बिहार की समकालीन राजनीति में जब समाजवाद केवल चुनावी जोड़-तोड़ और सत्ता परिवर्तन तक सीमित होकर अपनी वैचारिक धार खो चुका है, तब शहीद जगदेव प्रसाद की समाजवादी दृष्टि एक मौलिक, भौतिकवादी और क्रांतिकारी विकल्प के रूप में रास्ता दिखाती है। उनका समाजवाद केवल प्रतीकात्मक राजनीतिक प्रतिनिधित्व का समर्थक नहीं था, बल्कि वह 90 प्रतिशत शोषित बहुजन समाज के लिए जमीन, संपत्ति और राजकीय संसाधनों पर वास्तविक मालिकाने की दावेदारी करता था।
जगदेव प्रसाद ने भारतीय समाज का व्यावहारिक और ठोस विश्लेषण करते हुए यह स्थापित किया कि भारत में जाति ही वर्ग का आधार है। उनका ऐतिहासिक नारा – “सौ में नब्बे शोषित हैं, शोषितों ने ललकारा है, धन, धरती और राज-पाट में नब्बे भाग हमारा है” – केवल एक राजनीतिक नारा नहीं था, बल्कि सामाजिक बराबरी और आर्थिक पुनर्गठन तथा शोषितों के स्थायी ध्रुवीकरण-वर्गीकरण का एक ठोस आधार था।
रूसी इतिहासकार पॉल गार्ड लेबिन और अमेरिकी अर्थशास्त्री डॉ. एफ. टॉमसन को दिए साक्षात्कार में जगदेव प्रसाद कहते हैं कि शोषित दल सामाजिक क्रांति को मूल क्रांति मानता है। सामाजिक क्रांति के बिना राजनीतिक क्रांति असंभव है और सामाजिक क्रांति का मतलब है – विशेष अवसर का सिद्धांत। सरकारी, गैर-सरकारी और अर्द्ध-सरकारी नौकरियों में नब्बे सैकड़ा शोषितों के लिए नब्बे सैकड़ा जगहें सुरक्षित कर दूंगा। उससे नौकरशाही पर हमारा कब्जा होगा, जिसके जरिए सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में इंकलाब, बड़े-बड़े काम आसानी के साथ कर सकेंगे और जिन राजनीतिक दलों में दस प्रतिशत से ज्यादा ऊंची जाति के लोग रहेंगे, उन राजनीतिक दलों पर प्रतिबंध लगा देंगे।
जगदेव प्रसाद ने महामाया प्रसाद सिन्हा की सरकार को गिराने से पहले डॉ. राममनोहर लोहिया से कहा था कि संसोपा में भी दूसरे दलों की तरह शोषितों के साथ धोखा हो रहा है। यहां भी हालात यही है– ‘कमाए धोती वाला, खाए टोपी वाला’। आपके द्वारा दिए गए ‘साठ सैंकड़ा’ के नारे पर भरोसा करके शोषितों ने कई प्रांतों में सरकार बनवाई है। लेकिन अब शोषितों के सब्र का बांध टूट गया है।
डॉ. लोहिया के समाजवाद की तुलना में जगदेव प्रसाद का विचार अधिक स्पष्ट और जमीनी संघर्ष पर आधारित है। डॉ. लोहिया ‘विशेष अवसर के सिद्धांत’ के जरिए पिछड़ों और वंचितों को आरक्षण तथा प्रतिनिधित्व देने की वकालत करते हैं और ‘गैर-कांग्रेसवाद’ के माध्यम से राजनीतिक विकल्प खड़ा करते हैं। हालांकि, गैर-कांग्रेसवाद की रणनीति ने सामंती और दक्षिणपंथी सांप्रदायिक ताकतों के साथ चुनावी समझौतों का रास्ता भी खोला, जिसका दुष्परिणाम आज फासीवादी चुनौती के रूप में है, जो संवैधानिक लोकतंत्र को निगलने के लिए तैयार है।

राजनीतिक विचारधाराएं केवल आर्थिक या प्रशासनिक सिद्धांत नहीं होतीं, बल्कि वे देश की इतिहास-दृष्टि, सांस्कृतिक परंपराओं और सामाजिक संरचनाओं की प्रतिक्रिया और अंतर्क्रिया में आकार लेती हैं। डॉ. लोहिया, पेरियार ई.वी. रामासामी और जगदेव प्रसाद – तीनों ने ही समाजवाद को भारतीय सामाजिक यथार्थ के अनुसार परिभाषित किया, लेकिन सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि अलग होने के कारण उनके समाजवाद का चरित्र मौलिक रूप से अलग हो गया।
मसलन, डॉ. लोहिया का मानना था कि “रामायण केवल आर्य ग्रंथ नहीं है। आर्य, द्रविड़ और मंगोल भेद गढ़े गए हैं, विशेषकर विदेशियों ने गढ़े हैं। राम और कृष्ण भी भारतीय महादेश की एकता के प्रतीक हैं। इस रूप में रामायण और महाभारत केवल आनंद, प्रेम और शांति के महाकाव्य नहीं हैं। सभी जानते हैं कि राम हिंदुस्तान के उत्तर-दक्षिण की एकता के देवता थे और पूर्व-पश्चिम की एकता के देवता कृष्ण थे और आधुनिक भारतीय भाषाओं का मूल स्रोत रामकथा है।”[1]
डॉ. लोहिया के उपरोक्त कथन और रामकथा को अगर पेरियार की नजर से देखें तो यह अज्ञानता का साहित्य है। पेरियार कहते हैं कि “शुरू से अंत तक, हमें रामायण में कुछ भी अच्छा और न्यायपूर्ण नहीं मिला है। राम का हर कृत्य उत्पीड़नकारी है। हम उनकी पूजा कैसे करें …? क्या कोई यह कहने का साहस कर सकता है कि रामायण किस तरह से अधिकांश लोगों के हित में है …?”
पेरियार की रचना ‘रामायण पादीरंगल’ (‘रामायण : ए ट्रू रीडिंग’) का हिंदी अनुवाद ‘सच्ची रामायण’ को उत्तर भारत में प्रकाशित करवाने वाले पेरियार ललई सिंह यादव और ‘मनुस्मृति’ सहित ‘रामचरितमानस’ का दहन करने वाले अर्जक दार्शनिक नेता रामस्वरूप वर्मा और जगदेव प्रसाद की कड़ी भी वैचारिक दृष्टि के आधार पर जुड़ती है। इतिहास की समझ और सांस्कृतिक दृष्टि की सामीप्य के कारण ही जगदेव प्रसाद सामाजिक न्याय के संदर्भ को रखते हुए दक्षिण की ब्राह्मणवाद विरोधी द्रविड़ियन संस्कृति और तमिलनाडु का जिक्र अपने लेखों और भाषणों में करते हैं।
1970 में दारोगा प्रसाद राय के मुख्यमंत्री बनने के बाद विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण पर बोलते हुए जगदेव प्रसाद ने कहा था कि पटना विश्वविद्यालय में 747 प्राध्यापक, व्याख्याता और पदाधिकारी थे, जिनमें शोषित वर्ग से आने वालों की संख्या सिर्फ 124 थी। जगदेव प्रसाद के भाषण पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए जनसंघ (आज की भाजपा) के जनार्दन तिवारी ने कहा था– “माननीय सदस्य जगदेव बाबू को मद्रास चले जाना चाहिए, क्योंकि जैसा चाहते हैं, वैसा मद्रास में हो गया है।” इसके उत्तर में जगदेव प्रसाद ने कहा था– “घबराइए नहीं, मैं बिहार को ही मद्रास बना दूंगा।”
पेरियार और जगदेव प्रसाद की नजर में राम द्विज सांस्कृतिक वर्चस्व के प्रतीक हैं। पेरियार रामायण को एक ब्राह्मणवादी राजनीतिक ग्रंथ मानते थे। उनका कहना था कि इसे दक्षिण के अनार्यों पर उत्तर के आर्यों की विजय और प्रभुत्व को जायज ठहराने के लिए लिखा गया और यह गैर-द्विजों पर द्विजों का, महिलाओं पर पुरुषों के वर्चस्व का ब्राह्मणवादी सांस्कृतिक उपकरण है। जबकि डॉ. लोहिया की नजर में राम भारतीय संस्कृति के प्रतीक मर्यादा पुरुषोत्तम या देवता हैं।
वामपंथी समालोचक व पटना विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रहे डॉ. खगेंद्र ठाकुर अपने एक आलेख में लिखते हैं– “डॉ. लोहिया इतिहास की अपनी चक्रीय अवधारणा के हिसाब से ‘स्पेंगलर’ जैसे भाववादी राजतंत्र के हितों और सैन्यवाद के पक्षधर फासीवादी विचारधारा के अग्रदूत कहे जाने वाले दार्शनिक के विचारों के करीब हैं। … परिणामत: सोशलिस्ट पार्टी के सर्वोत्तम अवशिष्ट अंश जॉर्ज फर्नांडिस हैं, जो अटलबिहारी वाजपेयी जब प्रधानमंत्री हुए, तो उनके सबसे प्रिय यही थे, किसी भी संघी से ज्यादा। रोचक बात यह है कि वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में देश के तमाम लोकतंत्र प्रेमियों और धर्मनिरपेक्ष शक्तियों को महसूस होने लगा था कि देश में फासीवाद का खतरा है।”[2]
भारत में हिंदुत्व की राजनीति को धार्मिक-सांस्कृतिक आधार पर वैधता प्रदान करने और फासीवाद के संघी संस्करण को आज देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरा बनकर काबिज होने के लिए जमीन तैयार करने में डॉ. लोहिया की ऐतिहासिक भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता।
डॉ. लोहिया का ही प्रभाव है कि बिहार में राजद-जदयू और उत्तर प्रदेश में सपा के नेताओं का वैज्ञानिक और तर्कवादी सांस्कृतिक दृष्टिकोण बहुत स्पष्ट नहीं है। इसी वजह से अखिलेश यादव कभी परशुराम का ‘फरसा’ पकड़ लेते हैं, तो कभी ‘रामचरितमानस’ को ‘सांस्कृतिक संविधान’ कहने लगते हैं, जो पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों (पीडीए) के लिए सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक भटकाव का कारण बनता है।
इसके विपरीत, जगदेव प्रसाद ने सामंतवाद और पूंजीवादी ताकतों से किसी भी तरह के समझौते को सिरे से खारिज किया। जहां एक ओर डॉ. लोहिया के समाजवाद में ‘रामायण मेला’ जैसे सांस्कृतिक प्रयोग शामिल थे, जिससे पारंपरिक सामाजिक-धार्मिक ढांचे पर सीधा आक्रामक प्रहार नहीं हुआ। वहीं दूसरी ओर जगदेव प्रसाद ने ‘अर्जक संघ’ की वैचारिक धारा के तहत यह स्पष्ट किया कि जब तक ब्राह्मणवादी सांस्कृतिक वर्चस्व और धार्मिक अंधविश्वासों को नहीं ढहाया जाएगा, तब तक शोषितों की राजनीतिक सत्ता कभी स्थायी नहीं हो सकती।
इसी प्रकार, जयप्रकाश नारायण के समाजवाद और ‘संपूर्ण क्रांति’ के मॉडल से भी जगदेव प्रसाद की दृष्टि कहीं अधिक व्यावहारिक और रेडिकल है। जयप्रकाश नारायण का समाजवाद मुख्य रूप से सर्वोदय, नैतिक परिवर्तन और भूदान जैसे स्वैच्छिक मॉडलों पर निर्भर था, जिसमें वर्ग चेतना को आक्रामक रूप से धार देने के बजाय सर्व-समावेशी अपील पर बल दिया गया था। इसके विपरीत, जगदेव प्रसाद का स्पष्ट मानना था कि शोषक वर्ग कभी स्वैच्छिक रूप से अपने विशेषाधिकार नहीं छोड़ता, इसलिए ‘हृदय परिवर्तन’ या नैतिक अपील जैसे विचार सामंती शोषण को बनाए रखने का जरिया बन जाते हैं।
जगदेव प्रसाद ने ‘बिहार लेनिन’ के रूप में शोषितों को धन, धरती और राज-पाट पर अपने अधिकारों के लिए जुझारू जमीनी संघर्ष का मार्ग दिखाया। आज के दौर में, जहां एक ओर समाजवादी राजनीति अपनी वैचारिक दिशा खोती दिख रही है, वहीं दूसरी ओर जगदेव प्रसाद का सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तन, आर्थिक पुनर्वितरण, पुनर्गठन और बहुजन एकजुटता का त्रिस्तरीय मॉडल ही समाजवाद को पुनर्स्थापित करने का सबसे प्रासंगिक मार्ग प्रस्तुत करता है, जिसके तहत शोषित इंकलाब को संभव बनाया जा सकता है।
जगदेव प्रसाद गांधीवादी ट्रस्टीशिप और ‘हृदय परिवर्तन’ के सिद्धांत को सामंती-जातिवादी शोषण को बनाए रखने का जरिया मानते थे। उन्होंने समझौतावादी राजनीति के बजाय शोषितों के जुझारू राजनीतिक संगठन और सत्ता पर सीधी दावेदारी के मार्ग को चुना। उनका विचार मार्क्सवादी क्रांति और बहुजन सामाजिक न्याय का एक अनूठा क्रांतिकारी संयोजन है। उनका समाजवाद वैज्ञानिक समाजवाद की क्रांतिकारी धारा के सर्वाधिक करीब है, जिसमें आंबेडकरवादी व फुलेवादी सामाजिक चेतना का गहरा समावेश है।
भारतीय समाजवाद की परंपरा में डॉ. राममनोहर लोहिया और जगदेव प्रसाद दोनों ही जाति-व्यवस्था और विषमता के खिलाफ संघर्ष के केंद्रीय प्रतीक हैं, लेकिन ‘ब्राह्मणवाद’ के प्रश्न पर जगदेव प्रसाद का रास्ता डॉ. लोहिया के विचार से मौलिक रूप से अलग और कहीं अधिक निर्णायक व क्रांतिकारी साबित होता है। डॉ. लोहिया के लिए जातिगत ब्राह्मणवादी विषमता मुख्य रूप से राजनीतिक प्रतिनिधित्व, नीतिगत आरक्षण और ‘विशेष अवसर के सिद्धांत’ के इर्द-गिर्द घूमती थी। जबकि जगदेव प्रसाद के लिए ब्राह्मणवाद केवल एक सामाजिक बुराई नहीं, बल्कि सामंती-पूंजीवादी शोषण को बनाए रखने वाला एक वैचारिक और सांस्कृतिक हथियार है, जिसे बिना ध्वस्त किए 90 प्रतिशत वंचित-शोषित बहुजन समाज की वास्तविक मुक्ति संभव नहीं है।
डॉ. लोहिया की सप्तक्रांति, जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति और जगदेव प्रसाद की शोषित क्रांति में मौजूदा राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में संभव समन्वय और एकता की गुंजाइशों के बावजूद तय करना होगा कि असली धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के साथ समाजवाद की इंकलाबी धारा कौन-सी है।
[1] डॉ. पी.एन. सिंह, ‘प्रतीकों के शिल्पकार : डॉ. राममनोहर लोहिया’, डॉ. लोहिया और सतत समाजवाद, संपादन कन्हैया त्रिपाठी, प्रभात प्रकाशन, पृष्ठ 74
[2] खगेंद्र ठाकुर, ‘लोहिया की इतिहास दृष्टि और गैर-कांग्रेसवाद’, डॉ. लोहिया और सतत समाजवाद, संपादन कन्हैया त्रिपाठी, प्रभात प्रकाशन, पृष्ठ 167
(संपादन : नवल/अनिल)
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