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एक कहानी भारतीय पुनर्जागरण के पितामह जोतीराव फुले की

फुले आधुनिक दर्शनशास्त्र के पिता समझे जाने वाले देकार्ते के समकक्ष माने जाते हैं। देकार्ते ने सभी मान्यताओं को तर्क की कसौटी पर कसा। वैसे ही फुले ने भारतीय समाज का अध्ययन तार्किक आधार पर किया। उन्होंने भारतीय दर्शन का आधुनिकीकरण किया। बता रहे हैं डॉ. अनूप पटेल

[दलित-बहुजनों के लिए अप्रैल माह विशेष मायने रखता है। इस महीने की 11 तारीख को जोतीराव फुले और 14 तारीख को डॉ. आंबेडकर की जयंती पूरे देश में लोग धूमधाम से मनाते हैं। जोतीराव फुले का जन्म 11, अप्रैल 1827 को हुआ था और इस लिहाज से यह वर्ष उनके जन्म के दो सौवीं जयंती का आगाज है। फारवर्ड प्रेस इस अवसर पर प्रस्तुत कर रहा है जोतीराव फुले व उनके विचारों पर आधारित आलेखों की शृंखला। आज पढ़ें डॉ. अनूप पटेल का यह आलेख]

गत 11 अप्रैल, 2026 को पूरे देश में महात्मा जोतीराव फुले की 199वीं जयंती मनाई गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस मौके पर एक लेख के जरिए महात्मा फुले के जीवन, आदर्शों और राष्ट्रनिर्माण में उनकी भूमिका को विस्तार से याद किया। ध्यातव्य है कि महात्मा फुले जयंती के उपलक्ष्य में भारत सरकार का संस्कृति मंत्रालय दो वर्ष (2026 से 2028 तक) चलने वाले राष्ट्रव्यापी समारोह आरंभ कर रहा है।

आधुनिक भारत के निर्माता और ‘सामाजिक क्रांति के पिता’ महात्मा जोतीराव फुले का जन्म 1827 को कटगुन, सतारा (महाराष्ट्र) में हुआ था। उनके पिता का नाम गोविंद राव और माता का नाम चिमनबाई था। फूले के बड़े भाई का नाम राजाराम था। फुले जब मात्र एक वर्ष के थे तभी उनकी माता का निधन हो गया था। उनका लालन-पालन उनकी बुआ सगुणाबाई ने किया। सगुणाबाई ने ही उन्हें मां की ममता और दुलार दिया।

ब्राह्मणवाद के खिलाफ अनवरत संघर्ष

जोतीराव जब 13 वर्ष के थे तभी उनका विवाह सावित्रीबाई से हो गया था। उन्होंने सावित्रीबाई को घर में ही पढ़ाया और उन्हें आधुनिक शिक्षा दी। बाद में सावित्रीबाई भारत की प्रथम महिला शिक्षक बनीं। इसके पहले हुई एक घटना ने जोतीराव को झकझोर दिया। एक ब्राह्मण साथी ने बरात में उन्हें भी आमंत्रित किया था। बरात में लोगों ने शूद्र जाति के होने की वजह से उनका अपमान किया। इससे जोतीराव के मन को गहरी चोट लगी। उन्होंने प्रण किया वे अपनी जिंदगी शूद्रों, अतिशूद्रों और महिलाओं के उत्थान में लगा देंगे।

मात्र 21 वर्ष की आयु में जोतीराव फुले ने 1848 में अछूत लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला। यह अपनेआप में एक क्रांतिकारी कदम था क्योंकि इसके 9 साल बाद बंबई विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। 1848 में यह स्कूल खोलकर जोतीराव फुले ने उस वक्त के समाज के ठेकेदारों को नाराज़ कर दिया था। यहां तक कि उनके अपने पिता गोविंदराव भी उनसे नाराज हो गए और उन्हें अपने घर से निकाल दिया।

गृह त्याग के बाद फुले दंपत्ति को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। लेकिन वे अपने लक्ष्य से डिगे नहीं। एक बार की बात है। अंधेरी काली रात थी। आसमान में बिजली चमक रही थी। जोतीराव फुले को घर लौटने में देर हो गई थी। वह सरपट घर की ओर बढ़े जा रहे थे। बिजली चमकी तब उन्होंने देखा कि दो व्यक्ति हाथ में चमचमाती तलवारें लिए चले जा रहे हैं। फुले स्वयं तेज कदमों से उनके समीप पहुंचे। फुले के पूछने पर उन्होंने बताया कि हम फुले को मारने जा रहे हैं। तब फुले ने कहा कि उन्हें मार कर तुम्हें क्या मिलेगा? उन्होंने कहा कि पैसा मिलेगा, हमें पैसे की आवश्यकता है। तब फुले ने क्षण भर सोचा फिर कहा कि मुझे मारो, मैं ही जोतीराव फुले हूं। मुझे मारने से अगर तुम्हारा हित होता है, तो मुझे ख़ुशी होगी। इतना सुनते ही दोनों के हाथ से उनकी तलवारें छूट गईं। वे फुले के चरणों में गिर पड़े, और उनके समर्थक बन गए। भगवान बुद्ध ने अपनी करुणा और मैत्री से जिस तरह अंगुलिमाल का ह्रदय परिवर्तन किया था, ठीक वैसे ही फुले ने इन दोनों व्यक्तियों का हृदय परिवर्तित किया।

अपने सामाजिक बहिष्कार का जवाब फुले दंपति ने 1851 में दो और स्कूल खोलकर दिया। दो वर्षों तक शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने के बाद दोनों ने 3 जुलाई, 1853 को एक दूसरा विद्यालय पुणे के अन्नासाहेब चिपलूणकर भवन में खोला।

पुणे के फुलेवाड़ा में जोतीराव फुले और सावित्रीबाई फुले की प्रतिमाएं

बताते चलें कि जब जोतीराव फुले को विद्यालय के लिए योग्य अध्यापक नहीं मिल रहे थे तो उन्होंने इस कार्य के लिए अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले को शिक्षित किया था। उनकी पत्नी ने भी इस कार्य को सहज स्वीकार किया। वह स्कूल में पढ़ाने जाने लगीं। यह देख कर सवर्णों के क्रोध की कोई सीमा न रही। जब सावित्रीबाई स्कूल जातीं तो लोग उनके ऊपर कीचड़, कंकड़-पत्थर फेंकने लगते। इससे उनकी साड़ी गंदी हो जाती थी। इसलिए वह एक अतिरिक्त साड़ी अपने साथ ले कर चलती थीं। ऐसा जज्बा था उनका।

विद्यालयों का समुचित संचालन हो, इसके लिए जोतीराव फुले ने एक प्रबंधन समिति का गठन किया था। उनके कार्यों को तत्कालीन ब्रिटिश शासन द्वारा सराहा गया। 19 नवंबर, 1852 को ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन ने पुणे महाविद्यालय के प्राचार्य मेजर कंठी के द्वारा एक भव्य समारोह में फुले का सम्मान किया गया और उन्हें एक महान समाज सेवी की रूप में मान्यता दी। सन् 1852 में ही फुले ने पिछड़ों के लिये एक वाचनालय की स्थापना भी की। उनके इन कार्यों में उनके कुछ ब्राह्मण मित्र भी थे, जिससे रूढ़िवादी और समाजसेवी ब्राह्मणों में संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो गई थी। 19 फरवरी, 1852 के ‘टेलीग्राफ एंड कोरियर’ पत्र में एक पर्यवेक्षक ने लिखा था कि “इसमें कोई संदेह नहीं है कि ब्राह्मण छोटी जातियों के भयानक शत्रु थे, लेकिन कुछ ब्राह्मणों ने यह भी अनुभव करना प्रारंभ कर दिया है कि उनके पूर्वजों ने इन जातियों के लोगों को अनगिनत अघात पहुचाएं।”

किसानी साहित्य के सूत्रधार

जोतीराव फुले समतामूलक और न्याय पर आधारित समाज की बात कर रहे थे, इसलिए उन्होंने अपनी रचनाओं में किसानों और खेतिहर मजदूरों के लिए विस्तृत योजना का उल्लेख किया है। उनकी किताब ‘किसान का कोड़ा’ में उस समय के किसानों की बदहाली का चित्रण है। उन्होंने छत्रपति शिवाजी को किसानों का प्रेरणास्रोत बताया। फुले महाराष्ट्र के पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने शिवाजी के पराक्रम, साहस और कुशलता पर पोवाड़ा लिखे। शिवाजी के शासन में किसान ही उनकी सेना में सिपाही होते थे। शिवाजी स्वयं एक कुर्मी किसान परिवार से थे, इसलिए वे किसानों को अपने परिवार का हिस्सा मानते थे।

फुले छत्रपति शिवाजी को ‘लोकराजा’ बोलते थे। उन्होंने अपनी रचनाओं में पशुपालन, खेती, सिंचाई व्यवस्था आदि के बारे में विस्तार से लिखा है। गरीब किसानों के बच्चों की शिक्षा पर उन्होंने बहुत ज़ोर दिया। उन्होंने आज के 150 साल पहले कृषि शिक्षा के लिए विद्यालयों की स्थापना की बात की। जानकार बताते हैं कि 1875 में पुणे और अहमदनगर जिलों का जो किसानों का आंदोलन था, वह फुले की प्रेरणा से ही हुआ था।

 एक समान शिक्षा के समर्थक फुले

जोतीराव फुले ने जान की परवाह किये बिना जन-शिक्षा का मिशन शुरू किया। उनका प्रथम उद्देश्य था– एक समान प्राथमिक शिक्षा। उन्होंने प्राथमिक शिक्षा के लिए शिक्षक की योग्यता और पाठ्यक्रम पर ध्यान दिया। उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले को भारत की पहली महिला शिक्षक होने का गौरव प्राप्त है। उनके लिए शिक्षा सामाजिक बदलाव का एक माध्यम थी। उनका मानना था सामाजिक बदलाव की निरंतरता तभी बनी रह सकती है जब प्रत्येक व्यक्ति को पूरी शिक्षा प्राप्त करने के समान अवसर प्राप्त हों। इसलिए उन्होंने कहा–

विद्या बिना मति गई
मति बिना गति गई
गति बिना नीति गई
नीति बिना संपत्ति गई
इतना घोर अनर्थ मात्र
अविद्या के ही कारण हुआ।

फुले ने 24 सितंबर, 1873 को अपने सभी हितैषियों, प्रशंसकों तथा अनुयायियों की एक सभा बुलाई। उनसे विचार-विमर्श के बाद तथा फुले के विचारों से सहमत होते हुए संस्था का गठन कर दिया गया। फुले ने इस संस्था का नाम दिया– सत्यशोधक समाज। इसका प्रमुख उद्देश्य था– पिछड़े, दलित और महिलाओं को शोषणकरी व्यवस्था से छुड़ाना और उन्हें शिक्षित कर आत्मनिर्भर बनाना। सत्यशोधक समाज उस समय के अन्य संगठनों से अपने सिद्धांतों व कार्यक्रमों के कारण भिन्न था। यह शीघ्र ही पूरे महाराष्ट्र में फ़ैल गया। सत्यशोधक समाज के लोगों ने जगह-जगह दलित-पिछड़ों और लड़कियों की शिक्षा के लिए स्कूल खोले, छूआछूत का विरोध किया और किसानों के हितों की रक्षा के लिए आंदोलन चलाया।

सत्यशोधक समाज की स्थापना के पहले 1873 में ही जोतीराव फुले की महान रचना ‘गुलामगिरी’ प्रकाशित हुई।

दार्शनिक, समाज सुधारक, लीडर, स्त्री-पिछड़े वर्ग की मुक्ति के प्रवर्तक

फुले अमेरिकन लोकतंत्र और थॉमस पेन की कृति ‘राइट्स ऑफ़ मैन’ से बहुत प्रभावित थे। स्त्रियों और पिछड़े वर्ग का शोषण और मानव अधिकार की समस्याओं पर फुले ने गंभीर चिंतन किया और उसका मानवीय स्तर पर समाधान करने के लिए ताउम्र प्रतिबद्ध रहे। फुले ने महात्मा बुद्ध के सामाजिक न्याय और बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय के दर्शन को आगे बढ़ाया। फुले अपने मुक्तगामी दर्शन के आधार पर 19वीं सदी के महान चिंतक जे.एस. मिल और फ्रेडरिक एंगल्स की कतार में खड़े होते हैं।

फुले आधुनिक भारत के निर्माताओं में से एक थे। उनकी कथनी-करनी में कोई फर्क नहीं था। फूले अपने समय की राष्ट्रव्यापी समस्याओं से भिड़े। उन्होंने धर्म, जाति तथा जेंडर के सवाल पर, कर्मकांड, किसानों की समस्या और ब्रिटिश शासन आदि पर चिंतन किया। उन्होंने अपना सार्वजनिक जीवन 1848 में प्रारंभ किया और मृत्युपर्यंत शूद्र व अतिशूद्र समाज के कल्याण में लगे रहे। 1858 में अपने शैक्षणिक संस्थानों से अलग होकर वे सामाजिक सुधारों की तरफ अग्रसर हुए। 1876 में पुणे नगर निगम के पार्षद बने। फुले व उनके संगठन सत्यशोधक समाज के संघर्ष के कारण सरकार ने ‘एग्रीकल्चर एक्ट’ पास किया।

फुले मानते थे कि क्रांतिकारी विचार क्रांतिकारी कार्यों से ही आंके जाते हैं। उन्होंने देश के अद्विज लोगों को शूद्र व अतिशूद्र कहा जो आज के समय ओबीसी और दलित वर्ग हैं। इन्हीं वर्गों को फुले ने क्रांति का पहरुआ कहा। उनके योगदानों के चलते बांबे में 1888 में उन्हें ‘महात्मा’ की उपाधि दी गई। उनके जीवनीकार धनंजय कीर ने उन्हें सामाजिक क्रांति का पिता कहा है।

फुले आधुनिक दर्शनशास्त्र के पिता समझे जाने वाले देकार्ते के समकक्ष माने जाते हैं। देकार्ते ने सभी मान्यताओं को तर्क की कसौटी पर कसा। वैसे ही फुले ने भारतीय समाज का अध्ययन तार्किक आधार पर किया। उन्होंने भारतीय दर्शन का आधुनिकीकरण किया। उन्होंने पहली बार धर्म, योग, वेदांत के इतर शोषण और असमानता का चिंतन किया। योग में व्यक्ति के मानस के सुधार की बात की गई है जबकि फुले का चिंतन सार्वजानिक कल्याण के लिए था। वेदांत में माया और यथार्थ का चिंतन किया गया है। फुले इस दर्शन को ख़ारिज करते हैं और अविद्या को ही सारे दुखों का कारण बताते हैं। उन्होंने सच्चा ज्ञान को ही समता और बंधुता का आधार बताया। बुद्ध दर्शन ने दुख को अंतिम सत्य माना है और स्वयं के प्रति अज्ञानता को दुख का कारण माना है। व्यक्ति को जब सच्चा ज्ञान मिल जाता है तो प्रसन्नचित्त हो जाता है और निर्वाण की अवस्था को प्राप्त कर लेता है। वहीं फुले दुख का कारण ऐतिहासिक या मानसिक नहीं मानते हैं। वे गैर-बराबरी पर आधारित भारतीय सामाजिक ढांचे को इसका कारण मानते हैं। जिस दिन यह वर्चस्ववादी सामाजिक ढांचा खत्म हो जाएगा, व्यक्ति स्वतंत्र तथा आधुनिक हो जाएगा।

फुले ने मूर्ति-पूजा और परम ब्रह्म की अवधारणा को ख़ारिज किया और पाखंडी धर्म, मूर्ति पूजा और जाति-व्यवस्था को समृद्ध भारत के पतन का कारण माना। फुले ने अपनी पुस्तक ‘सार्वजानिक सत्यधर्म’ में इन समस्याओं का समाधान बताया। प्रसिद्ध समाजशास्त्री गेल ऑम्वेट ने अपनी रचना ‘औनिवेशिक समाज में सांस्कृतिक विद्रोह’ में फुले को भारतीय पुनर्जागरण का सूत्रधार माना है।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

अनूप पटेल

अनूप पटेल ने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली से ‘भारत की आरक्षण प्रणाली और दक्षिण अफ्रीका के अफर्मेटिव एक्शन के तुलनात्मक अध्ययन’ विषय पर पीएचडी की है। संप्रति वे लखनऊ से प्रकाशित राष्ट्रीय मासिक पत्रिका ‘करेंट एजेंडा’ के सह-संपादक हैं।

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