महाराष्ट्र की विभिन्न महानगरपालिकाओं के चुनाव संपन्न हो चुके हैं। इनमें मुख्य रूप से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने बढ़त हासिल की है। कुल 2869 नगरसेवकों वाली महापालिकाओं में दलवार स्थिति इस प्रकार है– भाजपा 1459, शिवसेना शिंदे गुट 399, कांग्रेस 324, राष्ट्रवादी अजित गुट 167, शिवसेना ठाकरे गुट 155, एमआईएम 114, शरद पवार गुट 36, मनसे 13, बसपा 6, निर्दलीय 19 और छोटे दल 215।
इन परिणामों के अनुसार विपक्ष की ताकत मुख्यतः लातूर, वसई-विरार, चंद्रपुर, मालेगांव, परभणी और भिवंडी-निजामपुर महानगर पालिकाओं में है, जहां वे सत्ता में आ सकते हैं। लेकिन यह आसान नहीं कहा जा सकता। महाराष्ट्र के सत्ताधारी दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं की कार्यशैली देखते हुए, बहुमत न होने पर भी वे अपनी रणनीति से अपना महापौर बनाने की कोशिश करेंगे। ‘साम, दाम, दंड, भेद’ की नीति से विपक्ष के नवनिर्वाचित नगरसेवकों को अपने पक्ष में करने की प्रवृत्ति अब देश में सामान्य हो चुकी है। दल-बदल विरोधी कानून निष्प्रभावी हो चुका है और उसकी स्थिति बिना दांत वाले संयुक्त राष्ट्र जैसी हो गई है। न्यायालय भी ऐसे मामलों में तटस्थ दिखाई देता है।
दूसरी ओर, सत्ताधारी दल के मुंबई, नागपुर, पुणे, ठाणे, नवी मुंबई, उल्हासनगर, कल्याण-डोंबिवली, मीरा-भाईंदर, पनवेल, नासिक, धुले, जलगांव, अहिल्यानगर, पिंपरी-चिंचवड़, सोलापुर, कोल्हापुर, सांगली, मिरज-कुपवाड़ा, छत्रपति संभाजीनगर, नांदेड़-वाघाला, अमरावती, अकोला, इचलकरंजी और जालना में महापौर होंगे। यानी राज्य की 29 में से 23 महानगरपालिकाओं में भाजपानीत गठबंधन के महापौर होंगे। यहां विपक्ष की कोई दखलअंदाजी संभव नहीं दिखती।
जिस मुंबई महानगरपालिका चुनाव पर पूरे देश की नजर थी, उसमें बड़ा उलटफेर हुआ है। 33 वर्षों से बाला साहेब ठाकरे के प्रभाव में रही बीएमसी अब भाजपा के पास चली गई है। हालांकि परिणाम बताते हैं कि मुंबई में उद्धव ठाकरे की शिवसेना का आधार अभी भी मजबूत है। यदि भाजपा के कुछ नगरसेवक निर्विरोध निर्वाचित न हुए होते, तो संभवतः मुंबई महानगर पालिका उद्धव ठाकरे के पास ही रहती। जिस मतपत्र पर नोटा को भी एक उम्मीदवार माना जाता है, वहां बिना चुनाव के निर्विरोध नगरसेवक चुना जाना नैतिकता के विरुद्ध है। नागरिक समाज, चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय को इस पर ध्यान देना चाहिए। नोटा के लिए आंदोलन करने वाले अण्णा हज़ारे और उनकी टीम आज कहीं नजर नहीं आते हैं।
महानगर पालिका चुनावों में ओवैसी की पार्टी एमआईएम ने अच्छा प्रदर्शन किया है और उनके 114 नगरसेवक चुने गए हैं। मुस्लिम समाज की मानसिकता में यह बड़ा परिवर्तन है। कुछ राष्ट्रीय दलों के लिए यह चेतावनी हो सकती है, लेकिन भविष्य में मुस्लिम समाज राजनीतिक रूप से अकेला भी पड़ सकता है। दूसरी ओर, आंबेडकरवादी राजनीति बिखर चुकी है और बसपा तथा वंचित बहुजन आघाड़ी को सीमित सफलता मिली है। यह फिर सिद्ध हुआ कि आंबेडकरी गुटों की एकता के बिना आंबेडकरवादी राजनीति सफल नहीं हो सकती। तथाकथित आंबेडकरवादी गुट प्रगतिशील और स्थापित दोनों दलों के साथ गठबंधन करते हैं, जबकि स्थानीय स्तर पर सौदेबाज नेता अपनी सुविधा के अनुसार पर्चे और व्हाट्सऐप के माध्यम से मतदान निर्देश जारी करते हैं। परिणामस्वरूप आंबेडकरवादी मतदाता नेतृत्वहीन हो चुके हैं। इसी तरह यह भी साबित हुआ है कि सामाजिक मुद्दों पर एकजुटता राजनीति में उपयोगी नहीं होती।

प्रांतीय राजनीति की बात करें तो शरद पवार का प्रभाव अब समाप्ति की ओर है। अधिक उम्र के कारण वे सक्रिय नहीं रह पाएंगे। उनकी कार्यशैली न तो अजित पवार (जिनकी गत 28 जनवरी को विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गई) में थी और न ही सुप्रिया सुळे में है। इसलिए उनका भविष्य बारामती तक सीमित रह पाएगा या नहीं, यह प्रश्न है। दूसरी ओर मराठा और ओबीसी समाज पर हिंदुत्व और धर्म के माध्यम से भाजपा और संघ ने मजबूत पकड़ बनाई है। हिंदुत्व, धर्म, सत्संग और कीर्तन ने भाजपा और संघ को गांव-गांव तक पहुंचाया है। इसलिए मराठा मतों पर पवार गुट का वर्चस्व कम हुआ है। यह पुणे, पिंपरी-चिंचवड़ और कोल्हापुर के परिणामों से स्पष्ट है।
ओबीसी समाज एकसमान नहीं है। वह अनेक जातियों का समूह है। इसलिए पूरे ओबीसी समाज का एक नेता बनना संभव नहीं। भाजपा-संघ ने पहले से ही जाति-आधारित नेतृत्व तैयार करने का काम शुरू कर रखा है। हिंदू समाज पर उनका मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी बढ़ा है। इसलिए आगे की राजनीति धर्म, हिंदुत्व, मुस्लिम-विरोध, जाति और प्रशासनिक वर्चस्व के आधार पर चलेगी और इसमें कौन बाजी मारेगा, यह समझना कठिन नहीं।
दूसरी ओर कांग्रेस का राजनीतिक पतन दिखाई देता है। क्या वह फीनिक्स की तरह फिर उठ पाएगी, यह बड़ा प्रश्न है। कांग्रेस की सत्तर वर्ष की सत्ता और स्वतंत्रता आंदोलन में उसका योगदान बनाम भाजपा की ग्यारह वर्ष की सत्ता, इस तुलना में भाजपा ने कम समय में बड़ा प्रभाव बनाया है। कांग्रेस में स्वतंत्रता काल से ही संघ की ‘स्लीपर सेल’ सक्रिय रही होगी, अन्यथा संघ का इतना विस्तार संभव नहीं था। कई कांग्रेसी अवसरवादी हैं और पार्टी की विचारधारा से दूर। ऐसी स्थिति में कांग्रेस को वैचारिक रूप से खड़ा करना राहुल गांधी के लिए बड़ी चुनौती है।
कुल मिलाकर, महानगर पालिका चुनावों से यह निष्कर्ष निकलता है कि महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में भविष्य के चुनाव विपक्ष के लिए आसान नहीं होंगे। “अगले पचास वर्ष हम ही सत्ता में रहेंगे”, भाजपा नेताओं के ऐसे दावे को विपक्ष को अब चेतावनी के रूप में लेनी चाहिए। सभी सीटों पर एक-एक संयुक्त उम्मीदवार खड़ा करने के लिए छोटे-बड़े सभी विपक्षी दलों में एकता आवश्यक है, अन्यथा उनकी पराजय का सिलसिला जारी रहेगा।
(संपादन : नवल/अनिल)
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