालू के हस्ताक्षर थे।
पूना पैक्ट के बाद गांधी ने छुआछूत के खिलाफ ‘हरिजन टूर’ शुरू किया। उन्होंने अछूतों को एक नया नाम दिया– ‘हरिजन’। उधर डॉ. आंबेडकर के विचार अब पुष्ट होने लगे थे कि जाति-व्यवस्थाा शोषणवादी है। अस्पृश्यता कोई मात्र ऊपरी चीज नहीं है जो व्यवस्था सुधार होते समाप्त हो जाएगी। यह पूरी व्यवस्था ही शोषणवादी है। इसलिए दलितों की मुक्ति दलितों द्वारा ही संभव है।
डॉ. आंबेडकर का रूझान मार्क्सवाद की तरफ बढ़ रहा था, जिसमें कहा गया था कि शोषण के विरूद्ध शोषितों के संघर्ष द्वारा स्वयं ही मुक्ति। प्रायः यह कहा जाता है कि जाति विरोधी आंदोलन लोकतांत्रिक आंदोलन थे, न कि समाजवादी क्रांति के आंदोलन। डॉ. आंबेडकर ने इसे थोड़ा अलग करके देखा और कहा कि ठीक है कि यह क्रांति एक लोकतांत्रिक क्रांति है, तो हम चाहते है कि हम समाजवादी क्रांति लाएं। हमें जाति प्रथा से दलितों की मुक्ति के लिए अपने आप को केंद्रित करना है, क्योंकि हमारे सिवा कोई हमारी मदद करने वाला नहीं है। हम लोकतांत्रिक क्रांति के लिए संघर्ष करते रहेंगे।
इन दिनों जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र संगठन आइसा सहित अनेक छात्र संगठनों ने ‘जय भीम’ का नारा अपनाया है। आंबेडकरवाद भारतीय संविधान के निर्माण के रूप में कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टियों के लिए आवश्यकता बन गई है। वामपंथी नेताओं ने खुले रूप से मनुवाद के खिलाफ सामाजिक और लैंगिक न्याय के लिए आवाज बुलंद किया है।
दरअसल, आंबेडकरवाद डॉ. आंबेडकर के विचारों, सिद्धांतो और दर्शन पर आधारित एक मानवतावादी विचारधारा है जो समता, बंधुता और सामाजिक न्याय पर जोर देती है। यह भारतीय जातिवाद, शोषण और असमानता का विरोध एवं समाजवादी समाज बनाने और वंचित वर्गों, महिलाओं के उत्थान का आंदोलन है। इसके मूल मंत्र हैं–
- मानवतावाद जो इंसानियत पर आधारित है और मानव गरिमा की रक्षा करता है।
- समाजवादी समाज जिसमें जाति का पूर्णरूप से उन्मूलन करके सभी को समान अधिकार की बात करता है। इसके लिए लोकतंत्र का होना जरूरी है जिसके अंतर्गत सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक लोकतंत्र हो।
- यह अंधविश्वास और पाखंडवाद का विरोधी है और समाज में वैज्ञानिक दृष्टकोण का पक्षधर है।
- आंबेडकरवाद संवैधानिक तरीके से शासन का समर्थन करता है।
बहरहाल, भारत में जेएनयू, हैदराबाद विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय और लखनऊ विश्वविद्यालय जैसे संस्थान आंबेडकरवादी छात्र आंदोलन सामाजिक न्याय, जातिविरोध, और लैंगिक न्याय के प्रमुख केंद्र रहे हैं। बापसा जैसे संगठनों ने अन्याय और शोषण के खिलाफ पूरे देश के विश्वविद्यालयो में दलित-बहुजन चेतना को मजबूती दी है। इस प्रकार भारतीय विश्वविद्यालयों के छात्रसंघों में आंबेडकरवाद तेजी से उभरती हुई विचारधारा है। यह विचारधारा पंरपरागत वामपंथी और दक्षिणपंथी छात्र राजनीति के विकल्प में स्थापित हो रही है।
(संपादन : नवल/अनिल)
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