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माओवादी रहें या न रहें, आदिवासियों का संघर्ष जारी रहेगा

सवाल उठता है कि अपने ही देश में आदिवासियों से भी ज्यादा उपेक्षित कई अन्य समुदाय हैं। मसलन, दलित हैं, ओबीसी समाज की असंख्य जातियां हैं, लेकिन उनके बीच माओवाद वहां क्यों नहीं पनपा? आदिवासी इलाके ही माओवाद के गिरफ्त में कैसे पहुंच गए? पढ़ें, विनोद कुमार का यह आलेख

बीते दिनों प्रतिष्ठित अंग्रेजी अखबार ‘हिंदू’ में माओवाद के तथाकथित खात्मे पर एक पूरे पृष्ठ की स्टोरी छपी थी, जिसमें आदिवासी इलाकों में माओवाद के फैलने की पड़ताल की गई थी और इस पर विचार किया गया था कि आगे सरकार को क्या करना चाहिए। कुल मिलाकर कारण यह बताया गया कि आदिवासी इलाके, जो पांचवी अनुसूचि के क्षेत्र हैं, वे शुरू से ही उपेक्षित रहे हैं, वहां प्रशासन की कमी रही है, उनका प्रतिनिधित्व सत्ता में नहीं होता, आदि आदि और अब वहां बेहतर प्रशासन देना होगा, उनकी भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी।

सवाल उठता है कि अपने ही देश में आदिवासियों से भी ज्यादा उपेक्षित कई अन्य समुदाय हैं। मसलन, दलित हैं, ओबीसी समाज की असंख्य जातियां हैं, लेकिन उनके बीच माओवाद वहां क्यों नहीं पनपा? आदिवासी इलाके ही माओवाद के गिरफ्त में कैसे पहुंच गए? यहां यह उल्लेख करना प्रासांगिक होगा कि 1967-68 में नक्सलबाड़ी मूवमेंट की शुरुआत हुई और वह बिहार के दलित-बहुजन बहुल इलाकों में तेजी से फैला। सामंती उत्पीड़न के शिकार दलित-बहुजन ही उनके हिरावल दस्ते में शामिल हुए। लेकिन सामंतों की भूमि सेना और सरकार ने उनका क्रूरता से दमन किया। चारु मजुमदार के नेतृत्व में शुरु हुआ यह हिंसक आंदोलन जल्द विखंडित होता गया और उनके मूल सिद्धांत में भी कई परिवर्तन हुए। ‘इंडीविजुअल एनाहिलेसन’ जिसे सीधे शब्दों में ‘छह इंच छोटा’ करने की रणनीति उन्होंने छोड़ दी, क्योंकि जमींदार को मार देने से जमींदारी प्रथा नहीं खत्म हो जाती, सामंतवाद खत्म नहीं हो जाता। ज्यादा विस्तार में गए बगैर हम कह सकते हैं कि कुछ गुटों को छोड़ ज्यादातर नक्सली संगठन दलगत राजनीति में शामिल हो गए।

लेकिन नक्सलबाड़ी मूवमेंट के समानांतर ही बंगाल और बिहार के सीमावर्ती क्षेत्र में पैदा हुआ माओवाद अभी तक चला आ रहा है। नक्सलियों और माओवादियों के बीच एक बुनियादी फर्क यह है कि माओवादियों ने संसदीय राजनीति को नहीं स्वीकारा, उनकी दृढ़ आस्था बनी रही कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती है। उनमें किसी तरह का वैचारिक भटकाव नहीं आया। उनकी रणनीति यही रही कि जंगल, पहाड़ को शरणस्थली बनाकर समतल क्षेत्र पर चढ़ाई करना। छापामार युद्ध से अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार करना, जिन्हें वे इसी व्यवस्था में मुक्त क्षेत्र की संज्ञा देते थे और इसी रणनीति के तहत उन्होंने वनक्षेत्र को अपना ठिकाना बनाया। इत्तेफाक से पहाड़ी अंचल, वनक्षेत्र ही आदिवासियों के अधिवास के भी क्षेत्र हैं, जो देश का हरित क्षेत्र है। यानि झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और दक्षिण के दंडकारण्य तक फैला वन क्षेत्र ही आदिवासियों के पांचवीं अनुसूची का भी क्षेत्र है। इसलिए पहले तो इस बात का परिमार्जन कर लेना चाहिए कि माओवादियों का आदिवासियों से किसी तरह का सरोकार रहा है या जल, जंगल, जमीन व खनन क्षेत्र को बचाने के लिए वे आदिवासी इलाकों में सक्रिय हुए?

गुमला में टूटूवापानी मोड़ पर नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज के विरोध में आंदोलन का प्रतीक चिह्न। (तस्वीर : नवल किशोर कुमार)

इस बात को भी समझना चाहिए कि आदिवासी ‘सर्वहारा’ नहीं हैं और न बहुत ज्यादा विपन्न। दलितों की बड़ी आबादी भूमिहीन है। आज भी बासगीत के पर्चे के लिए वे संघर्ष कर रहे हैं। जहां तहां सामंतों-जमींदारों की जमीन पर बसे हुए हैं। उसकी तुलना में गरीब से गरीब आदिवासी के पास रहने के लिए घर, आंगन-बाड़ी, खेती के लिए थोड़ी बहुत जमीन है। यह सही है कि औद्योगीकरण और विस्थापन ने उनके सामाजिक व आर्थिक जीवन की इस व्यवस्था पर प्रहार किया है, लेकिन अभी भी आदिवासी इलाकों में घूम कर आप इस फर्क को महसूस कर सकते हैं। इसके अलावा जल, जंगल, जमीन को बचाने के लिए वे हमेशा तत्पर भी रहे हैं और अंग्रेजों के आने के बाद जब इस पर हमला हुआ तो उसके खिलाफ कई विद्रोह हुए जिन्हें हम सिदो-कान्हू के ‘हूल’ और बिरसा के ‘उलगुलान’ के रूप में देखते हैं। इन्हीं भीषण संघर्षों और अनगिनत कुबार्नियों के बाद ही पांचवी व छठी अनुसूची की अवधारणा, झारखंड में छोटानानगुर संथाल परगना टीनेंसी एक्ट बने।

इतना ही नहीं, आजादी के बाद भी वे जल, जंगल और जमीन को बचाने के लिए सतत संघर्षरत रहे हैं।

नर्मदा आंदोलन, दामोदर घाटी निगम (डीवीसी) परियोजनाओं के तहत बनने वाले डैमों के खिलाफ संघर्ष, नेतरहाट फायरिंग रेंज के खिलाफ संघर्ष, नियमगिरी में बाॅक्साईट के उत्खनन के खिलाफ आदिवासियों का संघर्ष, कलिंगनगर में टाटा के खिलाफ संघर्ष सहित अनेक संघर्ष इस बात के गवाह हैं कि आदिवासी समाज जल, जंगल और जमीन को बचाने के लिए तत्पर रहा है। लेकिन उनके संघर्ष का तरीका हमेशा से खुला, व्यापक जनभागीदारी वाला विद्रोह रहा है, जो कभी-कभी हिंसक भी हो जाता है। लेकिन माओवादियों के छापामार युद्ध से उनका कोई वास्ता नहीं रहा है और न उनका लक्ष्य राज्य सत्ता पर काबिज होना ही रहा है। यह भी गौर करने वाली बात है कि अपने प्रभाव वाले आदिवासी इलाकों में माओवादी हमेशा चुनाव बहिष्कार का आह्वान करते रहे हैं, लेकिन आज की तारीख में सामान्य क्षेत्रों से ज्यादा आदिवासी इलाकों में मतदान का प्रतिशत रहा है।

माओवाद का जन्म बिहार, बंगाल के सीमावर्ती क्षेत्र में पारसनाथ की पहाड़ी शृंखला के बीच हुआ। 1970 के दशक की शुरुआत में ही उन्होंने चतरा, गिरिडीह होते टुंडी में प्रवेश करने की कोशिश की। लेकिन उस वक्त शिबू सोरेन के नेतृत्व में चल रहे महाजनी शोषण के खिलाफ संघर्ष का क्षेत्र टुंडी था और इसलिए उनका प्रवेश थम गया। लेकिन कुछ वर्षों बाद शिबू सोरेन के संसदीय राजनीति में प्रवेश के साथ ही वह क्षेत्र माओवाद के गिरफ्त में पहुंच गया। दरअसल, शिबू तो संथाल परगना चले गये और संसदीय राजनीति में व्यस्त हो गए और उनके समर्थक कोटा और परमिट के धंधे में लग गए, उनकी आंदोलन का ही उग्र तबका माओवादियों का कैडर बन गया। उन दिनों माओवादी एमसीसी व लालखंडी के रूप में जाने जाते थे। 1990 के दशक में उनका पार्टी यूनिटी और दक्षिण के पीपुल्स वार ग्रुप से विलय हो गया और उनकी मारक क्षमता बढ़ती चली गई।

लेकिन सत्ता की अपार शक्ति के सामने हिंसक आंदोलन किसी भी तरह टिक नहीं सकता। सत्ता के पास अपार सैन्य बल है। जाहिर है कि हिंसक राजनीति का कोई भविष्य नहीं है। बस्तर इलाके में उनके अब तक बचे रहने की वजह उसकी भौगोलिक स्थिति है। वह इलाका तीन राज्यों से मिलता है। माओवादियों के लिए एक जगह एक्शन कर किसी दूसरे राज्य में निकल जाना आसान था। इसमें वे बहुत दिनों तक सफल भी रहे। लेकिन जब तीनों राज्यों की सरकारों ने संयुक्त अभियान चलाया तो उनका सफाया तय था। अभी हम इस बहस में नहीं जाएंगे कि हिंसक राजनीति के मुकाबले गांधी की अहिंसा कितनी कारगर है, लेकिन यह स्पष्ट है कि हिंसक राजनीति एक बंद सुरंग में पहुंच चुकी है।

बावजूद इस लोहे जैसे ठंडे तथ्य के रोमानियत के वशीभूत हो कुछ लोग सशस्त्र क्रांति के गीत गाते हैं। वे आदिवासियों को इस आंदोलन का केंद्र बनाते हैं। उन्हें लगता है कि भले ही वे स्वयं समरक्षेत्र में नहीं, लेकिन वे भी उस क्रांति के भागीदार हैं। इसका एक नजारा इस बार जंतर-मंतर पर जेएनयू के छात्रों के प्रदूषण विरोधी प्रदर्शन के बीच देखने को मिला। दिल्ली गैस चैंबर में तब्दील हो चुका है और यह अपनेआप में गंभीर विषय है, लेकिन वहां नारे लगने लगे– “कितने हिडमा मारोगे, हर घर से हिडमा निकलेगा।”

विडंबना देखिए कि जब ये नारे लग रहे थे, उस वक्त माओवादी तीन राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिख रहे थे कि वे 1 जनवरी को सम्मिलित रूप से आत्म समर्पण करना चाहते हैं। उस खुले पत्र में अपने कैडरों से भी वे अनुरोध कर रहे थे कि अलग-अलग हड़बड़ी में आत्म समर्पण न करें। एकजुट हो कर यह काम करें।

माओ ने कहा था कि जनता के बीच जाओ, उनसे सीखो और उस ज्ञान को सूत्रबद्ध कर वापस क्षेत्र में जाओ। लेकिन माओवादियों ने आदिवासी जनता से कभी कुछ सीखा ही नहीं। वे देख नहीं पाए कि कम्युनिस्ट घोषणा पत्र की पहली पंक्ति है– ‘मानव जाति के विकास का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास है’, जबकि आदिवासी समाज में वर्ग नहीं है। वे यह नहीं देख पाए कि आदिवासी समाज में तमाम प्रमुख फैसले गांव के अखड़ा में लिये जाते हैं, जिसमें गांव के तमाम छोटे बड़े, स्त्री-पुरुष भाग लेते हैं और बहुमत से नहीं, सर्वानुमति से किसी फैसले पर पहुंचते है। उसकी जगह माओवादी कोई भी फैसला पोलित ब्यूरो या कुछ कामरेडों की शीर्ष कमेटी में ले कर अपना निर्णय क्षेत्र में थोपती है। माओवादियों ने कभी नहीं जाना कि सिदो-कान्हू हों या बिरसा मुंडा, उन्होंने कभी अलग से लड़ने के लिए दस्ता नहीं बनाया। संघर्ष के समय गांव का हर आदमी जो उनके साथ खेती करता है, अखड़ा में साथ नाचता है, संघर्ष का सेनानी बन जाता है।

केंद्र सरकार ने 31 मार्च, 2026 तक माओवाद के खात्मे का अल्टीमेटम दे रखा है। हालांकि, माओवाद या इस तरह की हिंसक राजनीति एकबारगी खत्म नहीं हो सकती। अच्छी से अच्छी सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था में कुछ लोगों को असंतोष हो सकता है और आज की व्यवस्था की बुनियाद ही शोषण और उत्पीड़न है। तो, इसके खिलाफ असंतोष और बेचैनी रहेगी। लेकिन इसका समाधान लोकतांत्रिक व्यवस्था के सच्चे अर्थों में स्थापना ही है। लोग धरना देंगे, प्रदर्शन करेंगे, व्यक्तिगत सत्याग्रह, अनशन आदि करेंगे। लोकतांत्रिक सरकार को उनकी बातों को सुनना होगा। उसे बलपूर्वक कुचलने से हिंसक राजनीति का रास्ता खुलता है।

जहां तक आदिवासियों का सवाल है, माओवादी रहें या न रहें, जल, जंगल और जमीन को बचाने का आदिवासियों का संघर्ष जारी रहेगा। संसदीय राजनीति और उपभोक्तावादी संस्कृति के प्रभाव से उसमें थोड़ा व्यवधान आया है, लेकिन आदिवासी समाज और आदिवासी युवा इस बात को लेकर सचेष्ट हैं।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

विनोद कुमार

झारखंड के वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता विनोद कुमार का जुड़ाव ‘प्रभात खबर’ से रहा। बाद में वे रांची से प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘देशज स्वर’ के संपादक रहे। पत्रकारिता के साथ उन्होंने कहानियों व उपन्यासों की रचना भी की है। ‘समर शेष है’ और ‘मिशन झारखंड’ उनके प्रकाशित उपन्यास हैं।

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