h n

यूजीसी रेगुलेशन : इन कारणों से जरूरी है दलित-बहुजनों की यह लड़ाई

विश्वविद्यालयों में बहुजन छात्रों के ख़िलाफ़ गहरे और व्यवस्थित भेदभाव का एक प्रमुख कारण यह है कि प्रशासन अक्सर उच्च जाति की लॉबी से प्रभावित होता है, जो न तो हाशिए पर पड़े वर्गों की समस्याओं के प्रति संवेदनशील होते हैं और न ही उनकी सामाजिक व शैक्षिक कठिनाइयों को गंभीरता से समझने का प्रयास करते हैं। बता रहे हैं अभय कुमार

यूजीसी के नियमों में कई खामियां हैं और इन्हें और अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। हालांकि, उच्च जाति के समर्थकों और उनका साथ देने वाले मीडिया ने पूरे देश में ऐसा एक कृत्रिम और भ्रामक माहौल बना दिया, मानो यूजीसी ने उच्च जाति के लोगों के ख़िलाफ़ भेदभाव का रास्ता खोल दिया हो, जबकि वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है।

यह पूरे देश ने देखा कि किस तरह उच्च जातियों का एक संगठित समूह सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) और केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ मोर्चा खोले हुए था। देश के कई हिस्सों से ख़बरें आ रही थीं कि भाजपा के कई समर्थक अपने ही नेताओं के ख़िलाफ़ नारे लगा रहे हैं और सार्वजनिक स्थानों पर लगे उनके पोस्टर और बैनर फाड़कर अपना ग़ुस्सा ज़ाहिर कर रहे हैं।

उनकी नाराज़गी का मुख्य कारण यह था कि भाजपा सरकार, जिसे सत्ता में लाने के लिए उन्होंने भरपूर ज़ोर लगाया, अब उच्च जाति के बच्चों के ‘भविष्य के साथ खिलवाड़’ कर रही है।

भाजपा को भी इसका एहसास हो गया कि वोट बैंक के लिहाज़ से यह मुद्दा बेहद संवेदनशील हो चुका है। इसी कारण केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को प्रेस के सामने आकर यह कहना पड़ा कि यूजीसी के नियमों का इस्तेमाल कभी भी किसी भी तरह के भेदभाव को बढ़ावा देने के लिए नहीं किया जाएगा और सरकार किसी भी व्यक्ति या समूह के ख़िलाफ़ किसी भी प्रकार के भेदभाव को बर्दाश्त नहीं करेगी।

भाजपा की सबसे बड़ी समस्या यह है कि उसे अपने कोर वोटर सवर्णों के साथ-साथ बहुजन समाज, दोनों वर्गों को खुश रखना है, जो वर्तमान में यूजीसी के नियमों के मामले में विशेष रूप से कठिन साबित हो रहा है।

यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है, जहां मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायाधीश जयमाला बागची की खंडपीठ ने 29 जनवरी को यूजीसी के नियमों पर रोक लगा दी और केंद्र सरकार तथा यूजीसी से 19 मार्च तक पूरे मामले पर जवाब मांगा है।

सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले ने वंचित समुदाय के युवाओं को घोर निराशा में डाल दिया है। वहीं दूसरी ओर उच्च जाति के समर्थक अदालत के फ़ैसले से ‘राहत’ महसूस कर रहे हैं।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत के इस फ़ैसले ने एक बार फिर इस धारणा को पुष्ट किया है कि न्यायपालिका ने आरक्षण और अन्य सामाजिक न्याय के मुद्दों पर अक्सर रूढ़िवादी रुख ही अपनाया है। कार्यकुशलता बनाए रखने के नाम पर इसने आरक्षण नीतियों और विधायिका द्वारा कमज़ोर वर्गों के लिए अनुमोदित अन्य क़ानूनों व नीतियों में कई बार बाधाएं डाली हैं।

यूजीसी रेगुलेशन, 2026 को लागू करने की मांग को लेकर गत 6 फरवरी को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में विरोध प्रदर्शन करते दलित-बहुजन युवा

इसी प्रकार, कोर्ट ने कई बार विश्वसनीय आंकड़ों की कमी और समाज में सामाजिक सद्भाव बनाए रखने का हवाला देते हुए दलित, आदिवासी, पिछड़े और अल्पसंख्यक समाज को सशक्त बनाने वाले क़ानूनों को रोकने या अस्वीकार करने के प्रयास किए हैं।

यह विरोधाभास और गतिशीलता लोकतांत्रिक ताक़तों और न्यायपालिका के बीच अपनाए गए दो अलग-अलग दृष्टिकोणों को स्पष्ट रूप से दर्शाती है, और यही स्थिति वर्तमान यूजीसी नियमों के मामले में भी साफ़ तौर पर देखी जा सकती है।

दरअसल, यूजीसी ने 13 जनवरी को उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने से संबंधित नियम अधिसूचित किए थे। यह किसी अचानक लिए गए फ़ैसले का नतीजा नहीं है, बल्कि एक लंबे संघर्ष और अनगिनत बलिदानों का परिणाम है। लेकिन मुख्यधारा मीडिया लगातार इन सभी पहलुओं को नज़रअंदाज़ कर रहा है और स्टूडियो में बैठे एंकर कथित तौर पर ‘उच्च जाति के बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़’ का आरोप लगाते नजर आए और ऐसा माहौल बनाया गया कि यूजीसी के नियमों को लागू करने के बाद सरकार पूरे देश में उच्च जाति के छात्रों के साथ भेदभाव करने का ‘लाइसेंस’ सबको दे देगी।

इस विरोधाभास को देखिए कि जब हिंदुत्व से जुड़े राजनीतिक दल धर्म के नाम पर लोगों को लामबंद करते हैं, तो उच्च जाति का यह गुट इसमें कोई राजनीति या वोट बैंक नहीं देखता; लेकिन जब कोई ऐसी नीति सामने आती है जो शोषित वर्गों को कुछ राहत प्रदान करती है, तो वही गुट इसे ‘वोट बैंक की गंदी राजनीति’ कहता है।

समाज के शक्तिशाली गुट की संकीर्ण मानसिकता और स्वार्थपरक राजनीति के कारण ही वे देश के शिक्षण संस्थानों में वर्षों से जाति और समुदाय के नाम पर हो रहे भेदभाव को देखने को तैयार नहीं हैं। वे दलितों, आदिवासियों, अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यकों – विशेषकर मुस्लिम छात्रों – के साथ प्रतिदिन हो रहे भेदभाव को या तो अनदेखा करते हैं या जानबूझकर उस पर आंखें मूंद लेते हैं।

2016 में हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में संस्थागत हत्या का शिकार हुए रोहित वेमुला की शहादत को देश का शोषित वर्ग और न्यायप्रिय तबका कभी नहीं भूल सकता। यह सिर्फ़ रोहित की बात नहीं है; देश का हाशिए पर पड़ा समाज पायल तड़वी के साथ हुए अत्याचारों को भी नहीं भूल सकता।

गौरतलब है कि 2019 में मुंबई के एक मेडिकल कॉलेज की छात्रा पायल जाति-आधारित उत्पीड़न से इतनी व्याकुल हो गई थी कि उसने आत्महत्या कर ली थी। ये मौतें व्यक्तिगत त्रासदी नहीं हैं, बल्कि जाति-आधारित भेदभाव और अलगाव का प्रतीक हैं, जो पूरे देश में व्यापक रूप से व्याप्त है। जबकि शोषित वर्गों के ख़िलाफ़ अत्याचार के कुछ मामले पुलिस और प्रशासन के संज्ञान में आते हैं, वहीं कई अन्य घटनाओं को आधिकारिक रिपोर्टों में शामिल किए जाने से पहले ही दबा दिया जाता है।

उच्च शिक्षा संस्थानों की सामाजिक संरचना को देखने से यह समझा जा सकता है कि आज भी इन संस्थानों में उच्च जाति का वर्चस्व सबसे अधिक है, जो सदियों पुराने प्रभुत्व को बनाए रखने के लिए लगातार बहुजन छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों को पीछे धकेलने का प्रयास करता है।

‘द वायर’ द्वारा 24 जुलाई, 2025 को प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, प्रोफेसर स्तर के 80 प्रतिशत पद ओबीसी के लिए, 64 प्रतिशत दलितों के लिए और 83 प्रतिशत आदिवासी श्रेणियों के लिए रिक्त हैं। इसी प्रकार, 5 दिसंबर, 2023 को ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय विश्वविद्यालयों से पढ़ाई बीच में ही छोड़ने वाले छात्रों की कुल संख्या 13,626 है, जो अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंधित हैं। वंचित समाज के ये छात्र भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों और भारतीय प्रबंधन संस्थानों में पढ़ते थे। ये आंकड़े दिसंबर, 2023 में शिक्षा राज्य मंत्री सुभाष सरकार द्वारा संसद में लिखित उत्तर के माध्यम से प्रस्तुत किए गए थे।

हकीकत यह कि देश के प्रमुख शिक्षण संस्थान हाशिए पर पड़े समुदायों की उपेक्षा करना जारी रखे हुए हैं, और नवीनतम आंकड़े स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि संवैधानिक रूप से अनिवार्य आरक्षण नीतियां अभी भी 45 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में पूरी तरह से लागू नहीं की जा रही हैं। ओबीसी के लिए आरक्षण दर 27 प्रतिशत निर्धारित होने के बावजूद, 45 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में ओबीसी प्रोफेसरों का प्रतिनिधित्व मात्र 4 प्रतिशत तक सीमित है, जबकि एसोसिएट प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर के स्तर पर भी स्थिति में कोई ख़ास या ठोस सुधार नहीं हुआ है, और उनका प्रतिनिधित्व क्रमशः केवल 6 प्रतिशत और 14 प्रतिशत तक ही पहुंचता है।

ये सभी जानकारियां लोकसभा में प्रस्तुत आधिकारिक आंकड़ों पर आधारित हैं, जो शिक्षा राज्य मंत्री सुभाष सरकार द्वारा अगस्त, 2023 में आंध्र प्रदेश के कुरनूल निर्वाचन क्षेत्र से वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के सांसद संजीव कुमार संगारी के एक प्रश्न के लिखित उत्तर में दी गई थीं।

इसके अलावा, गैर-शिक्षण कर्मचारियों के बीच भी ओबीसी आरक्षण की पूर्ति नहीं हो सकी है, क्योंकि केंद्रीय विश्वविद्यालयों में उनके लिए केवल 12 प्रतिशत सीटें ही आवंटित की गई हैं। इतना ही नहीं, विश्वविद्यालयों में अधिकांश कुलपति, जिनके पास संस्थानों की समग्र कमान और निर्णय लेने की शक्ति होती है, उच्च जाति समुदायों से आते हैं, जबकि आदिवासी और दलित पृष्ठभूमि के कुलपतियों की संख्या ऊंगलियों पर गिनी जा सकती है।

यह सर्वविदित है कि जब विश्वविद्यालय प्रशासन और शिक्षण कर्मचारियों का बहुमत समाज के शक्तिशाली और विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों से आता है, तो संस्थानों के भीतर पूर्वाग्रह, असमानता और भेदभाव की संभावना स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है।

इलाहाबाद में विरोध प्रदर्शन के दौरान एक दलित-बहुजन छात्रा

8 अगस्त, 2022 को ‘द प्रिंट’ द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत सरकार ने संसद को सूचित किया कि देश के 45 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से कुलपतियों की संख्या केवल एक-एक और ओबीसी से सात है। इसका मतलब 36 कुलपति यानि 80 प्रतिशत उच्च जातियों से हैं।

यह तथ्य स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि विश्वविद्यालयों में नीति-निर्माण और उच्चतम प्रशासनिक स्तरों पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी समुदायों का प्रतिनिधित्व कितना कम और अपर्याप्त है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदायों की कुल जनसंख्या लगभग 25 प्रतिशत है, और यदि कुलपति पद पर उनका प्रतिनिधित्व जनसंख्या के अनुपात में होना चाहिए, तो कम-से-कम 11 कुलपति इन हाशिए पर स्थित समुदायों से होने चाहिए। लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि उनकी संख्या केवल दो है, जो लगभग 4 प्रतिशत बैठती है और उनके संवैधानिक व लोकतांत्रिक अधिकारों से बहुत कम प्रतीत होती है।

कुछ लोग यह सवाल उठाते हैं कि कुलपति स्तर पर हाशिए पर रहने वाले समुदायों का प्रतिनिधित्व क्यों होना चाहिए। सामाजिक न्याय के तर्क के अनुसार इसका उत्तर यह है कि केवल अच्छे क़ानून बनाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि हाशिए पर रहने वाली जातियों और समुदायों के लोग उच्च निर्णय लेने वाले पदों पर मौजूद हों, ताकि वे इन क़ानूनों को वास्तविक और प्रभावी ढंग से लागू कर सकें।

विश्वविद्यालयों में बहुजन छात्रों के ख़िलाफ़ गहरे और व्यवस्थित भेदभाव का एक प्रमुख कारण यह है कि प्रशासन अक्सर उच्च जाति की लॉबी से प्रभावित होता है, जो न तो हाशिए पर पड़े वर्गों की समस्याओं के प्रति संवेदनशील होते हैं और न ही उनकी सामाजिक व शैक्षिक कठिनाइयों को गंभीरता से समझने का प्रयास करते हैं, क्योंकि वे आमतौर पर अपने व्यक्तिगत हितों और अपनी जाति के सामूहिक हितों से परे सोचने में असमर्थ होते हैं और इस प्रकार सभी के कल्याण के लिए काम करने में विफल रहते हैं।

इस संदर्भ में प्रत्येक शैक्षणिक संस्थान में बहुजन समुदाय का आनुपातिक, सार्थक और प्रभावी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना अनिवार्य हो जाता है, ताकि न्याय, समानता और समावेशन के सिद्धांत केवल काग़ज़ी दावों तक सीमित न रहें, बल्कि व्यावहारिक स्तर पर भी लागू किए जा सकें।

जाहिर है कि यूजीसी को इन सभी बातों की जानकारी अवश्य रही होगी। यद्यपि शिक्षण संस्थानों में उच्च और प्रभावशाली पदों पर आसीन अधिकारी जाति-आधारित, व्यवस्थित और संस्थागत भेदभाव को स्वीकार करने से इनकार करते हैं, फिर भी शोषित वर्गों के दिलों में यह भावना धीरे-धीरे इतनी गहरी बैठ गई है कि देश के अधिकांश शिक्षण संस्थान ज्ञान के केंद्र बनने के बजाय उनके लिए कब्रिस्तान बनते जा रहे थे। इन्हीं कड़वे और अकाट्य तथ्यों के आलोक में यूजीसी ने समानता से संबंधित नियम लागू किए।

उच्च जाति के लोग बार-बार यह तर्कहीन दावा कर रहे हैं कि यूजीसी के नियम सामान्य वर्ग के छात्रों को कोई सुरक्षा प्रदान नहीं करते। उनका यह ग़लत तर्क इस धारणा पर आधारित है कि ये नियम केवल दलित, आदिवासी और ओबीसी छात्रों को ही जाति-आधारित भेदभाव के संभावित शिकार के रूप में मान्यता देते हैं। यह दावा करना कि उच्च जाति के छात्रों को भी केवल उनकी पहचान के आधार पर भेदभाव का सामना करना पड़ सकता है, न तो किसी ठोस सामाजिक या ऐतिहासिक तर्क पर आधारित है और न ही यह सामाजिक न्याय के मूल तर्क के अनुरूप प्रतीत होता है। वे इस सरल लेकिन मूलभूत सत्य को समझने में विफल रहते हैं कि हाशिए पर पड़ी जातियों के अधिकारों की रक्षा के लिए बनाए गए क़ानूनों और नियमों का वास्तविक उद्देश्य भेदभाव को समाप्त करना और समानता, स्वतंत्रता तथा बंधुत्व के सिद्धांतों पर आधारित समाज का पुनर्निर्माण करना है।

उदाहरण के लिए, यदि बस में कुछ सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं, तो यह नीति न तो पुरुषों के हितों के विरुद्ध है और न ही किसी भी प्रकार से उनके साथ भेदभाव करती है। बल्कि, पुरुष-प्रधान समाज में महिलाओं के लिए सीटें सुनिश्चित करना सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने और लोकतांत्रिक मूल्यों को मज़बूत करने की दिशा में एक सार्थक कदम है।

इस सरल और समझने योग्य तर्क को जानबूझकर नज़रअंदाज़ किया जा रहा है, जिससे ग़ैर-ज़रूरी कशीदगी पैदा हो रही है। मानो यूजीसी के नए नियमों के लागू होने से उच्च जाति के छात्रों के साथ कोई बड़ा अन्याय होने वाला हो।

उच्च जाति के लोग इस बात का भी विरोध कर रहे हैं कि यूजीसी के नए नियमों में झूठी शिकायतों के लिए सज़ा के संबंध में कोई स्पष्ट और सख़्त प्रावधान शामिल नहीं हैं, जिससे उन्हें काफ़ी चिंता हो रही है। विडंबना यह है कि एक ओर तो निचली जातियों के ख़िलाफ़ भेदभाव जारी है और दूसरी ओर, इन्हीं समस्याओं के समाधान के लिए बनाए जा रहे क़ानून का इस आधार पर विरोध किया जा रहा है कि इसमें झूठी शिकायतें दर्ज कराने वालों के लिए कठोर दंड की कोई ठोस गारंटी नहीं है।

पहली नज़र में तो यह तर्क वास्तव में वंचित वर्गों को परेशान करने और डराने-धमकाने को बढ़ावा देता प्रतीत होता है। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि उच्च जाति के समर्थक इन नियमों को मज़बूत करने के बजाय कमज़ोर करना चाहते हैं और इनमें ऐसा प्रावधान जोड़ने पर ज़ोर दे रहे हैं जिसके तहत वे झूठी शिकायतों के नाम पर कार्रवाई कर सकें। दूसरे शब्दों में, यह वंचित और शोषित वर्गों को डराने-धमकाने और चुप कराने तथा उन्हें अपने बुनियादी अधिकारों की मांग करने से रोकने के उद्देश्य से किया गया एक संगठित प्रयास है।

सत्ताधारी लोग अक्सर यह भूल जाते हैं कि भारत का संविधान स्पष्ट रूप से सामाजिक न्याय और शोषितों व दलितों के कल्याण का वादा करता है। संविधान समाज में असमानताओं को दूर करने और समानता के आधार पर समाज का पुनर्निर्माण करने की बात करता है। शोषित वर्गों के लिए न्याय तभी प्राप्त किया जा सकता है जब उनके प्रति पूर्वाग्रह को समाप्त किया जाए, और पूर्वाग्रह को समाप्त करने के लिए सरकार के लिए जाति-आधारित असमानताओं को दूर करना आवश्यक है।

मुख्यधारा का मीडिया अक्सर इस तथ्य को दबा देता है कि हमारा संविधान लोकतंत्र और समानता की बात करता है, जबकि हमारा समाज जातिवाद के दलदल में फंसा हुआ है। सरल शब्दों में कहें तो देश का लोकतंत्र तब तक सफल नहीं हो सकता, जब तक सामाजिक असमानता का उन्मूलन और सामाजिक सुधार नहीं हो जाते।

भारत में जातिगत असमानता सबसे बड़ी सच्चाई है। आज़ादी के लगभग आठ दशक बाद भी ज़मीन पर उच्च जातियों का ही अधिकार है, जबकि दलित, आदिवासी और पिछड़ी जातियां भेदभाव और ग़रीबी से जूझ रही हैं और उनके विकास में बड़ी-बड़ी बाधाएं खड़ी हैं।

जहां एक ओर उच्च जातियों की आबादी कम है, दूसरी ओर संसाधनों पर उनका सबसे अधिक नियंत्रण है। चाहे वह भूमि हो या उद्योग, शैक्षणिक संस्थान हों या सरकारी विभाग, फ़िल्म और संस्कृति की दुनिया हो या धार्मिक संस्थान। आज भी उच्च जातियां अपनी सर्वोच्चता बनाए रखती हैं और समाज की बड़ी आबादी यानी दलितों, आदिवासियों, पिछड़े वर्गों और अल्पसंख्यकों को उनका वाजिब हक़ देने के लिए तैयार नहीं हैं।

जोतीराव फुले से लेकर डॉ. आंबेडकर तक, वे लगातार यही दोहराते रहे कि उच्च जातियों का वर्चस्व और उनकी ‘श्रेष्ठता’ तथा शूद्रों और अतिशूद्रों की ‘गुलामी’ का मुख्य कारण यह था कि शक्तिशाली वर्ग शोषित वर्गों को शिक्षा से दूर रखते थे। हालांकिआज़ादी के बाद और आंबेडकरवादी आंदोलनों के माध्यम से दबे-कुचले वर्गों के शैक्षिक और अन्य अधिकारों के लिए बड़े संघर्ष लड़े गए और स्कूलों, कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों के दरवाज़े उनके लिए खोले गए, मगर यह भी एक बड़ा सच है कि आज भी उच्च जाति के लोग अपने जातिगत नेटवर्क के ज़रिए अपने समुदाय के बच्चों को अच्छे अंक दिलाते हैं और उन्हें नौकरियों में मदद करते हैं, जबकि दलितों, आदिवासियों, पिछड़ी जातियों और अल्पसंख्यकों के बच्चों के साथ भेदभाव किया जाता है और उन्हें प्रोत्साहित करने के बजाय विभिन्न तरीकों से परेशान किया जाता है।

हक़ीक़त यह है कि बहुजन समाज को अभी तक उसका पूरा हक़ नहीं मिला है, लेकिन यूजीसी के इन नियमों का स्वागत और इनमें सुधार करने के बजाय उच्च जाति के लोग इन्हें समाज-विघटनकारी बताकर देश को गुमराह कर रहे हैं। सबसे दुखद बात यह है कि अदालत भी दलित समाज के दर्द और उनके साथ हर दिन हो रहे भेदभाव को दूर करने के बजाय शोर-शराबे वाली बहसों से प्रभावित होती दिख रही है। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने हालिया फ़ैसले में यूजीसी के नियमों पर रोक लगा दी और कहा कि 2012 के नियम लागू रहेंगे।

सामाजिक न्याय विशेषज्ञों का मानना है कि इन नियमों से उच्च जाति के लोग सबसे ज़्यादा परेशान हैं, क्योंकि पहली बार यूजीसी ने जातिगत भेदभाव का सामना करने वाले छात्रों की सूची में दलितों और आदिवासियों के साथ-साथ ओबीसी को भी शामिल किया है। वहीं उच्च जाति के लोग यह अफ़वाह फैला रहे हैं कि ओबीसी एक ‘शक्तिशाली समूह’ है और इसे एससी और एसटी के साथ शामिल नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन सच्चाई यह है कि ओबीसी समाज के लोग आज भी शैक्षणिक संस्थानों में हर दिन भेदभाव का सामना कर रहे हैं और उनकी जनसंख्या के अनुपात में उनका प्रतिनिधित्व अब भी नहीं है।

कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि इन नियमों में कई सुधारों की गुंजाइश है। यूजीसी के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर सुखदेव थोरात ने गत 28 जनवरी को ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ में एक लेख में वर्तमान यूजीसी नियमों में कई कमियों की ओर इशारा किया है। उनके अनुसार, उच्च शिक्षा संस्थानों को इस तरह परिभाषित किया गया है कि कई संस्थान इन नियमों को लागू करने की ज़िम्मेदारी से बच सकते हैं, और यह भी कि 2016 के यूजीसी नियम 2012 के नियमों की तुलना में कमज़ोर हैं। नए नियमों के लागू होने के बाद भी कई प्रकार के भेदभाव समाप्त नहीं होंगे, क्योंकि भेदभाव की सीमाएं बहुत संकीर्ण तरीके से परिभाषित की गई हैं। प्रोफेसर थोरात ने समिति की संरचना पर भी सवाल उठाया और कहा कि इसमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग का कम से कम 50 प्रतिशत प्रतिनिधित्व होना चाहिए, लेकिन वर्तमान यूजीसी नियम इस महत्वपूर्ण प्रश्न पर पूरी तरह मौन हैं।

बहरहाल, भारत जैसे गहरे असमान समाज में, हमें ऐसे नियमों का और उनसे भी बेहतर नियमों का स्वागत करना चाहिए, क्योंकि सामाजिक असमानता को समाप्त करके ही हम एक मज़बूत समाज और एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं। इस पूरी चर्चा में एक बात जिसे कभी नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए, वह यह है कि केवल कानून और नियम बना देना ही पर्याप्त नहीं होता। दूसरे शब्दों में, अधिक कानून होने से अपने आप न्याय की गारंटी नहीं मिल जाती। हमारे देश में अनेक कानून और संस्थाएं हैं जो शोषित और हाशिए पर पड़े समुदायों के अधिकारों की रक्षा का दावा करती हैं, लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि आज भी कमज़ोर वर्गों को पूर्ण न्याय नहीं मिल पाया है।

इसका मुख्य कारण यह है कि कानूनों को ठीक से लागू नहीं किया जाता, और प्रशासनिक व सरकारी स्तर पर राजनीतिक प्रतिबद्धता तथा गंभीरता की स्पष्ट कमी दिखाई देती है।

इस समस्या का प्रभावी समाधान यही है कि नीति-निर्माण और उसके कार्यान्वयन की प्रक्रियाओं में हाशिए पर पड़े समुदायों और जातियों को वास्तविक और सार्थक प्रतिनिधित्व दिया जाए। इसके साथ ही, एक मज़बूत और पारदर्शी व्यवस्था स्थापित की जानी चाहिए, जो प्रशासन को जवाबदेह ठहरा सके।

(संपादन : नवल/अनिल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, संस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

लेखक के बारे में

अभय कुमार

जेएनयू, नई दिल्ली से पीएचडी अभय कुमार संप्रति सम-सामयिक विषयों पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन करते हैं।

संबंधित आलेख

यूजीसी रेगुलेशन : बिहार के चप्पे-चप्पे में दलित-बहुजनों का हल्ला बोल
सिवान जिले के प्रिंस पासवान कहते हैं कि मुट्ठी भर लोगों के विरोध से एक बड़ी आबादी को भेदभाव से सुरक्षा प्रदान करने वाले...
यूजीसी रेगुलेशन : सच्चाई से मुंह मोड़ रहे हैं इसके विरोधी
ऊंची जाति के विद्यार्थियों के साथ भेदभाव की इक्का-दुक्का घटनाएं हो सकती हैं, मगर एससी, एसटी और ओबीसी समुदायों को संरचनात्मक बहिष्करण का सामना...
इलाहाबाद विश्वविद्यालय को हुआ क्या है?
कल 3 फरवरी, 2026 को जो घटना हुई उसने विश्वविद्यालय में व्याप्त जातिवाद को स्पष्ट तौर पर उजागर कर दिया। दिशा छात्र संगठन के...
महाराष्ट्र नगरपालिका चुनाव परिणाम : विपक्ष के लिए फिर एक बार गंभीर सबक
ओबीसी समाज एकसमान नहीं है। वह अनेक जातियों का समूह है। इसलिए पूरे ओबीसी समाज का एक नेता बनना संभव नहीं। भाजपा-संघ ने पहले...
महाराष्ट्र : मोबाइल नेटवर्क की कमी से जूझ रहे नंदुरबार जिले के आदिवासी बहुल गांवों के लोग
रोचमाड़ गांव के ही विठ्ठल पावरा 55 वर्ष के हैं। वे मजदूरी के जरिए जीविकोपार्जन करते हैं। वे कहते हैं कि “पहले गांव में...