जॉन हेनरी न्यूमैन की किताब ‘द आइडिया ऑफ़ ए यूनिवर्सिटी’ (1852) में विश्वविद्यालय को सिर्फ़ व्यावसायिक प्रशिक्षण के बजाय, ज्ञान को सबके साथ साझा करने और बढ़ाने की जगह बताया गया है। वह उसे एक ऐसे प्रगतिशील जगह के रूप में व्याख्यायित करते हैं जो ‘सोचने की दार्शनिकता’ को बढ़ावा देती है, सभी विचारों को जोड़कर सच्चाई की पूरी समझ पैदा करती है।
जवाहरलाल नेहरू ने विश्वविद्यालयों को ‘ज्ञान के केंद्र’ के रूप में देखा, जो मानवतावाद, सहिष्णुता, तर्क और विचारों के आदान-प्रदान के लिए समर्पित हो। उनका मानना था कि इन संस्थानों को वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देना चाहिए, राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देना चाहिए, और सामाजिक परिवर्तन के केंद्र के रूप में काम करना चाहिए, जिसका लक्ष्य संतुलित, जन-हितैषी नागरिक बनाना हो।
इन दोनों विचारों के आलोक में देखें तो वर्तमान में भारतीय विश्वविद्यालय दोनों ही सैद्धांतिक और वैचारिक पहलुओं पर खरा नहीं उतरते हैं। यहां उन सभी मूल्यों का अवमूल्यन जारी है जिसकी बात न्यूमैन और नेहरू ने की है। लगभग सभी विश्वविद्यालयों में संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार की कोई जगह नहीं रह गई है। अभिव्यक्ति के स्थान इतने कम हो गए हैं कि विचारों का आदान-प्रदान तो दूर की बात है, यहां विचारों को ही व्यक्त कर पाना कठिन से कठिनतर होता जा रहा है। एक उदाहरण इलाहाबाद विश्वविद्यालय है।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में ऐसा क्यों हो रहा है? इसकी एक रूपरेखा मैं आपके सामने रखना चाहूंगा। मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय में 2013 में स्नातक करने आया। तब यहां छात्रसंघ चुनाव हुआ करते थे। इस चुनाव के कारण विश्वविद्यालय परिसर में हमेशा बहसें और परिचर्चाएं होती रहती थीं, जो विभिन्न छात्र संगठनों की तरफ़ से आयोजित होती थीं। हिंदी विभाग और उर्दू विभाग के सामने बरगद लॉन में परिचर्चा या सांस्कृतिक गतिविधियां हुआ करती थीं।

मैं अपनी कक्षाओं के बाद अक्सर इस लॉन में आकर बैठता और बहसों और परिचर्चाओं को सुना करता था। इस लॉन का नामकरण छात्र संगठनों ने अपने वैचारिक रुझान के हिसाब से तय किया था। प्रगतिशील छात्र संगठन इसे शर्मिला इरोम के नाम पर ‘इरोम लॉन’ कहा करते थे तो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) इसे ‘विवेकानंद लॉन’ के नाम से पुकारती थी। यहां होने वाली गतिविधियां तब बिना किसी प्रशासनिक अनुमति के हुआ करती थीं। विश्वविद्यालय प्रशासन इसमें न के बराबर हस्तक्षेप करता था। इसलिए यह जगह कक्षा के पाठ्यक्रम से इतर छात्रों के लिए देश-दुनिया के विचारों को आलोचनात्मक रूप से सुनने और समझने की जगह हो जाता था।
जब मैं यहां आया था, तब कई छात्र संगठन सक्रिय थे, जिसमें आइसा, एसएफआई, एआईडीएसो, एबीवीपी, समाजवादी छात्र सभा, प्रतियोगी छात्र मोर्चा, सामाजिक न्याय मोर्चा प्रमुख थे। मैं इनकी परिचर्चाओं में अक्सर भाग लिया करता था। यहां ऐसा माहौल था कि मैं एक दिन किसी विमर्श के समर्थन में किसी को बोलते हुए सुनता तो उसके अगले दिन उसी के विरोध पर आधारित बहसों को सुनता। यह अनुभव बहुत अनोखा था।
छात्रसंघ के चुनाव के दौरान छात्र नेता विभिन्न जगहों पर अपना भाषण देते जो विश्वविद्यालय की समस्याओं के साथ देश के वैचारिक आयामों से भी टकराता था। सन् 2019 में विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्रसंघ की जगह छात्र परिषद का गठन करके इस प्रक्रिया पर पहला प्रहार किया। इसके बाद कोरोना काल के बाद विश्वविद्यालय धीरे-धीरे एक ऐसे परिसर के रूप में बदलने लगा जो विश्वविद्यालय की मूल संकल्पना के खिलाफ था। धीरे-धीरे कैंपस के भीतर होने वाली छात्र गतिविधियों को नियंत्रित किया जाने लगा।
छात्रों का निलंबन आम बात हो गई। पोस्टर लगाने पर पाबंदी लगा दी गई। एक बार एसएफआई की तरफ़ से विश्वविद्यालय परिसर की दीवारों पर कुछ स्लोगन लिखे गए। तब मैं एसएफआई का विश्वविद्यालय इकाई का अध्यक्ष था। कुलानुशासक ने मुझे बुलाया और कहा कि या तो आप दीवार साफ़ करें, नहीं तो हम कानूनी कार्रवाई करेंगे।
वर्तमान में स्थिति यह है कि विश्वविद्यालय के छात्र कहीं भी दस-बीस की संख्या में एक साथ उपस्थित नहीं हो सकते हैं। जैसे ही किसी भी तरह की गतिविधि के लिए छात्र बैठते हैं वैसे ही गार्ड डंडा लेकर आ धमकते हैं और पूछते हैं कि आप लोग ऐसे क्यूं बैठे हैं? आप लोग क्या बातें कर रहे हैं? यहां तक कि अगर वह छात्र मात्र साधारण-सी बातचीत के लिए भी एकत्रित हुए हैं तब भी उन्हें कहा जाता है कि आप लोग दूर-दूर बैठिए। अगर वहां कोई विमर्श हो रहा होता है तब तो प्रशासन के हाथ-पांव फूल जाते हैं कि कोई विमर्श यहां कैसे हो सकता है। वे तुरंत कहते हैं कि क्या आपके पास इस तरह बैठने की अनुमति है? अब दस-बीस छात्रों के बैठने के लिए भी अनुमति आवश्यक कर दी गई है।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने 8 सितंबर, 2025 को इस तरह की एक नोटिस जारी की थी कि विश्वविद्यालय परिसर में किसी भी तरह के चर्चा-परिचर्चा और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन की अनुमति की आवश्यकता होगी। इसमें यह परिभाषित नहीं किया गया है कि क्या मैदान में बैठकर बातचीत करने के लिए भी अनुमति लेनी होगी, क्योंकि विश्वविद्यालय प्रशासन छात्रों को गतिविधियों के लिए कोई जगह मुहैया नहीं कराता है। सवाल यह उठता है कि फिर मैदान में बैठने और बातचीत करने को क्या इस नोटिस का उल्लंघन माना जाएगा?
इससे पहले स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्रों द्वारा आयोजित ‘कविता पाठ’ को रोकने की कोशिश की थी, लेकिन कोई नियम नहीं होने के कारण इसे प्रशासन रोक नहीं पाया। उससे पहले जब आइसा से जुड़े छात्र इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कैंपस में सदस्यता अभियान चला रहे थे, गार्ड आए और रोकने लगे कि आप बिना प्रशासनिक अनुमति के यहां कुछ भी नहीं कर सकते हैं। इसके बाद सितंबर, 2025 वाली नोटिस जारी हुई और यह नियम जारी किया गया। दरअसल इस नियम के जरिए विश्वविद्यालय प्रशासन परिसर में खुली बहस और परिचर्चा जो अक्सर सत्ता और विश्वविद्यालय प्रशासन से विभिन्न मुद्दों पर सवाल करती है, उसे रोकना चाहती थी। वह नहीं चाहती कि छात्र तर्कशीलता को धारण करें। ऐसे में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के भीतर ऐसा कुछ भी नहीं बचा है जहां छात्र अपने विचारों को व्यक्त कर सकें। यह विश्वविद्यालय के लिए भी ठीक बात नहीं है कि छात्र सिर्फ़ परीक्षा दे और चले जाएं। एक तरह से यह न्यूमैन की विश्वविद्यालयी अवधारणा, जिसमें वह कहते हैं कि विश्वविद्यालय व्यावसायिक प्रशिक्षण देने की जगह नहीं है, आजकल इसी को बढ़ावा दिया जा रहा है कि आप व्यावसायिक प्रशिक्षण लें, लेकिन सत्ता और सामाजिक व्यवस्था पर कोई सवाल न पूछें।
कल 3 फरवरी, 2026 को जो घटना हुई उसने विश्वविद्यालय में व्याप्त जातिवाद को स्पष्ट तौर पर उजागर कर दिया। दिशा छात्र संगठन के कुछ छात्र बरगद लॉन में बैठकर यूजीसी के नए रेगुलेशन पर चर्चा कर रहे थे। तभी छात्रों एक उग्र समूह उनकी तरफ आया। दिशा छात्र संगठन से जुड़े छात्र बरगद लॉन में एक सर्कल बनाकर चर्चा कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने वहां ‘ब्राह्मणवाद’ के खात्मे को लेकर कुछ बातें की, जिसको कुछ छात्र जो वहां पहले से सुनियोजित रूप से मौजूद थे, रोकने की कोशिश की। तभी एक गाड़ी आई जिस पर ‘बजरंग’ लिखा हुआ था। उसमें से कुछ लड़के बाहर आए और बहस करने लगे कि किसी जाति को लेकर नारा यहां नहीं लगाया जा सकता है। आप लोग इसे जेएनयू और बीएचयू बनाने चले हैं। हम ऐसा नहीं होने देंगे।

इस पर दिशा छात्र संगठन से जुड़े छात्रों ने उन्हें समझाया कि ‘ब्राह्मणवाद’ किसी जाति के खिलाफ नहीं है। वह तो एक विचारधारा है जिसे हम खत्म करने की बात कर रहे हैं। इस पर दूसरा छात्र समूह भड़क उठा कि नहीं यह ब्राह्मण के खिलाफ है और अगर कोई ऐसा करता है तो हम उसे ऐसा कभी नहीं करने देंगे। इसके बाद वह गाली-गलौज करने लगे, फिर मारपीट करने लगे। बात-बात में वह गालियां देने लगे और कहने लगे कि इसे जेएनयू नहीं बनने देंगे, यहां ब्राह्मणवाद को गाली नहीं दी सकती है। उनका कहना था कि ब्राह्मणवाद को खत्म करने की बात ब्राह्मण को खत्म करना है। इसी बात को लेकर दोनों पक्षों में बहस के बाद मारपीट हो गई। वहां तुरंत ही बड़ी संख्या में उच्च जातियों विशेषकर ब्राह्मण छात्र इकट्ठा हो गए। हमलावर कार से आए थे और गार्ड्स ने उन्हें रोका भी नहीं जबकि गार्ड्स विश्वविद्यालय के छात्रों को बिना आईकार्ड चेक किए जाने तक नहीं देते और उन्होंने हमलावर छात्रों के समूह को चार पहिया वाहन के साथ विश्वविद्यालय के परिसर में घुसने दिया। इससे देखकर तो यहीं लगता है कि यह पहले से प्रायोजित था। हमलावर छात्रों ने जो गालियां दीं, यहां उसका वर्णन करना जायज नहीं है। इस दौरान दोनों पक्षों में झड़प हुई जिसमें दिशा छात्र संगठन से जुड़ी छात्रा का बाल पकड़कर खींचा गया और उनके मुंह पर चोटें आईं। दूसरे पक्ष से भी कुछ छात्रों को मामूली चोट आई।
यहां मामला है या था कि उच्च जातियों खासकर ब्राह्मण छात्रों का एक समूह इतना भी नहीं जानता कि ‘ब्राह्मणवाद’ एक विचार है जिसका किसी जाति से कोई लेना-देना नहीं है। इसे उमा चक्रवर्ती जैसे विद्वानों ने सैद्धांतिक स्पष्टता दी है कि जो भी व्यक्ति ऊंच-नीच को मानता है वह ब्राह्मणवादी हो सकता है, फिर वह किसी भी जाति या लिंग का हो। इतनी साधारण-सी बात उन छात्रों के दिमाग में नहीं आई कि वह जो कर रहे हैं दरअसल वहीं ब्राह्मणवाद है और उसी को खत्म करने की बात प्रगतिशील तबका करता है।
दरअसल अब यह पैटर्न बनता जा रहा है कि ब्राह्मणवाद को ब्राह्मण का पर्यायवाची बना दो और कहो कि यह जाति विशेष को लेकर कहा जा रहा है। एक संदेह की स्थिति भी पैदा करो, जिसमें ब्राह्मणवाद और ब्राह्मण के बीच अंतर करना मुश्किल हो जाए।
इसके बाद विश्वविद्यालय प्रशासन की तरफ़ से जब कुलानुशासक घटनास्थल पर पहुंचे तो वह हमलावर छात्रों को पकड़ने की जगह वहां बातचीत कर रहे छात्रों से ही सवाल करने लगे कि आपने यहां बैठने की अनुमति ली थी? अब इसका जवाब क्या हो सकता है कि दस छात्र अगर कहीं बैठकर बात करना चाहते हैं तो उसके लिए भी अनुमति लें। प्रशासन बातचीत कर रहे छात्रों को लेकर जब कुलानुशासक कार्यालय पहुंचा तो उसमें से एक छात्रा जिसे चोट आई थी, उसने अंदर जाने से यह कहते हुए मना कर दिया कि आपने हमलावर छात्रों को पकड़ने की कोई कोशिश क्यूं नहीं की और ये जो गार्ड हैं, क्या इनकी जिम्मेदारी सिर्फ आम छात्रों को ही परेशान करने की है। उन्होंने सवाल किया कि गार्ड्स ने हमलावर छात्रों को बाहर क्यूं जाने दिया? इस प्रकरणों से आप समझ सकते हैं कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय किस तरह संवैधानिक अधिकारों का गला घोंट रहा है।
विश्वविद्यालय की एक प्रमुख विशेषता होती है कि वह निर्बाध रूप से छात्रों के लिए खुला होना चाहिए। इलाहाबाद विश्वविद्यालय इस मामले में एक बाधित विश्वविद्यालय है। इसका परिसर पांच-छह साल पहले रात्रि में खुला रहता था। हालांकि तब भी रात में लड़कियों के प्रवेश पर पाबंदी थी, लेकिन यह पाबंदी नियम के रूप में नहीं थी। विश्वविद्यालय परिसर में रात में बहुत से छात्र अध्ययन करते थे। कोरोना के बाद स्थितियां बदलीं और लड़कियों के प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई। यह पाबंदी इस बात को लेकर लगाई गई कि रात में प्रशासन लड़कियों को सुरक्षित रखने के दृष्टिकोण से यह कर रहा है। यह एक ऐसा तर्क है जो प्रशासनिक अक्षमता को प्रकट करता है। बाद में जब लड़कों के प्रवेश को लेकर बात बढ़ी तो प्रशासन ने इसका समाधान निकाला कि शाम 6 बजे के बाद पुस्तकालय परिसर को छोड़कर बाकी परिसर में छात्रों के प्रवेश पर पूर्ण पाबंदी लगा दी गई। इस तरह यह विश्वविद्यालय किसी इंटर कालेज की तरह हो गया कि सुबह 8 बजे से शाम 6 बजे तक ही खुला रहेगा।
अब बात गार्ड के तौर-तरीकों पर भी कर लेते हैं। विश्वविद्यालय परिसर के कला संकाय में नियुक्त गार्ड भूतपूर्व सैनिक कल्याण निगम द्वारा नियुक्त किए गए हैं। ऐसा लगता है कि यह गार्ड बिना किसी विश्वविद्यालय प्रशिक्षण के सीधे यहां नियुक्त किए गए हैं क्योंकि उनका व्यवहार कहीं से भी मर्यादित नहीं होता है। पहले तो वह कई तरह की धारणाओं से भरे हुए हैं जो किसी विश्वविद्यालय के परिसर के लिए ठीक नहीं हैं। वह छात्रसंघ नहीं होने के कारण अपने को विश्वविद्यालय का लठैत समझते हैं। कभी भी किसी को भी अपमानित कर सकते हैं। एक बार एक बातचीत के लिए एक पीएचडी छात्र ने वहां गार्ड को बताया कि हम कुछ बातचीत करेंगे। उसने ऐसा इसलिए किया क्योंकि गार्ड्स किसी भी क्षण आकर बदतमीजी करने लगते हैं। इससे पहले कि वह कुछ कहें, उसने सोचा कि उन्हें अवगत करा दिया जाए। गार्ड्स पीएचडी के छात्र से पूछने लगे कि बताइए आप वहां क्या बात करोगे? यह सवाल एक गार्ड पीएचडी के छात्र से कर रहा है जैसे वह किसी विषय का विशेषज्ञ है।
यहां गार्ड्स लड़कियों के लेकर कुंठित और पितृसत्तात्मक सोच से ग्रसित हैं। शाम को जब 6 बज जाता है तब यह डंडा लेकर बच्चों को बाहर निकालते हैं और उस दौरान अगर कोई लड़का और लड़की या लड़के-लड़कियों का समूह कहीं मिल जाता है तब यह इतनी घिनौनी भाषा का प्रयोग करते हैं कि जिसे सुनकर शर्म से आपका सिर झुक जाएगा। यहां मैं उन शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहूंगा। दूसरे यह गार्ड्स मोरल पुलिसिंग करते हैं। इनको यह अधिकार कहां से मिला है कि कोई लड़की-लड़का एक साथ नहीं बैठ सकते हैं। शाम हुई नहीं कि इनकी मोरल पुलिसिंग शुरू हो जाती है।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के स्तर पर ही एक अप्रकाशित एमफिल शोध प्रबंध के अनुसार गार्ड्स की नौकरी में ज्यादातर उच्च जातियों से होते हैं जो सामाजिक रूढ़ियां को साथ लेकर यहां आते हैं। यहां भी गार्ड मुख्यतः उच्च जातियों से हैं। ऐसे में वह अपने सांस्कृतिक वर्चस्व की रक्षा करना भी अपना परम कर्तव्य समझते हैं। उनका व्यवहार उपनाम देखकर बदल जाता है।
इस तरह इलाहाबाद विश्वविद्यालय धीरे-धीरे ब्राह्मणवादी सांस्कृतिक वर्चस्व को स्थापित करने की जगह बनता जा रहा है। यहां उन सभी मूल्यों को बढ़ावा दिया जा रहा है जिसकी बात मनुस्मृति करती है और उन सभी मूल्यों का अवमूल्यन किया जा रहा है जिसकी बात संविधान करता है। ऐसे भी संदेह नहीं है कि भविष्य में भारतीय विश्वविद्यालय मनु के सिद्धांत को लागू करने का पहला स्थान बनें, जहां स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व तीनों के लिए कोई जगह न हो।
(संपादन : नवल/अनिल)
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